पिता की अनमोल कमाई

 “बेटा, तेरे बाप ने हमें बीस साल रोटी दी। बीस साल, एक दिन भी नागा नहीं किया। जिस दिन मेरी घरवाली गुज़री, उस दिन भी वे ख़ुद मेरे घर खाना लेकर आए थे। आज उनके जाने की ख़बर सुनी तो लगा जैसे मेरा बाप चला गया।” उसकी आवाज़ रुँधी हुई थी।

बच्चे वाली औरत भी आगे आई। अब उसका बच्चा बड़ा हो चुका था, शायद दस-बारह बरस का। “बेटा, जब मेरा आदमी मर गया था और मैं बच्चे को लेकर सड़क पर आ गई थी, तब तेरे पिताजी ने कहा था कि बहन, जब तक तेरे बच्चे का पेट भरा है, तब तक यह दुकान तेरी है। आज यह लड़का सातवीं में पढ़ता है। उसकी फ़ीस भी उन्हीं के कारण भरी जाती रही।”

सुबह के चार बजे थे। पटना की उस पुरानी गली में अभी अँधेरा था, पर हरिप्रसाद के “अन्नपूर्णा भोजनालय” की भट्ठी पूरे ज़ोर से जल चुकी थी। अड़तालीस साल से यह भट्ठी इसी वक़्त जलती आई थी, पहले उनके दादा के हाथों, फिर पिता के, और पिछले पच्चीस साल से हरिप्रसाद के।

बेटा आदित्य उन दिनों बंगलौर की एक बड़ी कंपनी में सॉफ़्टवेयर इंजीनियर था। साल में दो बार घर आता, चार दिन रुकता और लौट जाता। उसके लिए पिता का भोजनालय एक पुरानी, छोटी-सी दुकान से ज़्यादा कुछ नहीं था, जहाँ मुनाफ़ा कम और मेहनत बहुत थी।

उस साल दिवाली पर आदित्य घर आया तो पिता को खाँसते देखा। चेहरा पीला था, चाल धीमी। माँ यशोदा ने चुपके से बताया, “डॉक्टर कहता है दिल कमज़ोर है। आराम करने को कहा है, पर तेरे पापा माने तब ना।”

आदित्य ने पिता से कहा, “पापा, आप कल से दुकान नहीं जाएँगे। मैं सँभाल लूँगा।”

हरिप्रसाद हँस पड़े। “तू? तूने कभी कढ़ाई पकड़ी है?”

“कढ़ाई नहीं पकड़ूँगा, हिसाब-किताब और गल्ला देख लूँगा। आज का दिन मुझे साथ ले चलिए।”

अगली सुबह बाप-बेटे साथ निकले। आदित्य ने पूरा दिन ग़ौर से देखा। दाल-सब्ज़ी, गरम पूड़ियाँ, मक्खन से चमकते पराँठे, और हर ग्राहक से हरिप्रसाद की वही अपनापन भरी बात, “खाना ठीक लगा ना भैया? कुछ और चाहिए तो बोलना।” दोपहर में भीड़ रही, शाम को थोड़ी कम, और रात नौ बजे तक ज़्यादातर मेज़ें ख़ाली हो गईं।

रात दस बजे आदित्य गल्ला गिन रहा था कि उसकी नज़र दुकान के पिछले दरवाज़े पर गई। वहाँ धीरे-धीरे लोग जुटने लगे थे। एक बूढ़ा रिक्शेवाला, फटी चादर ओढ़े दो मज़दूर, एक औरत जिसकी गोद में बच्चा सो रहा था, स्टेशन के पास सोने वाला एक अंधा भिखारी, और कुछ लड़के जो शायद किसी फ़ैक्टरी की रात की पाली से लौटे थे। कोई बोल नहीं रहा था। सब चुपचाप क़तार में खड़े थे, जैसे इस क़तार की उन्हें बरसों से आदत हो।

हरिप्रसाद ने कड़ाही में बची सब्ज़ी, परात में बची रोटियाँ और डोंगे में बचा चावल निकाला। साफ़ स्टील की थालियाँ लगाईं और अपने हाथ से एक-एक को परोसने लगे। “बैठ जा काका, गरम है। अरे बिटिया, बच्चे के लिए दाल अलग से ले ले।”

आदित्य हैरान खड़ा देखता रहा। लोग खाते, और खाने के बाद हरिप्रसाद के आगे हाथ जोड़कर चल देते। कोई कुछ कहता नहीं था, पर उनकी आँखें सब कह जाती थीं।

सारे लोग चले गए तो आदित्य से रहा नहीं गया। “पापा, यह सब क्या है? आप रोज़ यह खाना बाँट देते हैं?”

“रोज़, बेटा। पूरे अड़तालीस साल से, यानी जब से यह दुकान है।”

“पर पापा, यह तो सीधा नुक़सान है। हमारे पास फ़्रिज है, डीप फ़्रीज़र है। यह खाना रखकर अगले दिन की सब्ज़ी में मिलाया जा सकता है। महीने का कितना बचेगा, कभी हिसाब लगाया है आपने? कम से कम तीस-चालीस हज़ार रुपये!”

हरिप्रसाद ने धीरे से पानी का गिलास रखा और बेटे के पास बैठ गए। “तेरे दादा जी कहा करते थे कि बासी खाना किसी ग्राहक की थाली में परोसना अपनी इज़्ज़त बेचने जैसा है। उन्होंने यह दुकान सिर्फ़ चार तसलों और एक भट्ठी से शुरू की थी। पर उन्होंने नियम बनाया था कि जो खाना आज बनेगा, वह आज ही ख़त्म होगा। या तो ग्राहक के पेट में, या किसी भूखे के पेट में।”

“वह तब की बात थी पापा। तब सुविधाएँ नहीं थीं।”

“सुविधा आज भी है बेटा, पर नीयत वही रखनी पड़ती है।” हरिप्रसाद मुस्कुराए। “तू पूछ रहा है ना कि नुक़सान क्यों उठाता हूँ? तू बता, उस बूढ़े रिक्शेवाले का चेहरा देखा था खाना खाने के बाद? मैं पूरे दिन की थकान, पूरे दिन का हिसाब भूल जाता हूँ। पैसा हर कोई कमाता है आदित्य, पर पैसे के साथ इंसान कमाना सबसे बड़ी कमाई है। हो सके तो यह दौलत तू भी कमाना।”

आदित्य चुप रहा। उसे पिता की बात ठीक तो लगी, पर पूरी तरह समझ नहीं आई। उसके दिमाग़ में अब भी वही हिसाब चल रहा था, जो उसकी कंपनी ने उसे सिखाया था: हर चीज़ का मोल, हर ख़र्च का रिटर्न।

दो दिन बाद वह बंगलौर लौट गया। पर उस रात की क़तार उसकी आँखों के आगे बार-बार आती रही। वह मीटिंगों में बैठा होता और उसे अचानक वह बच्चे वाली औरत याद आ जाती।

तीन महीने बाद सुबह-सुबह माँ का फ़ोन आया। आवाज़ काँप रही थी। “आदित्य, जल्दी आ जा बेटा। तेरे पापा…”

वह अगली फ़्लाइट से पटना पहुँचा, पर देर हो चुकी थी। हरिप्रसाद सुबह भट्ठी जलाकर लौटे थे, चाय पी रहे थे और बैठे-बैठे ही चले गए। दिल का दौरा था। चेहरे पर वैसी ही शांति थी, जैसी भरपेट खाना खाकर जाते किसी ग्राहक के चेहरे पर होती है।

घर में रिश्तेदार जुटने लगे। चाचा, मामा, बुआ, दूर के भाई। सब आँसू पोंछते हुए पिता की तारीफ़ कर रहे थे, पर आदित्य को लग रहा था कि वह किसी बुरे सपने में खड़ा है।

तभी दरवाज़े पर हलचल हुई। पहले दो-चार लोग आए, फिर दस, फिर पचास, फिर पूरी गली भर गई। सबके हाथ में कोई न कोई फूल था। किसी के पास मुरझाई हुई गेंदे की माला, किसी के पास सिर्फ़ एक कमल का फूल, और किसी के पास बस जेब में रखे दो सिक्के, जो वे चढ़ाना चाहते थे।

आदित्य के मौसा जी ने उसे कोहनी मारकर धीमे से पूछा, “बेटा, ये सब कौन हैं? तेरे मोहल्ले के तो नहीं लगते, और न ही हमारी बिरादरी के। इतनी भीड़ कैसे जुट गई?”

आदित्य की आँखों में आँसू थे, पर उसके चेहरे पर एक अजीब-सी दृढ़ता थी। उसने भीड़ की तरफ़ देखा और बोला, “ये पापा की अनमोल दौलत हैं, मौसा जी।”

मौसा जी ने चौंककर देखा। कुछ और रिश्तेदार भी पास खिसक आए।

“ऐसे मत देखिए आप लोग,” आदित्य ने भर्राई आवाज़ में कहा। “मैं भी इन्हें पहले नहीं जानता था। एक रात पापा के साथ दुकान गया था, तब देखा। रात दस बजे के बाद इनकी क़तार लगती है। ये रिक्शेवाले हैं, मज़दूर हैं, सड़क पर सोने वाले लोग हैं। पापा अड़तालीस साल से रोज़ इन्हें अपने हाथ से खाना परोसते आए थे।”

रिश्तेदारों में सन्नाटा छा गया।

“मैंने उस दिन पापा से बहस की थी,” आदित्य की आवाज़ टूट गई। “मैंने कहा था कि यह नुक़सान है। और पापा ने कहा था कि पैसा हर कोई कमाता है, पर पैसे के साथ इंसान कमाना सबसे बड़ी कमाई है। उस वक़्त मुझे यह बात बस बातें लगी थीं।”

तभी भीड़ में से वही बूढ़ा रिक्शेवाला आगे आया, जिसकी पीठ झुकी हुई थी। उसने काँपते हाथों से आदित्य के पाँव छूने चाहे, तो आदित्य ने उसे बीच में ही थाम लिया। “काका, आप क्या कर रहे हैं?”

“बेटा, तेरे बाप ने हमें बीस साल रोटी दी। बीस साल, एक दिन भी नागा नहीं किया। जिस दिन मेरी घरवाली गुज़री, उस दिन भी वे ख़ुद मेरे घर खाना लेकर आए थे। आज उनके जाने की ख़बर सुनी तो लगा जैसे मेरा बाप चला गया।” उसकी आवाज़ रुँधी हुई थी।

बच्चे वाली औरत भी आगे आई। अब उसका बच्चा बड़ा हो चुका था, शायद दस-बारह बरस का। “बेटा, जब मेरा आदमी मर गया था और मैं बच्चे को लेकर सड़क पर आ गई थी, तब तेरे पिताजी ने कहा था कि बहन, जब तक तेरे बच्चे का पेट भरा है, तब तक यह दुकान तेरी है। आज यह लड़का सातवीं में पढ़ता है। उसकी फ़ीस भी उन्हीं के कारण भरी जाती रही।”

आदित्य के आँसू रुक नहीं रहे थे। उसे अब समझ आया कि पिता ने जो छोड़ा था, उसका हिसाब किसी बही-खाते में नहीं था। वह तो सैकड़ों दुआओं में दर्ज था, जो आज इस गली को भरकर खड़ी थीं।

मौसा जी की आँखें भी नम थीं। उन्होंने आदित्य के कंधे पर हाथ रखकर कहा, “बेटा, मैं तेरे पिता को सिर्फ़ एक दुकानदार समझता था। आज पता चला कि वह तो हम सबसे कहीं ज़्यादा अमीर आदमी था।”

अंतिम यात्रा में सैकड़ों लोग साथ चले। जब पिता की चिता को अग्नि दी गई, तो पूरे श्मशान में कोई ऐसा न था जिसकी आँख सूखी हो।

तेरहवीं के बाद रिश्तेदार लौट गए। घर में सिर्फ़ माँ और आदित्य बचे। यशोदा ने बेटे से कहा, “बेटा, तू वापस बंगलौर चला जा। दुकान मैं किसी को चलाने के लिए दे दूँगी। तेरी नौकरी बड़ी है।”

आदित्य ने माँ का हाथ पकड़ा। “माँ, मैंने बंगलौर में इस्तीफ़ा भेज दिया है।”

माँ चौंक गईं। “यह क्या कह रहा है तू?”

“माँ, मैंने नौकरी में बहुत पैसा कमाया, पर आज तक एक भी ऐसा आदमी नहीं कमाया जो मेरे मरने पर इस तरह रोए। पापा ने जो कमाया है, वह दौलत मुझे भी चाहिए। मैं भट्ठी जलाऊँगा माँ, उसी वक़्त, जब पापा जलाते थे।”

अगली सुबह चार बजे आदित्य ने भट्ठी जलाई। पहली बार हाथ काँपे, कढ़ाई भारी लगी, पहली दाल कुछ जल गई। पर पुराने रसोइये रामू काका ने उसे सँभाला। धीरे-धीरे वह सब सीखता चला गया। उसने अपने कंप्यूटर के हुनर से भोजनालय का हिसाब आसान किया, ऑनलाइन ऑर्डर शुरू किए, और दुकान की आमदनी पहले से दुगुनी कर ली। पर एक नियम उसने कभी नहीं बदला: रात दस बजे के बाद बचा हुआ पूरा खाना पिछले दरवाज़े पर क़तार में खड़े लोगों में बाँटना।

एक साल बाद उसने दुकान के बाहर एक छोटा-सा बोर्ड लगवाया: “यहाँ कोई भूखा नहीं लौटता।” फिर उसने अपने शहर के दूसरे होटल वालों से बात की। पहले दो, फिर पाँच, फिर पंद्रह होटल वालों ने बचा हुआ ताज़ा खाना बाँटने की मुहिम में हाथ मिलाया। लोग उसे अब “आदित्य भैया” कहने लगे थे, और पूरे शहर में हरिप्रसाद जी की यह परंपरा नाम बन गई।

एक रात जब आख़िरी आदमी खाना खाकर जा चुका, तो आदित्य दुकान की दीवार पर टँगी पिता की तस्वीर के सामने खड़ा हो गया। फूलों की माला के पीछे से हरिप्रसाद वैसे ही मुस्कुरा रहे थे। आदित्य ने धीरे से कहा, “पापा, आज मैंने भी वह दौलत कमाई है जिसकी आप बात करते थे।”

तभी खिड़की से हवा का एक झोंका आया और तस्वीर पर टँगी माला हल्के-से हिल उठी, जैसे पिता ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया हो।


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