देवकी जी के इस असीम स्नेह और अदम्य साहस ने नव्या के भीतर जीने की नई उम्मीद जगा दी। नव्या ने अदालत में खड़े होकर गवाही देने का फैसला किया। उधर, समर के रईस दोस्तों के परिवारों ने देवकी जी पर दबाव बनाने की हर मुमकिन कोशिश की। उन्हें पैसे की पेशकश की गई, धमकियां दी गईं, समाज में उनका हुक्का-पानी बंद करने की कोशिश की गई, लेकिन देवकी जी टस से मस नहीं हुईं। उन्होंने अदालत में अपने ही बेटे के खिलाफ मुख्य गवाह के तौर पर बयान दर्ज कराया।
जिला अदालत के बाहर भारी भीड़ जुट चुकी थी। हर चेहरे पर गहरा आक्रोश था और सबकी निगाहें उस पुलिस वैन पर टिकी थीं जो सायरन बजाती हुई अदालत परिसर में दाखिल हो रही थी। वैन का पिछला दरवाजा खुला और हथकड़ियों में जकड़े एक नौजवान को दो सिपाहियों ने बाहर खींचा। उसका सिर नीचे झुका हुआ था, लेकिन चेहरे पर किसी अपराधबोध की जगह वही पुरानी ढीठता तैर रही थी। भीड़ से एक साथ लानत-मलानत की आवाजें गूंज उठीं। हर कोई यही कह रहा था कि इस वहशी को ऐसी सजा मिले जो मिसाल बन जाए। वहीं भीड़ के एक कोने में एक अधेड़ उम्र की औरत सफेद सूती साड़ी का पल्लू कसकर सीने से लगाए जड़वत खड़ी थी। यह देवकी जी थीं, उसी मुजरिम की मां, जिसने आज अपने कलेजे के टुकड़े को कानून के हवाले किया था ताकि इंसानियत शर्मसार होने से बच सके।
देवकी जी और उनके पति उमाकांत जी ने अपनी जिंदगी की सारी जमापूंजी और भावनाएं अपने इकलौते बेटे समर पर न्योछावर कर दी थीं। उमाकांत जी डाक विभाग में एक सीधे-साधे कर्मचारी थे, जबकि देवकी जी एक सरकारी स्कूल में बच्चों को अक्षर ज्ञान और जीवन के मूल्य सिखाती थीं। परिवार में सुख-सुविधाओं की कोई कमी न थी, पर समर के जन्म के बाद देवकी जी की ममता अनजाने में एक ऐसे अंधविश्वास में बदल गई जहां बेटे की हर जिद उनके लिए हुक्म बन जाती थी। बचपन में जब समर मोहल्ले के किसी बच्चे का खिलौना छीन लेता या किसी बुजुर्ग पर मिट्टी फेंक देता, तो देवकी जी उसे डांटने के बजाय ‘बचपना है’ कहकर बात टाल देतीं। उमाकांत जी जब भी समर की उद्दंडता पर हाथ उठाते या सख्त रवैया अपनाते, देवकी जी ढाल बनकर बीच में खड़ी हो जाती थीं। यही वह पहली गलती थी जिसने समर की आत्मा में अहंकार और निरंकुशता का बीज बो दिया था।
उम्र बढ़ने के साथ-साथ समर की आदतें बिगड़ने लगीं। स्कूल की पढ़ाई पीछे छूट गई और आवारा लड़कों की संगत आगे आ गई। कॉलेज में दाखिला तो हुआ, पर उसकी मौजूदगी कक्षाओं से ज्यादा नुक्कड़ के कैफे और सिगरेट के खोखों पर दिखाई देने लगी। वह घर देर रात लौटता, आंखों में शराब की लाली होती और जुबान पर बड़ों के लिए गाली-गलौज। उमाकांत जी जब भी उसे समझाने बैठते, वह घर का सामान फेंकने लगता और अपनी मां के आंचल की आड़ लेकर बच निकलता। देवकी जी उसे एकांत में रो-रोकर समझातीं, “बेटा, तेरे पापा की इज्जत ही हमारी पूंजी है। तू पढ़-लिखकर कुछ बन जा, यह आवारागर्दी तुझे कहीं का नहीं छोड़ेगी।” लेकिन समर उनकी आंसुओं भरी मिन्नतों को ठहाके में उड़ा देता। उसे लगता था कि दुनिया की हर चीज उसकी मुट्ठी में है और उसके गुनाहों पर पर्दा डालने के लिए उसकी मां हमेशा मौजूद रहेगी।
उसी मोहल्ले में समर के बचपन की साथी रहती थी, नव्या। नव्या और समर ने एक साथ पहली कक्षा में कदम रखा था, एक साथ गलियों में साइकिल दौड़ाई थी। नव्या बेहद सुलझी हुई, संस्कारी और अपने सपनों के प्रति सजग लड़की थी। उसने शहर के मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया था और डॉक्टर बनकर जरूरतमंदों की सेवा करना चाहती थी। नव्या जब भी देवकी जी के घर आती, देवकी जी का मुरझाया चेहरा खिल उठता। वे अक्सर नव्या से कहतीं, “काश, समर में तुम्हारी समझदारी का एक कतरा भी आ जाता।” नव्या भी समर को एक सच्चे दोस्त की तरह समझाती थी कि वह गलत रास्ते पर जा रहा है, लेकिन समर के मन में नव्या के प्रति दोस्ती की जगह एक कुत्सित वासना और ईर्ष्या घर कर चुकी थी। उसे लगता था कि एक साधारण लड़की उसे नसीहत देने की हिम्मत कैसे कर सकती है।
कॉलेज के आखिरी साल में समर की बदतमीजी ने सीमाएं लांघ दीं। उसने अपने कुछ रईस और बिगड़े हुए दोस्तों के साथ मिलकर जुआ और नशीले पदार्थों का धंधा शुरू कर दिया। उमाकांत जी को जब इस बात की भनक लगी, तो उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वे हफ्तों अस्पताल में जिंदगी और मौत से लड़े। अस्पताल के बिल भरने के लिए देवकी जी ने अपने गहने तक बेच दिए, लेकिन समर अपने पिता को देखने तक नहीं आया। उसने मां से उल्टा इलाज के पैसे छीनने की कोशिश की। उस दिन देवकी जी के भीतर की ममता पहली बार थरथराई थी। उन्हें एहसास होने लगा था कि जिस पौधे को उन्होंने दूध पिलाकर बड़ा किया था, वह एक जहरीला नागफनी बन चुका था। लेकिन इसके बावजूद, वे समाज के डर और लोकलाज के कारण बेटे की करतूतों पर सिसकियां लेकर चुप रह जाती थीं।
घटना उस मनहूस शाम की है जब कानपुर में मूसलाधार बारिश हो रही थी। नव्या अपने अस्पताल की ड्यूटी खत्म करके देर रात घर लौट रही थी। बारिश के कारण सड़कें सुनसान थीं और कोई सवारी नहीं मिल रही थी। समर और उसके तीन साथी अपनी काली एसयूवी में शहर की सड़कों पर हुड़दंग मचा रहे थे। अचानक उनकी नजर भीगती हुई नव्या पर पड़ी। समर की आंखों में शैतान जाग उठा। उसने गाड़ी नव्या के आगे लाकर रोक दी। पहले तो उसने मदद का दिखावा करते हुए नव्या को गाड़ी में बैठने को कहा। नव्या ने उसकी नियत भांपकर साफ मना कर दिया और तेज कदमों से आगे बढ़ने लगी।
समर के भीतर का वहशी ईगो जाग उठा। उसने अपने दोस्तों के साथ मिलकर नव्या को जबरन गाड़ी में खींच लिया। उस बंद गाड़ी में नव्या चीखती रही, रोती रही, बचपन की दोस्ती की दुहाई देती रही, समर के हाथ जोड़ती रही। लेकिन समर और उसके दरिंदे दोस्तों पर वहशीपन सवार था। उन्होंने शहर के बाहर एक पुराने सुनसान गोदाम में ले जाकर उस बेकसूर बच्ची के आत्मसम्मान, उसकी अस्मत और उसके जीवन को बेरहमी से कुचल दिया। जब नव्या अधमरी होकर बेहोश हो गई, तो वे उसे शहर के बाहरी इलाके में सड़क किनारे कीचड़ में फेंककर भाग निकले।
समर रात के दो बजे घर लौटा। उसके कपड़ों पर खून और कीचड़ के धब्बे थे, हाथ कांप रहे थे और चेहरे पर एक अजीब सी वहशियाना घबराहट थी। देवकी जी जाग रही थीं। बेटे की ऐसी हालत देखकर वे घबरा गईं। समर ने घबराहट में खुद को बचाने के लिए मां से सारी बात उगल दी और पैसे मांगने लगा ताकि वह तुरंत शहर छोड़कर नेपाल भाग सके। उसने बड़े बेपरवाह अंदाज में कहा, “मां, वो नव्या ज्यादा उड़ रही थी, आज उसका सारा घमंड तोड़ दिया। अब तू जल्दी से अलमारी की चाबी दे, मुझे निकलना है, नहीं तो पुलिस पकड़ लेगी।”
समर के यह शब्द देवकी जी के कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतरे। उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। उनके सामने उनका बेटा नहीं, बल्कि एक मासूम बच्ची की जिंदगी को लील जाने वाला नरभक्षी जानवर खड़ा था। जिस नव्या को उन्होंने अपनी बेटी की तरह पाला था, जिसने कुछ ही दिन पहले उनके बीमार पति के सिर पर हाथ फेरा था, उसके साथ यह सब? और करने वाला कौन? उनका अपना खून!
उस क्षण देवकी जी की ममता और उनके संस्कारों के बीच एक महायुद्ध छिड़ गया। एक पल के लिए मां का दिल चीखा कि बेटे को बचा ले, उसे छिपा दे, आखिर वही तो उनकी कोख की पहचान था। लेकिन अगले ही पल देवकी जी के भीतर की एक औरत, एक शिक्षिका और एक न्यायप्रिय इंसान जाग उठी। उन्होंने सोचा कि अगर आज उन्होंने इस दरिंदे को बचा लिया, तो वे कल किस मुंह से भगवान के सामने खड़ी होंगी? आज अगर समर बच गया, तो कल न जाने कितनी नव्या इस शहर में जिंदा लाश बना दी जाएंगी। ममता का मतलब अपराध का साझीदार बनना नहीं होता।
देवकी जी ने चेहरे पर कोई भाव नहीं आने दिया। उन्होंने बेहद शांत स्वर में समर से कहा, “तू हाथ-मुंह धो ले, मैं अलमारी से पैसे निकालती हूं और तेरे लिए कुछ खाने को बांध देती हूं।” समर को लगा कि मां हमेशा की तरह उसकी ढाल बन गई है। वह निश्चिंत होकर कमरे में चला गया।
देवकी जी के हाथ कांप रहे थे, लेकिन उनका संकल्प फौलाद बन चुका था। उन्होंने उमाकांत जी को जगाने के बजाय सीधे पुलिस थाने का नंबर घुमाया। भर्राई हुई आवाज में उन्होंने पुलिस इंस्पेक्टर को सारी बात सच-सच बता दी और अपने ही घर का पता दे दिया। फोन रखने के बाद वे अपने पूजा घर में गईं और भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति के आगे माथा टेककर रो पड़ीं। उन्होंने कहा, “हे ईश्वर, मैंने तुझे साक्षी मानकर अपने बेटे को पाला था, पर आज वह अधर्म के रास्ते पर है। मुझे गांधारी नहीं, कुंती और यशोदा से आगे बढ़कर न्याय की राह चुनने की शक्ति देना।”
पंद्रह मिनट के भीतर पुलिस की जीप सायरन बजाते हुए दरवाजे पर आ खड़ी हुई। जब पुलिस ने समर को दबोचा, तो वह चिल्लाने लगा, “मां! तूने यह क्या किया? मैं तेरा बेटा हूं! तू अपनी ही औलाद को जेल भेज रही है?” देवकी जी ने अपनी आंसुओं से भीगी आंखों को पोंछा और सीधे समर की आंखों में देखकर कहा, “तू मेरा बेटा तब तक था जब तक तू इंसान था। जब तूने एक बेटी की अस्मत पर हाथ डाला, उसी पल तूने मेरी कोख को कलंकित कर दिया। एक दरिंदे की कोई मां नहीं होती।”
पुलिस समर को घसीटते हुए ले गई। इसके बाद देवकी जी सीधे अस्पताल पहुंचीं, जहां नव्या आईसीयू में जिंदगी की जंग लड़ रही थी। नव्या के मां-बाप बदहवास रो रहे थे। जैसे ही नव्या के पिता ने देवकी जी को देखा, उनका गुस्सा फूट पड़ा। लेकिन देवकी जी ने उनके पैरों में गिरकर माफी नहीं मांगी, बल्कि नव्या के पिता के हाथ थामकर कहा, “भाई साहब, मुजरिम मेरा बेटा जरूर है, पर सजा उसे मैं दिलवाऊंगी। मैं नव्या के साथ खड़ी रहूंगी, जब तक उन दरिंदों को फांसी के फंदे तक न पहुंचा दूं।”
अस्पताल में नव्या को जब होश आया, तो वह गहरे सदमे में थी। उसने किसी से बात करना बंद कर दिया था, उसकी आंखों से जीने की इच्छा खत्म हो चुकी थी। देवकी जी ने अगले तीन महीने तक अस्पताल और कोर्ट के बीच अपनी जिंदगी बांट दी। वे रोज अस्पताल जातीं, नव्या का सिर अपनी गोद में रखकर सहलातीं, उसे खाना खिलातीं और उसके भीतर आत्मबल जगातीं। वे उससे कहतीं, “बेटी, पाप तेरे साथ हुआ है, तूने कोई पाप नहीं किया। सिर उस दरिंदे का झुकना चाहिए, तेरा नहीं। तुझे जीना होगा, डॉक्टर बनना होगा और उन जैसे दरिंदों के खिलाफ आवाज बनना होगा।”
देवकी जी के इस असीम स्नेह और अदम्य साहस ने नव्या के भीतर जीने की नई उम्मीद जगा दी। नव्या ने अदालत में खड़े होकर गवाही देने का फैसला किया। उधर, समर के रईस दोस्तों के परिवारों ने देवकी जी पर दबाव बनाने की हर मुमकिन कोशिश की। उन्हें पैसे की पेशकश की गई, धमकियां दी गईं, समाज में उनका हुक्का-पानी बंद करने की कोशिश की गई, लेकिन देवकी जी टस से मस नहीं हुईं। उन्होंने अदालत में अपने ही बेटे के खिलाफ मुख्य गवाह के तौर पर बयान दर्ज कराया। उन्होंने जज के सामने साफ लफ्जों में कहा, “साहब, समर मेरी कोख से जन्मा है, इसका मुझे जीवन भर पछतावा रहेगा। लेकिन एक मां होने के नाते मैं समाज से यह विनती करती हूं कि इसे ऐसी कड़ी सजा दी जाए कि कोई भी बेटा अपनी मां के प्यार को अपनी ढाल समझने की जुर्रत न करे।”
अदालत का फैसला ऐतिहासिक रहा। समर और उसके साथियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई, जिसमें किसी भी तरह की रियायत की गुंजाइश नहीं थी। जब फैसला सुनाया गया, तो अदालत का कमरा तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। समर रोते हुए अपनी मां की तरफ देख रहा था, शायद माफी की उम्मीद में, लेकिन देवकी जी ने अपनी नजरें फेर लीं। उस दिन एक मां की ममता हार गई थी, लेकिन एक औरत का आत्मसम्मान और इंसानियत जीत गई थी।
पांच साल बीत गए। कानपुर के मेडिकल कॉलेज के दीक्षांत समारोह में जब नव्या को सर्वश्रेष्ठ डॉक्टर का स्वर्ण पदक दिया जा रहा था, तो पूरा हॉल तालियों से गूंज रहा था। नव्या ने मंच से माइक संभाला और कहा, “आज मैं जिस मुकाम पर हूं, वह केवल एक इंसान की बदौलत है, जिन्होंने मुझे टूटने नहीं दिया। जिन्होंने अपने बेटे के अंधे प्यार पर न्याय और सत्य को चुना।” नव्या ने मंच से नीचे उतरकर वह मेडल सामने बैठी देवकी जी के गले में पहना दिया और उनके चरण स्पर्श किए। देवकी जी ने भर आई आंखों से नव्या को अपने सीने से लगा लिया।
देवकी जी ने आज अपने बेटे को खोकर भी एक बेटी को नई जिंदगी दी थी और पूरे समाज को यह सिखा दिया था कि मां की ममता केवल अपनी संतान की गलतियों पर पर्दा डालने के लिए नहीं होती, बल्कि जरूरत पड़ने पर अधर्म का नाश करने के लिए सुदर्शन चक्र उठाने का साहस भी रखती है।
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मूल लेखिका : हेमलता गुप्ता