रिश्तों का प्रायश्चित

तरुण तुरंत अपनी ससुराल लौटा। उसने नैना से बिना कोई बहस किए केवल इतना कहा, “नैना, तुमने मुझे क्या से क्या बना दिया। मैंने उस परिवार की बलि चढ़ा दी जिसने मुझे जीवन दिया था। अगर तुम्हारे दिल में थोड़ी भी इंसानियत बची है, तो मेरे साथ चलो, वरना आज से हमारे रास्ते अलग हैं।” नैना ने जब तरुण की आंखों में वह पागलपन, पश्चाताप और भयंकर पीड़ा देखी, तो वह भी भीतर तक कांप गई। उसे पहली बार अपनी स्वार्थपरता और संवेदनहीनता का अहसास हुआ कि उसके अहंकार ने एक पूरे हंसते-खेलते परिवार को लील लिया था।

 शारदा ने अपनी उम्र के उन्नीसवें पड़ाव पर कदम ही रखा था कि नियति ने उसके जीवन की दिशा बदल दी। पिता के एक पुराने परिचित के ज़रिए अरविंद का रिश्ता आया। अरविंद एक सरकारी डाक विभाग में वरिष्ठ लिपिक के पद पर कार्यरत थे। वे गंभीर, मितभाषी और अपने कर्तव्यों के प्रति बेहद सजग युवक थे। उनके कंधों पर पूरे परिवार का दारोमदार था क्योंकि अल्पायु में ही उनके सिर से पिता का साया उठ चुका था।

अरविंद की मां जानकी देवी निरंतर अस्वस्थ रहती थीं। उन्हें हर पल यह चिंता सताती थी कि उनके जाने के बाद परिवार बिखर न जाए। अरविंद के छोटे भाई तरुण और बहन रश्मि उस समय स्कूली शिक्षा ले रहे थे। जानकी देवी चाहती थीं कि घर में एक ऐसी बहू आए जो न केवल इस चौखट को संभाले बल्कि अनाथ जैसे हो चुके इन बच्चों को मां का दुलार दे सके। जब शारदा दुल्हन बनकर इस आंगन में आई, तो उसकी विदाई पर उसके पिता ने उसके सिर पर हाथ रखकर बस इतना ही कहा था, “बेटी, अब वे ही तुम्हारा संसार हैं। रिश्तों को जोड़ना सबसे बड़ा तप है।”

पिता के उन शब्दों ने अल्हड़ शारदा को भीतर तक बदल दिया। जो लड़की कभी अपने कमरे की चादर तक ठीक से नहीं बिछाती थी, उसने पूरे घर की बागडोर अपने कोमल हाथों में थाम ली। सुबह के पांच बजे से लेकर देर रात तक शारदा का चक्का घूमता रहता। सास जानकी देवी की दवाइयों का समय याद रखना, बीमार शरीर की मालिश करना और घर के हर कोने को चमका कर रखना उसकी दिनचर्या बन गया। परंतु इन सबसे बढ़कर उसका दिल अपने छोटे देवर तरुण और ननद रश्मि में बसता था।

तरुण उस समय सातवीं कक्षा में पढ़ता था और रश्मि पांचवीं में। शारदा ने कभी उन्हें देवर या ननद की दृष्टि से नहीं देखा, वे उसके लिए उसकी अपनी पहली संतान जैसे थे। सुबह उनके बस्ते सजाना, जूतों पर पॉलिश करना, नाश्ते में उनके मनपसंद पराठे बनाना और स्कूल से लौटते ही दरवाज़े पर मुस्कुराते हुए उनका स्वागत करना—यह सब शारदा के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका था। अरविंद स्वभाव से बहुत गंभीर और अनुशासनप्रिय थे। घर में किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि उनसे सीधे कुछ कह सके। यदि बच्चों को कोई नई किताब चाहिए होती, किसी पिकनिक पर जाना होता या जेब खर्च मांगना होता, तो वे सीधे अपनी भाभी के पल्लू में छिप जाते। शारदा हंसते-हंसते अरविंद के सामने वकालत करती और बच्चों की हर ख्वाहिश पूरी करवाती।

समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। घर की जिम्मेदारियों को निभाते-निभाते शारदा खुद दो बच्चों की मां बनी—बड़ा बेटा मयंक और छोटी बेटी तान्या। परंतु घर में चार बच्चे हो जाने के बाद भी तरुण और रश्मि के प्रति शारदा का स्नेह तनिक भी कम नहीं हुआ। कई बार ऐसा होता कि रसोई में सेब या मिठाइयां कम होतीं, तो शारदा अपने बेटे मयंक को बहला-फुसलाकर वह हिस्सा तरुण और रश्मि की थाली में रख देती। पड़ोस की औरतें अक्सर ताना मारतीं, “शारदा, देवर-ननद कभी अपने नहीं होते, पराए खून पर इतना न्योछावर मत हो।” मगर शारदा हमेशा मुस्कुराकर कहती, “रिश्ते खून से नहीं, भावना और सींचने से अपने बनते हैं। तरुण मेरा देवर बाद में है, पहले मेरा बेटा है।”

तरुण कुशाग्र बुद्धि का था। उसने बारहवीं की परीक्षा उत्कृष्ट अंकों से उत्तीर्ण की और उसका चयन भोपाल के एक प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज में हो गया। उस दिन पूरे मोहल्ले में मिठाइयां बांटी गईं। मेडिकल की पढ़ाई का खर्च बहुत अधिक था। अरविंद के सीमित वेतन में यह सब संभालना नामुमकिन सा लग रहा था। तब शारदा आगे आई। उसने बिना किसी झिझक के अपने विवाह के समय मिले भारी सोने के कंगन और हार अरविंद के हाथों में रख दिए। अरविंद ने संकोच से कहा, “शारदा, यह तुम्हारा स्त्रीधन है, इसे मैं कैसे बेच सकता हूँ?”

शारदा ने आंसुओं भरी आंखों से मगर दृढ़ता से कहा, “सुनिए, जब मेरा तरुण डॉक्टर बनकर गले में आला लटकाकर निकलेगा, तो वह सम्मान मेरे इन कंगन से हज़ार गुना अधिक कीमती होगा। जेवर तो फिर बन जाएंगे, लेकिन मेरे बच्चे का सपना अधूरा नहीं रहना चाहिए।” अरविंद ने नम आंखों से अपनी पत्नी के त्याग को नमन किया। उन जेवरों को बेचकर तरुण की फीस भरी गई।

मेडिकल कॉलेज के अंतिम वर्ष में तरुण का परिचय अपनी सहपाठी नैना से हुआ। नैना एक संपन्न और रसूखदार परिवार की एकलौती बेटी थी। उसके पिता शहर के जाने-माने उद्योगपति थे और उनका स्वयं का एक विशाल निजी अस्पताल था। नैना आधुनिक और स्वतंत्र विचारों की लड़की थी, जिसके लिए पारिवारिक भावनाएं और त्याग जैसी बातें केवल किताबों की चीजें थीं। तरुण और नैना के बीच प्रेम संबंध गहराता गया। जब पढ़ाई पूरी हुई, तो तरुण नैना को लेकर जबलपुर अपने घर आया।

शारदा ने दरवाजे पर थाल सजाकर आरती उतारी और नैना का गृहप्रवेश कराया। परिवार के सभी सदस्यों ने नैना को सहर्ष स्वीकार कर लिया। विवाह बड़े ही धूमधाम से संपन्न हुआ। शादी के बाद नैना के पिता ने तरुण के सामने प्रस्ताव रखा, “बेटा, मैंने शहर में करोड़ों की लागत से एक नया मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल बनवाया है। मैं चाहता हूँ कि तुम और नैना मिलकर उसकी बागडोर संभालो और हमारे साथ शहर की पॉश कॉलोनी में ही रहो।”

उस समय तरुण के भीतर का संस्कार जीवित था। उसने हाथ जोड़कर विनम्रता से कहा, “बाबूजी, मेरे भैया और भाभी ने अपना पेट काटकर मुझे डॉक्टर बनाया है। आज मैं जिस मुकाम पर हूँ, वह उनकी तपस्या का फल है। मैं उन्हें छोड़कर कहीं नहीं जा सकता। मैं इसी कस्बे में रहकर अपने कस्बे के लोगों और अपने परिवार की सेवा करूंगा।”

तरुण का यह फैसला नैना को रास नहीं आया। वह अनमने मन से उस साधारण घर में आ तो गई, लेकिन उसका मन कभी उस परिवार से नहीं जुड़ सका। वह सुबह ग्यारह बजे से पहले अपने कमरे से बाहर नहीं निकलती थी। घर के किसी काम में हाथ बंटाना तो दूर, वह परिवार के लोगों के साथ बैठकर चाय तक पीना अपनी तौहीन समझती थी। जब जानकी देवी कभी उससे कहतीं, “बहू, थोड़ा समय रसोई में भी दिया करो, शारदा अकेली कब तक खटेगी,” तो शारदा तुरंत बीच में आकर बात संभाल लेती, “अरे मां जी, रहने दीजिए ना। अभी नई-नई आई है, धीरे-धीरे सब सीख जाएगी। और फिर पढ़ाई-लिखाई करके आई है, थक जाती होगी।”

परंतु शारदा की इस सादगी और ममता को नैना ने उसकी कमजोरी समझ लिया। वह शारदा के साथ घर के नौकरों जैसा बर्ताव करने लगी। कभी पानी का गिलास जोर से मेज पर पटकना, तो कभी बनाए हुए खाने में सौ कमियां निकालना उसकी आदत बन गई। घर का माहौल दिन-ब-दिन घुटन भरा होता जा रहा था। तरुण भी अब धीरे-धीरे नैना के प्रभाव में आने लगा था। नैना रात-दिन उसके कान भरती, “तुम्हारे भैया-भाभी ने तुम पर कोई एहसान नहीं किया, हर बड़ा भाई छोटे के लिए करता है। तुम एक बड़े डॉक्टर हो और यहाँ इस तंगहाली में तुम्हारी जिंदगी बर्बाद हो रही है। तुम्हारे भाई का रुतबा तुम्हारे आगे कुछ भी नहीं है, फिर भी वे तुम पर हुक्म चलाते हैं।”

जहर का असर धीरे-धीरे दिखने लगा था। एक शाम बात तब बहुत बिगड़ गई जब नैना ने शारदा की बेटी तान्या को एक साधारण सी बात पर जोर से डांट कर रोने के लिए छोड़ दिया और शारदा को खरी-खोटी सुनाने लगी। उस दिन अरविंद का धैर्य टूट गया। उन्होंने पहली बार कड़े स्वर में तरुण से कहा, “तरुण, अगर तुम्हारी पत्नी इस घर की मर्यादा और अपनी भाभी का सम्मान नहीं कर सकती, तो बेहतर यही होगा कि तुम दोनों यहाँ से चले जाओ। जिस चौखट ने तुम्हें इंसान बनाया, उस पर अहंकार के पैर मत रखो।”

यही तो नैना चाहती थी। उसने तुरंत अपना सामान समेटा और रोने का नाटक करते हुए तरुण से कहा कि अब वह इस घर में एक पल भी नहीं रह सकती। तरुण अंधे मोह में इतना डूब चुका था कि उसने अपने भाई के त्याग और भाभी के आंसुओं की तरफ देखा तक नहीं। वह नैना के साथ उसके पिता के बंगले पर चला गया और ससुर के आलीशान अस्पताल का मुख्य निदेशक बन गया।

शहर की चकाचौंध और ससुर की दौलत ने तरुण की आंखों पर पट्टी बांध दी थी। नैना हर रोज उसे भड़काती कि पुश्तैनी जायदाद में उसका भी आधा हक है। आखिरकार, एक दिन तरुण अपनी पुरानी चौखट पर लौटा, लेकिन एक भाई बनकर नहीं, बल्कि एक हिस्सेदार बनकर। उसने अरविंद के सामने खड़े होकर कठोर स्वर में कहा, “भैया, मुझे इस घर और जमीन में मेरा कानूनी हिस्सा चाहिए। मैं अपना शेयर लेकर नैना के नाम से एक नया रिसर्च विंग शुरू करना चाहता हूँ।”

यह सुनकर बूढ़ी मां जानकी देवी की चीख निकल गई। वे थरथराते हुए उठीं और तरुण के सामने आकर बोलीं, “अरे निर्लज्ज! कौन सा हिस्सा मांगने आया है तू? जब तेरे पिता नहीं रहे, तो इस शारदा ने अपने गहने बेचकर तेरी डिग्रियां खरीदी थीं। आज तू अपनी सगी बहन रश्मि की शादी में भी नहीं आया, जिसे तू अपनी जान कहता था! और आज यहाँ हिस्सा मांगने खड़ा हो गया? निकल जा इस घर से, हमारा कोई बेटा नहीं है!”

तरुण का चेहरा तमतमा उठा। माहौल में गहरा सन्नाटा और तनाव था। तभी शारदा अपनी आंसुओं से भीगी आंखों को पोंछते हुए आगे आई। उसने तरुण के कंधे पर हाथ रखने की कोशिश की, मगर तरुण थोड़ा पीछे हट गया। शारदा का दिल तार-तार हो गया, फिर भी उसने अपने चेहरे पर ममता बटोरते हुए कहा, “तरुण, तुम उत्तेजित मत हो बेटा। यह घर, यह जमीन सब तुम्हारी ही है। अगर तुम्हें पैसों की जरूरत है, तो हम सब कुछ बेचकर तुम्हें दे देंगे। तुम बस खुश रहो।” लेकिन तरुण बिना कुछ कहे पैर पटकता हुआ अपनी महंगी गाड़ी में बैठकर चला गया।

उस दिन के बाद से उस घर पर दुखों का ऐसा पहाड़ टूटा जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। कुछ ही महीनों बाद शारदा का बारह वर्षीय बेटा मयंक अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। उसे तेज बुखार और सांस लेने में भारी तकलीफ होने लगी। स्थानीय कस्बे के डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए और कहा कि इसे तुरंत शहर के सबसे बड़े अस्पताल में ले जाना होगा, जहां वेंटिलेटर और आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हों।

अरविंद बेसुध होकर अपने बच्चे को एम्बुलेंस में डालकर शहर के उसी बड़े अस्पताल पहुंचे, जिसका संचालन तरुण करता था। अस्पताल की भव्य इमारत के आगे खड़े होकर अरविंद ने राहत की सांस ली कि उनका अपना भाई यहाँ का मुख्य डॉक्टर है, उनका बच्चा बच जाएगा। अरविंद बदहवास हालत में रिसेप्शन से सीधे तरुण के केबिन की ओर भागे। बाहर खड़े सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें रोक लिया। अरविंद ने हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हुए कहा, “अंदर मेरा भाई तरुण है, उसे बोलो कि उसका भतीजा मयंक बाहर जिंदगी और मौत से लड़ रहा है।”

सुरक्षाकर्मी ने अंदर जाकर संदेश दिया। उस समय तरुण एक महत्वपूर्ण मेडिकल बोर्ड की मीटिंग में था और नैना भी वहां मौजूद थी। जब संदेश मिला, तो नैना ने तरुण का हाथ पकड़ लिया और फुसफुसाई, “अगर तुमने आज उनकी मदद की, तो वे फिर से जायदाद और एहसानों का रोना रोएंगे। मीटिंग छोड़कर मत जाना।” तरुण कुछ पलों के लिए झिझका, मगर झूठी प्रतिष्ठा और पत्नी के दबाव में आकर उसने संदेश भिजवा दिया कि वह अभी बहुत व्यस्त है, मरीज को इमरजेंसी वार्ड में नियमानुसार भर्ती कराया जाए और तय फीस जमा कराई जाए।

इमरजेंसी वार्ड में डॉक्टरों ने औपचारिकताएं पूरी करने और भारी भरकम राशि जमा करने की मांग रख दी। अरविंद के पास उस समय उतने पैसे नहीं थे। वे अस्पताल के गलियारों में पागलों की तरह दौड़ते रहे, तरुण से मिलने की भीख मांगते रहे, मगर तरुण अपने केबिन से बाहर नहीं निकला। समय बीतता गया और उचित व त्वरित उपचार न मिलने के कारण मयंक ने अस्पताल के स्ट्रेचर पर ही दम तोड़ दिया।

जब यह खबर घर पहुंची, तो लगा जैसे पूरे परिवार की आत्मा ही मर गई हो। अपने मासूम पोते की असमय मृत्यु का सदमा अस्वस्थ जानकी देवी बर्दाश्त नहीं कर सकीं। मयंक के अंतिम संस्कार के तीन दिन बाद ही उन्होंने भी दम तोड़ दिया। एक ही हफ्ते में दो अर्थियां उठने से पूरा घर श्मशान बन गया। अरविंद पूरी तरह टूट चुके थे। उनके भीतर जीने की कोई इच्छा शेष नहीं बची थी। वे दिन-रात चुपचाप दीवार को घूरते रहते। शारदा अपने सीने में ज्वालामुखी दबाए, अपनी छह साल की बेटी तान्या के सिर पर हाथ फेरती और पति को ढांढस बंधाने की कोशिश करती। मगर अरविंद का दिल अंदर से फट चुका था। एक रात वे सोए, तो अगली सुबह फिर कभी नहीं उठे। दिल का दौरा पड़ने से वे भी इस क्रूर संसार को अलविदा कह गए।

अब उस वीरान ‘मातृछाया’ में केवल दो बेसहारा जिंदगियां बची थीं—शारदा और उसकी मासूम बेटी तान्या। शारदा के आंसुओं का पानी अब सूख चुका था। उसकी आंखों में केवल एक गहरा, शांत शून्य था। उसने किसी से कोई शिकायत नहीं की, किसी के आगे हाथ नहीं फैलाए। उसने एक वकील को बुलाया और चुपचाप घर, जमीन और अरविंद के प्रोविडेंट फंड से मिले सभी कागजात तैयार करवाए। उसने अपनी पूरी संपत्ति कानूनी तौर पर तरुण के नाम हस्तांतरित कर दी।

इसके बाद, शारदा ने अपनी और तान्या की कुछ पुरानी साड़ियां और किताबें एक छोटे से बक्से में रखीं और रात के अंधेरे में उस घर की चौखट को अंतिम बार प्रणाम करके हमेशा के लिए वहां से निकल गई।

कुछ दिनों बाद तरुण के नाम एक रजिस्टर्ड पार्सल पहुंचा। जब उसने लिफाफा खोला, तो उसमें उस पुश्तैनी घर और जमीन के सारे मालिकाना हक के मूल दस्तावेज थे। दस्तावेजों के साथ एक सादे कागज पर शारदा की कांपती हुई लिखावट में एक पत्र भी था।

पत्र में लिखा था:“प्रिय तरुण,जीते रहो। तुम्हारा हिस्सा तुम्हें मुबारक हो। जिस जमीन और मकान के लिए तुमने हमसे दूरियां बनाई थीं, वह सब आज से पूर्ण रूप से तुम्हारा है। मेरे पास अब खोने के लिए कुछ नहीं बचा। तुम्हारे भैया चले गए, मां जी चली गईं और मेरा मयंक भी इस दुनिया में नहीं रहा। मैंने अपने दोनों बेटों को खो दिया—एक को काल ने छीन लिया और दूसरे को उसकी अपनी महत्वाकांक्षा ने।मैं यह शहर छोड़कर बहुत दूर जा रही हूँ। बस ईश्वर से एक ही प्रार्थना है कि तुम जहाँ रहो, सुखी रहो। यदि कभी समय मिले और तुम्हारा मन करे, तो अपनी छोटी बहन रश्मि के घर चले जाना। तीज-त्यौहार पर उसके सिर पर हाथ रख देना, क्योंकि अब इस दुनिया में उसका कोई भाई या पिता नहीं बचा, यह फर्ज अब तुम्हें ही निभाना होगा। तुम्हें किसी बात का दोष नहीं देती, शायद मेरी ममता में ही कोई कमी रह गई थी। खुश रहना बेटा।”

उस पत्र को पढ़ते ही तरुण के पैरों तले से जमीन खिसक गई। उसके हाथ कांपने लगे और वह थरथरा कर कुर्सी पर गिर पड़ा। “भैया नहीं रहे? मां जी चली गईं? मयंक मर गया?” ये शब्द उसके दिमाग में हथौड़े की तरह बजने लगे। एक भयानक सन्नाटे ने उसकी चेतना को झकझोर कर रख दिया। वह गाड़ी उठाकर पागलों की तरह दौड़ा और सीधे अपनी बहन रश्मि की ससुराल पहुंचा।

जब तरुण रश्मि के घर के दरवाजे पर पहुंचा, तो रश्मि ने उसे देखा। रश्मि की आंखों में भाई के लिए कोई प्यार नहीं था, केवल नफरत और तिरस्कार की ज्वाला थी। तरुण ने रोते हुए पूछा, “रश्मि! यह सब क्या हो गया? भैया और मां कहाँ हैं? मयंक को क्या हुआ था?”

रश्मि ने अपनी आंखों से बहते आंसुओं को रोकते हुए अत्यंत तीखे स्वर में कहा, “दूर रहो मुझसे! तुम्हें पूछने का कोई हक नहीं है। जिस दिन तुम्हारे अस्पताल के दरवाजे पर भैया अपने फूल जैसे बच्चे को गोद में लेकर गिड़गिड़ा रहे थे, उस दिन तुम्हारी व्यस्तता ने मेरे भतीजे की जान ले ली! तुम्हारे पास अपने ही खून के इलाज के लिए दो मिनट का समय नहीं था। मयंक के गम में दादी चल बसीं और अपने जवान बेटे और मां की मौत का गम भैया का कलेजा चीर गया। वे सोते-सोते ही चले गए!”

रश्मि की आवाज ऊंची होती गई, “और भाभी? वही भाभी जिसने अपने सारे गहने बेचकर तुम्हें इस काबिल बनाया कि आज तुम बड़े डॉक्टर बन सको! उन्होंने अपना पेट काटकर तुम्हें खिलाया था। आज वही भाभी शहर के एक गंदे और तंग स्लम इलाके में एक छोटे से सीलन भरे कमरे में रह रही हैं। लोगों के फटे-पुराने कपड़े सिल-सिलकर तुम्हारी उस छोटी सी भतीजी तान्या का पेट पाल रही हैं! जाओ और मनाओ अपनी दौलत का जश्न! मेरा केवल एक ही पिता समान भाई था, जो मर गया। तुम तो कोई निर्दयी अजनबी हो!”

रश्मि के एक-एक शब्द तरुण की छाती में तीर की तरह चुभ रहे थे। उसे लगा जैसे उसके चारों तरफ आग की लपटें उठ रही हों। अहंकार, दौलत और प्रतिष्ठा का वह नशीला पर्दा एक ही झटके में उसकी आंखों से उतर गया। उसे अपनी मां का चेहरा, भैया के वे मजबूत कंधे और भाभी का वह ममतामयी आंचल याद आने लगा, जिसकी छांव में उसका पूरा बचपन बीता था। उसने खुद को दुनिया का सबसे घृणित और पापी इंसान महसूस किया।

तरुण तुरंत अपनी ससुराल लौटा। उसने नैना से बिना कोई बहस किए केवल इतना कहा, “नैना, तुमने मुझे क्या से क्या बना दिया। मैंने उस परिवार की बलि चढ़ा दी जिसने मुझे जीवन दिया था। अगर तुम्हारे दिल में थोड़ी भी इंसानियत बची है, तो मेरे साथ चलो, वरना आज से हमारे रास्ते अलग हैं।” नैना ने जब तरुण की आंखों में वह पागलपन, पश्चाताप और भयंकर पीड़ा देखी, तो वह भी भीतर तक कांप गई। उसे पहली बार अपनी स्वार्थपरता और संवेदनहीनता का अहसास हुआ कि उसके अहंकार ने एक पूरे हंसते-खेलते परिवार को लील लिया था।

तरुण और नैना ने शहर के उस पिछड़े इलाके की खाक छानी। गलियों में भटकते-भटकते, आखिरकार एक टूटे-फूटे मकान के बाहर उन्हें एक पुरानी सिलाई मशीन की चरमराहट सुनाई दी। तरुण ने कांपते कदमों से भीतर झांका।

सामने फटे हुए फर्श पर एक पुरानी चटाई बिछी थी। कोने में एक दीया जल रहा था। सफेद सूती साड़ी पहने शारदा झुकी हुई नजरों से एक कपड़े पर तुरपाई कर रही थी। उसके चेहरे पर गहरी झुर्रियां पड़ चुकी थीं और वह अपनी उम्र से बीस साल बड़ी दिख रही थी। पास ही छोटी तान्या सूखी रोटी का एक टुकड़ा पानी में डुबोकर खा रही थी।

यह दृश्य देखकर तरुण की आत्मा चीत्कार कर उठी। वह आगे बढ़ा और एक झटके में शारदा के पैरों पर गिर पड़ा। उसने अपनी दोनों बाहों से शारदा के पैरों को जकड़ लिया और फूट-फूट कर रोने लगा। उसके आंसुओं से शारदा के नंगे पैर भीगने लगे।

“भाभी मां! मुझे मार डालिए! मुझे जान से खत्म कर दीजिए! मैं आपका गुनहगार हूँ! मैं राक्षस हूँ जिसने अपने ही हाथों से अपने घर को उजाड़ दिया! मुझे सजा दीजिए भाभी, लेकिन मुझे अपनी ममता से बेदखल मत कीजिए!” तरुण हिचकियों के बीच पागलों की तरह विलाप कर रहा था।

पीछे खड़ी नैना भी अपनी साड़ियों के पल्लू से मुंह ढक कर घुटनों के बल बैठ गई और रोते हुए बोली, “दीदी, मुझे क्षमा कर दीजिए। मेरे घमंड ने सब कुछ तबाह कर दिया। मैं आपकी अपराधी हूँ।”

शारदा ने धीरे से अपनी सिलाई रोक दी। उसने अपने कंपकंपाते हाथों से तरुण के आंसुओं से भीगे सिर को उठाया। उसकी अपनी आंखों से भी गंगा-जमुना बह निकली। उसने तरुण के गालों को छुआ। वही तरुण, जिसे उसने बचपन में गोद में खिलाया था, जिसके घावों पर उसने अपनी साड़ियों के छोर बांधे थे।

शारदा ने रुंधे हुए गले से कहा, “उठो तरुण… उठो बेटा। एक मां कभी अपने बच्चे से ज्यादा देर तक नाराज नहीं रह सकती। जो भाग्य में लिखा था, वह हुआ। तुम्हारे भैया और मयंक अब लौट कर नहीं आ सकते, लेकिन अगर तुम इस तरह टूट जाओगे, तो उनकी आत्मा को शांति कैसे मिलेगी? मैंने तुम्हें माफ किया बेटा… मैंने तुम्हें कभी पराया माना ही नहीं था।”

तरुण ने रोते हुए शारदा का हाथ पकड़ा और कहा, “भाभी, चलिए हमारे साथ। वह घर आपका है। अब यह जिंदगी केवल आपके और तान्या के चरणों की सेवा में बीतेगी। मैं अपनी अंतिम सांस तक अपने गुनाहों का प्रायश्चित करूंगा।”

शारदा ने एक पल के लिए इनकार करना चाहा, उसने कहा कि उस वीरान घर में अब केवल सन्नाटा और पुरानी यादों का दर्द है। मगर तभी नैना आगे बढ़ी और उसने तान्या को अपनी गोद में उठा लिया। नैना ने हाथ जोड़कर कहा, “दीदी, अगर आप नहीं चलेंगी, तो हम भी इसी चौखट पर अपनी जान दे देंगे। हमें अपने पापों का प्रायश्चित करने का एक मौका दीजिए।”

शारदा ने जब उन दोनों की आंखों में सच्चा पश्चाताप और पीड़ा देखी, तो उसका मातृ-हृदय फिर से पिघल गया। वह अपनी बच्ची का हाथ पकड़कर उनके साथ उसी ‘मातृछाया’ में लौट आई।

घर लौटकर तरुण ने सबसे पहले उन सभी संपत्ति के कागजातों को एक कानूनी वसीयत में बदलवाया, जिसके अनुसार वह पूरी संपत्ति और उस अस्पताल का एक बड़ा हिस्सा शारदा और तान्या के नाम कर दिया गया। तरुण ने अस्पताल में गरीबों के निःशुल्क इलाज के लिए एक नया ट्रस्ट बनाया और उसका नाम ‘मयंक-अरविंद सेवा सदन’ रखा।

तरुण ने घर के मुख्य द्वार पर खड़े होकर पूरे मोहल्ले और अपनी बहन रश्मि के सामने सिर झुकाकर कहा, “यह घर, यह परिवार और मेरा यह जीवन केवल मेरी भाभी मां का है और सदा उन्हीं का रहेगा। तान्या मेरी बेटी है, और इसकी हर सांस की जिम्मेदारी अब मेरी है।”

घर के बैठक की दीवार पर अरविंद और जानकी देवी की तस्वीरों पर ताजे फूलों की मालाएं लटकी थीं। उन शांत तस्वीरों से मानो वे दोनों अपलक देख रहे थे—आंखों में एक गहरा दर्द था कि काश यह सद्बुद्धि समय रहते आ गई होती, तो यह संसार उजड़ने से बच जाता, मगर साथ ही एक संतोष भी था कि भटका हुआ बेटा आखिरकार अपनी जड़ों और ममता की छांव में लौट आया था।

विचारणीय प्रश्न: अक्सर इंसान धन-दौलत और झूठी प्रतिष्ठा की अंधी दौड़ में उन पवित्र रिश्तों की आहुति दे देता है, जिन्होंने उसे चलना सिखाया था। क्या वक्त रहते अपनी गलतियों का अहसास हो जाना और पश्चाताप करना इंसान को दोबारा उसी सम्मान का हकदार बना देता है? क्या एक टूटे हुए परिवार की भरपाई केवल संपत्ति और आंसुओं से संभव है? अपनी अमूल्य राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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