मान की डोर

 शौर्य की इस अगाध विनम्रता, बड़प्पन और मीठी वाणी ने उस कमरे में जमी सारी बर्फ को एक ही झटके में पिघला दिया। फूफाजी, जो बरसों से अपनी कड़क मिजाजी के लिए जाने जाते थे, उनका दिल भी इस नौजवान के आगे पिघल गया। उनका कठोर चेहरा एक आत्मीय मुस्कान में बदल गया। उन्होंने अपनी लाठी एक तरफ रखी और दोनों बाहें फैलाकर शौर्य को अपने सीने से लगा लिया।

“धन्य हैं तुम्हारे माता-पिता, जिन्होंने तुम्हें इतने सुंदर संस्कार दिए हैं बेटा!” फूफाजी की आवाज में स्नेह का समंदर उमड़ पड़ा। “आज की पीढ़ी में अपने स्वाभिमान को बड़ों के सम्मान के आगे झुकाने का हौसला बहुत कम नौजवानों में होता है। मुझे अपनी मर्यादा प्यारी थी, लेकिन तुम्हारी इस समझदारी ने मेरा दिल जीत लिया। हरिमोहन, तुमने अपनी फूल जैसी बच्ची के लिए हीरा चुना है, बिल्कुल सच्चा हीरा!”

  शौर्य और अनन्या की सगाई को बीते अभी चार महीने ही हुए थे। यह वह दौर था जब दो अलग-अलग परिवेश में पले-बढ़े इंसान धीरे-धीरे एक-दूसरे के स्वभाव, आदतों और अनकहे जज़्बातों को समझना शुरू करते हैं। दोनों परिवारों की रजामंदी और बड़े ही हर्षोल्लास के साथ यह संबंध तय हुआ था। अनन्या के माता-पिता बेहद सुलझे और प्रगतिशील विचारों के धनी थे, इसलिए उन्होंने कभी दोनों के मिलने-जुलने पर कोई बेजा पाबंदी नहीं लगाई थी। कभी वीकेंड पर किसी शांत कैफे में बैठकर घंटों बातें करना, कभी शादी के लिए साड़ियों और आभूषणों की दुकानों के चक्कर काटना, तो कभी शाम ढले जुबली पार्क के किनारे टहलते हुए भविष्य के सपने बुनना—यह सब उनके जीवन का एक सहज और खूबसूरत हिस्सा बन चुका था। दोनों के बीच एक गहरा विश्वास पनप रहा था कि आने वाली जिंदगी बेहद खूबसूरत होगी।

अनन्या को कला, थिएटर और रंगमंच से गहरा लगाव था। शहर के सबसे प्रतिष्ठित सभागार में एक ऐतिहासिक नाटक का मंचन होने वाला था, जिसके निर्देशक और कलाकार राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त थे। पूरे शहर में उस नाटक के टिकटों को लेकर जबर्दस्त मारामारी थी। शौर्य जानता था कि अनन्या इस नाटक को देखने के लिए कितनी बेताब थी। उसने अपने संपर्कों का इस्तेमाल कर काफी मशक्कत के बाद पहली पंक्ति के दो विशेष पास हासिल किए थे। वह अनन्या को एक सुखद आश्चर्य देना चाहता था। शाम के वक्त शौर्य इत्र की भीनी महक बिखेरते हुए, करीने से तैयार होकर अनन्या के घर पहुंचा। उसके चेहरे पर उत्साह था और जेब में वे दो कीमती पास।

लेकिन जैसे ही शौर्य ने घर के मुख्य द्वार पर कदम रखा, उसे माहौल में एक अजीब सा खिंचाव महसूस हुआ। रोज की तरह दरवाजे पर चहकती हुई अनन्या का स्वागत नहीं मिला, न ही उसके पिता की वह खिलखिलाती हुई आवाज सुनाई दी जो हर बार कहते थे, “आइए शौर्य जी, आज चाय हमारे साथ ही होगी।” ड्राइंग रूम में सोफे पर एक वृद्ध सज्जन खादी का सफेद कुर्ता-पायजामा पहने, चेहरे पर गहरी गंभीरता ओढ़े बैठे थे। वे अनन्या के बड़े फूफाजी थे, जो बिहार के अपने पैतृक गांव से अचानक शहर आ पहुंचे थे। अनन्या के पिता, हरिमोहन जी, चुपचाप सिर झुकाए एक कोने में खड़े थे। उनकी आंखों में एक अजीब सी लाचारी तैर रही थी, मानो वे शौर्य से नजरें मिलाने से कतरा रहे हों।

शौर्य ने उत्साह से मुस्कुराते हुए हाथ में पकड़े पास दिखाए और कहा, “अंकल, आज नाटक का समय थोड़ा पहले है, इसलिए हम लोग जल्दी निकलेंगे ताकि जाम में न फंसें।”

इससे पहले कि हरिमोहन जी कुछ कह पाते, फूफाजी ने अपना भारी चश्मा ठीक करते हुए अपनी लाठी फर्श पर ठोंकी। उनकी आवाज में एक तीखापन था, “सुनिए नौजवान! हमारे यहां सगाई का अर्थ फेरे नहीं होता। सगाई महज एक वचन है, कोई पक्का बंधन नहीं। जब तक मंडप में पंडित जी मंत्र पढ़कर कन्यादान न करवा दें, तब तक बेटी का इस तरह पराए लड़के के साथ रात-बिरात घूमना खानदान की मर्यादा और इज्जत को मिट्टी में मिलाना है।”

शौर्य के पैरों तले से जमीन खिसक गई। उसे लगा जैसे किसी ने सरेआम उसके मुंह पर तमाचा जड़ दिया हो। उसने अचरज और सवालिया नजरों से हरिमोहन जी की तरफ देखा, यह उम्मीद करते हुए कि वे अपनी बेटी और उसके बीच की समझ का बचाव करेंगे। लेकिन हरिमोहन जी ने खामोशी से अपनी पलकें झुका लीं, उनके होंठ सिले हुए थे। तभी शौर्य की नजर बैठक के पर्दे के पीछे गई, जहां अनन्या खड़ी थी। उसके गाल आंसुओं से भीगे हुए थे और वह अपनी सिसकियों को दबाने की नाकाम कोशिश कर रही थी।

जिस घर में कल तक उसका स्वागत एक बेटे की तरह होता था, वहां एक पल में उसे बेगाना और मर्यादा का भंजक साबित कर दिया गया था। शौर्य के आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुंची। उसके पौरुष और स्वाभिमान ने उसे वहां एक पल भी रुकने की इजाजत नहीं दी। वह बिना कुछ कहे, तमतमाते चेहरे के साथ पीछे मुड़ा। गेट से बाहर निकलते ही उसने अपनी जेब से वे दोनों बेशकीमती पास निकाले, गुस्से से कांपते हाथों से उनके अनगिनत टुकड़े किए और हवा में उछाल दिए। गाड़ियों के शोर के बीच वह अपनी कार में बैठा और तेजी से एक्सीलेटर दबा दिया।

घर पहुंचते ही शौर्य ने गाड़ी का दरवाजा इतनी जोर से बंद किया कि उसकी आवाज अंदर तक गई। ड्राइंग रूम में उसकी माँ, सावित्री जी, जो भगवान की आरती करने के बाद बैठी थीं, चौंक पड़ीं। शौर्य के चेहरे पर लालिमा थी और उसकी मुट्ठियां खिंची हुई थीं।

“क्या हुआ शौर्य? तुम तो नाटक देखने जाने वाले थे? अनन्या की तबीयत तो ठीक है न?” सावित्री जी ने बेटे के चेहरे का तनाव भांपते हुए फिक्र से पूछा।

“तबीयत उसकी नहीं माँ, उनके पूरे खानदान की खराब है!” शौर्य ने जूते उतारकर एक कोने में फेंकते हुए कड़वाहट से कहा।

“यह कैसी भाषा है शौर्य? क्या बात हुई है, साफ-साफ बताओ।” सावित्री जी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

“माँ, उनके घर में अचानक से संस्कारों और मर्यादा का नया नाटक शुरू हो गया है। गांव से उनके कोई बड़े फूफाजी पधारे हैं। मुझे दरवाजे पर ही रोक दिया गया और ऐसे प्रवचन दिए गए जैसे मैं कोई सड़क छाप आवारा हूं जो उनकी बेटी को बहला-फुसलाकर ले जा रहा था। मुझे साफ कह दिया गया कि शादी से पहले लड़की का मंगेतर के साथ बाहर जाना खानदान की नाक कटवाने जैसा है।” शौर्य सोफे पर गिरते हुए बोला, “और सबसे ज्यादा शर्मनाक बात यह थी कि अंकल, जो रोज मेरे साथ बैठकर जिंदगी के फलसफे बतियाते थे, वे भी चुपचाप बुत बनकर खड़े रहे। किसी ने मेरा पक्ष नहीं लिया। अगर उन्हें अपनी इसी रूढ़िवादिता पर इतना गर्व था, तो पहले दिन ही मुझे बता देते। मुझे कोई शौक नहीं था वहां जाकर अपनी बेइज्जती करवाने का!”

सावित्री जी ने एक गहरी सांस ली। वे रसोई से पानी का एक गिलास लेकर आईं और शौर्य के सामने रख दिया। “पानी पियो पहले।”

“मुझे पानी नहीं चाहिए माँ, मुझे बस यह समझ नहीं आ रहा कि लोग इतने दोमुंहे कैसे हो सकते हैं!” शौर्य ने मुंह फेर लिया।

सावित्री जी उसके बगल में बैठ गईं और बहुत ही ममता भरे स्वर में बोलीं, “शौर्य, जब दिल में चोट लगती है और अहंकार घायल होता है, तो इंसान को सिर्फ अपनी तकलीफ दिखाई देती है। क्या तूने ठंडे दिमाग से यह सोचा कि उस वक्त उस चौखट के भीतर अनन्या और उसके पिता पर क्या गुजर रही होगी?”

शौर्य ने तुनक कर कहा, “अनन्या भी तो बोल सकती थी? वह पढ़ी-लिखी है, आत्मनिर्भर है। क्या वह अपने फूफाजी से यह नहीं कह सकती थी कि हम कोई गलत काम नहीं कर रहे?”

“यही तो तुम्हारी उम्र का उतावलापन है बेटा,” माँ ने उसके बालों में उंगलियां फेरते हुए समझाया। “तुम सोचते हो कि हर मतभेद का हल बगावत और तीखे जवाब से ही निकलता है। जरा हरिमोहन जी के नजरिए से सोचो। उन्होंने तुम्हें अपनी बेटी का हाथ सौंपा, तुम दोनों को पूरी आजादी दी क्योंकि उन्हें तुम पर और अपनी परवरिश पर पूरा भरोसा था। लेकिन हमारे समाज में कुछ बुजुर्ग ऐसे होते हैं जिनकी जड़ें पुरानी मान्यताओं में बहुत गहरी होती हैं। अगर हरिमोहन जी उस वक्त फूफाजी के सामने अड़ जाते और तुम्हें भेज देते, तो तुम्हारी शाम तो बन जाती, लेकिन तुम्हारे जाने के बाद उस घर में क्या होता? फूफाजी पूरे खानदान में यह बात फैलाते कि बेटी हाथ से निकल गई है, बाप संस्कारों को भूल गया है। वे हर बात पर ताने देते। हरिमोहन जी ने तुम्हें नहीं रोका, बल्कि अपनी बेटी को अपनों की ही चुभती बातों और तानों से सुरक्षित किया है।”

माँ की एक-एक बात शौर्य के सीने में सीधे उतर रही थी। उसके गुस्से की धधकती आग पर जैसे किसी ने सुकून का जल छिड़क दिया हो। उसे तुरंत याद आया कि जब वह मुड़ रहा था, तो अनन्या पर्दे के पीछे रो रही थी। वह बेबस थी, बागी नहीं।

सावित्री जी ने आगे कहा, “रिश्ते कभी अपनी जिद और शर्तों पर नहीं चलाए जाते शौर्य। जो लड़की कल अपना पूरा संसार, अपनी पहचान और अपने माता-पिता को छोड़कर तुम्हारे घर की दहलीज पार करने वाली है, क्या उसके परिवार की एक छोटी सी सामाजिक मजबूरी के आगे तुम अपने स्वाभिमान का ऐसा पहाड़ खड़ा कर दोगे? अगर आज तुमने समझदारी नहीं दिखाई, तो कल तुम दोनों के बीच यह कड़वाहट दीवार बनकर खड़ी हो जाएगी। पुरुषार्थ इसमें नहीं है कि तुम अपने मान के लिए रिश्ते दांव पर लगा दो, बल्कि असली पुरुषार्थ इसमें है कि तुम उस मर्यादा का मान रखो जिसे निभाने में उसका परिवार विवश था।”

माँ के शब्दों ने शौर्य की आंखों पर से अहंकार का पर्दा हटा दिया। उसका गुस्सा पूरी तरह काफूर हो चुका था और उसकी जगह एक गहरी आत्मग्लानि ने ले ली थी। उसने सोचा कि उसने गुस्से में आकर पास फाड़ दिए और बिना कुछ समझे वहां से भाग आया, जबकि उस वक्त अनन्या को उसके संबल की सबसे ज्यादा जरूरत थी।

रात करीब ग्यारह बजे शौर्य के फोन की स्क्रीन जली। स्क्रीन पर ‘अनन्या’ नाम चमक रहा था। शौर्य ने एक पल भी गंवाए बिना कॉल उठा ली। फोन कान से लगाते ही दूसरी तरफ से सिसकियों और आंसुओं की टूटी-फूटी आवाज सुनाई दी।

“शौर्य… मुझे… मुझे माफ कर दो,” अनन्या फूट-फूट कर रो रही थी। “मैं तुमसे नजरें मिलाने के काबिल भी नहीं रही। मुझे बहुत शर्मिंदगी महसूस हो रही है कि मेरे घर पर तुम्हारा ऐसा अपमान हुआ। तुम कितनी खुशी से आए थे, तुमने कितनी मेहनत से वे टिकट जुटाए थे… और मेरी वजह से सब बर्बाद हो गया। पापा बहुत रो रहे हैं, वे फूफाजी के सामने कुछ बोल नहीं पाए क्योंकि फूफाजी ने पापा की पढ़ाई के वक्त बहुत मदद की थी, वे उनका लिहाज करते हैं। प्लीज शौर्य, मुझसे नाराज मत होना…”

अनन्या का रोना शौर्य के दिल को चीर गया। उसकी आवाज में अब न कोई तल्खी थी, न कोई शिकवा।

“अरे पगली, चुप हो जा,” शौर्य ने बहुत ही कोमल और आत्मीय स्वर में कहा। “रोते हुए तुम बिल्कुल अच्छी नहीं लगतीं। और माफी कैसी? माफी तो मुझे मांगनी चाहिए कि मैं इतना नासमझ निकला कि तुम्हारी बेबसी को समझ ही नहीं पाया। माँ ने मुझे सब समझा दिया है। मुझे जरा भी गुस्सा नहीं है। नाटक तो फिर कभी देख लेंगे, जब हमारी शादी हो जाएगी तब तो कोई फूफाजी हमें नहीं रोक पाएंगे ना? तुम्हारे पापा का मान-सम्मान मेरे लिए किसी भी नाटक या तमाशे से हजार गुना बढ़कर है। तुम बस रोना बंद करो और सो जाओ।”

फोन कटने के बाद दोनों के दिलों का बोझ काफी हल्का हो चुका था, लेकिन शौर्य जानता था कि बात सिर्फ फोन पर दिलासा देने से खत्म नहीं हुई थी। रिश्ते में पड़ी खरोंच को मिटाने के लिए पहल उसे ही करनी थी।

अगली सुबह सूरज की पहली किरण के साथ शौर्य उठा। उसने शहर की सबसे मशहूर और पुरानी मिठाई की दुकान से शुद्ध देसी घी की बनी बालूशाही और ताजे रसकदम का डिब्बा पैक करवाया। यह बात उसे अनन्या ने एक बार बातों-बातों में बताई थी कि उसके फूफाजी को पारंपरिक मिठाइयों का बेहद शौक है।

करीब दस बजे शौर्य दोबारा अनन्या के घर के सामने खड़ा था। इस बार उसके चेहरे पर कोई तनाव या गुस्सा नहीं था, बल्कि एक सहज मुस्कान और विनम्रता थी। उसने दरवाजे की घंटी बजाई। दरवाजा हरिमोहन जी ने खोला। सामने शौर्य को खड़ा देखकर वे हक्के-बक्के रह गए। उनके चेहरे पर कल की घटना का संकोच और अपराधबोध साफ झलक रहा था।

“शौर्य बेटा… तुम?” हरिमोहन जी की आवाज लड़खड़ाई।

“नमस्ते अंकल!” शौर्य ने झुककर उनके पैर छुए। हरिमोहन जी की आंखें भर आईं और उन्होंने कांपते हाथों से शौर्य की पीठ थपथपाई।

शौर्य सीधा ड्राइंग रूम की तरफ बढ़ा। वहां फूफाजी उसी तरह गंभीर मुद्रा में अखबार पढ़ रहे थे। शौर्य ने आगे बढ़कर पूरी श्रद्धा के साथ झुककर फूफाजी के चरण स्पर्श किए।

फूफाजी ने अखबार नीचे किया और अचरज से इस नौजवान को देखने लगे। कल जो लड़का आंखें तरेर कर गया था, वह आज उनके चरणों में सिर झुकाए खड़ा था।

“जीते रहो बेटा… खुश रहो,” फूफाजी के मुंह से अनायास ही आशीर्वाद निकल पड़ा।

शौर्य ने मिठाई का डिब्बा मेज पर रखते हुए बड़ी शालीनता से कहा, “फूफाजी, अनन्या अक्सर आपके अनुशासन और गांव के किस्सों के बारे में बताती रहती है। कल शाम जब मैं आया था, तो थोड़ा उतावलेपन में था। बाद में घर जाकर माँ से बात की, तो मुझे समझ आया कि बड़ों की डांट और उनकी पाबंदियों के पीछे हमेशा परिवार की भलाई और मान-सम्मान की चिंता होती है। आपकी बात बिल्कुल सही थी, मर्यादा की सीमाएं हमें बांधने के लिए नहीं, बल्कि रिश्तों को महफूज रखने के लिए होती हैं। मुझसे अगर जाने-अनजाने कोई गुस्ताखी हुई हो, तो मुझे अपना नासमझ बच्चा समझकर माफ कर दीजिएगा।”

शौर्य की इस अगाध विनम्रता, बड़प्पन और मीठी वाणी ने उस कमरे में जमी सारी बर्फ को एक ही झटके में पिघला दिया। फूफाजी, जो बरसों से अपनी कड़क मिजाजी के लिए जाने जाते थे, उनका दिल भी इस नौजवान के आगे पिघल गया। उनका कठोर चेहरा एक आत्मीय मुस्कान में बदल गया। उन्होंने अपनी लाठी एक तरफ रखी और दोनों बाहें फैलाकर शौर्य को अपने सीने से लगा लिया।

“धन्य हैं तुम्हारे माता-पिता, जिन्होंने तुम्हें इतने सुंदर संस्कार दिए हैं बेटा!” फूफाजी की आवाज में स्नेह का समंदर उमड़ पड़ा। “आज की पीढ़ी में अपने स्वाभिमान को बड़ों के सम्मान के आगे झुकाने का हौसला बहुत कम नौजवानों में होता है। मुझे अपनी मर्यादा प्यारी थी, लेकिन तुम्हारी इस समझदारी ने मेरा दिल जीत लिया। हरिमोहन, तुमने अपनी फूल जैसी बच्ची के लिए हीरा चुना है, बिल्कुल सच्चा हीरा!”

रसोई के दरवाजे पर खड़ी अनन्या और उसकी माँ की आंखों से खुशी के आंसू बह निकले। अनन्या की आंखों में शौर्य के लिए जो प्यार था, वह आज असीम आदर और सम्मान में बदल चुका था। हरिमोहन जी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था। उस दिन उस घर में नाटक छूटने का कोई गम नहीं था, बल्कि एक ऐसे रिश्ते का उत्सव मन रहा था जो परीक्षा की पहली ही घड़ी में कुंदन बनकर निखरा था।

शौर्य ने दोपहर का खाना उसी घर में खाया। फूफाजी ने अपने हाथों से उसे मिठाई खिलाई और गांव की खेती-किसानी से लेकर पुराने जमाने की तमाम बातें बड़े चाव से साझा कीं। जिस अहंकार की आंधी ने कल उस रिश्ते की नींव को हिला दिया था, आज उसी रिश्ते को समझदारी, त्याग और संस्कारों की शीतल बयार ने हमेशा-हमेशा के लिए अटूट बना दिया था।

दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या पारिवारिक रिश्तों में हर बार टकराव का जवाब टकराव से देना सही है, या कभी-कभी थोड़ा सा झुककर और बड़ों के नजरिए को समझकर हम अपने रिश्ते को टूटने से बचा सकते हैं? क्या शौर्य की तरह उठाया गया समझदारी भरा कदम हर नए रिश्ते को मजबूती दे सकता है? अपनी अनमोल राय कमेंट करके ज़रूर बताएं।

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लेखिका : अपर्णा घोष

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