चूड़ियों की खनक और सधी हुई डोर

“मम्मी, आज आपने मेरी आंखें खोल दीं,” शालिनी का गला भर आया। “मैं अपनी कड़वाहट को सही मानकर बैठ गई थी और सोच रही थी कि जो दर्द मैंने सहा, उसी रास्ते से सबको गुजरना चाहिए। मैं भूल गई थी कि परंपराएं तकलीफ़ की नहीं, प्यार की आगे बढ़नी चाहिए। आपने बिल्कुल सच कहा, घर की बागडोर सौंपने का मतलब सिर्फ चाबियां देना नहीं होता, बल्कि सामने वाले को इस काबिल बनाना होता है कि वह उन चाबियों का बोझ नहीं, बल्कि उनका मान समझ सके।”

  घर में पिछले पंद्रह दिनों से चल रही शादी की गहमागहमी अब जाकर शांत हुई थी। रिश्तेदार अपने-अपने घरों को लौट चुके थे, लाउडस्पीकर का शोर थम चुका था और आंगन में बिछी दरियां समेट दी गई थीं। घर के बड़े बेटे मयंक का विवाह बड़े ही धूमधाम से अनामिका के साथ संपन्न हुआ था। अब घर में केवल परिवार के सदस्य ही बचे थे—घर की बड़ी मालकिन जानकी देवी, उनका बेटा मयंक, नई नवेली बहू अनामिका और जानकी देवी की शादीशुदा बेटी शालिनी, जो अपने दो छोटे बच्चों के साथ मायके आई हुई थी।

आज दोपहर की ट्रेन से शालिनी को भी अपने ससुराल रायपुर लौटना था। उसका सूटकेस हॉल में पैक होकर रखा था। मयंक स्टेशन से टिकट और कुछ सामान लेने गया हुआ था, जबकि अनामिका रसोई में सबके लिए दोपहर के भोजन की तैयारी कर रही थी। जानकी देवी बरामदे में बैठी मेथी की भाजी साफ कर रही थीं।

शालिनी ने जब अपनी मां को इस उम्र में भी भाजी बीनते और रसोई की तरफ कान लगाए देखा, तो वह पास आकर बैठ गई। उसने मां के हाथों से मेथी की गड्डी ले ली और प्यार भरे उलहाने के साथ बोली, “अरे मम्मी, अब तो बस करो! बाल धूप में सफेद नहीं हुए हैं आपके, पूरी जिंदगी इसी चौके-चूल्हे में खपा दी। अब जब मयंक की शादी हो गई, घर में पढ़ी-लिखी सलीकेदार बहू आ गई है, तो आपको यह सब करने की क्या जरूरत है? चाबियों का गुच्छा अनामिका की हथेली पर रखिए और अब आप आराम से बैठिए। चार धाम की यात्रा की योजना बनाइए, सहेलियों के साथ सत्संग जाइए। घर-गृहस्थी के इस झमेले से अब तो संन्यास ले लीजिए।”

जानकी देवी ने अपनी बेटी के चेहरे पर फैली चिंता और प्यार को देखा, फिर मंद-मंद मुस्कुराते हुए बोलीं, “घूमना-फिरना भी होगा बिटिया, तीर्थ यात्रा भी कहीं भागी नहीं जा रही है। पर अभी मेरी असली जिम्मेदारी खत्म कहां हुई है? अनामिका इस घर में नई है। उसे इस चौखट, यहां के तौर-तरीकों और रसोई के बर्तनों से लेकर हर इंसान के मिजाज को समझने में थोड़ा वक्त तो लगेगा न? अभी से उसके सिर पर जिम्मेदारियों की पूरी गठरी लाद दूंगी, तो वह घबरा जाएगी। पहले उसे यह घर अपना तो लगने दूं, फिर आराम ही आराम है।”

शालिनी ने थोड़ा चिढ़ते हुए कहा, “मम्मी, आप जरूरत से ज्यादा भोली हैं। आज के जमाने की लड़कियां बहुत होशियार होती हैं। अगर आप शुरू से ही उसका हाथ बंटाती रहेंगी और लाड़-दुलार दिखाएंगी, तो वह कभी पूरी जिम्मेदारी अपने कंधे पर नहीं लेगी। जब तक इंसान पर खुद नहीं पड़ती, वह कुछ नहीं सीखता। आप पीछे हटेंगी, तभी तो वह आगे आएगी। कहीं ऐसा न हो कि आपकी इस भलाई का फायदा उठाकर वह आपको ही जिंदगी भर उलझाए रखे।”

जानकी देवी ने मेथी की पत्तियों को टोकरी में डालते हुए अपनी बेटी की आंखों में देखा। उनका स्वर बहुत शांत और गहरा था, “शालिनी, जिम्मेदारी कोई सजा नहीं होती जिसे किसी के सिर पर पटक दिया जाए। अनामिका शहर के एक अच्छे कॉलेज में प्रोफेसर है, पढ़ी-लिखी है, उसने किताबों में दुनिया देखी है, पर एक भरे-पूरे परिवार को जोड़कर चलाने की तालीम किसी यूनिवर्सिटी की डिग्री में नहीं मिलती। मायके में उसने सिर्फ पढ़ाई और अपने करियर पर ध्यान दिया, वहां उसे दाल में नमक का अंदाज लगाने की फुरसत कहां मिली होगी? अब अगर आते ही मैं उससे उम्मीद करूं कि वह एक मंझे हुए खिलाड़ी की तरह सब संभाल ले, तो यह उसके साथ ज्यादती होगी।”

शालिनी का चेहरा अतीत की किसी कड़वी याद से खिंच गया। उसके माथे पर शिकन उभर आई। उसने भारी मन से कहा, “तो क्या हुआ मम्मी? जब मेरी शादी हुई थी, तो मुझे कौन सा खाना बनाना या घर संभालना आता था? मैं भी तो कुछ नहीं जानती थी। पर क्या मेरी सासू जी ने मुझे सिखाया? शादी के तीसरे ही दिन उन्होंने पूजा की थाली मेरे हाथ में थमाई और ऐलान कर दिया कि आज से रसोई तुम्हारी है। मुझसे दाल जल जाती, तो पूरे घर के सामने फजीहत होती थी। चाय में शक्कर कम हो जाती, तो बातें सुनने को मिलती थीं कि ‘मां-बाप ने बेटी को विदा तो कर दिया, पर तमीज और सलीका सिखाना भूल गए।’ मैंने रो-रोकर, ताने सह-सहकर सब सीखा। आज मैं पूरा घर अकेले संभालती हूं, कोई उंगली नहीं उठा सकता। काम अपने आप सिखा देता है, मम्मी।”

जानकी देवी ने अपनी बेटी का हाथ अपने हाथों में ले लिया। शालिनी के हाथों में मां का स्पर्श पाकर हल्की सी कंपकंपी हुई।

जानकी देवी ने बड़े वात्सल्य से कहा, “यही तो बात है शालिनी। तू आज रायपुर में अपना घर बहुत शानदार तरीके से चला रही है, दावतें संभालती है, सबकी पसंद-नापसंद का ख्याल रखती है, पर सच-सच बता, क्या तेरे दिल में अपनी सास के लिए वह प्यार और सम्मान है जो एक मां के लिए होना चाहिए?”

शालिनी की नजरें झुक गईं। वह कुछ पल खामोश रही, फिर दबी जुबान से बोली, “सच कहूं मम्मी, तो नहीं। उनके सामने मैं सारे फर्ज निभाती हूं, सेवा भी करती हूं, पर मन के किसी कोने में वो पुराने ताने आज भी चुभते हैं। जब भी वो कोई फरमाइश करती हैं, तो मन में वही पुराने दिन याद आ जाते हैं जब मैं रसोई में जलती हुई उंगलियां लेकर रोती थी और वो बाहर बैठकर मेरी कमियां गिनती थीं। मैं उनके प्रति कर्तव्य तो निभाती हूं, पर दिल से जुड़ाव कभी महसूस नहीं कर पाई।”

“बस, यही मैं नहीं चाहती,” जानकी देवी ने शालिनी के गाल को सहलाते हुए कहा। “मैं नहीं चाहती कि कल को अनामिका जब घर की पूरी जिम्मेदारी संभाल ले, तो उसके मन में मेरे लिए वही कड़वाहट और फांस रह जाए जो आज तेरे मन में अपनी सास के लिए है। बेटा, इंसान काम तो वक्त के साथ सीख ही जाता है। जरूरत पड़ने पर तो कोई भी इंसान रोटी बेलना, सब्जी छौंकना सीख लेगा, पर उसने वो काम किस माहौल में और किन परिस्थितियों में सीखा, यह बात उसकी रूह पर छप जाती है। अगर वह डर, अपमान और तानों के साए में सीखेगी, तो वह इस घर को सिर्फ एक ड्यूटी समझेगी, अपना घोंसला नहीं। और अगर वह प्यार, मार्गदर्शन और अपनेपन के बीच सीखेगी, तो वह इस घर को दिल से अपनाएगी।”

शालिनी अपनी मां की बातें सुनकर अवाक रह गई। जानकी देवी आगे बोलीं, “जब एक नई लड़की विदा होकर आती है, तो वह अपना पूरा संसार, अपने माता-पिता, अपनी आदतें पीछे छोड़ आती है। यहां सब नया होता है। अगर इस नए माहौल में उसे सास के रूप में एक सहेली और मां मिल जाए, जो उसकी गलतियों पर पर्दा डालकर उसे सही तरीका बताए, तो उसका आत्मविश्वास दोगुना हो जाता है। अगर खीर में शक्कर कम हो जाए और मैं सबके सामने कह दूं कि ‘अरे, आजकल तो वैसे भी कम मीठा खाना सेहत के लिए अच्छा है, अगली बार अनामिका थोड़ी और डाल देगी’, तो सोच उसके दिल में मेरे लिए कितनी इज्जत बढ़ेगी? रिश्तों की नींव डर से नहीं, भरोसे से मजबूत होती है।”

तभी रसोई से कुकर की सीटी बजी और थोड़ी ही देर में अनामिका एक बड़ी सी ट्रे में सबके लिए गरमा-गरम कढ़ी-चावल और सलाद लेकर बाहर आई। उसकी साड़ी का पल्लू कमर में बंधा हुआ था और माथे पर पसीने की हल्की बूंदें थीं, पर चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान थी।

“मां जी, दीदी… खाना लग गया है। मां जी, आपने जैसा बताया था, कढ़ी में मेथी दाने और कढ़ी पत्ते का छौंक बिल्कुल वैसे ही लगाया है, पर एक बार आप चखकर देख लीजिए, कहीं नमक-मिर्च ऊपर-नीचे न हो गया हो,” अनामिका ने संकोच और आदर से कहा।

जानकी देवी ने मुस्कुराते हुए चम्मच से कढ़ी चखी और उसकी पीठ थपथपाते हुए बोलीं, “अरे वाह अनामिका! स्वाद तो बिल्कुल वैसा ही बैठा है जैसा हमारे घर में सबको पसंद है। बस थोड़ी सी हींग अगली बार तेल में पहले डालना, खुशबू और निखर कर आएगी। बाकी तो पहली बार में ही तुमने कमाल कर दिया।”

अनामिका के चेहरे पर एक गजब का सुकून और खुशी तैर गई। उसने कृतज्ञ भाव से कहा, “थैंक यू मां जी! जब आप पास खड़ी रहती हैं, तो मुझे डर नहीं लगता कि कुछ बिगड़ जाएगा। मुझे लगता है कि कोई गलती होगी भी तो आप संभाल लेंगी।”

शालिनी यह सब चुपचाप देख रही थी। उसने देखा कि अनामिका की आंखों में अपनी सास के लिए कोई हिचक या डर नहीं था, बल्कि एक गहरा विश्वास और सम्मान था। अनामिका खाना परोसकर जब बच्चों को देखने अंदर गई, तो शालिनी ने नम आंखों से अपनी मां को देखा।

“मम्मी, आज आपने मेरी आंखें खोल दीं,” शालिनी का गला भर आया। “मैं अपनी कड़वाहट को सही मानकर बैठ गई थी और सोच रही थी कि जो दर्द मैंने सहा, उसी रास्ते से सबको गुजरना चाहिए। मैं भूल गई थी कि परंपराएं तकलीफ़ की नहीं, प्यार की आगे बढ़नी चाहिए। आपने बिल्कुल सच कहा, घर की बागडोर सौंपने का मतलब सिर्फ चाबियां देना नहीं होता, बल्कि सामने वाले को इस काबिल बनाना होता है कि वह उन चाबियों का बोझ नहीं, बल्कि उनका मान समझ सके।”

जानकी देवी ने हंसते हुए कहा, “चल पगली, अब ज्यादा भावुक मत हो। जब तू दो महीने बाद सर्दियों की छुट्टियों में आएगी न, तब देखना, तेरी यह भाभी पूरे घर को कितनी खूबसूरती से संभालती मिलेगी। और तब मैं आराम से धूप सेकते हुए तेरे बच्चों को कहानियां सुनाऊंगी।”

“हां मां, मुझे पूरा यकीन है। जिसकी सास इतनी ममतामयी और समझदार हो, उस घर की बहू कभी पराई हो ही नहीं सकती,” शालिनी ने मुस्कुराते हुए कहा।

मयंक के गाड़ी का हॉर्न बाहर बजा। वह स्टेशन से आ चुका था। शालिनी के जाने का वक्त हो गया था। विदाई के समय अनामिका ने झुककर शालिनी के पैर छुए और अपने हाथों से पैक किया हुआ नाश्ते का डिब्बा उसके हाथ में दिया, “दीदी, रास्ते के लिए मैंने आपके पसंदीदा बेसन के लड्डू और मठरी रख दी है। मां जी ने कहा था कि आपको यह बहुत पसंद है।”

शालिनी ने अनामिका को गले से लगा लिया। इस बार उसके आलिंगन में कोई औपचारिकता नहीं थी, बल्कि एक नई शुरुआत का सच्चा स्नेह था। गाड़ी में बैठते हुए शालिनी ने मुड़कर देखा—मां और बहू एक-दूसरे के कंधे पर हाथ रखे मुस्कुराते हुए उसे विदा कर रही थीं। बिलासपुर की दोपहर की धूप में वह घर किसी मंदिर की तरह शांत और पावन लग रहा था। शालिनी मन में एक सकारात्मक सोच, ससुराल के प्रति अपने नजरिए को बदलने का संकल्प और मायके की इस खूबसूरत सीख को दिल में संजोए रायपुर के लिए रवाना हो गई।

क्या एक सास का शुरुआत में मां बनकर सहारा देना, भविष्य में एक मजबूत और खुशहाल परिवार की सबसे बड़ी नींव बन सकता है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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