संस्कार की छांव

अन्नपूर्णा जी ने अपने पल्लू के छोर से आंख का एक आंसू पोंछा। यह दुख का आंसू नहीं था, बल्कि तृप्ति और कृतज्ञता का मोती था। उन्होंने हाथ जोड़कर मन ही मन ठाकुर जी को नमन किया और बोलीं, “आप बिल्कुल सच कह रहे हैं। जब हम दूसरों को वही मान-सम्मान देते हैं जिसके हम खुद हकदार बनना चाहते हैं, तो ईश्वर हमारे दामन को खुशियों से भर देता है। आज समर की दुल्हन भी इस देहरी पर कदम रखेगी, तो मुझे पूरा विश्वास है कि मीनाक्षी और वंदना उसे सास बनकर नहीं, बल्कि मां बनकर संभालेंगी। हमारा यह संस्कार यूं ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी बहता रहेगा।”

  आज घर के सबसे बड़े पोते, समर की शादी थी। शहनाई की मधुर तान कानों में रस घोल रही थी, और घर के हर कोने से उठती मंगल गीतों की गूंज इस बात की गवाही दे रही थी कि यह सिर्फ दो इंसानों का मिलन नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों की खुशियों का महापर्व था।

समर ने अपनी पहली कमाई और शादी की खुशी में दादा-दादी के लिए खुद बाजार जाकर कपड़े चुने थे। ओंकारेश्वर जी के तन पर तसर रेशम का बादामी कुरता और जरदोजी काम वाली शॉल खूब फब रही थी, वहीं अन्नपूर्णा जी गहरे लाल रंग की बनारसी सिल्क साड़ी में किसी मंदिर की देवी की भांति गरिमामयी लग रही थीं। समर जब सुबह उनके चरण छूने आया था, तो उसने बड़े लाड़ से कहा था, “दादी, जब तक आप दोनों मेरी पसंद के इन कपड़ों में सजकर सामने नहीं बैठेंगे, तब तक बारात का सेहरा नहीं बंधेगा।”

आंगन में चहल-पहल का समंदर उमड़ रहा था। बड़ी बहू मीनाक्षी चांदी के थाल में कुमकुम, अक्षत और दूर्वा सजाए दौड़ रही थीं, तो छोटी बहू वंदना हलवाइयों के पास जाकर मेवों की शुद्धता परख रही थी। इसी बीच, ससुराल से आई दोनों बेटियां, रोहिणी और शालिनी, अपनी भाभियों के पीछे-पीछे हंसी-मजाक करते हुए घूम रही थीं। रोहिणी ने छुपके से मीनाक्षी की कमर में चुटकी काटी, “अरे भाभी, समर की शादी में तो आप दूल्हे की मां कम और उसकी बड़ी बहन ज्यादा लग रही हैं! भैया से जरा संभल कर रहने को कहिएगा।”

मीनाक्षी ने हंसते हुए थाल एक हाथ में संभाला और बनावटी गुस्से से बोली, “चल हट नटखट! अपनी तारीफ का बहाना ढूंढ रही है। जा, पहले देख समर के चाचा तैयार हुए या नहीं, वरना बारात का मुहूर्त निकल जाएगा।”

पास ही खड़ी छोटी बहू वंदना ने शालिनी का पल्लू खींचते हुए कहा, “जीजी, आपकी ननद वाली रौब झाड़ने की उम्र अब गई। आज तो हम दोनों भाभियों ने तय किया है कि आपको और रोहिणी दीदी को बारात में सबसे आगे नचाएंगे।” चारों औरतों के खिलखिलाते ठहाके जब आंगन में गूंजे, तो हवेली की दीवारें भी मानो मुस्कुरा उठीं। कहीं कोई शिकवा नहीं, न तानों की चुभन, न मायके-ससुराल का कोई पर्दा। बस एक अगाध, निश्छल प्रेम की सरिता बह रही थी।

दालान में बैठे ओंकारेश्वर जी ने अपनी जीवनसंगिनी के कंधे पर धीरे से हाथ रखा। उनकी आंखें भीगी हुई थीं, पर होठों पर गर्व भरी मुस्कान थी। वे धीमे स्वर में बोले, “देख रही हो अन्नपूर्णा? यह आंगन, यह हमारा भरा-पूरा परिवार… यह वंश वृक्ष आज कितना हरा-भरा और फूला-फला दिख रहा है। इसकी एक-एक टहनी खुशबू बिखेर रही है। पर सच कहूं, तो इस वृक्ष की जड़ें तुम हो।”

अन्नपूर्णा जी ने पति की ओर देखा और संकोच से मुस्कुरा दीं, “मैं अकेले क्या करती? अगर आपका साथ और भरोसा न होता।”

“नहीं अन्नपूर्णा,” ओंकारेश्वर जी ने टोकते हुए कहा, “याद करो वह दिन, जब तीस साल पहले मीनाक्षी इस घर की पहली बहू बनकर आई थी। वह एक छोटे से कस्बे से आई थी, सहमी हुई, डरी हुई। लोगों ने तुमसे कहा था कि बहू को शुरू से दबाकर रखना, वरना सिर चढ़ जाएगी। पर तुमने क्या किया था? तुमने उसकी पहली गलती पर उसे डांटने के बजाय अपनी छाती से लगा लिया था। जब रोहिणी की शादी हुई, तो तुमने जितना रोहिणी को दिया, उससे एक रत्ती कम मीनाक्षी को नहीं दिया। तुमने कभी अपनी जुबान से यह शब्द निकलने ही नहीं दिया कि यह बेटी है और यह पराई बेटी।”

अन्नपूर्णा जी अतीत की उन पुरानी पगडंडियों में खो गईं। शादी के शुरुआती दिन उनके लिए भी आसान नहीं थे। उन्होंने अपने समय में सास-बहू के झगड़े, बेटियों और बहुओं के बीच की गहरी दीवारें देखी थीं। उन्होंने देखा था कि कैसे एक ही छत के नीचे रहने वाले लोग एक-दूसरे के पराए हो जाते हैं। जब उनके घर में बहुएं आने लगीं, तो उन्होंने अपने मन में एक प्रतिज्ञा की थी—जो पीड़ा उन्होंने कभी अपने पुराने दिनों में सही थी, उसकी छाया भी वे अपनी बहुओं पर नहीं पड़ने देंगी।

जब मीनाक्षी आई, तो अन्नपूर्णा जी ने उसे रसोई की मालकिन बनाने से पहले अपने दिल की मालकिन बनाया। वे अक्सर कहती थीं, “बेटी तो अपनी मर्जी से इस घर में पैदा हुई थी, पर बहू तो अपना पूरा संसार, अपने मां-बाप, अपनी पहचान छोड़कर सिर्फ हमारे एक बुलावे पर हमारे कुल को अपना मानकर आ गई। अगर हम उसे बेटी से दोगुना प्यार नहीं देंगे, तो यह ईश्वर के साथ अन्याय होगा।”

कुछ सालों बाद जब छोटी बहू वंदना आई, तो कई रिश्तेदारों ने कान भरने की कोशिश की थी कि ‘बड़ी बहू पुरानी है, छोटी नई है, दोनों में जेठानी-देवरानी का मुकाबला होगा।’ पर अन्नपूर्णा जी ने दोनों को पास बिठाकर तिजोरी की चाबियां उनके हाथों में थमा दी थीं और कहा था, “यह घर मेरा नहीं, तुम दोनों का है। रोहिणी और शालिनी तुम्हारी बहनें हैं। अगर तुम दोनों एक रहोगी, तो इस घर का कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता।”

आज उसी सीख का फल सामने था। ननद जब मायके आतीं, तो भाभियों के लिए तोहफे लातीं, और भाभियां महीनों पहले से ननदों की पसंद के पकवानों की तैयारी शुरू कर देती थीं। कभी किसी बात पर अगर कोई मनमुटाव का हल्का सा बादल घिरता भी, तो अन्नपूर्णा जी बीच में आकर फैसला नहीं सुनाती थीं, बल्कि दोनों को एक साथ बैठाकर प्यार से समझाती थीं कि रिश्तों में झुकना हारना नहीं, बल्कि रिश्ते को बचाना होता है।

ओंकारेश्वर जी अपनी यादों की लड़ी जोड़ते हुए आगे बोले, “लोग कहते हैं कि स्वर्ग मरने के बाद मिलता है, बादलों के पार कहीं कोई सुंदर लोक है। पर मैं कहता हूं अन्नपूर्णा, जिसने अपनी गृहस्थी में ऐसा प्रेम देख लिया, उसे किसी दूसरे स्वर्ग की क्या तृष्णा होगी? हमने अपनी आंखों से जीते-जी स्वर्ग देख लिया। बहुएं बेटियों की तरह सम्मान दे रही हैं, बेटियां भाभियों को अपनी सगी बहनों से बढ़कर मानती हैं। हमारे नाती-पोते इस संस्कार की छांव में पलकर बड़े हो रहे हैं। एक इंसान को अपने जीवन की सांझ में इससे बड़ी पूंजी और क्या चाहिए?”

अन्नपूर्णा जी ने अपने पल्लू के छोर से आंख का एक आंसू पोंछा। यह दुख का आंसू नहीं था, बल्कि तृप्ति और कृतज्ञता का मोती था। उन्होंने हाथ जोड़कर मन ही मन ठाकुर जी को नमन किया और बोलीं, “आप बिल्कुल सच कह रहे हैं। जब हम दूसरों को वही मान-सम्मान देते हैं जिसके हम खुद हकदार बनना चाहते हैं, तो ईश्वर हमारे दामन को खुशियों से भर देता है। आज समर की दुल्हन भी इस देहरी पर कदम रखेगी, तो मुझे पूरा विश्वास है कि मीनाक्षी और वंदना उसे सास बनकर नहीं, बल्कि मां बनकर संभालेंगी। हमारा यह संस्कार यूं ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी बहता रहेगा।”

तभी आंगन से समर की आवाज आई, “दादू! दादी! चलिए, बारात निकलने का समय हो गया, पहले आप दोनों का आशीर्वाद चाहिए!”

दोनों बुजुर्ग मुस्कुराते हुए अपनी कुर्सियों से उठे। दोनों बहुओं ने आगे बढ़कर सास-ससुर के हाथ थाम लिए और बेटियां उनके पीछे आंचल संभालते हुए चलने लगीं। उस भरे-पूरे आंगन में हर चेहरा आत्मविश्वास, सुकून और अपनत्व से चमक रहा था। वास्तव में, जहां बहुओं को बेटी का मान और बेटियों को भाभियों का सत्कार मिलता है, वह घर केवल ईंट-पत्थरों का मकान नहीं रहता, साक्षात प्रेम का तीर्थ बन जाता है।

हर सास यदि अपनी बहू में अपनी ही बेटी का अक्स देखने लगे और हर बहू अपनी सास में अपनी मां का दुलार ढूंढे, तो क्या आज भी हर घर ऐसा ही खुशहाल स्वर्ग नहीं बन सकता? आपकी इस बारे में क्या राय है, हमें अपनी सोच जरूर बताएं।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद

error: Content is protected !!