रिश्तों की धूप-छांव और मोम सा दिल

 “सहना नहीं है, जीतना है,” वंदना ने आत्मविश्वास से कहा। “अच्छे व्यवहार और धैर्य से बड़ी से बड़ी नफरत को भी पिघलाया जा सकता है। अपनी ननद कोमल से मुकाबला मत करो, बल्कि उसे अपनी छोटी बहन समझकर उसके साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाओ। उसकी पसंद-नापसंद का ख्याल रखो। जब वो देखेगी कि उसकी कड़वाहट के बदले तुम उसे प्यार दे रही हो, तो एक दिन उसकी अंतरात्मा भी जागेगी, जैसे आज तुम्हारी जागी है। और सबसे बड़ी बात, अंदर ही अंदर घुटने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। मैं तुम्हारी सिर्फ भाभी नहीं हूं, तुम्हारी बड़ी बहन हूं, तुम्हारी सहेली हूं। जब भी दिल भारी हो, बिना किसी झिझक के मुझे फोन कर लेना। मन की बात कह देने से बोझ आधा हो जाता है।”

 जमशेदपुर शहर के उस बड़े से मकान में शहनाइयों की गूंज हर कोने को गुंजायमान कर रही थी। बाहर बारात की गाड़ियां रुकने की आवाजें आने लगी थीं और बैंड-बाजे वालों ने अपनी धुन तेज कर दी थी। तभी कमरे का दरवाजा धड़धड़ाते हुए खुला और सरोज चाची हड़बड़ाती हुई अंदर दाखिल हुईं।

“अरे वंदना, हाथ जल्दी-जल्दी चला बहू! देख, बारात दरवाजे पर आ ही गई है। समधन जी और बाकी औरतें आगे स्वागत के लिए खड़ी हैं, और तू अभी तक शगुन की थाली सजाने में ही उलझी है?” सरोज चाची, जो रिश्ते में वंदना की चचेरी सास लगती थीं, चेहरे पर चिंता और घबराहट समेटे बोली जा रही थीं।

आज वंदना की छोटी ननद अंकिता की शादी थी। घर में कोई बड़ी सास नहीं थी, क्योंकि वंदना की शादी से करीब दो साल पहले ही उसकी सास का आकस्मिक देहांत हो चुका था। इसलिए रीति-रिवाजों और लेन-देन की बारीकियां समझाने का जिम्मा सरोज चाची ने ही उठा रखा था। वंदना के परिवार में उसके ससुर हरीश जी, पति कुणाल और ननद अंकिता ही थे।

हर नवविवाहिता की तरह वंदना भी जब इस घर में कदम रख रही थी, तो उसके मन में रंग-बिरंगे अरमान थे। उसने सोचा था कि मां के न होने से जिस घर में सूनापन आ गया है, वह अपनी ममता, सेवा और सलीके से उस सूनेपन को भर देगी। लेकिन ससुराल की दहलीज लांघते ही उसे समझ आ गया कि हकीकत किताबों या फिल्मों जैसी सीधी नहीं होती। मां के गुजर जाने के बाद से घर की पूरी बागडोर छोटी ननद अंकिता के हाथ में थी। अंकिता उम्र में ज्यादा बड़ी नहीं थी, लेकिन पूरे घर पर उसका एकछत्र राज चलता था। राशन की कौन सी दाल कब बनेगी से लेकर पिता और भाई की चाय का समय तक अंकिता ही तय करती थी।

शादी से पहले वंदना की सहेलियों और रिश्तेदारों ने उसे आगाह भी किया था कि जिस घर में बिन ब्याही ननद पहले से घर की मुखिया बनी बैठी हो, वहां अपनी जगह बनाना लोहे के चने चबाने जैसा होता है। पर वंदना ने इन बातों को हंसी में उड़ा दिया था। उसने सोचा था कि अंकिता बेचारी मां के साए से महरूम है, अगर वह उसे एक सहेली और बड़ी बहन जैसा प्यार देगी, तो दोनों मिलकर घर को स्वर्ग बना लेंगी।

मगर उसका यह भोला भ्रम पहले ही हफ्ते में चकनाचूर हो गया। अंकिता को वंदना की कोई भी पहल अपनी सल्तनत पर हमला लगती थी। अगर वंदना रसोई में कोई नया व्यंजन बना देती और ससुर जी या कुणाल उसकी जरा सी भी तारीफ कर देते, तो अंकिता का मुंह फूल जाता था। वह तंज कसने से नहीं चूकती थी, “हां भाई, अब तो नए लोगों का ही जमाना है। हम तो बस ऐसे ही इतने सालों से चूल्हा फूंक रहे थे, हमारे हाथ में तो कभी किसी को स्वाद लगा ही नहीं।”

कुणाल अपनी बहन के इस बर्ताव को उसका बचपना और मां के जाने का खालीपन समझकर हमेशा टाल देते थे। वंदना भी सब चुपचाप सह जाती थी। एक दिन की बात वंदना कभी नहीं भूली। उसने बहुत मन से पूरे परिवार के लिए कढ़ी बनाई थी। रसोई समेटकर जब वह पूजा करने गई, तो अंकिता ने पीछे से चुपके से उस कढ़ी में दो बड़े चम्मच भरकर नमक और लाल मिर्च झोंक दी।

दोपहर को जब सब खाना खाने बैठे, तो कुणाल ने पहला ही निवाला मुंह में लेते ही थूक दिया और पानी का गिलास मांगते हुए झुंझलाकर बोले, “वंदना! यह क्या बना दिया है? जरा देखकर काम किया करो, नमक की पूरी बोरी उड़ेल दी क्या? अंकिता भी तो खाना बनाती है, उससे कुछ सीखो। कभी नमक-मिर्च का संतुलन बिगड़ते देखा है उसके हाथ से?”

अंकिता ने प्लेट में रोटी तोड़ते हुए मासूमियत से कहा, “अरे भैया, भाभी पर इतना गुस्सा मत होइए। मैंने तो भाभी से कहा भी था कि मैं देख लेती हूं, पर भाभी बोलीं कि वो खुद ही सब कर लेंगी। मैंने तो बस थोड़ी मदद ही की थी।”

वंदना का दिल भीतर तक रो पड़ा। उसने गैस बंद करने से पहले खुद कढ़ी चखकर देखी थी, स्वाद बिल्कुल सही था। वह समझ गई कि यह किसकी करतूत है। लेकिन उसने उस वक्त कोई सफाई नहीं दी, न ही अंकिता पर कोई आरोप लगाया। उसने सोचा कि अगर वह कुछ कहेगी तो भाई-बहन के बीच अविश्वास की दरार पड़ जाएगी और घर का माहौल कलेश से भर जाएगा। वैसे भी अंकिता की शादी तय हो चुकी थी और वह चंद महीनों की मेहमान थी। वंदना ने मन ही मन खुद को समझाया कि कुछ दिनों की ही तो बात है, मुझे सब्र से काम लेना चाहिए।

आज वही अंकिता दुल्हन के लाल जोड़े में सजी बैठी थी। जयमाला, फेरे और कन्यादान के बाद जब विदाई का वक्त आया, तो पूरे आंगन में एक अजीब सा सन्नाटा और रुलाई घुल गई। ससुर हरीश जी का गला रुंधा हुआ था और कुणाल अपनी बहन को सीने से लगाकर आंसुओं को रोकने की नाकाम कोशिश कर रहे थे।

जब अंकिता की डोली उठने का समय आया, तो वंदना आगे बढ़ी। उसने अंकिता के सिर पर हाथ रखा और उसे कसकर गले से लगा लिया। अंकिता ने एक पल के लिए अपनी नजरें चुराईं, पर वंदना के चेहरे पर कोई मैल नहीं था। वंदना ने उसके कान में बहुत कोमल स्वर में कहा, “अंकिता, ससुराल तुम्हारा नया संसार है। वहां सास, ससुर और तुम्हारी एक ननद भी है। कभी किसी के लिए अपने मन में कोई कड़वाहट मत आने देना। बड़ों की डांट में भी अपनी भलाई ढूंढना और रिश्तों को संजोकर रखना। भगवान करे तेरी झोली हमेशा खुशियों से भरी रहे।” अंकिता ने बिना कुछ कहे सिर्फ सिर हिलाया और ससुराल के लिए रवाना हो गई।

अंकिता के ससुराल में उसके ससुर, एक कड़क स्वभाव की सास और उसकी समवयस्क ननद कोमल थी। वहां मां और बेटी एक तरफ थीं और अंकिता अकेली। शादी के कुछ ही हफ्तों बाद जब अंकिता पहली बार पगफेरे की रस्म के लिए मायके आई, तो वंदना ने गौर किया कि उसके चेहरे से वह पुरानी चमक और चंचलता गायब थी। वह बहुत बुझी-बुझी और सहमी सी लग रही थी।

वंदना ने जब कमरे में जाकर पूछा, “अंकिता, सब ठीक तो है ना वहां? तबीयत तो ठीक है तुम्हारी?” तो अंकिता ने नजरें फेरते हुए रूखेपन से कह दिया, “हां भाभी, सब ठीक है। नए घर में थोड़ा समय तो लगता ही है।” वंदना ने बात को ज्यादा कुरेदना ठीक नहीं समझा, पर उसे अंकिता की यह चुप्पी अंदर ही अंदर खटक रही थी।

दिन बीतते गए और फागुन का महीना आ गया। शादी के बाद अंकिता की यह पहली होली थी और रीति के अनुसार वह मायके आई हुई थी। सुबह से ही घर के बाहर अबीर-गुलाल उड़ रहा था। मोहल्ले के लोग, कुणाल और उसके दोस्त सब आंगन में ढोल की थाप पर नाच रहे थे। चारों तरफ हंसी-ठहाकों की गूंज थी। वंदना सुबह से ही रसोई में पसीने से तर-बतर होकर गुजिया, नमकीन और ठंडाई बनाने में जुटी हुई थी। उसके हाथों में मैदा और खोया लगा हुआ था।

तभी हल्के कदमों की आहट हुई और अंकिता रसोई की चौखट पर आकर खड़ी हो गई। उसने देखा कि वंदना अकेले ही चूल्हे की तपिश में जल रही है और बाकी पूरा घर होली के जश्न में डूबा है। अंकिता आगे बढ़ी, उसने धीरे से वंदना के हाथ से करछुल ले ली और बोली, “भाभी… चलिए, आप भी बाहर जाकर रंग खेलिए। भैया और पापा आपको बुला रहे हैं। यह सब गुजिया और पकौड़े बाद में हम दोनों मिलकर तल लेंगे।”

वंदना को एक पल के लिए अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। वह हक्की-बक्की होकर अंकिता का चेहरा देखने लगी। यह वही अंकिता थी जिसने पिछले साल की होली पर जब वंदना ने जरा सा गुलाल कुणाल के गालों पर लगा दिया था, तो पूरे घर के सामने तमाशा खड़ा कर दिया था और कहा था कि ‘मां के जाने का कोई गम ही नहीं है, भाभी को तो बस सजने और हुड़दंग मचाने की पड़ी है, कितनी बेशर्म हैं।’ आज वही अंकिता खुद उसे रंग खेलने के लिए बाहर भेज रही थी?

वंदना ने कुछ नहीं कहा, बस हल्की सी मुस्कान के साथ अपने हाथ धोए और बाहर चली गई। लेकिन अंकिता के इस बदले हुए व्यवहार ने वंदना के मन में कई सवाल खड़े कर दिए थे।

रात को जब सब मेहमान चले गए, घर का सारा काम निबट गया और सन्नाटा छा गया, तो वंदना एक गिलास गर्म दूध लेकर अंकिता के कमरे में गई। अंकिता खिड़की के पास खड़ी बाहर अंधेरे को निहार रही थी।

वंदना ने दूध की मेज पर रखा और उसके कंधे पर प्यार से हाथ रखा, “अंकिता, अब मुझसे मत छुपाओ। पिछले दो दिनों से मैं देख रही हूं, तुम वो अंकिता नहीं हो जो यहां से विदा होकर गई थी। तुम्हारी ससुराल में सब कुछ ठीक तो है ना? तुम्हारा यह बदला हुआ रूप, तुम्हारी यह उदासी… मुझे बहुत बेचैन कर रही है।”

वंदना का इतना कहना था कि अंकिता के सब्र का बांध टूट गया। उसने वंदना की छाती से अपना सिर टिका दिया और फूट-फूट कर रोने लगी। उसकी सिसकियों से पूरा कमरा भर गया। वंदना उसके सिर पर हाथ फेरती रही और उसे शांत होने का वक्त दिया।

कुछ देर बाद अंकिता ने आंसुओं से भीगा चेहरा ऊपर उठाया और हाथ जोड़कर बोली, “भाभी… मुझे माफ कर दीजिए। मैं बहुत पापिनी हूं। मैंने आपके साथ बहुत बुरा बर्ताव किया। किसी ने सच ही कहा है कि इंसान जो बोता है, वही काटता है। कर्म घूमकर अपनी ही चौखट पर वापस आते हैं।”

वंदना ने हैरान होकर पूछा, “क्या हुआ अंकिता? खुलकर बताओ, बात क्या है?”

अंकिता सिसकते हुए कहने लगी, “भाभी, मेरी ससुराल में मेरी सास और मेरी ननद कोमल… वो दोनों मिलकर मुझे एक पल भी चैन से जीने नहीं देतीं। मैं सुबह पांच बजे उठकर रात के बारह बजे तक खटती हूं, पर हर काम में खोट निकाला जाता है। पिछले हफ्ते मैंने बहुत जतन से खीर बनाई थी, कोमल ने उसमें जानबूझकर नमक डाल दिया और मेरी सास ने पूरे खानदान के सामने मुझे गवार और बदतमीज कहकर जलील किया। मेरे पति भी अपनी मां और बहन की बातों में आकर मुझ पर ही बरस पड़े। उस दिन मुझे याद आया भाभी… ठीक वही काम मैंने आपके साथ किया था! जब मैंने कढ़ी में नमक मिलाया था और भैया ने आपको डांटा था, तब आपके दिल पर क्या गुजरी होगी, इसका अंदाजा मुझे आज हुआ है।”

अंकिता की आंखें पश्चाताप की आग में जल रही थीं। वह आगे बोली, “भाभी, जब मेरी सास मुझे बात-बात पर ताने देती हैं, मुझे मायके की दुहाई देकर नीचा दिखाती हैं, तो मेरा दम घुटने लगता है। मैं सोचती हूं कि आप कैसे मेरी सारी ज्यादतियों को एक मीठी मुस्कान के पीछे छुपा लेती थीं? आपने कभी भैया से मेरी शिकायत क्यों नहीं की? आपने कभी पापा के कान क्यों नहीं भरे? भाभी, मैं अंदर ही अंदर घुट रही हूं। मुझसे यह अपमान सहा नहीं जाता, और अगर मैं कुछ बोलती हूं तो बात और बिगड़ जाती है। मुझे लगता है कि मैं अपनी ही नफरत के जाल में फंस गई हूं।”

वंदना की आंखें भी नम हो गईं। उसने आगे बढ़कर अंकिता के दोनों हाथ अपने हाथों में थाम लिए और उसके आंसू पोंछते हुए बड़े धीरज से बोली, “अंकिता, सुनो मेरी बात। जो बीत गया, उसे भूल जाओ। तुमने जो किया, वह तुम्हारा बचपना था, तुम्हारी नासमझी थी। तुमने अपनी मां को खोया था, तुम्हें लगता था कि कोई पराई औरत आकर तुम्हारा हक छीन लेगी। मैंने तुम्हारी उस नादानी को कभी दिल से नहीं लगाया, तो फिर आज तुम खुद को दोषी मानकर क्यों घुट रही हो?”

अंकिता ने रोते हुए कहा, “तो फिर मैं क्या करूं भाभी? वहां सब मुझे पराया समझते हैं।”

वंदना ने उसे समझाते हुए कहा, “अंकिता, ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती, और रिश्ते एक दिन में नहीं बनते। जैसे तुमने मुझे अपना मानने में वक्त लिया और जब खुद पर बीती तब मेरी कद्र समझी, वैसे ही तुम्हारी सास और ननद को भी तुम्हें समझने में थोड़ा वक्त लगेगा। वे दोनों भी तो सालों से उस घर को अपनी मर्जी से चला रही थीं। अचानक एक नई लड़की के आ जाने से उन्हें भी असुरक्षा महसूस होती होगी। तुम उनके तानों का जवाब तानों से मत दो। अगर वो कड़वाहट घोलें, तो तुम अपनी मिठास मत छोड़ो।”

“पर भाभी, कब तक सहूं?” अंकिता ने बेबसी से पूछा।

“सहना नहीं है, जीतना है,” वंदना ने आत्मविश्वास से कहा। “अच्छे व्यवहार और धैर्य से बड़ी से बड़ी नफरत को भी पिघलाया जा सकता है। अपनी ननद कोमल से मुकाबला मत करो, बल्कि उसे अपनी छोटी बहन समझकर उसके साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाओ। उसकी पसंद-नापसंद का ख्याल रखो। जब वो देखेगी कि उसकी कड़वाहट के बदले तुम उसे प्यार दे रही हो, तो एक दिन उसकी अंतरात्मा भी जागेगी, जैसे आज तुम्हारी जागी है। और सबसे बड़ी बात, अंदर ही अंदर घुटने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। मैं तुम्हारी सिर्फ भाभी नहीं हूं, तुम्हारी बड़ी बहन हूं, तुम्हारी सहेली हूं। जब भी दिल भारी हो, बिना किसी झिझक के मुझे फोन कर लेना। मन की बात कह देने से बोझ आधा हो जाता है।”

अंकिता ने भरी आंखों से वंदना की ओर देखा। उसे वंदना के चेहरे पर कोई बनावट या प्रतिशोध की भावना नहीं दिखी, बल्कि वहां सिर्फ निस्वार्थ प्रेम और समझदारी का समंदर लहरा रहा था।

अंकिता के चेहरे पर एक हल्की सी सुकून भरी मुस्कान तैर गई। उसने वंदना के गले में बाहें डाल दीं और भावुक होकर बोली, “भाभी, मैं कितनी अंधी थी जो इतने दिनों तक आपके भीतर की इस ममता को नहीं देख पाई। भगवान ने मुझसे मेरी मां छीनी थी, पर आपके रूप में मुझे मां, बहन और सबसे अच्छी सहेली एक साथ लौटा दी। मैं सच में बहुत खुशनसीब हूं कि मुझे आप जैसी भाभी मिली।”

वंदना ने हंसते हुए अंकिता की पीठ पर हल्की सी चपत लगाई और बोली, “बस, बस… अब ज्यादा फिल्मी डायलॉग मत मारो, नहीं तो मेरी आंखों का काजल भी बह जाएगा और सुबह भैया पूछेंगे कि रात भर दोनों ननद-भाभी ने कौन सा रोने का मुकाबला किया था!”

दोनों खिलखिलाकर हंस पड़ीं। उस हंसी में सालों की कड़वाहट, असुरक्षा और गलतफहमियां हमेशा-हमेशा के लिए बह गईं। कमरे की खिड़की से आती ताजी बयार में अब कोई चुभन नहीं थी, बल्कि उसमें आने वाले एक खूबसूरत और सुलझे हुए कल की महक थी।

अक्सर जब हम किसी रिश्ते में अधिकार जताने की होड़ में लग जाते हैं, तो सामने वाले की भावनाओं को कुचल देते हैं। पर सच यही है कि कड़वाहट का जवाब कड़वाहट नहीं, बल्कि धैर्य और बड़प्पन ही होता है। क्या आपको भी लगता है कि अगर हर घर में वंदना जैसी समझदार भाभी और अंकिता जैसी अपनी भूल सुधारने वाली ननद हो, तो कोई भी परिवार टूटने से बच सकता है? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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नीलम शर्मा

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