जब ममता लावारिस हो गई

 पल्लवी का हाथ वहीं थम गया। वह सोफे पर धप से बैठ गई और उसका पूरा बदन कांपने लगा। अंबर की आंखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। जिस बच्चे के सामने वे अपनी तथाकथित आधुनिकता और व्यस्तता का ढोंग कर रहे थे, उस बच्चे ने उनके कर्मों का आइना उनके सामने लाकर रख दिया था। उन्होंने समझ लिया था कि वे अपने बेटे को संस्कार नहीं, बल्कि अपनी ही आने वाली बर्बादी का पाठ पढ़ा रहे थे। जो बीज उन्होंने आज जानकी देवी के लिए बोया था, वही फसल कल उनका अपना बेटा उनके लिए काटने वाला था।

 उम्र के तिहत्तरवें पड़ाव पर आकर उनके शरीर ने अचानक जवाब दे दिया था। कुछ दिन पहले ही उन्हें लकवे का हल्का दौरा पड़ा था, जिसने उनके दाहिने हिस्से को कमजोर कर दिया था। चलने-फिरने के लिए सहारे की जरूरत थी और आवाज भी लड़खड़ाने लगी थी।

जानकी देवी ने अपने जीवन में क्या कुछ नहीं देखा था। पैंतीस साल पहले जब पति का साया सिर से उठा, तो उन्होंने सिलाई-कढ़ाई करके, दिन-रात एक करके अपने दोनों बच्चों—बेटे अंबर और बेटी नीलिमा को पाला-पोसा। आज अंबर शहर की एक नामी आईटी फर्म में बड़े पैकेज पर प्रोजेक्ट मैनेजर था और उसकी पत्नी पल्लवी एक बैंक में असिस्टेंट मैनेजर थी। नीलिमा का ब्याह भी वडोदरा के एक बड़े कपड़ा व्यापारी के खानदान में हुआ था। जानकी देवी को लगता था कि उनकी तपस्या सफल हो गई, उनके बच्चे अपनी-अपनी जिंदगी में खुश हैं और अब उनका बुढ़ापा सुकून से बीतेगा।

लेकिन यह सुकून तब तक ही था जब तक जानकी देवी अपने दोनों पैरों पर खड़ी थीं, घर के छोटे-मोटे काम निपटा लेती थीं और किसी पर बोझ नहीं थीं। बीमारी ने आते ही घर के सारे मुखौटे नोच डाले।

सोमवार की सुबह रसोई से प्रेशर कुकर की सीटी के साथ पल्लवी की ऊंची आवाज ड्रॉइंग रूम तक गूंज रही थी। पल्लवी ऑफिस के लिए तैयार हो रही थी और लैपटॉप बैग समेटते हुए चिड़चिड़ेपन से अंबर पर बरस रही थी।

“अंबर, मैं तुमसे साफ कह रही हूं, मुझसे अब यह सब नहीं संभलने वाला! सुबह छह बजे उठकर खाना बनाऊं, ऑफिस भागूं, शाम को फाइलों का ढेर लेकर घर लौटूंगी और फिर यहां आते ही मरीजों वाली तीमारदारी करूं? मेरे पास इतना वक्त नहीं है! आखिर मैं भी नौकरी करती हूं, कोई तुम्हारी बंधुआ मजदूर नहीं हूं जो अपनी तरक्की छोड़कर घर बैठ जाऊं और सिर्फ मां जी की सेवा करूं!”

अंबर ने टाई की गांठ ढीली करते हुए लाचारी से कहा, “पल्लवी, थोड़ा धीरे बोलो, मां जाग रही हैं, सुन लेंगी तो उन्हें कितना बुरा लगेगा। आखिर वो मेरी मां हैं, इस हालत में कहां जाएंगी? थोड़ा तालमेल बिठा लो ना।”

“अरे वाह! सुन लेंगी तो क्या झूठ कह रही हूं मैं?” पल्लवी ने त्योरियां चढ़ाते हुए कहा, “अगर तुम्हें अपनी मां की इतनी ही फिक्र है तो खुद नौकरी छोड़ दो और घर बैठो! हमने मेड रखकर भी देख लिया, दो दिन में काम छोड़कर भाग जाती है। मां जी को हर घंटे कुछ न कुछ चाहिए होता है। एक बात बताओ, तुम्हारी एक बहन भी तो है ना? नीलिमा दीदी क्या सिर्फ जायदाद में हिस्सा लेने और त्योहारों पर महंगे तोहफे बटोरने के लिए हैं? मां की सेवा यहां नहीं हो पा रही तो उन्हें दीदी के पास वडोदरा भेज दो ना! उनका घर कितना बड़ा है, नौकर-चाकर हैं, वहां मां जी की अच्छे से देखभाल हो जाएगी।”

अंबर को पत्नी की बात में एक आसान रास्ता नजर आया। उसे लगा कि सचमुच, बेटा और बेटी दोनों का मां पर बराबर हक होता है, तो फिर जिम्मेदारी सिर्फ बेटे के सिर क्यों? उसने तुरंत मोबाइल निकाला और नीलिमा को फोन मिलाया।

“हेलो, दीदी! कैसी हो?”

“हां अंबर, बोल भाई, सब ठीक है? आज इतनी सुबह कैसे फोन किया?” नीलिमा ने वहां से सहजता से पूछा।

अंबर ने थोड़ा गला खंकारते हुए झिझकते हुए बात शुरू की, “दीदी, दरअसल मां की तबीयत को लेकर बात करनी थी। तुम तो जानती ही हो कि लकवे के बाद से मां का चलना-फिरना बंद है। पल्लवी का बैंक में नया प्रमोशन हुआ है, उस पर काम का बहुत दबाव है और मैं भी टूर पर रहता हूं। घर में कोई उनकी देखभाल करने वाला नहीं है। क्या तुम कुछ महीनों के लिए मां को अपने पास ले जाओगी? तुम्हारी ससुराल में सब ठीक है, वहां मां का मन भी बहल जाएगा।”

फोन के उस पार कुछ पलों का गहरा सन्नाटा छा गया। फिर नीलिमा की आवाज में एक अजीब सी तल्खी और कड़वाहट घुल गई, “अरे अंबर, तू भी क्या बच्चों जैसी बातें कर रहा है! तुझे लगता है कि मेरे पास यहां फालतू फुर्सत है? मेरा अपना संसार है, बच्चे दसवीं और बारहवीं में हैं, उनका ट्यूशन, उनका खाना-पीना… ऊपर से अगले हफ्ते मेरे सास-ससुर तीरथ से लौटकर पक्के तौर पर यहीं रहने आ रहे हैं। उनके रहते मैं अपनी बीमार मां को यहां कैसे ला सकती हूं? मेरी ससुराल वाले क्या सोचेंगे कि बेटी अपनी मां को मायके से लाकर यहां बिठा रही है? मां की सेवा करना तो बेटे और बहू का फर्ज होता है ना भाई!”

अंबर का चेहरा उतर गया, “पर दीदी, यहां सचमुच बहुत परेशानी है…”

“तो फिर कोई दूसरा रास्ता निकालो अंबर! मुझे बीच में मत घसीटो। हां, अगर रुपयों-पैसों की जरूरत हो तो मुझे बता देना, मैं थोड़े-बहुत भेज दूंगी, पर यहां रखना नामुमकिन है,” इतना कहकर नीलिमा ने फोन काट दिया।

अंबर फोन हाथ में पकड़े शून्य में देखता रह गया।

उधर कमरे के भीतर, बिस्तर पर पड़ी जानकी देवी ने अपनी सूजी हुई आंखों से आंसुओं को बहने दिया। उनके कान इतने कमजोर नहीं हुए थे कि वे बेटे, बहू और बेटी की बातें न सुन पाते। उनकी छाती में ऐसा दर्द उठा जैसे किसी ने जिंदा कलेजे पर आरी चला दी हो। जिस बेटे को उन्होंने अपनी एक-एक सांस देकर पाला था, आज उसकी पत्नी के लिए वह एक मुसीबत बन चुकी थीं। और वह बेटी, जिसकी डोली विदा करते वक्त उन्होंने अपनी पूरी जमा-पूंजी और ममता लुटा दी थी, आज वही बेटी अपनी चौखट पर मां के कदम पड़ने को अपनी इज्जत पर दाग समझ रही थी।

शाम को डाइनिंग टेबल पर फिर वही फुसफुसाहट शुरू हुई। पल्लवी ने चाय का कप रखते हुए दो टूक लहजे में कहा, “अंबर, दीदी ने हाथ खींच लिए ना? मुझे पहले ही पता था। अब इसका एक ही पक्का इलाज है। मेरे कजिन ने अपनी दादी को गांधीनगर के पास वाले ‘आनंद निकेतन’ वृद्धाश्रम में रखा था। बहुत बढ़िया जगह है। हर महीने चालीस हजार रुपये लगते हैं, चौबीसों घंटे नर्स रहती है, डॉक्टर आते हैं और साफ-सुथरा माहौल है। मां जी वहां खुश रहेंगी और हम भी अपनी जिंदगी चैन से जी पाएंगे। तुम कल ही बात करो।”

अंबर का जमीर एक पल के लिए कांपा, “वृद्धाश्रम? लोग क्या कहेंगे पल्लवी? समाज में हमारी क्या थू-थू होगी कि इतने बड़े घर का बेटा अपनी मां को वृद्धाश्रम छोड़ आया?”

“लोग क्या कहेंगे, इसकी चिंता छोड़ो अंबर! जब घर में रोज-रोज क्लेश होगा और हमारा करियर बर्बाद हो जाएगा, तब ये लोग खाना देने नहीं आएंगे! मां की सेवा वहां सबसे अच्छी होगी, इसे दिल पर पत्थर रखकर मान लो,” पल्लवी ने फैसला सुना दिया।

अगले ही दिन सारी औपचारिकताएं पूरी कर ली गईं। अंबर ने जानकी देवी के कुछ पुराने कपड़े, दवाइयों का थैला और उनके भगवान की छोटी सी मूर्ति एक सूटकेस में पैक की। जब अंबर कमरे में आया, तो उसने अपनी नजरें चुराते हुए कहा, “मां, चलिए, आपको एक बहुत अच्छी जगह ले चल रहे हैं। वहां आपकी बहुत अच्छी देखभाल होगी, बड़े-बड़े डॉक्टर हैं, आप जल्दी ठीक हो जाएंगी।”

जानकी देवी ने अपने बेटे के चेहरे को देखा। वह चेहरा, जिसे देखकर कभी उनका सारा दुख मिट जाता था, आज उस पर अपराधबोध की एक काली परत चढ़ी हुई थी। जानकी देवी ने न कोई सवाल किया, न कोई विरोध। उनकी लड़खड़ाती जबान से सिर्फ इतना निकला, “जहां… तेरी खुशी हो बेटा…”

गाड़ी जब ‘आनंद निकेतन’ के बड़े लोहे के गेट के भीतर दाखिल हुई, तो जानकी देवी ने अपनी कांपती उंगलियों से साड़ी का पल्लू कसकर पकड़ लिया। वहां का सन्नाटा किसी अस्पताल के मुर्दाघर जैसा लग रहा था। अंबर ने रिसेप्शन पर सारे कागजात पर दस्तखत किए, छह महीने की एडवांस फीस भरी और जानकी देवी को एक व्हीलचेयर पर बैठाकर वार्ड की तरफ बढ़ गया।

सफेद दीवारों वाला वह कमरा साफ तो था, लेकिन वहां आत्मीयता की कोई बूंद नहीं थी। वहां कई और बुजुर्ग भी बैठे थे, जिनकी आंखों में अपने-अपने घरों से बेदखल होने का वही दर्द तैर रहा था।

अंबर ने अपनी घड़ी देखी। “मां, अब मुझे निकलना होगा, ऑफिस में जरूरी मीटिंग है। मैं हर रविवार को आपसे मिलने आऊंगा। पल्लवी भी आएगी। आप अपना ध्यान रखना।”

अंबर ने झुककर जानकी देवी के पैर छुए, लेकिन जानकी देवी के कांपते हाथ उस दिन बेटे के सिर पर आशीर्वाद देने के लिए नहीं उठे। वे बस शून्य में देखती रहीं। अंबर तेज कदमों से बाहर निकल गया, मानो किसी भारी जुर्म की जगह से भाग रहा हो।

शुरुआत के कुछ हफ्ते जानकी देवी के लिए नरक जैसे थे। वहां समय पर दवा मिलती थी, समय पर दलिया और उबला हुआ खाना मिलता था, नर्सें अपना काम मशीनी तरीके से करती थीं। लेकिन उस व्यवस्था में ‘मां’ शब्द की कोई गर्माहट नहीं थी। अंबर पहले रविवार को आया, पंद्रह मिनट बैठा और घड़ी देखकर चला गया। दूसरे रविवार उसने फोन पर कह दिया कि वह काम में फंसा है। तीसरा रविवार आया और चला गया, न अंबर आया और न ही वडोदरा से नीलिमा की कोई खबर आई।

जानकी देवी समझ गईं कि उनके बच्चों ने अपनी जिम्मेदारी का सौदा रुपयों से कर लिया था। उन्होंने पैसे फेंककर अपनी मां को अपनी जिंदगी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था।

एक दिन, जब जानकी देवी आश्रम के बगीचे में व्हीलचेयर पर बैठी एक मुरझाए हुए गुलाब के फूल को देख रही थीं, तभी उनके पास आश्रम के संचालक, पचहत्तर वर्षीय सेवानिवृत्त प्रोफेसर वासुदेव जी आकर बैठ गए। वासुदेव जी ने अपनी पूरी पेंशन और जीवन इस आश्रम को संवारने में लगा दी थी।

वासुदेव जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “जानकी बहन, उस फूल को क्या देख रही हो? जो पत्ता शाख से गिर जाता है, अगर वह रोज रोएगा तो मिट्टी में मिलकर सड़ जाएगा। लेकिन अगर वह खाद बन जाए, तो जमीन से एक नया बीज अंकुरित कर देता है।”

जानकी देवी ने गीली आंखों से उनकी तरफ देखा।

वासुदेव जी ने बहुत कोमल स्वर में कहा, “मैं जानता हूं कि दिल पर क्या बीतती है जब अपनी ही कोख से जन्मे बच्चे हमें बेगाना कर देते हैं। पर बहन, क्या ईश्वर ने हमें यह जीवन सिर्फ इसलिए दिया था कि हम किसी के मोहताज होकर अपनी अंतिम सांसों का इंतजार करें? इस आश्रम के पीछे एक छोटा सा अनाथालय भी है, जहां दर्जनों ऐसे मासूम बच्चे हैं जिनके सिर पर न मां है, न बाप। वे ममता के भूखे हैं और आप जैसी माएं यहां बच्चों के प्यार के लिए तरस रही हैं। क्यों न आप अपने इस खालीपन को उन मासूमों की मुस्कान से भर दें?”

वासुदेव जी की बातों ने जानकी देवी के भीतर बुझती हुई लौ को फिर से सुलगा दिया। उन्होंने सोचा—सच ही तो है, जब मेरे अपने बच्चों को मेरी जरूरत नहीं, तो मैं उन बच्चों की मां क्यों न बनूं जिन्हें सचमुच एक मां के आंचल की तलाश है?

अगले ही दिन से जानकी देवी ने अपने बिस्तर पर पड़े रहने की आदत को अलविदा कह दिया। उन्होंने फिजियोथेरेपिस्ट की मदद से कड़े अभ्यास शुरू किए। दर्द होता था, पैर कांपते थे, लेकिन उनके भीतर जीने का एक नया संकल्प जाग चुका था। दो महीने के भीतर, जानकी देवी छड़ी के सहारे अपने पैरों पर चलने लगीं।

वे रोज शाम को आश्रम के उस हिस्से में जाने लगीं जहां अनाथ बच्चे रहते थे। जानकी देवी ने उन बच्चों को कहानियां सुनाना, उन्हें हिंदी और गणित पढ़ाना और अपनी सिलाई के पुराने हुनर से उनके फटे कपड़े सिलना शुरू कर दिया। उन अनाथ बच्चों को जानकी देवी में अपनी दादी और नानी मिल गई। वे दौड़कर आते और कहते, “दादी मां! आज हमें वो राजा-रानी वाली कहानी सुनाओ ना!”

जानकी देवी का मुरझाया हुआ चेहरा फिर से खिल उठा। उनके चेहरे पर वही पुरानी आभा लौट आई। उन्होंने आश्रम की अन्य उपेक्षित माताओं को भी अपने साथ जोड़ा। सब मिलकर बच्चों के लिए स्वेटर बुनतीं, आचार-पापड़ बनातीं और आश्रम के प्रांगण में एक नई ऊर्जा का संचार हो गया। जानकी देवी अब केवल एक बेबस बुजुर्ग नहीं थीं, वे उस पूरे परिसर की ‘बड़ी मां’ बन चुकी थीं। उन्होंने अपनी बची हुई पेंशन और जमा पूंजी से उन बच्चों की पढ़ाई के लिए एक ट्रस्ट शुरू करवा दिया।

इधर अहमदाबाद में, अंबर और पल्लवी के जीवन में जैसा उन्होंने सोचा था वैसा सुकून नहीं आया।

मां को आश्रम भेजकर उन्होंने सोचा था कि जिम्मेदारियों से मुक्ति मिल जाएगी, लेकिन घर से जैसे बरकत और शांति ही गायब हो गई थी। अंबर के मन में एक गहरा अपराधबोध हर वक्त कचोटता रहता था। वह रात को ठीक से सो नहीं पाता था। उधर पल्लवी को बैंक में भारी घाटा और काम के तनाव के चलते उच्च रक्तचाप और गंभीर अवसाद ने घेर लिया। जिस सुख और तरक्की के लिए उन्होंने मां की सेवा से मुंह मोड़ा था, वही तरक्की अब उन्हें जहर जैसी लगने लगी थी। घर में आए दिन दोनों के बीच झगड़े होने लगे।

एक दिन अंबर के बारह साल के बेटे कबीर ने स्कूल से लौटकर एक ऐसा सवाल पूछा जिसने अंबर और पल्लवी दोनों के पैरों तले से जमीन खींच ली।

कबीर ने अपना बस्ता मेज पर पटका और गंभीर चेहरे के साथ अपने पिता से पूछा, “पापा, आप और मम्मी रोज इतना काम करते हैं, बहुत थक जाते होंगे ना?”

अंबर ने बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “हां बेटा, तुम्हारे भविष्य के लिए मेहनत तो करनी पड़ती है।”

कबीर ने मासूमियत से, पर बेहद चुभते हुए स्वर में कहा, “पापा, जब आप और मम्मी बूढ़े हो जाओगे और बीमार पड़ोगे, तो मैं भी इतनी भागदौड़ नहीं कर पाऊंगा। मुझे भी बड़ा अफसर बनना है। तो क्या मुझे भी अभी से पैसे जोड़ने चाहिए ताकि मैं आप दोनों को उसी ‘आनंद निकेतन’ वाले आश्रम में छोड़ सकूं जहां आपने दादी को छोड़ा है?”

कबीर के मुंह से निकले ये शब्द अंबर और पल्लवी के सीने में किसी खंजर की तरह उतर गए।

पल्लवी का हाथ वहीं थम गया। वह सोफे पर धप से बैठ गई और उसका पूरा बदन कांपने लगा। अंबर की आंखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। जिस बच्चे के सामने वे अपनी तथाकथित आधुनिकता और व्यस्तता का ढोंग कर रहे थे, उस बच्चे ने उनके कर्मों का आइना उनके सामने लाकर रख दिया था। उन्होंने समझ लिया था कि वे अपने बेटे को संस्कार नहीं, बल्कि अपनी ही आने वाली बर्बादी का पाठ पढ़ा रहे थे। जो बीज उन्होंने आज जानकी देवी के लिए बोया था, वही फसल कल उनका अपना बेटा उनके लिए काटने वाला था।

उसी शाम नीलिमा का भी रोते हुए फोन आया। वडोदरा में उसकी सास ने उसके साथ ऐसा ही बर्ताव किया था, उसे घर के फैसलों से बेदखल कर दिया गया था और उसके अपने बच्चे उसकी बात नहीं सुन रहे थे। नीलिमा फोन पर सिसक रही थी, “अंबर… हमने मां के साथ बहुत बड़ा पाप किया है। आज जब मेरी ससुराल में मुझे बेगाना किया जा रहा है, तब मुझे समझ आ रहा है कि उस दिन मां के दिल पर क्या गुजरी होगी जब मैंने उन्हें अपने घर की चौखट पर आने से मना कर दिया था। भगवान हमें कभी माफ नहीं करेगा।”

अंबर ने फोन काटा और पल्लवी की तरफ देखा। पल्लवी का सारा अहंकार, सारा घमंड बह चुके आंसुओं के साथ मिट चुका था। उसने हाथ जोड़कर अंबर से कहा, “अंबर, मुझे माफ कर दो। मैं अंधी हो गई थी। चलो, अभी चलो… हम मां जी को वापस घर लाएंगे। चाहे मुझे अपनी नौकरी छोड़नी पड़े, मैं खुद उनकी सेवा करूंगी। अगर आज हम नहीं सुधरे, तो हमारा यह घर कभी घर नहीं बन पाएगा।”

अगली सुबह, अंबर, पल्लवी और नीलिमा अपनी गाड़ियों से ‘आनंद निकेतन’ पहुंचे। तीनों के चेहरे पर गहरी शर्मिंदगी और पश्चाताप का बोझ था। वे सोच रहे थे कि जानकी देवी किसी अंधेरे कोने में रोती हुई, बीमार और लाचार हालत में मिलेंगी और वे उनके पैरों में गिरकर माफी मांग लेंगे।

लेकिन जब वे आश्रम के मुख्य प्रांगण में पहुंचे, तो वहां का नजारा देखकर वे अपनी सुध-बुध खो बैठे।

धूप से भरे बगीचे में, एक चबूतरे पर जानकी देवी बैठी थीं। उनके चेहरे पर कोई लाचारी या बीमारी का साया नहीं था; उनके चेहरे पर एक अलौकिक तेज, शांति और आत्मविश्वास झलक रहा था। उनके इर्द-गिर्द दर्जनों छोटे-छोटे बच्चे बैठे थे, जिन्हें वे हंस-हंसकर वर्णमाला सिखा रही थीं। उनके एक हाथ में किताब थी और दूसरा हाथ एक अनाथ बच्ची के सिर पर था। वहां हंसी के फव्वारे गूंज रहे थे।

“मां…” अंबर की रुंधी हुई आवाज निकली।

जानकी देवी ने नजरें उठाईं। सामने अंबर, पल्लवी और नीलिमा सिर झुकाए, हाथ जोड़े खड़े थे।

नीलिमा दौड़कर जानकी देवी के घुटनों से लिपट गई और फूट-फूट कर रोने लगी, “मां! हमें माफ कर दो मां! हम अंधे हो गए थे। हम अपनी व्यस्तता के नशे में भूल गए थे कि हमारी सांसें भी तुम्हारी बदौलत हैं। चलो मां, घर चलो। अब तुम्हें कभी कोई तकलीफ नहीं होगी।”

अंबर और पल्लवी भी उनके पैरों में गिर पड़े। पल्लवी ने रोते हुए कहा, “मां जी, मैं अपनी गलती पर शर्मिंदा हूं। मुझे एक मौका दीजिए, मैं बहू नहीं, आपकी बेटी बनकर आपकी सेवा करूंगी। कृपया हमारे साथ घर चलिए।”

जानकी देवी ने तीनों को देखा। उनकी आंखों में अब कोई शिकायत, कोई कड़वाहट या प्रतिशोध का भाव नहीं था। वहां केवल एक शांत, विशाल समंदर था।

उन्होंने धीरे से नीलिमा को उठाया और अंबर के कंधे पर हाथ रखा। उनकी आवाज में आज कोई लड़खड़ाहट नहीं थी, बल्कि एक अद्भुत गरिमा थी।

“उठो बच्चों, रोना बंद करो। मुझे तुम तीनों से कोई शिकायत नहीं है। उस दिन जब तुम लोगों ने मुझे अपनी जिंदगियों से बेदखल किया था, तो मुझे लगा था कि मेरी दुनिया खत्म हो गई। मैं सोचती थी कि औलाद ही मां का संसार होती है। लेकिन यहाँ आकर, इन बेसहारा बच्चों के बीच रहकर मेरी आंखें खुलीं।”

जानकी देवी ने अपने आसपास खड़े मासूम बच्चों की ओर देखा, “तुमने मुझे यहाँ इसलिए भेजा था क्योंकि तुम्हारे पास मेरी सेवा करने का समय नहीं था। लेकिन यहाँ आकर मुझे समझ आया कि मुझे किसी की दया, किसी की मजबूरी की सेवा का मोहताज नहीं होना है। तुमने मुझे बेसहारा समझा, लेकिन ईश्वर ने मुझे इन दर्जनों बेसहारा बच्चों का सहारा बना दिया। आज मैं यहाँ किसी की फालतू जिम्मेदारी नहीं हूं, मैं यहाँ इन बच्चों की जिंदगी हूं।”

अंबर ने रोते हुए कहा, “पर मां, यह समाज क्या कहेगा? हमारा घर आपके बिना सूना है।”

जानकी देवी ने मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, घर सिर्फ ईंट-पत्थरों और छत से नहीं बनता, घर अपनों के आदर और संस्कारों से बनता है। तुम लोग अपनी जिंदगी में खुश रहो, अपने बच्चों को वह संस्कार दो जो तुम खुद भूल गए थे। मैं अब उस चौखट पर वापस नहीं जाऊंगी जहां मुझे सिर्फ एक बोझ समझा गया था। मेरा घर अब यह आश्रम है, मेरा परिवार अब ये बच्चे हैं। हाँ, तुम जब चाहो, मुझसे मिलने आ सकते हो, अपने बच्चों को यहाँ ला सकते हो ताकि वे सीख सकें कि जीवन का असली मतलब केवल खुद के लिए जीना नहीं होता।”

अंबर, पल्लवी और नीलिमा समझ गए कि उन्होंने क्या खो दिया था। उन्होंने अपनी मां का वह विशाल रूप देख लिया था जो अब उनके संकीर्ण घरों की दीवारों में कभी नहीं समा सकता था। वे सिर झुकाए खड़े रहे, पश्चाताप की आग में तपकर, लेकिन अपनी मां के इस स्वाभिमान और त्याग के आगे नतमस्तक होकर।

जानकी देवी ने एक नई जिंदगी चुन ली थी—लाचारी की नहीं, बल्कि स्वाभिमान, सेवा और समाज को रोशनी देने वाली एक ऐसी प्रेरणा की, जो बुढ़ापे को अभिशाप नहीं बल्कि एक वरदान बना देती है।

आपके विचार: क्या आपको भी लगता है कि आज के आधुनिक समाज में करियर और व्यस्तता के नाम पर बुजुर्ग माता-पिता को वृद्धाश्रम भेजना एक फैशन बनता जा रहा है? क्या जानकी देवी का अपने बच्चों के साथ वापस न जाकर आश्रम के अनाथ बच्चों के लिए जीने का फैसला सही था? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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मूल लेखिका : रश्मि झा मिश्रा 

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