“इतना बड़ा पाखंडी? इतना घिनौना झूठ? मां को सड़क पर बेसहारा छोड़ दिया और यहां आकर लाखों के टूर की झूठी कहानियां सुना रहा है!” चारों तरफ से लानतों और तानों की बौछार होने लगी। विकास का सिर शर्म से झुककर सीने से लग गया था। वह अपनी जगह पर पत्थर की तरह गड़ा हुआ था, उसके अंदर इतनी हिम्मत भी नहीं बची थी कि वह अपनी आंखें उठाकर किसी का सामना कर सके।
समीर ने हाथ उठाकर सभी को शांत कराया। उसने आहिस्ता से माइक जानकी देवी के कांपते हाथों में थमा दिया और बोला, “मां जी… आज आप सच बोलिए। आज पूरा समाज आपके सामने है। बताइए इस बेटे की करतूत, ताकि आज यह मुखौटा उतर सके।”
इस शाम की सबसे खास बात यह थी कि आम पार्टियों की तरह न तो यहां कानफाड़ू डीजे की धमक थी और न ही शराब के दौर चल रहे थे। यह शाम विशेष रूप से बुजुर्गों के सम्मान और उनके अकेलेपन को दूर करने के लिए आयोजित की गई थी। इस पूरे आयोजन की बागडोर संभाली थी युवा और संवेदनशील व्यवसायी समीर ने। समीर पिछले कई वर्षों से बुजुर्गों की सेवा और पुनर्वास से जुड़े एक बड़े सेवा संस्थान ‘सहारा आश्रम’ का संचालन भी कर रहा था। वह हमेशा कहता था कि बुजुर्ग किसी भी समाज की वो मजबूत जड़ें होते हैं, जिनकी छांव में पूरा परिवार फलता-फूलता है। इसी सोच के तहत समीर ने अपने कॉलेज के दिनों के पुराने दोस्तों, व्यापारिक सहयोगियों और उनके परिवारों को इस महफिल में आमंत्रित किया था, ताकि लोग अपनी व्यस्त जिंदगी से निकलकर अपने माता-पिता के साथ कुछ सुकून भरे पल साझा कर सकें।
हॉल के प्रवेश द्वार पर खड़ा समीर हर आने वाले मेहमान का हाथ जोड़कर और गर्मजोशी से स्वागत कर रहा था। तभी प्रवेश द्वार से उसका पुराना मित्र विकास अपनी पत्नी अंजलि और दोनों बच्चों के साथ भीतर दाखिल हुआ। विकास शहर का एक जाना-माना बिल्डर था और उसकी पहचान एक बेहद रसूखदार इंसान के रूप में थी। वह महंगे सूट में था और उसकी चाल-ढाल में एक अजीब सा अभिमान साफ झलक रहा था।
समीर मुस्कुराते हुए आगे बढ़ा और विकास को गले लगाते हुए बोला, “अरे विकास भाई! स्वागत है तुम्हारा। पर ये क्या? चाची जी को साथ नहीं लाए? मैंने तो निमंत्रण पत्र में भी साफ लिखा था और फोन पर भी कहा था कि आज का यह शाम का कार्यक्रम तो हमने खासतौर पर अपने पूजनीय बुजुर्गों के सम्मान के लिए रखा है। मैं तो आज चाची जी के हाथ का बना वो पुराना आशीर्वाद लेने का इंतजार कर रहा था।”
विकास ने अपने कोट का कॉलर थोड़ा ठीक किया, अपनी कलाई पर बंधी महंगी घड़ी पर नजर डाली और एक बनावटी, गहरी मुस्कान के साथ बोला, “अरे यार समीर, क्या बताऊं तुम्हें! मां का बहुत मन था इस कार्यक्रम में आने का। पर तुम्हें तो पता ही है कि इस उम्र में तीर्थ यात्रा का कितना महत्व होता है। मां की बहुत पुरानी तमन्ना थी कि वो दक्षिण भारत के सभी प्रमुख मंदिरों के दर्शन करें—रामेश्वरम, मीनाक्षी अम्मन, तिरुपति बालाजी। बस, पिछले ही हफ्ते मैंने उन्हें एक महीने के वीआईपी पैकेज वाले तीर्थ यात्रा टूर पर भेजा है। पूरी एक महीने की यात्रा है उनकी, वो भी पूरी सुख-सुविधाओं के साथ।”
समीर ने आश्चर्य और प्रशंसा भरे भाव से पूछा, “अरे वाह विकास! यह तो बहुत ही नेक और सराहनीय काम किया तुमने। पर ऐसे विशेष और निजी टूर पैकेज में तो लाखों का खर्च बैठता होगा?”
विकास ने अपने सीने को गर्व से थोड़ा और फुलाते हुए कहा, “अरे समीर, पैसे का क्या है? पैसा तो आज है, कल नहीं। पर मां के चरणों से बढ़कर दुनिया में कोई दौलत नहीं होती। उन्होंने हमारे लिए पूरी जिंदगी खपा दी, अब बुढ़ापे में अगर मैं उनकी छोटी सी ख्वाहिश के लिए अपनी जेब न खोलूं, तो मेरी इस दौलत और शोहरत का क्या मोल? मां की खुशी के आगे ये लाखों रुपये तो हाथ की धूल के बराबर हैं!”
पास खड़े विकास के दूसरे दोस्त और रिश्तेदार यह बात सुनकर विकास को बड़ी ही आदर और प्रशंसा की नजरों से देखने लगे। एक सज्जन ने तो विकास की पीठ थपथपाते हुए कहा, “वाह विकास बाबू! आज के कलयुग में जहां बेटे मां-बाप को चार दिन अपने साथ रखने में कतराते हैं, वहां आप जैसे श्रवण कुमार बेटे को देखकर दिल खुश हो गया। धन्य हैं वो मां जिन्होंने ऐसे संस्कारवान बेटे को जन्म दिया।” विकास ने मुस्कुराते हुए सबका अभिवादन स्वीकार किया, जबकि उसकी पत्नी अंजलि ने अपनी नजरें थोड़ी चुरा लीं।
कार्यक्रम विधिवत शुरू हुआ। हॉल में मौजूद सभी बुजुर्गों के चेहरों पर एक अनूठी चमक थी। पहले दौर में उनके मनोरंजन के लिए कुछ हल्के-फुल्के खेल आयोजित किए गए—जैसे अपनी पसंदीदा पुरानी यादें ताजा करना, अंताक्षरी और जीवन के अनुभव साझा करना। माहौल में हंसी-ठिठोली की आवाजें गूंज रही थीं। इसके बाद समीर ने कार्यक्रम के मुख्य भाग की घोषणा की। उसने मंच से माइक संभालते हुए कहा कि आज इस मंच पर हमारे सभी आदरणीय माता-पिता बारी-बारी से आएंगे और अपने बच्चों, उनके बचपन और अपने परिवार के बारे में अपने विचार रखेंगे।
एक-एक करके सभी बुजुर्ग मंच पर आए। किसी के पिता ने अपने बेटे की पहली नौकरी के दिन की खुशी साझा की, तो किसी की मां ने अपनी बहू के आने के बाद घर में आई खुशहाली की दास्तान सुनाई। हर मां-बाप की आंखों में अपने बच्चों के लिए सिर्फ और सिर्फ ममता और गर्व का सागर उमड़ रहा था। कोई भी माता-पिता अपने बच्चों की किसी गलती या कमी को मंच पर नहीं लाए, क्योंकि मां की फितरत ही ऐसी होती है—वह बच्चों के हर कांटे को अपने आंचल में छिपा लेती है और दुनिया के सामने सिर्फ फूल ही पेश करती है।
धीरे-धीरे सभी बुजुर्ग अपनी बात कहकर अपनी कुर्सियों पर बैठ चुके थे। हॉल में उपस्थित सभी लोगों को लगा कि अब यह भावुक और सुंदर कार्यक्रम अपने समापन की ओर बढ़ रहा है। विकास भी अपनी कलाई घड़ी देखकर उठने की तैयारी करने लगा ताकि वह डिनर के लिए आगे बढ़ सके।
तभी समीर दोबारा मंच पर आया। उसने माइक को अपने हाथों में कसकर पकड़ा। इस बार समीर के चेहरे पर पहले जैसी हल्की मुस्कान नहीं थी, बल्कि उसकी जगह एक गहरा, गंभीर और स्तब्ध कर देने वाला सन्नाटा था। उसकी आंखों में दर्द और एक अनकही बेचैनी साफ पढ़ी जा सकती थी।
समीर ने एक गहरी सांस ली और भरे हुए कंठ से बोलना शुरू किया, “मेरे प्यारे दोस्तों और यहां उपस्थित आदरणीय परिवारजनों… आज का यह आयोजन बुजुर्गों के प्रति हमारे प्रेम और सम्मान को समर्पित था। आप सबने देखा कि कैसे हर माता-पिता ने अपने बच्चों की तारीफों के पुल बांधे। लेकिन इस महफिल को समाप्त करने से पहले, मैं आप सबको एक ऐसी मां से मिलवाना चाहता हूं, जो आज से ठीक एक महीने पहले मुझे इसी शहर के एक वीरान बस स्टैंड के कोने में मिली थीं।”
पूरे हॉल में अचानक एक अजीब सी खामोशी छा गई। लोग उत्सुकता से मंच की ओर देखने लगे।
समीर ने अपनी बात आगे बढ़ाई, “उस रात मूसलाधार बारिश हो रही थी। वो मां फटी हुई सूती साड़ी में, भूख और प्यास से बेहाल, ठंड से कांपती हुई एक सीमेंट की बेंच पर बैठी थीं। उनकी आंखों के आंसू सूख चुके थे और उनके पास एक फटे हुए थैले में सिर्फ अपने बेटे की बचपन की एक पुरानी तस्वीर और कुछ फटे-पुराने कपड़े थे। उस बेबस मां को जब मैंने सहारा देकर अपनी गाड़ी में बैठाया और अपने आश्रम ले आया, तो कई दिनों तक उन्होंने कुछ नहीं खाया। आज मुझे उनका परिचय आप सबके सामने करवाना बहुत जरूरी लगा… क्योंकि वो बदकिस्मत मां किसी अनाथ की मां नहीं हैं, बल्कि वो उस बेटे की मां हैं, जो समाज में अपने संस्कारों का ढोल पीटता है और दुनिया के सामने यह दम भरता है कि वह अपनी मां की खुशी के लिए अपनी जान तक न्योछावर कर सकता है!”
समीर के ये शब्द किसी जलते हुए अंगारे की तरह पूरे हॉल में गिरे। लोग आपस में फुसफुसाने लगे। लोगों के चेहरों पर गुस्सा और नफरत के भाव उभरने लगे।
एक बुजुर्ग गुस्से में बोल उठे, “लानत है ऐसे नालायक बेटे पर! जो अपनी बूढ़ी मां को सड़क पर मरने के लिए छोड़ दे, उसे इंसान कहलाने का कोई हक नहीं है!”
दूसरे कोने से आवाज आई, “समीर बेटा, बताओ कौन है वो हैवान? उसे सबके सामने लाओ ताकि समाज उस पर थूके!”
लेकिन इस पूरे शोर-शराबे के बीच, हॉल की दूसरी कतार में बैठे विकास का चेहरा एकदम पीला पड़ चुका था। उसके माथे पर पसीने की ठंडी-ठंडी बूंदें छलक आई थीं। उसके हाथ-पैर सुन्न होने लगे थे और उसका गला पूरी तरह सूख गया था। उसकी पत्नी अंजलि ने घबराकर विकास का हाथ पकड़ लिया। विकास के दिल की धड़कनें इतनी तेज हो गई थीं कि उसे अपना सीना फटता हुआ महसूस हो रहा था।
तभी मंच के पीछे का पर्दा धीरे से हटा। समीर आगे बढ़ा और उसने बहुत ही आदर और नजाकत से एक अत्यंत वृद्ध, कमजोर और कांपती हुई महिला का हाथ थामा और उन्हें सहारा देते हुए मंच के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया।
उस महिला के बदन पर आश्रम की एक बेहद सादी, धुली हुई सफेद साड़ी थी। सिर पर पल्लू था और पैरों में पुरानी चप्पलें थीं। चेहरे पर समय की झुर्रियों से कहीं ज्यादा अपनों के दिए हुए घावों की गहरी लकीरें खिंची हुई थीं।
जैसे ही हॉल में बैठे लोगों की नजर उस वृद्ध महिला पर पड़ी, सन्नाटा और ज्यादा गहरा हो गया। लेकिन विकास के लिए तो मानो आसमान टूटकर उसके सिर पर गिर पड़ा था। उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई।
वह वृद्ध महिला कोई और नहीं, बल्कि विकास की सगी मां, जानकी देवी थीं!
वही मां, जिन्हें ठीक एक महीने पहले एक बड़े बंगले की मालकिन होने के बावजूद, जायदाद के कागजों पर दस्तखत करवाने के बाद, विकास और अंजलि ने एक रात चुपके से बस स्टैंड पर यह कहकर छोड़ दिया था कि वे उनके लिए किसी वृद्धाश्रम में जगह ढूंढ रहे हैं। और वही मां, जिनके बारे में ठीक एक घंटा पहले विकास इसी मंच के सामने सीना तानकर डींगें हांक रहा था कि उसने उन्हें लाखों रुपये खर्च करके चार धाम और दक्षिण भारत के वीआईपी तीर्थ यात्रा पैकेज पर भेजा है!
हॉल में मौजूद कई लोग जानकी देवी को अच्छी तरह पहचानते थे। वे विकास के पुराने पारिवारिक परिचित थे।
अचानक हॉल में एक चीख जैसी आवाज गूंजी, “अरे! यह तो विकास की मां जानकी भाभी हैं! यह क्या अनर्थ है?”
पल भर में सारा माजरा सबके सामने शीशे की तरह साफ हो गया। जो लोग कुछ देर पहले तक विकास को ‘कलयुग का श्रवण कुमार’ बता रहे थे और उसकी तारीफों के कसीदे पढ़ रहे थे, उनकी आंखें अब घृणा, नफरत और गुस्से से धधकने लगीं।
“थू है तुझ पर विकास! शर्म से डूब मरना चाहिए तुझे!” एक पुराने बुजुर्ग मित्र ने अपनी लाठी पटकते हुए कहा।
“इतना बड़ा पाखंडी? इतना घिनौना झूठ? मां को सड़क पर बेसहारा छोड़ दिया और यहां आकर लाखों के टूर की झूठी कहानियां सुना रहा है!” चारों तरफ से लानतों और तानों की बौछार होने लगी। विकास का सिर शर्म से झुककर सीने से लग गया था। वह अपनी जगह पर पत्थर की तरह गड़ा हुआ था, उसके अंदर इतनी हिम्मत भी नहीं बची थी कि वह अपनी आंखें उठाकर किसी का सामना कर सके।
समीर ने हाथ उठाकर सभी को शांत कराया। उसने आहिस्ता से माइक जानकी देवी के कांपते हाथों में थमा दिया और बोला, “मां जी… आज आप सच बोलिए। आज पूरा समाज आपके सामने है। बताइए इस बेटे की करतूत, ताकि आज यह मुखौटा उतर सके।”
पूरा हॉल सांस रोके खड़ा था। सबको लग रहा था कि आज यह सताई हुई बूढ़ी मां अपने उस कपूत बेटे के खिलाफ अपना सारा दर्द और गुस्सा उगल देगी। सब इंतजार कर रहे थे कि मां का आक्रोश अब इस झूठे बेटे को भस्म कर देगा।
लेकिन अगले ही पल जो हुआ, उसने वहां मौजूद हर इंसान की रूह को झकझोर कर रख दिया।
जानकी देवी ने अपनी कांपती उंगलियों से माइक को पकड़ा। उन्होंने अपनी धुंधली और भीगी आंखों से भीड़ में सिर झुकाए खड़े अपने बेटे विकास को देखा। उनके चेहरे पर न तो कोई गुस्सा था, न कोई नफरत, और न ही बदले की कोई भावना। उनकी आंखों से आंसुओं की दो अविरल धाराएं फूट पड़ीं।
जानकी देवी ने बहुत ही धीमी, लेकिन ममता से भीगी आवाज में कहा, “समीर बेटा… और आप सब लोग… मेरे बच्चे को दोष मत दीजिए। मेरे विकास ने कोई झूठ नहीं बोला है।”
हॉल में खड़े लोग अवाक रह गए। समीर ने तड़पकर कहा, “मां जी! आप अभी भी इस इंसान को बचा रही हैं? इसने आपके साथ क्या किया है, आप भूल गईं?”
जानकी देवी ने रुंधे गले से कहा, “नहीं बेटा, मैं कुछ नहीं भूली। पर सच तो यही है ना कि एक मां का सबसे बड़ा तीर्थ तो उसके बच्चे का सुख ही होता है। अगर मेरे इस बूढ़े शरीर के उस घर में रहने से मेरे बेटे और बहू के जीवन में अशांति थी, अगर मेरे अलग हो जाने से मेरे बच्चे का घर बसता था, तो मैं खुद ही उस घर से निकल आई थी। मेरा बेटा तो हमेशा से मुझे खुश ही देखना चाहता था। उसने मुझे कोई दुख नहीं दिया… शायद मेरी ही परवरिश में कोई कमी रह गई होगी जो मैं अपने बच्चे के दिल में अपने लिए जगह नहीं बना पाई। मेरे बच्चे पर थू-थू मत कीजिए… एक मां अपने जीते जी अपने बच्चे का यह अपमान नहीं देख सकती। भगवान मेरे विकास को हमेशा खुश रखे, तरक्की दे… बस इतनी ही दुआ है मेरी।”
इतना कहकर जानकी देवी फफक-फफक कर रो पड़ीं और उन्होंने अपना मुंह अपनी साड़ी के पल्लू में छुपा लिया।
एक मां की यह पराकाष्ठा देखकर पूरा हॉल सन्न रह गया। वहां मौजूद कई महिलाओं और पुरुषों की आंखों से आंसू छलक पड़े। ममता का यह विराट रूप देखकर लोगों के रोंगटे खड़े हो गए। जिस बेटे ने उसे सड़क पर मरने के लिए छोड़ दिया था, उसी बेटे की इज्जत बचाने के लिए वह मां आज भी ढाल बनकर खड़ी थी और सारे गुनाह अपने सिर ले रही थी।
यह दृश्य देखकर विकास के भीतर का बचा-खुचा अहंकार, झूठी शान और पाखंड का महल एक ही झटके में भरभराकर ढह गया। उसकी अंतरात्मा पर जैसे हजारों हथौड़ों की चोट एक साथ पड़ी।
विकास अपनी सुध-बुध खो बैठा। वह पागलों की तरह दौड़ता हुआ मंच की ओर भागा। उसने मंच की सीढ़ियां चढ़ीं और सीधे अपनी मां के चरणों में गिर पड़ा। उसने दोनों हाथों से जानकी देवी के पैरों को जकड़ लिया और अपना सिर उनके चरणों में पटक-पटक कर दहाड़ मारकर रोने लगा।
“मां… मुझे माफ कर दो मां! मुझे इस जमीन में गाड़ दो मां! मैं इंसान कहलाने के लायक नहीं हूं!” विकास की चीखों से पूरा हॉल दहल उठा। उसका रोना किसी छोटे बच्चे की तरह बेकाबू हो चुका था।
“मां, मैं कितना बड़ा अंधा, कितना बड़ा राक्षस बन गया था! अपनी झूठी दौलत, इस नकली समाज और अपने खोखले रुतबे के नशे में मैंने उस ममता का सौदा कर दिया जिसने मुझे अपनी उंगली पकड़कर चलना सिखाया था। जिस मां ने मुझे अपनी कोख में नौ महीने पाला, मैंने उसे एक झटके में सड़क पर फेंक दिया… और आज भी, मेरे इतने बड़े पाप के बाद भी, तुम मुझे बचाने के लिए इस भरे समाज के सामने खुद को दोषी ठहरा रही हो? मां, मुझे कोई सजा दे दो, मुझे मार लो, पर अपनी इन ममता भरी नजरों से मुझे मत देखो… मेरा कलेजा फटा जा रहा है मां!” विकास फूट-फूट कर अपने आंसुओं से अपनी मां के पैर धो रहा था।
पीछे से अंजलि भी रोती हुई मंच पर आ गई। उसने भी जानकी देवी के पैर पकड़ लिए और हाथ जोड़कर बोली, “मां जी… सारा कसूर मेरा है। मैंने विकास को भड़काया, मैंने इस घर को सिर्फ अपना समझा और यह भूल गई कि यह घर आपकी तपस्या की नींव पर खड़ा है। मुझे माफ कर दीजिए मां जी, अपने इस अभागे बच्चों को अपने चरणों में थोड़ी सी जगह दे दीजिए।”
जानकी देवी का ममतामयी दिल अपनी औलाद को इस तरह तड़पते और टूटते हुए कैसे देख सकता था? एक मां की सबसे बड़ी कमजोरी ही उसकी औलाद होती है। जानकी देवी के कांपते हुए हाथ अपने आप नीचे झुके। उन्होंने झुककर अपने बेटे विकास को अपने सीने से लगा लिया।
“मेरे बच्चे… रो मत मेरा लाल… मां कभी अपने बच्चे से नाराज नहीं रह सकती। तू समझ गया, मेरे लिए यही दुनिया की सबसे बड़ी तीर्थ यात्रा हो गई। उठ मेरे बच्चे, उठ…” जानकी देवी ने अपनी साड़ी के पल्लू से विकास का चेहरा पोंछा और उसके माथे को चूम लिया।
मंच पर मां और बेटे का यह पावन मिलन देखकर पूरे हॉल में तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी। जो आंखें कुछ देर पहले गुस्से से जल रही थीं, वे अब श्रद्धा और भावुकता के आंसुओं से भीगी हुई थीं।
समीर आगे बढ़ा और उसने विकास के कंधे पर हाथ रखा। समीर की आंखें भी नम थीं। उसने कहा, “विकास, आज तू एक बहुत बड़े दलदल में धंसने से बच गया। दौलत और शोहरत का गुमान इंसान को अंधा बना देता है, लेकिन याद रखना कि जिस घर में मां-बाप की आंखों से आंसू गिरते हैं, वहां कभी बरकत और शांति नहीं रह सकती। आज तेरी मां ने तुझे सिर्फ माफ नहीं किया, बल्कि तुझे एक नया जन्म दिया है।”
विकास ने अपने आंसू पोंछते हुए खड़े होकर पूरे हॉल के सामने हाथ जोड़े, “आज आप सबके सामने मैं यह कसम खाता हूं कि जब तक मेरी देह में एक भी सांस बाकी है, मैं अपनी मां के चरणों को ही अपना मंदिर और उनकी सेवा को ही अपनी सबसे बड़ी इबादत समझूंगा। आज के बाद दुनिया का कोई सुख, कोई लालच मुझे मेरी मां से अलग नहीं कर सकता।”
उस रात चंडीगढ़ के उस हॉल में केवल एक कार्यक्रम का समापन नहीं हुआ था, बल्कि एक भटके हुए बेटे की आत्मा का पुनर्जन्म हुआ था। विकास अपनी मां का हाथ अपने हाथों में थामकर, उनके फटे हुए बैग को अपने सीने से लगाकर बड़े गर्व से अपने घर की ओर लौटा। आज उसके चेहरे पर किसी बनावटी सूट का घमंड नहीं था, बल्कि अपनी असली दौलत—अपनी मां को वापस पा लेने का एक सच्चा और दिव्य सुकून था।
दिखावे की इस चकाचौंध भरी दुनिया में अक्सर लोग अपने उन बूढ़े माता-पिता को भूल जाते हैं जिनकी उंगलियां पकड़कर उन्होंने कभी पहला कदम बढ़ाया था। क्या आपको भी लगता है कि माता-पिता की सच्ची सेवा किसी भी तीर्थ यात्रा और सामाजिक प्रतिष्ठा से कहीं बढ़कर है? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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संगीता अग्रवाल