“हमारी भलाई सोचने के लिए हम खुद सक्षम हैं दीदी,” कौशल्या जी ने दो टूक कहा और मुख्य दरवाज़े की ओर इशारा करते हुए हाथ जोड़ लिए, “हमें अपना घर, अपनी बहू और अपने बच्चे संभालने आते हैं। हमारे घर में प्यार है, सम्मान है और एक-दूसरे पर अटूट विश्वास है। यहाँ किसी की गंदी नज़र और ज़हरीली बातों के लिए कोई जगह नहीं है। इसलिए बेहतर यही होगा कि आप अपने घर का ख्याल रखें और दोबारा मेरी चौखट पर किसी के बारे में ज़हर उगलने न आएँ।”
मई की उस तपती दोपहर में पटना की सड़कें अंगारों जैसी दहक रही थीं। बाहर लू के थपेड़े चल रहे थे और घर के अंदर भी उमस अपने चरम पर थी। विवाह के उत्सव की हलचल अभी पूरी तरह थमी नहीं थी। रिश्तेदार अपने-अपने कमरों में आराम कर रहे थे। उसी बीच कौशल्या जी की बड़ी जेठानी विमला जी हाथ का पंखा झलती हुई मुख्य बैठक में दाखिल हुईं। उनके चेहरे पर हमेशा की तरह एक तीखा, खोजी भाव था—जैसे कोई कमज़ोरी ढूँढने की फ़िराक में हों।
सामने रसोई के पास नई नवेली बहू अनघा नज़र आ रही थी। विवाह को अभी सिर्फ़ दो ही दिन हुए थे। भारी ज़रीदार बनारसी साड़ी, भारी आभूषण और घूँघट की जगह अनघा ने एक साधारण, हल्का सूती कुर्ता और पायजामा पहन रखा था। वह सिर पर दुपट्टा सलीके से ओढ़े पानी का जग भर रही थी।
विमला जी की आँखें फैल गईं। उनकी त्योरियाँ चढ़ गईं और आवाज़ में बनावटी तल्खी भरकर बोलीं, “अरे कौशल्या! ज़रा बाहर तो आ… यह क्या अंधेर मचा रखा है? ज़रा देख तो अपनी बहू को! अभी मेंहदी का रंग भी नहीं छूटा, कलाई की चूड़ियों की खनक भी ताज़ा है, और यह लड़की सलवार-सूट पहनकर घूम रही है! अरे, बहू पर शुरू से नकेल कसकर रखनी चाहिए, नहीं तो सिर चढ़कर नाचेगी। हमारे ज़माने में छह महीने तक घूँघट नहीं उठता था, और यहाँ तो शादी के दूसरे दिन ही पर निकल आए!”
कौशल्या जी जो उस वक़्त रसोई से निकल रही थीं, उन्होंने जेठानी की बात सुनी। उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं आई। उन्होंने मुस्कुराते हुए अनघा के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और फिर विमला जी की तरफ़ मुड़कर बेहद शांत लहज़े में कहा, “दीदी, नकेल तो जानवरों पर कसी जाती है, इंसानों पर नहीं। और अनघा तो हमारी बहू होने से पहले किसी की नाज़ों से पली बेटी है। इस भीषण गर्मी में जब हम सब सूती और ढीले कपड़ों में भी पसीने से तर-बतर हो रहे हैं, तो यह भारी साड़ी में क्यों तपे? कपड़े बदन ढकने और सहूलियत के लिए होते हैं, किसी को सज़ा देने के लिए नहीं। मैंने ही उससे कहा था कि कपड़े बदलकर सहज हो जाए। घर की शांति कपड़ों से नहीं, दिल के जुड़ाव से आती है।”
विमला जी का चेहरा फक पड़ गया। वे कुछ बुदबुदाती हुई अपने कमरे की तरफ़ बढ़ गईं।
विमला जी का यह स्वभाव कोई आज का नहीं था। तीस साल पहले जब वे इस परिवार में ब्याह कर आई थीं, तब से लेकर आज तक उन्होंने कभी किसी को सुकून से जीने नहीं दिया था। अपनी सास के साथ उनका कभी मेल नहीं बैठा। सास की हर बात में खोट निकालना, ससुर के आगे रोना-धोना और शादी के मात्र छह महीने बाद ही अपने पति को सास-ससुर से अलग करवा लेना—यह उनका इतिहास रहा था। जब कौशल्या जी ब्याह कर इस घर में आईं, तो विमला जी का एक नया खेल शुरू हो गया था। वे कभी सास के पास जाकर कौशल्या की चुगली करतीं कि ‘छोटी बहू बहुत आज़ाद खयालों की है’, तो कभी कौशल्या के कमरे में आकर सास के ख़िलाफ़ ज़हर उगलतीं कि ‘अम्मा जी तुम्हें कभी अपना नहीं समझेंगी।’
पर कौशल्या जी अपनी मर्यादा और विवेक से सब संभालती रहीं। उन्होंने सास की सेवा पूरे मन से की, यहाँ तक कि सास ने अपने अंतिम पलों में कौशल्या के सिर पर हाथ रखकर कहा था, “तूने इस घर को मंदिर बना दिया बहू।” सास के गुज़र जाने के बाद विमला जी को नया बहाना चाहिए था। वे कौशल्या के बच्चों में नुक्स निकालने लगीं। कौशल्या की बेटी तान्या जब कॉलेज जाने लगी, तो विमला जी कान भरने पहुँच जातीं, “कौशल्या, तान्या पर ज़रा नज़र रखा कर, आजकल की लड़कियों की हवा खराब है, कहीं खानदान की नाक न कट जाए।” जब तान्या का एक अच्छे परिवार में ब्याह हो गया, तो वे समधियों के घर की छोटी-छोटी बातों पर कटाक्ष करतीं कि ‘लड़की वालों को इतना झुकना नहीं चाहिए।’
कौशल्या जी ने हमेशा अपने संस्कारों का लिहाज़ किया। उन्होंने कभी जेठानी को पलटकर कड़ा जवाब नहीं दिया, यह सोचकर कि वे उम्र में बड़ी हैं और परिवार की मर्यादा टूटेगी। पर विमला जी ने इस शराफ़त को हमेशा कौशल्या की कमज़ोरी समझा।
दिन बीतते गए और समय के साथ-साथ अनघा उस घर में पूरी तरह रच-बस गई। कौशल्या जी ने कभी सास बनकर हुक़ूमत नहीं चलाई, बल्कि एक माँ बनकर अनघा की हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का ख्याल रखा। अनघा भी समझदार थी। उसने देखा कि उसकी सास हर कदम पर उसका हौसला बढ़ाती हैं। जब अनघा ने अपनी आगे की पढ़ाई जारी रखने की इच्छा जताई, तो कौशल्या जी और उनके बेटे अर्णव ने पूरा समर्थन दिया। अनघा सुबह कॉलेज जाती और शाम को घर के कामों में हाथ बँटाती। घर में एक अजीब सा ठहराव और प्रेम का वातावरण था।
शादी को पूरा एक साल बीत गया। एक दिन दोपहर के समय घर की घंटी बजी। कौशल्या जी ने दरवाज़ा खोला तो सामने विमला जी खड़ी थीं। हाथ में एक थैला था और चेहरे पर वही पुरानी, चुभती हुई मुस्कान।
कौशल्या जी ने शिष्टाचार निभाते हुए कहा, “आइए दीदी, बैठिए। आज अचानक कैसे आना हुआ? सब कुशल-मंगल?”
विमला जी सोफ़े पर जम गईं और चारों तरफ़ नज़रें घुमाते हुए बोलीं, “हाँ-हाँ, सब ठीक ही है। मैं तो बस यूँ ही चली आई। सोचा देखूँ, तेरी बहू का क्या हाल-चाल है। पर कौशल्या… एक बात मैं कई दिनों से सोच रही थी। तेरी बहू की शादी को पूरा एक साल हो गया है। पर अभी तक कोई खुशखबरी नहीं सुनाई दी? घर में बच्चे की किलकारी नहीं गूँजी! आजकल की ये पढ़ी-लिखी बहुएँ न… करियर के चक्कर में परिवार का वंश आगे बढ़ाना ही भूल जाती हैं।”
कौशल्या जी ने पानी का गिलास मेज़ पर रखते हुए सहज भाव से कहा, “दीदी, इतनी जल्दी भी क्या है? अनघा अभी अपनी मास्टर डिग्री पूरी कर रही है और अर्णव भी अपने काम को जमाने में लगा है। दोनों समझदार हैं, जब सही समय आएगा, वे अपना परिवार बढ़ा लेंगे। और फिर आप तो जानती ही हैं, मेरी तान्या के यहाँ भी तो शादी के तीन साल बाद बेटा हुआ था। बच्चे भगवान की देन होते हैं, कोई जल्दबाज़ी की चीज़ थोड़े ही हैं।”
विमला जी को यह जवाब हज़म नहीं हुआ। उनके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान उभरी। वे आगे झुककर फुसफुसाते हुए बोलीं, “अरे कौशल्या! तू हमेशा इतनी भोली क्यों बन जाती है? ज़माना बहुत चालाक है। कहीं तेरी बहू में ही कोई कमी तो नहीं? आजकल की लड़कियों का खान-पान और रहन-सहन ऐसा हो गया है कि अंदर ही अंदर कमियाँ हो जाती हैं। तू एक काम कर, उसे किसी बड़े डॉक्टर को दिखा। कहीं ऐसा न हो कि देर हो जाए और तेरे बेटे की ज़िंदगी बर्बाद हो जाए। मैं तो तेरे भले के लिए कह रही हूँ, वरना मुझे क्या पड़ी है।”
उस कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा खिंच गया।
कौशल्या जी के भीतर बरसों से दबा हुआ सब्र का बाँध उस एक पल में टूट गया। उन्होंने देखा कि उनकी इस चुप्पी ने इस औरत के हौसले इतने बढ़ा दिए हैं कि आज वह उनके घर की नई पीढ़ी की इज़्ज़त और गरिमा पर कीचड़ उछालने लगी है।
कौशल्या जी अपनी जगह से उठ खड़ी हुईं। उनकी आँखों में क्रोध नहीं, बल्कि एक अडिग स्वाभिमान की ज्वाला थी।
“बस कीजिए दीदी!” कौशल्या जी की आवाज़ इतनी बुलंद और गंभीर थी कि दीवारें तक काँप उठीं।
विमला जी सकपका गईं। उन्होंने कौशल्या को कभी इस रूप में नहीं देखा था। वे हड़बड़ाकर बोलीं, “अरे… तू तो नाराज़ हो गई… मैं तो बस सलाह दे रही थी…”
“नहीं दीदी, यह सलाह नहीं, ज़हर है!” कौशल्या जी ने अपनी उँगली उठाते हुए साफ़ शब्दों में कहा, “आज तक मैंने आपका लिहाज़ किया क्योंकि आप मेरे जेठ जी की पत्नी हैं, इस घर की बड़ी हैं। पर आपने कभी बड़प्पन का एक भी फ़र्ज़ निभाया? जब मैं इस घर में ब्याह कर आई थी, आपने अम्मा जी के ख़िलाफ़ मेरे कान भरे। आपने खुद अपनी सास को कभी एक गिलास पानी इज़्ज़त से नहीं दिया और शादी के छह महीने बाद अलग चूल्हा जला लिया। फिर मेरी बेटी बड़ी हुई, तो आप उसकी जासूसी करने लगीं, उसके चरित्र पर उँगलियाँ उठाने की कोशिश की। जब उसका ब्याह हो गया, तो आप उसके ससुराल वालों की बुराइयाँ लेकर बैठ गईं। और आज… आज आप मेरी उस बहू पर लांछन लगा रही हैं जो इस घर को मंदिर बनाकर रखती है?”
विमला जी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। वे सोफ़े से उठने लगीं और बोलीं, “तू… तू मुझसे इस तरह बात कर रही है?”
“हाँ दीदी, क्योंकि आपने मुझे मजबूर किया है!” कौशल्या जी की आवाज़ में रत्ती भर भी हिचकिचाहट नहीं थी। “दीदी, अगर इतनी नसीहतें और जासूसी आपने अपने घर में की होती, तो आज आपकी अपनी बेटी मायके में बैठकर अपनी टूटी शादी का मातम न मना रही होती! अगर आपने अपनी ज़बान में थोड़ी मिठास रखी होती, तो आपका अपना बेटा आपसे अलग शहर जाकर न बस गया होता, जहाँ वह साल में एक बार भी आपका हाल पूछने नहीं आता! जो औरत अपना खुद का संसार नहीं संभाल सकी, जिसके अपने बच्चे उससे कतराते हैं, वह आज मेरे भरे-पूरे परिवार को नसीहत देने आई है?”
विमला जी की ज़बान जैसे तालू से चिपक गई। वे काटो तो ख़ून नहीं की स्थिति में खड़ी थीं। उनके अपने जीवन के कड़वे सच जब कौशल्या ने आईने की तरह उनके सामने रख दिए, तो उनके पास छिपाने के लिए कोई जगह नहीं बची। वे हकलाते हुए बोलीं, “मैं… मैं तो बस तेरी भलाई सोच रही थी…”
“हमारी भलाई सोचने के लिए हम खुद सक्षम हैं दीदी,” कौशल्या जी ने दो टूक कहा और मुख्य दरवाज़े की ओर इशारा करते हुए हाथ जोड़ लिए, “हमें अपना घर, अपनी बहू और अपने बच्चे संभालने आते हैं। हमारे घर में प्यार है, सम्मान है और एक-दूसरे पर अटूट विश्वास है। यहाँ किसी की गंदी नज़र और ज़हरीली बातों के लिए कोई जगह नहीं है। इसलिए बेहतर यही होगा कि आप अपने घर का ख्याल रखें और दोबारा मेरी चौखट पर किसी के बारे में ज़हर उगलने न आएँ।”
विमला जी पूरी तरह अपना सा मुँह लेकर रह गईं। जिस घमंड और दबंगई से वे आई थीं, वह सब एक पल में चकनाचूर हो चुका था। उनके चेहरे पर ऐसी शर्मिंदगी और बेबसी थी जिसे वे चाहकर भी छिपा नहीं पा रही थीं। वे बिना एक शब्द बोले, सिर झुकाए दरवाज़े से बाहर निकल गईं।
दरवाज़ा बंद करते ही कौशल्या जी ने मुड़कर देखा। अनघा दरवाज़े के पीछे खड़ी सब सुन रही थी। उसकी आँखों में कृतज्ञता के आँसू बह रहे थे। वह दौड़कर आई और कौशल्या जी के गले लग गई।
“माँ जी… आपने मेरे लिए…” अनघा की आवाज़ भर्रा गई।
कौशल्या जी ने उसके आँसू पोंछते हुए अपने सीने से लगा लिया और ममता से बोलीं, “पगली, तू मेरी बहू बाद में है, पहले इस घर की बेटी और मेरा मान है। जब तक मैं ज़िंदा हूँ, इस घर की दहलीज पर कोई भी बाहर का इंसान आकर तेरी गरिमा पर सवाल नहीं उठा सकता। परिवार नियमों और तानों से नहीं बनता अनघा, परिवार एक-दूसरे का संबल बनकर खड़ा होने से बनता है। तू बेफ़िक्र होकर अपनी पढ़ाई कर, अपने सपने पूरे कर।”
उस दिन घर में एक नई ताज़गी और सुकून का अहसास था। कौशल्या जी ने यह साबित कर दिया था कि बड़ों का आदर अपनी जगह है, लेकिन जब बात अपने परिवार के आत्मसम्मान और नई पीढ़ी की सुरक्षा की हो, तो अनुचित बातों के आगे दीवार बनकर खड़ा होना ही सबसे बड़ी समझदारी और संस्कार है। उस दिन के बाद विमला जी ने कभी उस घर की तरफ़ मुड़कर देखने की हिम्मत नहीं की, और वह परिवार अपने प्रेम और एकता के दम पर हमेशा खुशहाल रहा।
एक परिवार की असली ताकत तब सामने आती है जब बड़े-बुज़ुर्ग पुरानी रूढ़ियों और बाहरी लोगों के ज़हरीले तानों से अपनी नई पीढ़ी को बचाकर एक ढाल की तरह खड़े होते हैं। क्या आपको लगता है कि कौशल्या जी ने अपनी जेठानी को आईना दिखाकर और अपनी बहू का मान रखकर बिल्कुल सही कदम उठाया? क्या आज हर घर में ऐसी ही समझदार और प्रगतिशील सोच वाली सास की ज़रूरत नहीं है? अपने विचार और अनुभव कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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मूल लेखिका : विभा गुप्ता