आत्मसम्मान की आवाज़

“बाबूजी… प्लीज, मेरी बात मान लीजिए। मत जाइए अंदर। आप प्रिंसिपल सर के सामने कुछ मत बोलना। आप सीधे-साधे हैं, आपको उनके कायदे-कानून नहीं पता। वो बहुत बड़े आदमी हैं। अंग्रेजी में बात करते हैं। मैं प्री-बोर्ड के दो विषयों में फेल हो गया हूँ, वो पहले ही बहुत नाराज हैं। अगर आपने कुछ उल्टा-सीधा कह दिया तो वो मुझे फाइनल बोर्ड परीक्षा में बैठने का रोल नंबर ही नहीं देंगे। मेरा पूरा साल बर्बाद हो जाएगा बाबूजी… प्लीज, शांत रहिएगा,” आयुष ने लगभग गिड़गिड़ाते हुए अपने पिता का सूखा, खुरदुरा हाथ पकड़कर कहा। उसकी आवाज में एक अजीब सी लाचारी और झिझक थी।

हरिश्चंद्र ने अपने बेटे के सिर पर हाथ फेरा। उनके हाथों की त्वचा पर सालों तक ऑटो का हैंडल थामने और धूप-बारिश झेलने के निशान साफ दिख रहे थे। उन्होंने धीमी लेकिन गहरी आवाज में कहा, “तू डर मत आयुष। सच से कभी नहीं डरना चाहिए। अगर तूने पढ़ाई में कोई कमी रखी है, तो डांट खाएगा, सजा भी मिलेगी। लेकिन बिना कुछ समझे-बूझे किसी के आगे गिड़गिड़ाना और बिना गलती के आत्मसम्मान खो देना इंसान की फितरत नहीं होनी चाहिए। जब स्कूल वालों ने बुलवाया है, तो बात तो करनी ही पड़ेगी। चल मेरे साथ।”

दोनों बाप-बेटा स्कूल के विशाल, वातानुकूलित गलियारे से होते हुए आगे बढ़े। संगमरमर के चमकते फर्श पर हरिश्चंद्र की घिसी हुई चप्पलों की हल्की आवाज गूंज रही थी। दीवारों पर बड़े-बड़े अक्षरों में आधुनिक शिक्षा, अनुशासन और सुनहरे भविष्य के वादे लिखे थे। हरिश्चंद्र उन पोस्टरों को देखते जा रहे थे। ऑडिटोरियम और कॉन्फ्रेंस रूम के बाहर कई और माता-पिता भी खड़े थे। उनमें से अधिकतर संभ्रांत, महंगे सूट-बूट और रेशमी साड़ियों में सजे हुए थे, फिर भी उनके चेहरों पर एक अजीब सी बेबसी थी। हर कोई अपने बच्चे के भविष्य को लेकर डरा हुआ था। कोई मां अपने बच्चे को फुसफुसाकर डांट रही थी, तो कोई पिता अपनी पत्नी पर खीझ निकाल रहा था कि ‘दिनभर घर पर रहकर करती क्या हो, लड़का बिगड़ गया।’

थोड़ी ही देर में आयुष और हरिश्चंद्र का नंबर आया। प्यून ने इशारा किया और वे प्रिंसिपल के भव्य केबिन में दाखिल हुए। कमरा पूरी तरह से ठंडा था। सामने महोगनी की बड़ी मेज के पीछे प्रिंसिपल मिस्टर कपूर बैठे थे। उनके चेहरे पर एक बनावटी गंभीरता और घमंड का भाव था। बगल में आयुष के क्लास टीचर और भौतिक विज्ञान के शिक्षक मिस्टर वर्मा खड़े थे, जिनकी आंखों में छात्रों के लिए सिर्फ शिकायतें भरी रहती थीं।

हरिश्चंद्र ने दोनों हाथ जोड़कर झुकते हुए कहा, “प्रणाम साहब।”

मिस्टर कपूर ने अपनी मोटी फ्रेम वाले चश्मे के ऊपर से हरिश्चंद्र को सिर से पैर तक देखा। उनकी पुरानी कमीज, धूप से झुलसा चेहरा और सादगी देखकर प्रिंसिपल के चेहरे पर एक हल्की सी नफरत और उपेक्षा की लकीर उभर आई। उन्होंने बिना हाथ जोड़े, बेरुखी से कुर्सी की तरफ इशारा किया, “मिस्टर हरिश्चंद्र, बैठिए। आई सपोज यू नो व्हाई यू हैव बीन कॉल्ड हियर टुडे? योर सन्स परफॉर्मेंस इज अटरली पैथेटिक। ही हैज फेल्ड मिजरेबली इन फिजिक्स एंड मैथ्स इन द प्री-बोर्ड्स।”

आयुष ने अपनी नजरें मेज के नीचे फर्श पर गड़ा दीं। उसका चेहरा पीला पड़ गया।

हरिश्चंद्र सीधे होकर बैठे। उन्होंने पलकें नहीं झपकाईं। उनकी आवाज में तनिक भी घबराहट नहीं थी, “साहब, मुझे आपकी यह विलायती जुबान समझ नहीं आती। हम देसी लोग हैं, मेहनत-मजदूरी करके पेट पालते हैं। जो भी कहना है, जरा साफ-साफ हमारी हिंदी में कहिए ताकि बात पल्ले पड़े।”

प्रिंसिपल मिस्टर कपूर ने एक गहरी सांस ली, जैसे किसी अनपढ़ से बात करना उनके समय की बर्बादी हो। उन्होंने फाइल मेज पर पटकी और कड़े स्वर में बोले, “सीधी बात यह है कि आपका बेटा प्री-बोर्ड में दो मुख्य विषयों में बुरी तरह फेल हुआ है। अगर इसका यही हाल रहा, तो बोर्ड परीक्षा में इसका बैठना मुश्किल है। यह हमारे स्कूल का सौ प्रतिशत पास होने का रिकॉर्ड खराब कर देगा। आप लोग घर पर बच्चों पर कोई ध्यान नहीं देते क्या? बस स्कूल में दाखिला दिला दिया और अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया? पैरेंटिंग नाम की भी कोई चीज होती है!”

यह सुनते ही आयुष का दिल बैठ गया। उसने दबे पांव अपने पिता का कुर्ता खींचा, मानो कह रहा हो कि ‘बाबूजी, अब माफी मांग लीजिए और निकलिए।’

लेकिन हरिश्चंद्र हिले तक नहीं। उनके चेहरे पर कोई झिझक नहीं आई। वे एकटक प्रिंसिपल की आंखों में देखते रहे। फिर उन्होंने अत्यंत शांत, किंतु वज्र जैसी मजबूत आवाज में कहा, “साहब, आप कह रहे हैं कि हम ध्यान नहीं देते? मैं सुबह पांच बजे ऑटो लेकर सड़क पर निकलता हूँ और रात के ग्यारह बजे तक एक-एक सवारी जोड़ता हूँ। दिनभर की धूल, धुआं और लोगों की गालियां इसलिए सहता हूँ ताकि हर महीने की दस तारीख से पहले आपके इस आलीशान स्कूल की हजारों रुपये की फीस भर सकूँ। मेरी पत्नी घरों में चौका-बर्तन करती है ताकि इस बच्चे की किताबों और प्रोजेक्ट का खर्च निकल सके। हम दोनों पति-पत्नी मिलकर अपने हिस्से की एक-एक सांस इस बच्चे के भविष्य के लिए गिरवी रख चुके हैं।”

प्रिंसिपल अवाक होकर उन्हें देखने लगे। कमरे में सन्नाटा पसर गया।

हरिश्चंद्र आगे बोले, “साहब, अगर हम इतने पढ़े-लिखे होते कि घर पर बैठकर इसे भौतिक विज्ञान और गणित के मुश्किल सवाल हल करवा सकते, तो हम इसे आपके इस बड़े स्कूल में क्यों भेजते? तब तो हम खुद ही इसे पढ़ा लेते या किसी बड़े दफ्तर में अफसर बनकर बैठे होते। हमने अपनी पूरी कमाई, अपने बुढ़ापे का सहारा और अपनी जमापूंजी आपके हवाले इसलिए की थी क्योंकि आपका बोर्ड कहता है कि आप शहर के सबसे बेहतरीन शिक्षक हैं। हम कमाने की जिम्मेदारी पूरी कर रहे हैं, लेकिन क्या आप पढ़ाने की जिम्मेदारी पूरी कर रहे हैं?”

क्लास टीचर मिस्टर वर्मा तुरंत बीच में कूद पड़े। उन्हें एक ऑटो वाले का इस तरह से सवाल उठाना अपनी शान के खिलाफ लगा। वे तुनककर बोले, “देखिए मिस्टर हरिश्चंद्र, स्कूल में साठ बच्चे एक क्लास में बैठते हैं। टीचर सबको बराबर पढ़ाता है। अब आपका बच्चा कमजोर है, ग्रास्पिंग पावर कम है, तो इसमें स्कूल क्या करे? अगर आपसे घर पर नहीं देखा जाता, तो आप इसके लिए अलग से पर्सनल ट्यूशन लगवाइए। बाकी सब पेरेंट्स भी तो ट्यूशन लगवाते हैं।”

हरिश्चंद्र के चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक मुस्कान तैर गई। उन्होंने सीधे मिस्टर वर्मा की ओर देखा, “मास्टर जी, बहुत खूब फरमाया आपने! अगर छह घंटे स्कूल में रहने के बाद भी बच्चे को समझने के लिए बाहर ट्यूशन ही जाना पड़े, तो फिर इस स्कूल की इन चार मंजिला इमारतों, एसी कमरों और लाखों के इंफ्रास्ट्रक्चर की क्या जरूरत है? फिर तो आप लोग यह ताला लगा दीजिए और सिर्फ ट्यूशन सेंटर ही खोल लीजिए! हम किस बात की फीस दे रहे हैं? इस चमकते हुए फर्श की? या उन एसी की ठंडी हवा की जो हमारे बच्चों के दिमाग में ज्ञान तो नहीं भर पा रही?”

“माइंड योर लैंग्वेज, मिस्टर हरिश्चंद्र! आप स्कूल मैनेजमेंट पर सवाल उठा रहे हैं!” प्रिंसिपल ने मेज पर हाथ मारते हुए आवाज ऊंची की।

“आवाज ऊंची करने से सच नहीं बदलता साहब,” हरिश्चंद्र अपनी जगह से उठे। उनका कद भले ही छरहरा था, लेकिन उनका आत्मसम्मान उस विशाल कमरे की छत को छू रहा था। “जब बच्चा पहली क्लास में आया था, तब भी आप ही के पास था। पिछले दस-बारह सालों से यह यहीं पढ़ रहा है। तब तो यह ठीक था। दसवीं में इसके अस्सी प्रतिशत नंबर आए थे। अब बारहवीं के आखिरी पड़ाव पर आकर, जब परीक्षा में सिर्फ दो महीने बचे हैं, आप कह रहे हैं कि यह कमजोर है और स्कूल का रिकॉर्ड खराब कर देगा? अगर मेरा बेटा फेल हुआ है, तो साहब, सबसे पहले आप और आपका यह सिस्टम फेल हुआ है। आपने सालभर क्या पढ़ाया? जब हर महीने टेस्ट होते थे, तब आपने हमें बुलाकर क्यों नहीं बताया कि बच्चा पिछड़ रहा है? तब तो हर महीने फीस की रसीद कटती रही। आज जब इम्तिहान सिर पर हैं, तो आप अपना पल्ला झाड़कर सारा दोष हमारे सिर पर मढ़ रहे हैं ताकि आपका रिकॉर्ड साफ रहे?”

केबिन का दरवाजा थोड़ा खुला हुआ था। बाहर गलियारे में खड़े दर्जनों माता-पिता, जो अब तक अपने-अपने बच्चों को डांट रहे थे या शर्मिंदा होकर खड़े थे, वे सब हरिश्चंद्र की बातें सुनकर ठिठक गए। एक-एक करके वे केबिन के दरवाजे और खिड़कियों के पास जमा होने लगे। हर माता-पिता के दिल में यही दर्द था, यही गुस्सा था, लेकिन किसी में कॉन्वेंट और इंटरनेशनल स्कूल के प्रशासन के सामने मुंह खोलने की हिम्मत नहीं थी।

एक संभ्रांत परिवार के सज्जन, जिनकी बेटी भी उसी क्लास में थी, हिम्मत करके आगे आए और बोले, “यह भाई बिल्कुल सच कह रहे हैं मिस्टर कपूर। मेरी बेटी भी पिछले तीन महीने से कह रही थी कि फिजिक्स के नए टीचर जो पढ़ाते हैं, क्लास में किसी को समझ नहीं आता। जब हमने बात करनी चाही, तो कह दिया गया कि सिलेबस बहुत बड़ा है, बच्चे को खुद मेहनत करनी चाहिए। हम लाखों रुपये साल की फीस सिर्फ इसलिए नहीं देते कि आखिर में हमें ही बच्चे को पढ़ाना पड़े या अलग से कोचिंग ढूंढनी पड़े।”

देखते ही देखते बाहर खड़े अन्य अभिभावकों के स्वर भी मुखर हो गए। “हां, बिल्कुल सही बात है!” “टीचर्स क्लास में सिर्फ नोट्स लिखवाकर चले जाते हैं, डाउट कोई क्लियर नहीं करता!” “और जब रिजल्ट खराब आता है, तो सारा ठीकरा बच्चों और पेरेंट्स पर फोड़ दिया जाता है!” “अगर आप लोग जिम्मेदारी से नहीं पढ़ा सकते, तो हमें पहले बताइए, हम सब अपने बच्चों की टीसी ले लेते हैं!”

प्रिंसिपल मिस्टर कपूर का चेहरा पसीने से भीगने लगा। एसी की ठंडक में भी उन्हें गर्मी का अहसास होने लगा था। उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि एक साधारण ऑटो चालक की सीधी और सच्ची बातें पूरे स्कूल के अभिभावकों को एकजुट कर देंगी। स्कूल की साख और भारी-भरकम फीस का ढांचा हिलता हुआ नजर आ रहा था। अगर बात शिक्षा विभाग या मीडिया तक पहुंच जाती, तो स्कूल का तथाकथित ‘प्रतिष्ठित’ नाम मिट्टी में मिल जाता।

मिस्टर कपूर ने तुरंत अपना लहजा बदला। उन्होंने अपने चश्मे को ठीक किया और हाथ जोड़ते हुए माहौल को शांत करने की कोशिश की, “प्लीज… प्लीज पेरेंट्स, आप सब शांत हो जाइए। पैनिक करने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। हम आपके बच्चों के भविष्य को लेकर बेहद संजीदा हैं। हमारा मकसद किसी का अपमान करना नहीं था।”

फिर उन्होंने हरिश्चंद्र की ओर देखा, जिनकी आंखों में एक अडिग चमक थी। प्रिंसिपल ने गहरी सांस लेते हुए कहा, “मिस्टर हरिश्चंद्र, आपकी बात में दम है। हम अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं रहे हैं। मैं यह स्वीकार करता हूँ कि कहीं न कहीं संवाद की कमी रही है। कल से ही… मैं खुद इस बात की निगरानी करूँगा। जो भी बच्चे प्री-बोर्ड में कमजोर रहे हैं, उनके लिए कल से स्कूल के बाद तीन घंटे की विशेष रेमेडियल और डाउट-क्लियरिंग क्लासेस लगाई जाएंगी। और इसका कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जाएगा। हमारे बेस्ट फैकल्टी मेंबर्स पर्सनली इन बच्चों के बेसिक कॉन्सेप्ट्स क्लियर करेंगे। मैं आपको भरोसा दिलाता हूँ कि बोर्ड एग्जाम से पहले हर बच्चा पूरी तरह तैयार होगा।”

पूरे हॉल में एक सुकून भरी खामोशी छा गई। अन्य अभिभावकों के चेहरों पर संतोष की लहर दौड़ गई। कई पिताओं ने आगे बढ़कर हरिश्चंद्र के कंधे पर हाथ रखा, “भाई साहब, आज आपने हम सबकी आंखें खोल दीं। हम तो अपने ही बच्चों को दोषी मानकर उन पर चिल्ला रहे थे। हक की बात कहना कोई आपसे सीखे।”

हरिश्चंद्र ने हाथ जोड़कर सबका अभिवादन स्वीकार किया। फिर उन्होंने अपने बेटे आयुष की तरफ देखा।

आयुष की आंखों से आंसू बह रहे थे, लेकिन ये आंसू डर या शर्म के नहीं थे। ये आंसू गर्व के थे। जिस पिता की पुरानी कमीज और टूटी चप्पलों को देखकर वह कुछ देर पहले हीनभावना से ग्रसित हो रहा था, आज उसी पिता ने पूरे स्कूल के सामने बिना झुके, बिना डरे उसका पक्ष लिया था और सही को सही साबित करके दिखाया था। आयुष का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था।

हरिश्चंद्र ने आयुष का हाथ अपने मजबूत हाथों में लिया और कहा, “चल बेटा, अब मैदान तेरे हवाले है। तेरे हक की लड़ाई मैंने लड़ दी है, अब अपनी मेहनत से इन सब को साबित करने की बारी तेरी है। दिन-रात एक कर दे और दिखा दे कि एक ऑटो वाले का बेटा किसी से कम नहीं होता।”

आयुष ने अपने आंसू पोंछे और दृढ़ता से सिर हिलाया, “बाबूजी, मैं आपको कभी झुकने नहीं दूंगा। मैं पूरी जान लगा दूंगा।”

दोनों बाप-बेटा जब स्कूल के बड़े गेट से बाहर निकल रहे थे, तो आयुष का सिर अब झुका हुआ नहीं था। वह पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने पिता के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा था। स्कूल के सुरक्षा गार्ड से लेकर वहां खड़े तमाम लोग उस साहसी पिता को सम्मान की नजरों से देख रहे थे, जिसने यह साबित कर दिया था कि सम्मान पैसों या बड़ी-बड़ी अंग्रेजी डिग्रियों का मोहताज नहीं होता, बल्कि सच, ईमानदारी और स्वाभिमान की बुनियाद पर खड़ा होता है।

अक्सर हम महंगे स्कूलों और संस्थानों की चकाचौंध के आगे अपने ही बच्चों को कमतर आंकने लगते हैं और व्यवस्था पर सवाल उठाने के बजाय अपनों पर ही गुस्सा निकालते हैं। क्या आपके साथ या आपके किसी परिचित के साथ कभी ऐसा हुआ है जब स्कूल प्रशासन ने अपनी कमियों का दोष बच्चे या माता-पिता के सिर मढ़ दिया हो? इस मुद्दे पर आपकी क्या राय है, हमें अपने विचार लिखकर जरूर बताएं।

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