संतान सुख 

एक छोटे से शहर में राजेश और मीरा नाम का दंपति रहता था। दोनों एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे। उनके घर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी। अच्छा घर, अच्छी नौकरी और सुख-सुविधाओं के सभी साधन थे। लेकिन उनके जीवन में एक कमी थी, जो हर खुशी के बीच उन्हें अधूरा महसूस कराती थी। वह कमी थी संतान की।

शादी के दस साल बीत चुके थे, लेकिन उनके आँगन में बच्चे की किलकारी नहीं गूँजी थी। मीरा हर त्योहार पर भगवान से एक ही प्रार्थना करती, “हे प्रभु! मुझे भी माँ बनने का सुख प्रदान करना।” रिश्तेदारों और पड़ोसियों की बातें उसे अंदर तक दुखी कर देती थीं। कई बार लोग बिना सोचे-समझे पूछ लेते, “अभी तक कोई खुशखबरी नहीं मिली?” मीरा मुस्कुराकर बात टाल देती, लेकिन अकेले में उसकी आँखें भर आतीं।

राजेश हमेशा मीरा का साथ देता था। वह कहता, “मीरा, हमारा रिश्ता किसी बच्चे पर निर्भर नहीं है। हम एक-दूसरे के लिए ही पूरी दुनिया हैं।” लेकिन वह जानता था कि मीरा के दिल में माँ बनने की इच्छा कितनी गहरी है।

एक दिन मीरा मंदिर से लौट रही थी। रास्ते में उसे एक अनाथालय दिखाई दिया। वहाँ से बच्चों के हँसने और खेलने की आवाजें आ रही थीं। वह कुछ देर वहीं रुक गई। तभी एक छोटी-सी बच्ची दौड़कर उसके पास आई और उसका हाथ पकड़कर बोली, “आंटी, आप मुझसे मिलने फिर आएँगी न?”

उस मासूम सवाल ने मीरा के दिल को छू लिया। वह घर लौटी और राजेश को सारी बात बताई। दोनों ने अनाथालय जाने का निर्णय लिया।

अगले रविवार वे अनाथालय पहुँचे। वहाँ उनकी मुलाकात पाँच साल की एक बच्ची, परी से हुई। परी बहुत प्यारी और समझदार थी। उसकी आँखों में अपनेपन की तलाश थी। वह मीरा के पास बैठकर बोली, “क्या आप मेरी मम्मी बनेंगी?”

मीरा की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने परी को गले लगा लिया। राजेश ने भी उसे प्यार से अपनी गोद में उठा लिया।

कुछ महीनों की कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद परी उनके परिवार का हिस्सा बन गई। अब घर में उसकी हँसी गूँजती थी। दीवाली पर वह दीये सजाती, जन्मदिन पर केक काटती और रात को मीरा से कहानी सुनकर सोती।

एक दिन परी ने मीरा से पूछा, “मम्मी, क्या मैं आपके पेट से पैदा नहीं हुई थी, इसलिए आप मुझसे कम प्यार करती हैं?”

मीरा ने उसे कसकर गले लगाया और कहा, “बेटा, बच्चे का जन्म शरीर से होता है, लेकिन माँ का जन्म तो उसके प्यार से होता है। तुम मेरी कोख से नहीं, लेकिन मेरे दिल से जन्मी हो।”

यह सुनकर परी मुस्कुराई और मीरा के गले लग गई।

उस दिन मीरा को समझ आया कि संतान सुख केवल बच्चे को जन्म देने में नहीं, बल्कि उसे प्यार, सुरक्षा और संस्कार देकर एक अच्छा इंसान बनाने में है।

स्वरचित कहानी 

आपकी सखी 

खुशी 

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