अनमोल आंचल की छांव

 “और तुम्हारा कर्तव्य क्या है?” विश्वनाथ जी ने उसकी बात बीच में ही काट दी। “तुम्हारा क्या कर्तव्य बनता है रोहन? अपनी उस मां का अपमान करना, उसे नीचा दिखाना, जिसका दर्जा शास्त्रों में भगवान से भी ऊंचा माना गया है? तुम जिस दिखावे, जिस स्टेटस और जिन खोखले दोस्तों की रेपुटेशन के पीछे भाग रहे हो, वो सब रेत की दीवारें हैं। कल अगर तुम पर कोई विपत्ति आई, तो तुम्हारे वो हाई-क्लास दोस्त तुम्हारे पास खड़े भी नहीं होंगे। उस वक्त सिर्फ यही अनपढ़, सादी मां तुम्हारे आंसुओं को अपने आंचल में समेटने के लिए खड़ी होगी। अगर तुम्हारी डिग्रियां, तुम्हारा यह एमबीए और तुम्हारी यह अंग्रेजी तुम्हें अपनी मां का सम्मान करना नहीं सिखा सकी, तो थू है ऐसी शिक्षा पर

 घर के मुखिया विश्वनाथ जी शिक्षा विभाग से रिटायर्ड एक बेहद संजीदा, नेक और वसूलों के पक्के इंसान थे। उनकी पत्नी गिरिजा देवी सादगी की मूरत थीं। सिर पर हमेशा करीने से टिका सूती साड़ी का पल्लू, माथे पर लाल बिंदी और होठों पर ममता भरी मीठी मुस्कान ही उनकी असली पहचान थी। उनका बेटा रोहन शहर के एक नामी बिजनेस स्कूल में एमबीए के अंतिम वर्ष का छात्र था। रोहन दिखने में स्मार्ट, बोलने में तेजतर्रार और पढ़ाई में अव्वल था, लेकिन पिछले कुछ महीनों से बड़े शहर के रईस दोस्तों की सोहबत में आकर उसकी सोच में एक अजीब सा दिखावा और बनावटीपन घुलने लगा था।

शनिवार की दोपहर थी। घर के आंगन में खिली हल्की धूप के नीचे विश्वनाथ जी अखबार पढ़ रहे थे और पास ही बैठी गिरिजा देवी मेथी की भाजी बीन रही थीं। तभी रोहन हाथ में एक चमचमाता निमंत्रण पत्र लिए कमरे से बाहर आया। उसके चेहरे पर एक खास उत्साह और चमक थी।

उसने अपने पिता के पास आकर कुर्सी खींचते हुए कहा, “पापा, याद है न आपको? अगले रविवार को हमारे कॉलेज का दीक्षांत और वार्षिक समारोह है। मुझे बेस्ट स्टूडेंट ऑफ द ईयर का अवॉर्ड मिलने वाला है। साथ ही मैंने एक अंग्रेजी डिबेट कंपटीशन में भी पहला स्थान पाया है, उसका पुरस्कार भी मुझे उसी मंच पर मिलेगा। आपको हर हाल में समय पर पहुंचना है। और हां पापा, उस दिन आप वही ग्रे रंग का जोधपुरी सूट पहनना जो पिछले महीने हमने मॉल से लिया था। उस सूट में आप एकदम क्लासिक और रोबदार दिखते हैं।”

विश्वनाथ जी ने अखबार चश्मे के ऊपर से देखते हुए हंसकर कहा, “अरे वाह भाई! आज तो बेटे की तरफ से बड़ी मक्खनबाजी हो रही है। क्या बात है रोहन, कहीं कोई नई फरमाइश तो नहीं आने वाली?”

“अरे नहीं पापा, सच कह रहा हूं! उस जोधपुरी सूट में आपका व्यक्तित्व बिल्कुल अलग ही नजर आता है। पिछले महीने जब आप हमारे कॉलेज के चेयरमैन सर से मिलने गए थे, तो मेरे सारे दोस्त पूछ रहे थे कि तुम्हारे डैड कितने वेल-मेंटेंड और ग्रेसफुल हैं। इसलिए मैं चाहता हूं कि उस दिन भी आप उसी ठाठ से चलें।” रोहन ने सीना फुलाकर गर्व से कहा।

विश्वनाथ जी मुस्कुरा दिए और उन्होंने बड़े प्यार से पास बैठी अपनी पत्नी गिरिजा की ओर देखा, जो चुपचाप भाजी बीनते हुए बेटे की उपलब्धियों पर मन ही मन फूली नहीं समा रही थीं। विश्वनाथ जी ने खिलखिलाते हुए कहा, “ठीक है भई, साहबजादे का हुक्म सिर माथे पर। हम दोनों बिल्कुल सही वक्त पर तैयार होकर ऑडिटोरियम की पहली कतार में बैठ जाएंगे। वैसे गिरिजा, तुमने क्या सोचा है उस दिन के लिए? मेरी मानो तो जो पीले रंग की चंदेरी सिल्क की साड़ी तुम्हारी बहन ने दी थी, वही पहनना। जब तुम वह पहनकर मंच के सामने बैठोगी, तो हमारा रोहन जब ट्रॉफी लेगा, तो उसकी मां सबसे गरिमामयी दिखेगी।”

गिरिजा देवी का चेहरा संकोच और लज्जा से लाल हो गया। उन्होंने अपने आंचल को थोड़ा और ठीक करते हुए दबी जुबान में कहा, “आप भी ना बस… बुढ़ापे में कहीं भी कुछ भी शुरू हो जाते हैं। जवान बेटा सामने खड़ा है, जरा तो लिहाज कीजिए।”

विश्वनाथ जी ने ठहाका लगाते हुए कहा, “अरे अपने बेटे से कैसा संकोच? क्यों रोहन, ठीक कहा न मैंने? उस दिन तुम्हारी मां को देखकर पूरे कॉलेज को पता चलना चाहिए कि हमारे होनहार बेटे की असली प्रेरणा कौन है!”

विश्वनाथ जी की बात सुनकर रोहन के चेहरे पर अचानक गहरा खिंचाव आ गया। उसकी मुस्कान पल भर में गायब हो गई और उसने झिझकते हुए, थोड़ा रुककर कहा, “पापा… असल में… मम्मा का वहां क्या काम? मैंने तो सिर्फ आपको कॉलेज के उस प्रोग्राम में आने के लिए कहा है। मम्मा को घर पर ही रहने दीजिए।”

हवा में जैसे अचानक बर्फ जम गई। आंगन का वह खुशनुमा माहौल एक झटके में सन्न रह गया।

गिरिजा देवी के हाथ में पकड़ी हुई मेथी की पत्तियां वहीं थाली में गिर पड़ीं। उनका दिल भीतर तक कांप गया। उन्होंने नजरें उठाकर अपने बेटे को देखा। क्या यह वही रोहन था, जो बचपन में एक पल के लिए भी उनका आंचल नहीं छोड़ता था? स्कूल से लौटते ही बस्ता फेंककर ‘मां-मां’ पुकारता हुआ पूरे घर में चक्कर लगाता था, जब तक मां के हाथ से पहला निवाला मुंह में न चला जाए, पानी तक नहीं पीता था। आज उसी रोहन की जबान से यह निकला कि ‘मम्मा का वहां क्या काम?’ गिरिजा देवी की पलकें भीग गईं और उनका गला रुंध गया। वे एक शब्द भी नहीं बोल पाईं, बस पत्थर की मूरत बनी बैठी रहीं।

विश्वनाथ जी का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। उन्होंने हाथ में पकड़ा अखबार झटके से मेज पर पटका और कुर्सी से सीधे खड़े हो गए। उनकी आवाज में एक ऐसा तीखापन था जिससे रोहन सहम गया।

“रोहन! यह क्या बकवास कर रहे हो तुम? अपने होश में तो हो? अपनी मां के बारे में ऐसी घटिया बात कहते हुए तुम्हारी जबान कैसे नहीं कांपी? मुझे अपनी कानों पर यकीन नहीं हो रहा कि यह शब्द मेरे बेटे के मुंह से निकले हैं!” विश्वनाथ जी की आंखें लाल हो चुकी थीं।

रोहन ने अपनी नजरें चुराईं, लेकिन खुद को सही साबित करने की जिद में वह अकड़कर बोला, “पापा, इसमें इतना गुस्सा होने या चौंकने वाली क्या बात है? मैं बहुत सोच-समझकर ही कह रहा हूं। मैं नहीं चाहता कि मम्मा उस दिन कॉलेज के फंक्शन में आएं। अगर मम्मा वहां आईं, तो मेरे दोस्तों और प्रोफेसर्स के सामने मेरी क्या साख रह जाएगी? मेरी रेपुटेशन की तो धज्जियां उड़ जाएंगी।”

गिरिजा देवी ने अपने कांपते आंसुओं को दबाते हुए भरे कंठ से पूछा, “बेटा रोहन… मेरे वहां आने से तुम्हारी रेपुटेशन कैसे खराब हो जाएगी? मैंने तो कभी कोई ऐसा काम नहीं किया जिससे तुम्हारा सिर झुके। मैं समझी नहीं बेटा…”

रोहन ने झुंझलाते हुए हाथ हिलाया, “मम्मा, इसमें न समझने जैसा क्या है? आप दुनिया को नहीं जानतीं। मेरे सारे दोस्तों की मम्मियां या तो किसी मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर एग्जीक्यूटिव हैं, या डॉक्टर हैं, या फिर बहुत बड़े बुटीक चलाती हैं। वो जब कॉलेज के किसी इवेंट में आती हैं, तो उनका पहनावा, उनकी अंग्रेजी में बात करने का अंदाज, उनकी हाई-सोसायटी की लाइफस्टाइल देखने लायक होती है। और आप? आप सिर्फ एक सीधी-सादी हाउसवाइफ हैं। आपको न तो आज के दौर के फैशन की कोई समझ है, न ही आपको अंग्रेजी में बात करना आता है और न ही वो स्मार्टनेस है जो आधुनिक समाज में चाहिए होती है। अगर कोई मुझसे पूछेगा कि तुम्हारी मां क्या करती हैं, तो मैं क्या जवाब दूंगा कि वो घर में चूल्हा-चौका संभालती हैं?”

“बस करो रोहन! एक लफ्ज और नहीं!” विश्वनाथ जी की दहाड़ से पूरा आंगन गूंज उठा। उनका क्रोध अब अपनी चरम सीमा पर था। “हाउसवाइफ होना कोई गुनाह है? और तुम्हारी मां सिर्फ एक हाउसवाइफ नहीं, इस पूरे घर की प्राणवायु हैं, होममेकर हैं! इनके बिना यह घर केवल ईंट, सीमेंट और पत्थरों का एक बेजान ढेर होता। तुम जिसे आज इतने हल्के में खारिज कर रहे हो, उसकी बदौलत तुम्हारी यह हस्ती बनी है!”

रोहन ने भी थोड़ा उद्दंड स्वर में पलटकर जवाब दिया, “पापा, आप बात का बतंगड़ बना रहे हैं। होममेकर कहिए या हाउसवाइफ, हकीकत तो नहीं बदलती ना? सच तो यही है कि मम्मा सिर्फ घर के बर्तन और झाड़ू-पोंछा संभालती हैं। घर का काम तो कोई भी अनपढ़ या नौकर भी कर सकता है। उसके लिए किसी टैलेंट की जरूरत नहीं होती। समाज में इज्जत ऑफिस जाने से, ऊंचे पदों पर बैठने से और मोटी सैलरी कमाने से मिलती है, घर की चारदीवारी में रोटियां सेकने से इज्जत नहीं बढ़ती। मुझे भी अपनी सोशल लाइफ और अपने स्टेटस का ख्याल रखना पड़ता है। मुझे तो अपने दोस्तों के सामने इन्हें अपनी मां बताते हुए भी शर्मिंदगी महसूस होती है!”

‘शर्मिंदगी…’ यह शब्द सुनकर गिरिजा देवी का कलेजा जैसे छलनी हो गया। वे अपनी साड़ी के पल्लू में मुंह दबाकर सिसक पड़ीं। जिस बेटे को उन्होंने अपने रक्त से सींचकर बड़ा किया था, जिसे दुनिया की हर बला से बचाने के लिए उन्होंने अपनी जवानी, अपने शौक, अपनी रातों की नींद सब कुछ न्योछावर कर दिया था, आज वही बेटा उन्हें अपनी मां कहने में शर्मिंदा हो रहा था।

विश्वनाथ जी ने आगे बढ़कर रोहन के कंधे को झकझोर दिया। उनका स्वर गुस्से से कांप रहा था, “वाह रे मेरे पढ़े-लिखे साहबजादे! अंग्रेजी की चार किताबें क्या पढ़ लीं, दो-चार सूट क्या पहन लिए, तुमने समझ लिया कि तुम आसमान से टपक पड़े हो और तुम्हें अपनी मां का अपमान करने का लाइसेंस मिल गया है? अभी तुम्हारे दूध के दांत भी ठीक से नहीं टूटे हैं और तुम उस ममता की कीमत लगाने चले हो जिसकी एक सांस का कर्ज भी तुम सात जन्म लेकर नहीं चुका सकते! आज तुम मेरी पत्नी का, अपनी सगी मां का इस तरह सरेआम तिरस्कार कर रहे हो, कल को अगर मेरी हैसियत तुम्हारे तथाकथित ‘हाई स्टेटस’ के आड़े आएगी, तो तुम मुझे भी किसी सड़क किनारे धकेलने में देर नहीं लगाओगे!”

रोहन के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था। वह नजरें नीची किए चुपचाप खड़ा रहा।

विश्वनाथ जी का गुस्सा अब एक गहरे दर्द में बदल चुका था। उन्होंने रोहन की आंखों में आंखें डालकर कहा, “तुम कहते हो कि घर का काम कोई अनपढ़ भी कर सकता है? जरा बताओ रोहन, जब तुम आठवीं कक्षा में टाइफाइड से तप रहे थे और डॉक्टर ने भी कह दिया था कि रात बहुत नाजुक है, तब कौन था जो तीन रातों तक बिना एक पल झपकी लिए तुम्हारी पेशानी पर ठंडी पट्टियां रखता रहा? कौन था जिसने उस वक्त अपनी भूख-प्यास भूलकर सिर्फ तुम्हारे लिए भगवान के आगे रो-रोकर अपनी उम्र मांग ली थी?

जब तुम सुबह पांच बजे कोचिंग जाने के लिए उठते थे, तो बाहर की कड़ाके की ठंड में कौन था जो तुमसे आधा घंटा पहले उठकर ठंडे पानी में हाथ डालकर तुम्हारे लिए गरमा-गरम नाश्ता और लंच बॉक्स तैयार करता था, ताकि मेरे बेटे की सेहत पर कोई आंच न आए? जब तुम्हें प्रोजेक्ट्स के लिए या दोस्तों के साथ पिकनिक जाने के लिए पैसों की जरूरत होती थी और मेरा बजट तंग होता था, तो कौन अपनी संदूक से अपनी बचत के पैसे चुपके से तुम्हारी जेब में डाल देता था?

तुम्हारी मां ने पिछले दस सालों में अपने लिए एक नई साड़ी नहीं खरीदी ताकि तुम्हारी महंगी किताबों और लैपटॉप के पैसे कम न पड़ें। उन्होंने अपने हर अरमान को, अपनी हर ख्वाहिश को तुम्हारे भविष्य की वेदी पर चढ़ा दिया। और आज तुम उस त्याग को कह रहे हो कि यह तो कोई भी अनपढ़ कर सकता है? तुम्हें इन्हें किसी से मिलवाते हुए शर्म आती है?”

रोहन ने नजरें झुकाए रखीं, लेकिन उसके चेहरे पर अभी भी एक हल्की सी कशमकश थी। उसने धीरे से कहा, “पापा… यह सब तो हर मां का कर्तव्य होता है ना। इसमें इतना…”

“और तुम्हारा कर्तव्य क्या है?” विश्वनाथ जी ने उसकी बात बीच में ही काट दी। “तुम्हारा क्या कर्तव्य बनता है रोहन? अपनी उस मां का अपमान करना, उसे नीचा दिखाना, जिसका दर्जा शास्त्रों में भगवान से भी ऊंचा माना गया है? तुम जिस दिखावे, जिस स्टेटस और जिन खोखले दोस्तों की रेपुटेशन के पीछे भाग रहे हो, वो सब रेत की दीवारें हैं। कल अगर तुम पर कोई विपत्ति आई, तो तुम्हारे वो हाई-क्लास दोस्त तुम्हारे पास खड़े भी नहीं होंगे। उस वक्त सिर्फ यही अनपढ़, सादी मां तुम्हारे आंसुओं को अपने आंचल में समेटने के लिए खड़ी होगी। अगर तुम्हारी डिग्रियां, तुम्हारा यह एमबीए और तुम्हारी यह अंग्रेजी तुम्हें अपनी मां का सम्मान करना नहीं सिखा सकी, तो थू है ऐसी शिक्षा पर! मुझे तुमसे यह उम्मीद नहीं थी रोहन। आज मुझे लग रहा है कि शायद हमारे दिए संस्कारों में ही कोई खोट रह गया था, जो हम अपने ही घर में एक ऐसा संवेदनहीन इंसान पाल बैठे।”

विश्वनाथ जी की यह बात रोहन के दिल पर किसी खंजर की तरह जाकर लगी। ‘संस्कारों में खोट…’ इस एक वाक्य ने रोहन की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया।

उसने नजर उठाकर अपनी मां की ओर देखा। गिरिजा देवी एक कोने में बैठी खामोशी से रो रही थीं। उनके कांपते हुए हाथ अभी भी उन मेथी के पत्तों को समेटने की कोशिश कर रहे थे, ताकि घर का काम न रुके। रोहन ने देखा कि मां की उंगलियों में चूड़ियों के निशान थे, उनके पैरों की एड़ियां फटी हुई थीं जो सालों से परिवार की सेवा में दौड़ते-दौड़ते घिस चुकी थीं, और उनकी वही पुरानी सूती साड़ी, जिसके पल्लू से उन्होंने न जाने कितनी बार रोहन के माथे का पसीना पोंछा था।

अचानक रोहन की आंखों के आगे से वह झूठा पर्दा हट गया जो कॉलेज की चमक-दमक और दोस्तों की झूठी शान ने उसकी आंखों पर डाल दिया था। उसे याद आया कि जब भी उसके दोस्त अपनी नौकरीपेशा माताओं की व्यस्तता का रोना रोते थे कि उन्हें घर पर मां का प्यार और घर का बना खाना नसीब नहीं होता, तब वही दोस्त रोहन के टिफिन पर टूट पड़ते थे और कहते थे, “यार रोहन, तू कितना लकी है कि तेरी मां तेरे लिए इतना स्वादिष्ट खाना बनाती हैं और हर वक्त तेरे साथ खड़ी रहती हैं।”

रोहन के पैरों तले से जमीन खिसक गई। उसने क्या कर दिया था! उसने अपनी झूठी शान के लिए उस ममता को कुचल दिया था जिसने उसे यह जीवन दिया था।

रोहन के घुटने मुड़ गए। वह भारी कदमों से चलकर अपनी मां के पास गया और जमीन पर घुटनों के बल बैठ गया। उसने दोनों हाथों से अपनी मां के कांपते हुए पैरों को पकड़ लिया और अपना सिर उनकी गोद में रख दिया।

“मम्मा… मुझे माफ कर दीजिए… मुझे माफ कर दीजिए मम्मा!” रोहन फफक-फफक कर रो पड़ा। उसकी सिसकियों से पूरा दालान गूंज उठा।

गिरिजा देवी का दिल तो मां का था। बेटे के आंसू जैसे ही उनकी साड़ी पर गिरे, उनका सारा दर्द, सारा अपमान एक ही पल में धुल गया। उनके ममता भरे हाथ अपने आप रोहन के सिर पर चले गए और वे उसके बालों को सहलाने लगीं।

रोहन रोते हुए कह रहा था, “मम्मा, मैं बहुत अंधा हो गया था। मेरे दिमाग पर झूठी शान और दिखावे का ऐसा भूत सवार हो गया था कि मैं अपनी सबसे अनमोल दौलत की कीमत भूल गया था। मेरे दोस्त जब अपनी माताओं की बातें करते थे, तो मैं अपनी हीनभावना का शिकार होकर बहक गया था। मैं भूल गया था कि मेरी हर सांस, मेरी हर कामयाबी आपकी ही तपस्या का फल है। मैं आपके चरणों की धूल के बराबर भी नहीं हूं मम्मा। अगर आप मुझे माफ नहीं करेंगी तो मैं कभी खुद से नजरें नहीं मिला पाऊंगा।”

फिर उसने सिर उठाकर अपने पिता की ओर देखा, जो गंभीर मुद्रा में खड़े थे। रोहन ने हाथ जोड़कर कहा, “पापा, आपने आज मेरी आंखें खोल दीं। आपने उस झूठे कोहरे को हटाकर मुझे असली उजाला दिखाया है। अगर आज आपने मुझे नहीं डांटा होता, तो मैं जिंदगी भर इस नकली दिखावे के दलदल में धंसता चला जाता और एक खोखला इंसान बनकर रह जाता। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद पापा, मुझे सही रास्ता दिखाने के लिए।”

रोहन ने अपनी मां का हाथ अपने सीने से लगाया और गर्व से भरकर बोला, “मम्मा, अब उस कॉलेज के फंक्शन में आप ही मेरे साथ चलेंगी। और आप वही अपनी पीले रंग की चंदेरी साड़ी पहनेंगी। मैं पूरी दुनिया के सामने, उस भरे मंच पर खड़े होकर अपने प्रोफेसर्स और अपने सभी दोस्तों से चिल्लाकर कहूंगा कि यह मेरी मां हैं—मेरी पहली गुरु, मेरा गौरव, मेरी असली भगवान! जिनकी बदौलत आज मैं इस मुकाम पर खड़ा हूं।”

गिरिजा देवी की आंखों से खुशी और ममता के आंसू बह निकले। उन्होंने रोहन को उठाकर अपने सीने से भींच लिया। “मेरे बच्चे… मां कभी अपने बच्चे से नाराज नहीं रह सकती। देर आए, दुरुस्त आए। तूने अपनी भूल समझ ली, मेरे लिए यही दुनिया की सबसे बड़ी खुशी है। बस मुझसे वादा कर कि जिंदगी में चाहे कितने भी बड़े मुकाम पर पहुंच जाए, कभी अपने संस्कारों और अपनों के प्यार को छोटा नहीं समझेगा।”

“वादा मम्मा, जिंदगी भर के लिए वादा!” रोहन ने भावुक होकर कहा।

विश्वनाथ जी जो अब तक सब देख रहे थे, उनके चेहरे पर भी एक सुकून भरी मुस्कान तैर गई। उन्होंने हल्की चुटकी लेते हुए कहा, “अच्छा जी! मैं आधे घंटे से यहां गला फाड़-फाड़ कर लेक्चर दे रहा हूं, मेरी तो किसी को कद्र ही नहीं है। सारी मलाई तो मां-बेटे ही आपस में बांट रहे हैं!”

रोहन ने हंसते हुए एक हाथ से मां को और दूसरे हाथ से पिता को अपने आलिंगन में समेट लिया। उसने लाड़ से कहा, “अरे पापा, आप तो वो वटवृक्ष हैं जिसकी छांव में हमारी यह बगिया महकती है। आपने जुगनू की तरह मेरे मन पर छाए भटकाव के अंधेरे को ज्ञान के प्रकाश में बदल दिया। आप दोनों के बिना मेरा वजूद ही क्या है!”

तीनों एक-दूसरे के गले लगकर खिलखिला पड़े। आंगन में खिली दोपहर की धूप अब पहले से कहीं अधिक गुनगुनी, पावन और उज्ज्वल लग रही थी। घर का कोना-कोना संस्कारों और ममता की अटूट डोर से एक बार फिर बंध चुका था।

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और दिखावे की दुनिया में अक्सर युवा पीढ़ी अपने माता-पिता के सीधेपन और उनके त्याग को समाज की झूठी चमक के आगे कम आंकने लगती है। पर हकीकत यही है कि दुनिया की कोई भी डिग्री या ओहदा मां के आंचल की ममता और पिता के संस्कारों से बड़ा नहीं हो सकता। क्या आपको भी लगता है कि आधुनिकता के नाम पर अपने संस्कारों और परिवार की सादगी को भूलना सबसे बड़ा भटकाव है? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद .

अर्चना कोहली ‘अर्चि’ (नोएडा)

error: Content is protected !!