देवकी जी ने घबराकर कहा, “दामाद जी, यह आप क्या कह रहे हैं? दामाद के घर जाकर रहना… बेटी के ससुराल में डेरा डालना… हमारे समाज में यह सब अच्छा नहीं माना जाता। लोग क्या कहेंगे कि बेटा विदेश में बैठा है और माँ-बाप दामाद के टुकड़ों पर पल रहे हैं? हम अपनी इस पुश्तैनी हवेली को छोड़कर कहीं नहीं जा सकते बेटा।”
देवकी जी का हाथ बार-बार उस मोबाइल स्क्रीन की तरफ बढ़ जाता, जिस पर उन्होंने पिछले आधे घंटे में चार बार एक ही नंबर डायल किया था। हर बार रिंग जाती, पूरी बजती और फिर कट जाती। देवकी जी की आँखों में एक अजीब सी छटपटाहट थी। वे हर बार चश्मे को ठीक करतीं, स्क्रीन पर उंगलियाँ फेरतीं और मन ही मन बुदबुदातीं कि शायद मीटिंग में होगा, शायद गाड़ी चला रहा होगा, या शायद किसी ज़रूरी प्रोजेक्ट की फाइल देख रहा होगा। माँ का दिल हमेशा अपने बच्चे की खता से पहले उसके लिए हज़ार बहाने तैयार कर लेता है।
जब उन्होंने पाँचवीं बार नंबर मिलाया, तो तीन-चार घंटियों के बाद कॉल आखिरकार उठ गया। मगर उधर से जो स्वर आया, उसमें ममता की मिठास नहीं, बल्कि झुंझलाहट और तीखापन था।
“माँ! क्या आफत आ गई है? आप जानती हैं कि यहाँ न्यू यॉर्क में अभी हमारे ऑफिस का सबसे व्यस्त समय है? बैक-टू-बैक प्रेजेंटेशन चल रहे हैं। आप दिन में दस बार फोन मिलाकर मुझे परेशान क्यों करती रहती हैं? कभी तो समय का लिहाज़ किया कीजिए!” बेटे विवेक की आवाज़ में एक अजीब सी बेरुखी थी, जो सीधे देवकी जी के कलेजे को चीर गई।
देवकी जी ने अपनी आवाज़ को सामान्य बनाए रखने की कोशिश करते हुए भर्राए गले से कहा, “बेटा… मैं जानती हूँ तू बहुत बड़ा अफ़सर बन गया है, बहुत व्यस्त रहता है। पर तू तो कभी हफ़्तों तक पलटकर एक मैसेज भी नहीं करता। मैं तो बस इतना पूछने के लिए फोन कर रही थी कि तू इस बार दिवाली पर तो आ रहा है न? सात साल बीत गए हैं विवेक, तुझे अपनी आँखों से देखे हुए। तेरे बाबूजी की रीढ़ की हड्डी का दर्द अब बहुत बढ़ गया है, डॉक्टर ने ऑपरेशन की सलाह दी है। मेरी आँखें भी अब कमजोर हो गई हैं। हम दोनों का मन तुझे देखने के लिए बहुत तड़प रहा है बेटा… बस कुछ दिनों के लिए अपने घर आ जा।”
दूसरी तरफ से एक गहरी और चिढ़ी हुई साँस की आवाज़ आई, “माँ, आप और बाबूजी हर बार वही पुरानी कैसेट बजाना शुरू कर देते हैं। मैंने आपको कितनी बार समझाया है कि ग्लोबल लेवल पर काम करने वाले प्रोफेशनल्स के पास ऐसे हफ्तों की छुट्टियाँ लेकर भारत आने का वक्त नहीं होता। यहाँ करोड़ों के सौदे चल रहे हैं। मैं अपनी जमी-जमाई नौकरी और करियर को छोड़कर वहाँ बैठकर आप लोगों के साथ पुरानी बातें नहीं कर सकता। जब मुझे फुर्सत मिलेगी, मैं खुद सोचूँगा। फिलहाल मेरे पास बिल्कुल वक्त नहीं है। अब मुझे काम करने दीजिए, शाम को जब फ्री होऊँगा तब बात करूँगा।”
इससे पहले कि देवकी जी कुछ और कह पातीं, फोन कटने की तीखी ‘बीप-बीप’ आवाज़ उनके कानों में गूँजने लगी। देवकी जी का हाथ काँप गया और फोन गोदी में गिर पड़ा। उनका चेहरा सफेद पड़ गया था। आँखों के कोरों से गर्म आँसू ढुलक कर गालों पर बह निकले। उन्होंने जल्दी से अपनी सूती साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछीं, एक गहरी साँस ली और अपने चेहरे पर जबरन एक बनावटी मुस्कान लाने की कोशिश की। उन्हें लगा कि शायद वे अपने दर्द को छुपा लेंगी।
वे धीरे-धीरे कदमों से अंदर वाले बड़े कमरे में आईं, जहाँ उनके पति विश्वंभर दयाल जी आरामकुर्सी पर लेटे हुए थे। विश्वंभर जी शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त हुए थे। उनके हाथ में एक पुरानी किताब खुली थी, लेकिन उनकी नज़रें छत की कड़ियों पर टिकी हुई थीं। कमरे में पंखा धीमी आवाज़ में घूम रहा था।
देवकी जी ने कमरे में आते ही पल्लू से माथा पोंछते हुए बहुत सहज बनने का ढोंग किया, “आज मौसम में कितनी अजीब सी उमस है जी! शरीर पसीने से भीग रहा है, ऐसा लगता है जैसे साँस लेना भी भारी हो गया हो।”
विश्वंभर जी ने धीरे से अपनी किताब बंद करके मेज़ पर रखी। उन्होंने अपनी आँखों से पुराना चश्मा उतारा, उसकी कमानी को साफ किया और अपनी पत्नी की ओर गहरी, मर्मभेदी दृष्टि से देखा। उनकी आवाज़ में वर्षों का अनुभव और गहरा दर्द था।
“देवकी, तुम पिछले पैंतीस सालों से मेरी अर्धांगिनी हो। तुमने घर के हर सुख-दुख को मेरे साथ बाँटा है, पर सच कहूँ तो तुम झूठ बोलने में आज भी बहुत कच्ची हो। बाहर बरामदे से लेकर इस कमरे तक एसी चल रहा है, यहाँ पसीना कहाँ से आएगा? और ये जो तुम्हारी आँखों के किनारे लाल हो रहे हैं और गालों पर नमी की लकीरें खिंची हैं, ये उमस का पसीना नहीं है। ये एक लाचार माँ के वे आँसू हैं जिन्हें तुम मुझसे छुपाने की नाकाम कोशिश कर रही हो।”
देवकी जी की बनावटी हिम्मत एक पल में टूट गई। वे वहीं विश्वंभर जी के पैरों के पास फर्श पर बैठ गईं और उनका कंधा पकड़कर बिलख पड़ीं।
विश्वंभर जी ने भारी मन से अपनी पत्नी के काँपते सिर पर हाथ रखा और बोले, “देवकी, दरवाज़ा खुला था। मैंने विवेक की एक-एक बात सुनी है। उस लड़के के शब्द इतने तीखे थे कि मेरे बूढ़े कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरे हैं। जिस बेटे को हमने अपनी रीढ़ की हड्डी झुकाकर, अपना पेट काटकर, अपनी एक-एक पाई जोड़कर विदेश की बड़ी यूनिवर्सिटी में पढ़ाया, आज उसी बेटे के पास हमारे लिए पाँच मिनट की फुर्सत नहीं है। सात साल हो गए… सात साल! उसने एक बार भी मुड़कर इस हवेली की चौखट नहीं देखी।”
विश्वंभर जी की अपनी आँखों से भी आँसू की एक बूँद छलक कर उनके सफेद कुर्ते पर गिर पड़ी। उन्होंने रुंधे हुए गले से आगे कहा, “अब हमें इस पुत्र-मोह की झूठी माया से बाहर निकल आना चाहिए देवकी। जिस संतान को हमारी परवाह नहीं, उसके लिए तिल-तिल कर घुटने का क्या फायदा? हमारे लिए अब सिर्फ हम दोनों ही बचे हैं। इस दुनिया में जब तक साँसें चल रही हैं, एक-दूसरे का हाथ थामे रहेंगे। अब तो बस ईश्वर से यही प्रार्थना करता हूँ कि जब भी हमारा बुलावा आए, हम दोनों को एक साथ ही उठाए, ताकि किसी एक को इस वीराने में अकेले तड़पना न पड़े।”
कमरे में गहरा सन्नाटा और मायूसी का अंधेरा पसर गया था। दोनों वृद्ध दंपत्ति एक-दूसरे का दुख बाँटते हुए सिसक रहे थे। उन्हें लग रहा था कि ज़िंदगी की इस आखिरी ढलान पर वे पूरी तरह लावारिस और अकेले हो चुके हैं।
“बाबूजी! आप दोनों को यह सोचने का हक किसने दिया कि आप इस दुनिया में अकेले हैं?”
अचानक कमरे की चौखट पर से एक खनकती हुई, आत्मीय आवाज़ गूँजी। विश्वंभर जी और देवकी जी ने चौंककर दरवाज़े की तरफ देखा। वहाँ उनकी छोटी बेटी अंजलि, उसका पति आलोक और उनके दोनों छोटे बच्चे हाथ में मिठाइयों के डिब्बे और फल लिए मुस्कुराते हुए खड़े थे।
अंजलि के चेहरे पर वही बचपन वाली ममता और शरारत थी, लेकिन उसकी आँखों में अपने माता-पिता के प्रति अगाध आदर था। अंजलि के पति आलोक एक बहुत ही सुलझे हुए, संस्कारी और प्रतिष्ठित विद्यालय के प्रधानाचार्य थे।
अंजलि दौड़कर कमरे में आई और अपनी माँ के गले लग गई। उसने अपनी उंगलियों से माँ के आँसू पोंछे और डाँटने के अंदाज़ में बोली, “बाबूजी, आप यह कैसे भूल गए कि आपकी सिर्फ एक औलाद नहीं है? क्या बेटियाँ औलाद नहीं होतीं? क्या सिर्फ बेटा ही बुढ़ापे की लाठी बनने का ठेका लेकर पैदा होता है? अगर आपका बेटा सात समंदर पार बैठकर अपने फर्ज़ भूल गया, तो क्या आपकी यह बेटी भी मर गई है?”
विश्वंभर जी ने भावुक होकर कहा, “अरे अंजलि, बेटी… तू अचानक इस समय? और दामाद जी, आप भी? सब खैरियत तो है न?”
आलोक आगे बढ़े और उन्होंने बहुत ही विनम्रता से झुककर विश्वंभर जी और देवकी जी के चरण स्पर्श किए। आलोक ने कहा, “बाबूजी, सब बिल्कुल खैरियत है। बल्कि आज से सब कुछ बहुत बेहतर होने वाला है। हम यहाँ सिर्फ मिलने नहीं आए हैं, हम आप दोनों को अपने साथ हमारे घर ले जाने आए हैं। गाड़ी बाहर खड़ी है और हमने आपकी दोनों अलमारियों का सामान बाँधने के लिए बैग भी मँगवा लिए हैं।”
देवकी जी ने घबराकर कहा, “दामाद जी, यह आप क्या कह रहे हैं? दामाद के घर जाकर रहना… बेटी के ससुराल में डेरा डालना… हमारे समाज में यह सब अच्छा नहीं माना जाता। लोग क्या कहेंगे कि बेटा विदेश में बैठा है और माँ-बाप दामाद के टुकड़ों पर पल रहे हैं? हम अपनी इस पुश्तैनी हवेली को छोड़कर कहीं नहीं जा सकते बेटा।”
आलोक ने एक बहुत ही सौम्य मुस्कान के साथ देवकी जी के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। उन्होंने कहा, “माँ जी, समाज उस दिन कहाँ था जब आप दोनों इस वीरान घर में अकेले बीमारी से जूझ रहे थे? समाज उस दिन कहाँ था जब आपका बेटा सात साल से मुड़कर देखने नहीं आया? और रही बात दामाद के घर रहने की, तो मैं आपको बता दूँ कि यह फैसला सिर्फ मेरा और अंजलि का नहीं है। यह मेरे माता-पिता का हुक्म है।”
विश्वंभर जी ने अचरज से पूछा, “समधी जी का?”
“जी हाँ, बाबूजी!” आलोक ने आदर से कहा, “अंजलि ने पिछले पाँच सालों में मेरे माता-पिता की जिस तरह सेवा की है, जैसी देखभाल उसने मेरे पूरे परिवार की की है, उसने मेरे घर को स्वर्ग बना दिया है। मेरी माँ कहती हैं कि अंजलि बहू नहीं, हमारे घर की साक्षात लक्ष्मी और देवी है। आज जब मेरे माता-पिता को पता चला कि आपकी तबीयत ठीक नहीं रहती और आप दोनों यहाँ अकेले संघर्ष कर रहे हैं, तो मेरे पिताजी ने मुझसे साफ कहा कि अगर तुम अपने ससुर और सास को ससम्मान अपने घर नहीं ला सकते, तो तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई और संस्कारों पर धिक्कार है। मेरे बापूजी ने कहा है कि अगर आप सीधे नहीं चलेंगे, तो वे खुद गाड़ी लेकर यहाँ आ जाएंगे। अब आप बताइए, क्या आप अपने समधी जी की बात टालेंगे?”
अंजलि ने अपने पिता के घुटनों पर सिर रख दिया और नम आँखों से कहा, “बाबूजी, आपने मुझे और भैया को एक समान पाला। कभी बेटी होने का भेदभाव नहीं किया। मुझे अच्छी से अच्छी शिक्षा दी, मुझे अपने पैरों पर खड़ा किया। जब आपने बेटे और बेटी में कोई फर्क नहीं समझा, तो आज बुढ़ापे में आप मुझे अपनी सेवा करने का हक कैसे छीन सकते हैं? क्या बेटियों का फर्ज सिर्फ विदाई के वक्त रोने तक ही सीमित होता है? क्या माँ-बाप के दुख में हाथ बँटाना सिर्फ बेटे का ही अधिकार है? अगर भैया अपने कर्तव्य से भाग गए, तो मैं अपने फर्ज़ से कभी पीछे नहीं हटूंगी। आप दोनों को हमारे साथ चलना ही होगा।”
अंजलि के छोटे बच्चों ने आकर अपने नाना-नानी की उंगलियाँ पकड़ लीं और चहकते हुए बोले, “नाना जी, नानी जी, चलिए ना! हमारे घर में आपके लिए बड़ा वाला कमरा तैयार किया गया है। हम रोज़ रात को आपसे परियों और राजा-रानी की कहानियाँ सुनेंगे।”
विश्वंभर जी और देवकी जी की आँखों से आँसुओं की अविरल धारा बह निकली, लेकिन ये आँसू बेबसी या तिरस्कार के नहीं थे, बल्कि उस असीम कृतज्ञता, तृप्ति और सम्मान के थे जो उन्हें अपनी बेटी और दामाद के प्रेम में मिल रहा था। विश्वंभर जी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। उन्हें अहसास हुआ कि इंसान की असली पूँजी वह नहीं होती जो बैंक खातों में विदेशी मुद्रा के रूप में जमा हो, बल्कि असली दौलत वे संस्कार होते हैं जो संतान को इंसान बनाते हैं।
विश्वंभर जी ने अपनी बेटी और दामाद को दोनों हाथों से सीने से लगा लिया। उन्होंने कांपते होंठों से कहा, “अंजलि… बेटी, तूने आज साबित कर दिया कि कोख से जन्म लेने वाला सिर्फ बेटा ही कुल का दीपक नहीं होता, बल्कि एक संस्कारी बेटी पूरे खानदान की मशाल होती है जो दोनों कुलों को अपनी रोशनी से जगमगा देती है। दामाद जी, आपके जैसे विचार और संस्कार पाकर आज मैं खुद को दुनिया का सबसे भाग्यशाली पिता महसूस कर रहा हूँ।”
हवेली के उस पुराने आँगन में अब कोई उदासी नहीं थी। शाम की ठंडी हवा तुलसी के पत्तों को सहला रही थी। बच्चों की खिलखिलाहट से वह वीरान मकान गूँज उठा था। देवकी जी ने राहत की एक लंबी साँस ली और मंदिर के आगे हाथ जोड़कर ईश्वर को धन्यवाद दिया। उन्हें समझ आ गया था कि जब अपने खून के रिश्ते झूठे अहंकार और स्वार्थ में अंधे हो जाते हैं, तब भी प्यार, आदर और संस्कारों की लौ किसी न किसी रिश्ते के रूप में हमारे जीवन को रोशन करने के लिए जलती रहती है।
आज के बदलते दौर में जब लोग बेटों को ही बुढ़ापे का एकमात्र सहारा मानते हैं, वहाँ इस कहानी ने यह साबित किया है कि अगर संस्कारों की नींव मज़बूत हो, तो बेटियाँ और दामाद भी माता-पिता के मान-सम्मान की सबसे बड़ी ढाल बन सकते हैं। आपकी नज़रों में क्या आज के समाज में बेटा और बेटी के इस पुराने भेद को पूरी तरह मिटाने का समय नहीं आ गया है? अपनी विचारपूर्ण और सच्ची राय नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें।
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पूजा शर्मा