मनोरमा देवी भीतर ही भीतर छटपटाने लगीं। उनका बनाया तिलिस्म टूट चुका था। उन्हें लगने लगा कि अब इस घर में उनकी कोई अहमियत नहीं रही। इसी तनाव और खीझ में एक दिन उनका रक्तचाप अचानक बहुत बढ़ गया और वे चक्कर खाकर आँगन में गिर पड़ीं।
उस वक़्त घर पर कोई पुरुष नहीं था। अगर यह पहले का समय होता, तो शायद तीनों बहुएँ एक-दूसरे के मुँह देखतीं या डर के मारे अपने कमरों में दुबक जातीं। लेकिन उस दिन तीनों ने एक टीम की तरह काम किया। अनघा ने तुरंत अपनी सास का सिर अपनी गोद में रखा, नलिनी ने डॉक्टर को फ़ोन लगाया और वाणी दौड़कर गाड़ी निकालने और प्राथमिक उपचार की व्यवस्था करने में जुट गई। तीनों बहुओं ने मिलकर अपनी सास को संभाला, अस्पताल ले गईं और जब तक उनकी तबीयत स्थिर नहीं हो गई, तीनों ने एक पल के लिए भी अस्पताल का कमरा नहीं छोड़ा।
देवीप्रसाद जी सीधे-सादे, ईश्वर-भजन में लीन रहने वाले इंसान थे, लेकिन घर की असली बागडोर उनकी धर्मपत्नी मनोरमा देवी के हाथों में थी। मनोरमा देवी के चेहरे पर हमेशा एक सख्त, अडिग भाव रहता था। उनके चलने की आहट से ही घर के नौकर-चाकर सहम जाते थे। उनके तीन बेटे थे—अमित, सुमित और निशांत। तीनों ही संस्कारी और आज्ञाकारी थे, लेकिन मनोरमा देवी के मन में हमेशा एक अजीब सा खौफ़ रहता था। उन्हें लगता था कि यदि उनके तीनों बेटों की पत्नियाँ आपस में मिल-जुलकर रहने लगीं, तो परिवार पर से उनका नियंत्रण ख़त्म हो जाएगा। इसी डर ने उनके भीतर ‘फूट डालो और राज करो’ की उस नीति को जन्म दिया, जिसने सालों तक उस घर की खुशियों को निगल रखा था।
सबसे बड़ी बहू अनघा जब इस घर में आई, तो उसने अपनी सास की हर आज्ञा को पत्थर की लकीर मानकर स्वीकार किया। वह स्वभाव से शांत, सहनशील और समर्पित थी। पाँच साल तक उसने घर की हर ज़िम्मेदारी को अपने कंधों पर उठाया। लेकिन जब मँझले बेटे सुमित का विवाह नलिनी से हुआ, तो मनोरमा देवी के कान खड़े हो गए। नलिनी एक छोटे कस्बे के शिक्षक की बेटी थी—भावुक, सरल और बड़ों का आदर करने वाली। विवाह के पहले ही दिन से मनोरमा देवी ने अपनी चालें चलना शुरू कर दीं।
मनोरमा देवी नलिनी को अपने कमरे में बुलातीं और बेहद हमदर्दी जताते हुए कहतीं, “बहू, अनघा ऊपर से जितनी भोली दिखती है, अंदर से उतनी ही चालाक है। इतने साल अकेली रही है, इसलिए घर की चाबियों पर सिर्फ़ अपना हक़ समझती है। ज़रा संभलकर रहना, कहीं तुझे अपनी उँगलियों पर न नचाने लगे।” दूसरी तरफ़, वे अनघा के पास जाकर आँसू बहाने का नाटक करतीं, “अनघा, देख रही है नलिनी के तेवर? आते ही तेरे काम में नुक्स निकालने लगी है। मुझसे तो देखा नहीं जाता कि तू दिन-भर खटे और वह हुकूमत चलाए।”
नलिनी नई-नई आई थी, उसने सास की हर बात को सच मान लिया। नतीजा यह हुआ कि दोनों देवरानी-जेठानी के बीच एक अनकही खाई खिंच गई। दोनों एक ही रसोई में खाना बनातीं, लेकिन एक-दूसरे से नज़रें तक न मिलातीं। अगर अनघा दाल में तड़का लगाती, तो नलिनी बिना कुछ बोले बाहर निकल जाती। अगर नलिनी चाय बनाती, तो अनघा अपना कप अलग रख लेती। मनोरमा देवी दूर सोफ़े पर बैठकर चाय की चुस्कियाँ लेते हुए अपने इस खेल की सफलता पर मन ही मन मुस्कुराती थीं। घर के दोनों भाइयों को भी यही लगता था कि उनकी पत्नियों के स्वभाव आपस में नहीं मिलते।
चार साल बाद सबसे छोटे बेटे निशांत का ब्याह वाणी से हुआ। वाणी आज के दौर की पढ़ी-लिखी, चुलबुली और खुले विचारों वाली लड़की थी। उसने सोचा था कि भरे-पूरे परिवार में दो जेठानियों का साथ मिलेगा, तो वह बहनों की तरह रहेगी। लेकिन घर में कदम रखते ही मनोरमा देवी ने उसके कानों में भी ज़हर घोलना शुरू कर दिया।
मनोरमा देवी वाणी से एकांत में कहतीं, “वाणी, अनघा और नलिनी दोनों ही तुझे देखकर जलती हैं। तू शहर की पढ़ी-लिखी लड़की है, इसलिए वे दोनों तेरे ख़िलाफ़ साज़िशें रचती रहती हैं। तू बस मेरी शरण में रह, बाकी किसी पर भरोसा मत करना।” वाणी शुरू में सहम गई। उसने देखा कि घर में दोनों जेठानियाँ एक-दूसरे से बात तक नहीं करतीं और पूरा माहौल किसी श्मशान जैसा शांत रहता है। वह भी अपनी दोनों जेठानियों से कतराने लगी।
तीनों बहुएँ मनोरमा देवी को खुश करने की होड़ में लगी रहती थीं ताकि सास की नज़रों में वे अच्छी बन सकें। किसी को पता ही नहीं था कि वे जिस सास को अपना हितैषी समझ रही हैं, वही उनकी इस दूरियों और घुटन की असली सूत्रधार थीं।
लेकिन झूठ की बुनियाद पर खड़ी की गई दीवारें ज़्यादा दिन तक टिक नहीं सकतीं। कुदरत ने सच को सामने लाने का एक रास्ता तय कर रखा था।
सर्दियों के दिन थे। घर के सभी पुरुष किसी पारिवारिक शादी के सिलसिले में तीन दिनों के लिए बाहर गए हुए थे। उसी दौरान अचानक नलिनी की तबीयत बहुत बिगड़ गई। उसे तेज़ बुखार चढ़ा और वह ठंड से काँपने लगी। डॉक्टर को दिखाया गया तो पता चला कि उसे गंभीर वायरल निमोनिया हो गया है और उसे पूर्ण विश्राम तथा देखरेख की सख़्त ज़रूरत है। मनोरमा देवी ने हमदर्दी दिखाने का ढोंग किया, पर अपने कमरे में जाकर आराम से लेट गईं। वे अनघा से बोलीं, “अनघा, नलिनी के पास जाने की ज़रूरत नहीं है, कहीं तुझे भी इन्फ़ेक्शन न लग जाए। नौकर उसका ध्यान रख लेंगे।”
लेकिन अनघा का दिल नहीं माना। जब रात के बारह बजे सन्नाटा छा गया और मनोरमा देवी गहरी नींद में सो गईं, तो अनघा दबे पाँव नलिनी के कमरे में पहुँची। नलिनी तेज़ बुखार में तप रही थी और उसके होंठ प्यास से सूख चुके थे। अनघा ने तुरंत ठंडे पानी की पट्टियाँ भिगोकर उसके माथे पर रखना शुरू किया। उसने गर्म काढ़ा बनाया और नलिनी को अपने हाथों से पिलाया। नलिनी ने जब अधखुली आँखों से अपनी बड़ी जेठानी को अपनी तीमारदारी करते देखा, तो उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े।
“दीदी… आप यहाँ? माँ जी ने तो कहा था कि आप मुझसे नफ़रत करती हैं…” नलिनी ने काँपती आवाज़ में कहा।
अनघा की आँखों में भी नमी उतर आई। उसने नलिनी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “नलिनी, मैंने तुझसे कभी नफ़रत नहीं की। मुझे तो माँ जी ने हमेशा यही बताया कि तू मुझे देखना भी पसंद नहीं करती और मेरे ख़िलाफ़ बातें बनाती है।”
उस रात, बीमारी के उस सन्नाटे में, दोनों ने अपने-अपने दिलों के सारे दरवाज़े खोल दिए। जब एक-एक बात का मिलान हुआ, तो दोनों के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। जो बातें मनोरमा देवी ने नलिनी से अनघा के बारे में कही थीं, और जो बातें अनघा से नलिनी के बारे में कही थीं—वे सब एक सोची-समझी साज़िश का हिस्सा थीं। दोनों बहुएँ अवाक रह गईं। जिसे वे ममता की मूरत समझती थीं, वही औरत अपने स्वार्थ और वर्चस्व के लिए उनके बीच नफ़रत की दीवारें खड़ी कर रही थी। उस रात नलिनी के आँसू अनघा की साड़ी के पल्लू में सूखे और दोनों के बीच का वर्षों पुराना मनमुटाव एक ही पल में धुल गया।
अगले दो दिनों तक अनघा और नलिनी ने मिलकर घर का काम संभाला। अब उनकी आँखों में एक-दूसरे के लिए खिंचाव नहीं, बल्कि समझ और अपनापन था। वे जब भी रसोई में होतीं, दबी आवाज़ में बात करतीं और मुस्कुरा देतीं।
यह बदलाव वाणी की नज़रों से छुप न सका। वाणी कमरे के बाहर खड़ी होकर दोनों को बातें करते देखती, तो उसके मन में अजीब सी तड़प उठती। वह इस अजनबीपन से तंग आ चुकी थी। तीसरे दिन जब मनोरमा देवी दोपहर की नींद ले रही थीं, अनघा और नलिनी रसोई में शाम की चाय की तैयारी कर रही थीं।
तभी वाणी धीरे से रसोई के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गई। उसकी आँखें डबडबा रही थीं। उसने कातर आवाज़ में कहा, “दीदी… क्या आप दोनों आपस में ही प्यार बाँटती रहेंगी या इस छोटी देवरानी को भी अपनी ज़िंदगी में थोड़ी सी जगह देंगी? मैं बहुत अकेली पड़ गई हूँ इस घर में।”
अनघा और नलिनी ने एक-दूसरे को देखा और तुरंत आगे बढ़कर वाणी को गले से लगा लिया। तीनों बहुओं के आँसू उस दिन एक साथ बहे। वाणी को भी जब सच्चाई का पता चला, तो वह हक्का-बक्का रह गई।
वाणी ने भारी मन से कहा, “माँ जी ने तो मुझे आप दोनों के ख़िलाफ़ इतना भड़काया था कि मैं आप लोगों के कमरे की तरफ़ जाने से भी डरती थी। हमारे देश से भले ही अंग्रेज़ चले गए, पर फूट डालो और राज करो की यह नीति हमारी सासू माँ ने पूरी तरह अपना रखी थी!”
अब तीनों को समझ आ चुका था कि समस्या उनमें नहीं थी, बल्कि उस सोच में थी जो उन्हें बाँटकर रखना चाहती थी।
पर अब सवाल यह था कि आगे क्या किया जाए? क्या वे घर में महाभारत छेड़ दें? क्या अपने पतियों के कान भरकर घर के टुकड़े कर दें?
अनघा ने दोनों छोटी बहुओं का हाथ थामते हुए कहा, “नहीं, हम वही गलती नहीं करेंगे जो माँ जी ने की। नफ़रत का जवाब नफ़रत से नहीं, बल्कि प्यार और एकता से दिया जाता है। हम अपने पतियों से कोई शिकायत नहीं करेंगे और न ही माँ जी का अपमान करेंगे। हम बस एक हो जाएँगे। जब हमारी डोर एक हो जाएगी, तो कोई भी हमें अलग नहीं कर पाएगा।”
तीनों बहुओं ने एक गुप्त समझौता किया। अब से घर का कोई भी काम अकेले नहीं होगा। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक, तीनों हर फ़ैसले में एक-दूसरे के साथ खड़ी रहेंगी। अगर मनोरमा देवी किसी एक को बुलाकर दूसरी की चुगली करतीं, तो वह चुपचाप सुन लेती, लेकिन कमरे से बाहर आकर तुरंत दूसरी बहनों को बता देती कि आज क्या कहा गया है।
अगले ही दिन से हवेली का नज़ारा बदलने लगा। सुबह जब मनोरमा देवी उठीं, तो उन्होंने देखा कि तीनों बहुएँ रसोई में एक साथ हँस-हँसकर नाश्ता बना रही थीं। अनघा पराठे सेंक रही थी, नलिनी चाय छान रही थी और वाणी प्लेटें सजा रही थी। मनोरमा देवी के माथे पर बल पड़ गए। उन्होंने नलिनी को पास बुलाकर कहा, “नलिनी, तू क्यों इतना काम कर रही है? अनघा पर छोड़ दे सब।”
नलिनी ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “माँ जी, दीदी अकेले थक जाती हैं। हम सब मिलकर करेंगे तो काम जल्दी हो जाएगा और हमें साथ वक्त बिताने का मौका भी मिलेगा।”
मनोरमा देवी अवाक रह गईं। दोपहर को उन्होंने वाणी को अपने कमरे में बुलाया और बोलीं, “वाणी, देख रही है, वे दोनों मिलकर अब तुझे नज़रअंदाज़ कर रही हैं।”
वाणी ने बड़ी मासूमियत से कहा, “अरे नहीं माँ जी! बड़ी दीदी ने तो आज मेरे सिर में तेल लगाया और मँझली दीदी ने मेरे लिए मेरी पसंद की खीर बनाई है। वे दोनों मुझे अपनी छोटी बहन जैसा प्यार देती हैं।”
मनोरमा देवी के पाँवों तले की ज़मीन खिसकने लगी। उनका बरसों पुराना हथियार अब कुंद हो चुका था। वे जिस किसी के कान भरने की कोशिश करतीं, सामने से उन्हें प्यार और एकता का जवाब मिलता। जब पुरुष घर लौटे, तो उन्होंने भी घर के माहौल में एक अद्भुत शांति और खुशी महसूस की। अब घर में कोई तनाव नहीं था। तीनों बेटे अपनी पत्नियों के इस तालमेल को देखकर बेहद प्रसन्न थे और अपने पिता के साथ सुकून से बैठ पा रहे थे।
मनोरमा देवी भीतर ही भीतर छटपटाने लगीं। उनका बनाया तिलिस्म टूट चुका था। उन्हें लगने लगा कि अब इस घर में उनकी कोई अहमियत नहीं रही। इसी तनाव और खीझ में एक दिन उनका रक्तचाप अचानक बहुत बढ़ गया और वे चक्कर खाकर आँगन में गिर पड़ीं।
उस वक़्त घर पर कोई पुरुष नहीं था। अगर यह पहले का समय होता, तो शायद तीनों बहुएँ एक-दूसरे के मुँह देखतीं या डर के मारे अपने कमरों में दुबक जातीं। लेकिन उस दिन तीनों ने एक टीम की तरह काम किया। अनघा ने तुरंत अपनी सास का सिर अपनी गोद में रखा, नलिनी ने डॉक्टर को फ़ोन लगाया और वाणी दौड़कर गाड़ी निकालने और प्राथमिक उपचार की व्यवस्था करने में जुट गई। तीनों बहुओं ने मिलकर अपनी सास को संभाला, अस्पताल ले गईं और जब तक उनकी तबीयत स्थिर नहीं हो गई, तीनों ने एक पल के लिए भी अस्पताल का कमरा नहीं छोड़ा।
रात को जब मनोरमा देवी को होश आया, तो उन्होंने देखा कि उनके तीनों बेटे बाहर खड़े थे, और कमरे के भीतर तीनों बहुएँ उनके पैर दबा रही थीं। अनघा उनके माथे पर हाथ फेर रही थी, नलिनी दवाइयों की पर्ची देख रही थी और वाणी उनके लिए गर्म सूप तैयार कर रही थी। तीनों के चेहरों पर सास के लिए वही सच्ची चिंता थी जो अपनी सगी माँ के लिए होती है।
मनोरमा देवी की आँखों से पश्चाताप की धार बह निकली। उनके अंदर का कठोर, अहंकारी और असुरक्षित इंसान उस दिन हमेशा के लिए हार गया।
उन्होंने काँपते हाथों से तीनों बहुओं के सिर पर हाथ रखा और रुँधे गले से बोलीं, “मुझे माफ़ कर दो बहुओं… मैंने बरसों तक तुम तीनों को एक-दूसरे का दुश्मन बनाए रखा ताकि मेरा दबदबा बना रहे। मैंने इस घर को नर्क बना दिया था। पर आज जब मैं मौत के मुँह में थी, तो मेरे उसी पाप के बदले तुमने मुझे अपनी ममता और सेवा से बचा लिया। आज मुझे समझ आया कि परिवार डर और फूट से नहीं, बल्कि प्यार और विश्वास से चलता है।”
अनघा ने आगे बढ़कर अपनी सास के आँसू पोंछे और कहा, “माँ जी, पुरानी बातें भूल जाइए। आप हमारे घर की नींव हैं। जब तक आपकी छत्रछाया हमारे सिर पर है, यह घर हमेशा खुशहाल रहेगा। हम आपकी बहुएँ नहीं, आपकी बेटियाँ हैं।”
उस दिन के बाद से ‘आनंद कुंज’ वास्तव में आनंद का धाम बन गया। मनोरमा देवी का ‘हिटलर’ वाला रूप हमेशा के लिए विदा हो चुका था और उसकी जगह एक स्नेही, दयालु माँ ने ले ली थी। तीनों बहुओं की एकता ने न केवल उस परिवार को टूटने से बचा लिया, बल्कि पूरे समाज के लिए यह मिसाल कायम कर दी कि यदि देवरानी-जेठानी आपस में बहनें बन जाएँ, तो कोई भी साज़िश उस घर के सुख-चैन को छीन नहीं सकती।
यह कहानी हर उस परिवार के लिए एक गहरा सबक है जहाँ सास या कोई तीसरा व्यक्ति अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए रिश्तों में ज़हर घोलने की कोशिश करता है। क्या आपको लगता है कि अगर घर की बहुएँ आपस में सूझबूझ और प्यार से एक हो जाएँ, तो किसी भी परिवार को टूटने से बचाया जा सकता है? अपनी अनमोल राय कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद .