रात के करीब दो बजे अनिकेत की नींद खुली। प्यास लगने पर वह पानी पीने के लिए उठा। जब वह पल्लवी के कमरे के पास से गुज़रा, तो उसे अंदर से धीमी कराहने की आवाज़ आई। अनिकेत के कदम ठिठक गए। उसने धीरे से दरवाज़ा खोला। नाइट लैंप की हल्की रोशनी में उसने देखा कि पल्लवी पसीने से तर-बतर थी और ठंड से काँप रही थी। उसका चेहरा बिल्कुल बेजान लग रहा था।
रसोई से बर्तनों के खड़कने की हल्की आवाज़ें आ रही थीं, लेकिन उन आवाज़ों में रोज़ जैसी फुर्ती नहीं थी। पल्लवी रसोई के स्लैब को दोनों हाथों से थामे खड़ी थी। उसका पूरा शरीर तप रहा था, कनपटी की नसें फटने को हो रही थीं और पैरों में इतनी जान भी नहीं बची थी कि वह सीधे खड़ी रह सके। रात से ही बदन में कपकपी छूट रही थी, लेकिन सुबह के पाँच बजते ही उसकी आँखें खुद-ब-खुद खुल गई थीं। एक औरत, जो पिछले अठारह सालों से उस घर की धुरी बनी हुई थी, चाहकर भी अपने दर्द को सुबह की जिम्मेदारियों से बड़ा नहीं मान सकती थी।
पल्लवी ने किसी तरह गैस पर चाय की केतली चढ़ाई और हाथ में रखे थर्मामीटर को जीभ के नीचे दबा लिया। दो मिनट बाद जब उसने देखा तो पारा एक सौ दो डिग्री पार कर चुका था। उसकी आँखों से बेबसी का एक कतरा फिसलकर गाल पर आ गिरा। उसने थर्मामीटर को झाड़कर साइड में रखा ही था कि पीछे से उसके पति अनिकेत की भारी और तल्ख आवाज़ गूँजी।
“क्या तमाशा है ये पल्लवी? सुबह-सुबह फिर वही बीमारी का ढोंग शुरू हो गया? परसों ही तो मैं रोहन को लेकर क्लिनिक गया था, दो घंटे लाइन में खड़ा रहा, और आज तुम ये बुखार का बहाना लेकर खड़ी हो गई हो? अगर तुम ऐसे ही हाथ पर हाथ धरकर खड़ी रहोगी तो नाश्ता कब बनेगा? मुझे आठ बजे मीटिंग के लिए निकलना है, कपड़े प्रेस कौन करेगा?” अनिकेत का चेहरा गुस्से से लाल था। उसने एक बार भी पल्लवी के पीले पड़े चेहरे और लाल आँखों को देखने की ज़हमत नहीं उठाई।
पल्लवी के सब्र का बाँध टूट गया। वह रुंधे हुए गले से बोली, “अनिकेत, बुखार क्या मैं अपनी मर्जी से बुलाती हूँ? इंसान हूँ, कोई लोहे की मशीन नहीं कि चौबीसों घंटे बिना थके चलती रहूँ। बस थर्मामीटर से देख रही थी कि दवा कौन सी लूँ। आपको क्या लगता है, मुझे शौक है बीमार पड़ने का? मैंने तो चाय चढ़ा दी है, आपका नाश्ता भी बना ही रही हूँ। कभी पूछा है कि तबीयत कैसी है? परसों आप रोहन की एलर्जी की वजह से डॉक्टर के पास गए थे, मेरे लिए नहीं। मुझे तो याद भी नहीं कि आखिरी बार आप मुझे डॉक्टर के पास कब ले गए थे। आपको तो बस टेबल पर गरम खाना और हाथ में पानी का गिलास चाहिए। अपनी तो उम्मीद ही छोड़ दी है मैंने। आप ऑफिस जाइए, मैं गोली खाकर सब संभाल लूँगी।”
“हाँ-हाँ, तुम्हारे पास तो हर बात का जवाब तैयार रहता है! सुबह-सुबह कलेश करवा लो बस। इस घर में शांति नाम की चीज़ ही नहीं बची। नाश्ता भी जहर लगता है अब। बीमार चेहरे देखने से अच्छा है इंसान भूखा ही ऑफिस चला जाए।” अनिकेत ने पैर पटकते हुए दरवाज़ा ज़ोर से बंद किया और बाहर निकल गया।
दरवाज़ा बंद होने की तेज़ आवाज़ पल्लवी के सीने में किसी खंजर की तरह चुभी। वह वहीं रसोई के फर्श पर बैठ गई और फफक-फफक कर रो पड़ी। अठारह साल पहले जब वह दुल्हन बनकर इस घर में आई थी, तो उसने सोचा था कि जीवनसाथी का मतलब सुख-दुख में बराबर का भागीदार होता है। लेकिन समय के साथ उसने पाया कि एक बहू या पत्नी जब तक सबकी सेवा करती रहे, सबकी जी-हज़ूरी करती रहे, तब तक वह संस्कारी और आदर्श होती है। जैसे ही उसका शरीर थककर जवाब देने लगे, वह पूरे घर की नज़रों में बोझ और कामचोर बन जाती है। पहले सास और ननद के तानों का सिलसिला चलता था, अब जब वे इस दुनिया में नहीं रहीं, तो अनिकेत ने वह कमान संभाल ली थी। पल्लवी का पूरा अस्तित्व केवल रसोई और झाड़ू-पोंछे तक सिमट कर रह गया था।
तभी बाहर की डोरबेल बजी। पल्लवी ने जल्दी से अपनी साड़ी के पल्लू से आँसू पोंछे और लड़खड़ाते कदमों से दरवाज़ा खोला। सामने उसकी बीस साल की बेटी तन्वी खड़ी थी, जो कॉलेज से लौटी थी। तन्वी ने जैसे ही माँ का उतरा हुआ, पीला चेहरा और सूजी हुई आँखें देखीं, उसका माथा ठनका।
“मम्मा! क्या हुआ? आपकी तबीयत ठीक नहीं है ना? और आप रो रही थीं?” तन्वी ने माँ के माथे पर हाथ रखा और चौंक गई, “अरे, आपको तो बहुत तेज़ बुखार है! आप यहाँ दरवाज़े पर क्यों खड़ी हैं? चलिए अंदर।”
पल्लवी ने अपने दर्द को छुपाने की कोशिश करते हुए कहा, “कुछ नहीं बेटा, बस थोड़ा सा सिर भारी था। तू बैठ, मैं तेरे लिए शिकंजी बना लाती हूँ।”
तन्वी ने तुरंत पल्लवी का हाथ पकड़कर सोफे पर बिठाया और सख्त लहजे में बोली, “मम्मा, चुपचाप बैठिए! मैं कोई छोटी बच्ची नहीं हूँ जो अपने लिए पानी भी न ले सकूँ। मुझे सब समझ आ रहा है। ज़रूर पापा ने सुबह फिर से आप पर अपनी खीझ निकाली है ना? आपकी बीमारी को ढोंग कहा होगा? मम्मा, आप कब तक ऐसे घुट-घुट कर जीती रहेंगी? कब तक पुरानी फिल्मों की लाचार हीरोइन की तरह आँसू बहाती रहेंगी? जब पापा को ज़रा सा सिरदर्द होता है तो पूरा घर सिर पर उठा लेते हैं, आप रात-रात भर उनके सिर पर तेल लगाती हैं, और जब आपको इतना तेज़ बुखार है तो वे आपको सुनाकर ऑफिस चले गए? आप अपने लिए कभी आवाज़ क्यों नहीं उठातीं? जब तक आप खुद अपनी कद्र नहीं करेंगी, इस घर में कोई आपकी कद्र नहीं करेगा। आज आप एक भी काम नहीं करेंगी, कोई खाना नहीं बनेगा।”
तन्वी ने अपनी माँ को सहारा देकर बेडरूम में लिटाया, पंखा धीमा किया, और खुद रसोई में जाकर ठंडे पानी की पट्टियाँ भिगोकर लाई। वह पल्लवी के माथे पर पट्टियाँ रखने लगी। पल्लवी की आँखों से फिर आँसू बह निकले, पर इस बार उन आँसुओं में ममता और राहत का अहसास था। तन्वी ने डॉक्टर को फोन करके घर पर बुलाया। डॉक्टर ने जाँच के बाद बताया कि वायरल संक्रमण के साथ-साथ अत्यधिक थकान और तनाव की वजह से पल्लवी का ब्लड प्रेशर बहुत गिर गया था। डॉक्टर ने सख्त हिदायत दी कि कम से कम तीन दिन का संपूर्ण आराम अनिवार्य है, वरना स्थिति बिगड़ सकती है।
तन्वी ने दवाइयाँ मँगवाईं, माँ को हल्का दलिया बनाकर खिलाया और दवा देकर सुला दिया। इसके बाद तन्वी ने एक बड़ा फैसला लिया। उसने अपने छोटे भाई रोहन को समझाया कि आज के बाद घर का कोई भी काम माँ के बिना नहीं रुकेगा, बल्कि वे दोनों मिलकर सब संभालेंगे ताकि पापा को अहसास हो कि घर चलाने में एक माँ की क्या भूमिका होती है।
शाम के करीब सात बजे अनिकेत घर लौटा। हमेशा की तरह उसने दरवाज़े से ही आवाज़ लगाई, “पल्लवी! ज़रा एक कप कड़क चाय बना दो, आज सिर फटा जा रहा है।”
लेकिन बैठक में सन्नाटा था। न तो पल्लवी दौड़कर पानी का गिलास लेकर आई, और न ही रसोई से चाय की खुशबू आई। अनिकेत ने झल्लाते हुए जूते उतारे और बैठक में आया। सामने सोफे पर तन्वी और रोहन शांत बैठे थे।
“तुम्हारी माँ कहाँ है? मेरी आवाज़ नहीं सुनाई दे रही किसी को?” अनिकेत ने त्योरियाँ चढ़ाते हुए पूछा।
तन्वी शांति से उठी और बोली, “पापा, मम्मा अंदर सो रही हैं। उन्हें एक सौ तीन डिग्री बुखार है। डॉक्टर आए थे, उन्होंने कहा है कि मम्मा को बहुत गहरा तनाव और कमजोरी है। वे अगले तीन दिन तक बिस्तर से नहीं उठेंगी। और चाय की बात है, तो रसोई में सब सामान रखा है, आप खुद बना लीजिए या मैं बना देती हूँ।”
अनिकेत को बेटी का यह रूखा और बेबाक जवाब बिल्कुल रास नहीं आया। उसका पुरुषवादी अहंकार आहत हो गया। वह तैश में आकर बोला, “अच्छा! तो अब बेटी बाप को सिखाएगी कि क्या करना है? मुझे पता है, तुम्हारी माँ ने ही तुम्हें मेरे खिलाफ भड़काया है। दिन भर घर में आराम करती हैं, फिर भी बीमार पड़ जाती हैं। ऑफिस में हम जो बारह घंटे खटते हैं, उसका कोई मोल नहीं है?”
तन्वी ने इस बार अपनी आवाज़ को धीमा मगर बेहद कड़ा रखा, “पापा, प्लीज़ धीरे बोलिए, मम्मा की नींद खराब होगी। और रही बात आराम की, तो मम्मा सुबह पाँच बजे उठती हैं और रात के ग्यारह बजे तक एक पल के लिए भी नहीं बैठतीं। उनका कोई संडे नहीं होता, कोई सिक लीव नहीं होती, कोई सैलरी नहीं मिलती। फिर भी उन्होंने कभी शिकायत नहीं की। आज जब उनका शरीर जवाब दे गया, तो आपको उनका दर्द नहीं, अपनी चाय और नाश्ते की चिंता सता रही है? पापा, प्यार और सम्मान सिर्फ शब्दों में नहीं, मुश्किल वक्त में साथ खड़े होने में दिखता है। अगर आप एक पति होकर उनके दर्द को नहीं समझ सकते, तो कम से कम एक इंसान बनकर तो सोचिए!”
रोहन भी आगे आया और उसने कहा, “हाँ पापा, दीदी सही कह रही हैं। जब मैं बीमार पड़ता हूँ तो माँ रात भर जागकर मेरे सिरहाने बैठी रहती हैं। आज माँ को हमारी ज़रूरत है, और आप उन पर चिल्ला रहे हैं?”
बच्चों की ये बातें अनिकेत के सीने में तीर की तरह चुभीं। पहली बार उसके अपने ही बच्चों ने उसे आईना दिखाया था। अनिकेत गुस्से में बिना कुछ कहे अपने कमरे में चला गया, लेकिन उसके भीतर एक अजीब सी खलबली मच गई थी। रात को जब तन्वी ने सादा खिचड़ी बनाई और मेज़ पर रखी, तो अनिकेत ने बिना कोई नखरा दिखाए चुपचाप खाना खाया। घर में पसरा वह सन्नाटा उसे काट खाने को दौड़ रहा था।
रात के करीब दो बजे अनिकेत की नींद खुली। प्यास लगने पर वह पानी पीने के लिए उठा। जब वह पल्लवी के कमरे के पास से गुज़रा, तो उसे अंदर से धीमी कराहने की आवाज़ आई। अनिकेत के कदम ठिठक गए। उसने धीरे से दरवाज़ा खोला। नाइट लैंप की हल्की रोशनी में उसने देखा कि पल्लवी पसीने से तर-बतर थी और ठंड से काँप रही थी। उसका चेहरा बिल्कुल बेजान लग रहा था।
अनिकेत चुपचाप अंदर गया और उसने पल्लवी के माथे को छुआ। उसका माथा अंगारे की तरह तप रहा था। अनिकेत का दिल एक पल के लिए दहल गया। यह वही स्त्री थी जिसने अठारह साल तक उसकी हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का ख्याल रखा था। जब भी अनिकेत को ज़रा सा जुकाम भी होता था, पल्लवी काढ़ा बनाकर उसके सिरहाने बैठ जाती थी, उसकी थकावट दूर करने के लिए पाँव दबाती थी। और आज, जब वह खुद मौत जैसी पीड़ा में थी, अनिकेत ने उसे क्या दिया? सिर्फ कड़वे बोल, ताने और बेरुखी!
अनिकेत के भीतर का सारा अहंकार, सारा घमंड उस तपते हुए माथे की गर्मी में पिघलकर बह गया। उसकी आँखों से पश्चाताप के आँसू छलक पड़े। वह चुपचाप बाथरूम गया, एक कटोरे में ठंडा पानी और तौलिया लेकर आया। वह पल्लवी के सिरहाने बैठ गया और आहिस्ते-आहिस्ते उसके माथे पर ठंडी पट्टियाँ रखने लगा।
आधी रात के उस सन्नाटे में, जब पूरा शहर सो रहा था, एक पति अपनी पत्नी के दर्द को पहली बार महसूस कर रहा था। पल्लवी ने जब अपनी भारी पलकें खोलीं, तो उसने देखा कि अनिकेत की आँखें भीगी हुई थीं और उसके हाथ काँप रहे थे।
“अनिकेत… आप?” पल्लवी ने कमजोर आवाज़ में कहा और उठने की कोशिश की।
अनिकेत ने तुरंत उसके कंधे पर हाथ रखकर उसे सहारा दिया और भर्राए हुए गले से बोला, “उठो मत पल्लवी, लेटी रहो। मुझे माफ कर दो। मैं इतना अंधा और खुदगर्ज हो गया था कि तुम्हारी सेवा को तुम्हारा फर्ज और तुम्हारी बीमारी को तुम्हारा नाटक समझ बैठा। मैंने कभी यह सोचा ही नहीं कि तुम भी एक हाड़-मांस की इंसान हो, तुम्हें भी प्यार, आराम और देखभाल की उतनी ही ज़रूरत है जितनी मुझे। तन्वी ने आज मेरी आँखें खोल दीं। मुझे शर्म आ रही है अपने व्यवहार पर।”
पल्लवी ने अपने पति के चेहरे पर बरसों बाद वह पुराना अपनापन और सच्चा पछतावा देखा। उसके होठों पर एक हल्की सी सुकून भरी मुस्कान तैर गई। उसने धीरे से अनिकेत के हाथ पर अपना हाथ रख दिया।
अगली सुबह जब घर में उजाला हुआ, तो दृश्य पूरी तरह बदला हुआ था। पल्लवी आराम से बिस्तर पर थी। रसोई में अनिकेत और तन्वी मिलकर नाश्ता तैयार कर रहे थे। अनिकेत ने अपने हाथों से चाय बनाई, टोस्ट सेके और ट्रे सजाकर पल्लवी के कमरे में ले गया।
“लीजिए महारानी जी, आज का नाश्ता आपके इस सेवक के हाथों से तैयार हुआ है,” अनिकेत ने मुस्कुराते हुए कहा, हालांकि उसकी आवाज़ में एक गहरा संकोच और आदर था।
तन्वी और रोहन दरवाज़े पर खड़े यह देख रहे थे। उनके चेहरों पर एक निश्चिंत और सुखद मुस्कान थी। पल्लवी ने चाय का कप थामा, तो उसे लगा कि सिर्फ चाय नहीं, बल्कि उसके जीवन में रिश्तों की गर्माहट और मिठास वापस लौट आई थी।
अनिकेत ने उस दिन ऑफिस से छुट्टी ले ली और पूरा दिन पल्लवी की देखभाल में बिताया। उसने यह समझ लिया था कि परिवार केवल एक इंसान के त्याग से नहीं चलता, बल्कि जब हर कोई एक-दूसरे के सुख-दुख का साझीदार बनता है, तभी कोई मकान सचमुच ‘घर’ बनता है। पल्लवी की बीमारी ने उस घर को तोड़ा नहीं, बल्कि उसमें वर्षों से जमी बेरुखी की धूल को साफ करके रिश्तों को एक नई, खूबसूरत और सम्मानजनक दिशा दे दी थी।
एक औरत जो बिना किसी वेतन और छुट्टी के पूरे परिवार की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर देती है, क्या बीमारी के वक्त थोड़ा सा प्यार, सहानुभूति और आराम पाना उसका हक़ नहीं है? क्या हमारे समाज के पुरुषों को यह समझने के लिए किसी बड़े झटके की ज़रूरत होती है कि पत्नी कोई मशीन नहीं, बल्कि सम्मान और स्नेह की हकदार इंसान है? इस विषय पर अपनी राय और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर साझा करें।
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