घर के मुख्य द्वार पर बंधे आम के पत्तों के तोरण और आंगन में बिखरे रंगोली के रंग नई नवेली दुल्हन के आगमन की गवाही दे रहे थे। दुल्हन बनकर आई थी अनन्या। रूप-रंग और संस्कारों में अनन्या जितनी परिपक्व थी, रसोई के काम-काज में उतनी ही कच्ची। पढ़ाई-लिखाई में हमेशा अव्वल रहने वाली अनन्या ने कॉलेज के बाद सीधे मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी पकड़ ली थी। उसकी मां मनोरमा जी ने उसे हमेशा किताबों और करियर में आगे बढ़ने की सीख दी, पर चूल्हा-चौका सिखाने का समय ही कभी नहीं मिला। शादी तय होते ही मनोरमा जी ने होने वाली समधन गायत्री जी को हाथ जोड़कर यह बात साफ-साफ बता दी थी, “दीदी, मेरी अनन्या स्वभाव की बहुत भोली और सेवाभावी है, लेकिन उसे चूल्हा-चौका बिल्कुल नहीं आता। उसने कभी रसोई का मुंह भी ठीक से नहीं देखा।”
गायत्री जी ने तब मुस्कुराकर कहा था, “समधन जी, मैं अपने घर बहू ला रही हूं, कोई बावर्ची नहीं। आप बेफिक्र रहिए, घर-गृहस्थी तो प्यार से सीखी जाती है।”
शादी संपन्न हुई, विदाई की रुलाई के बाद जब अनन्या ससुराल पहुंची, तो गृहप्रवेश की रस्में हुईं। पहली रात की रस्मों के बाद जब अगली सुबह मुंह-दिखाई और पैर छुआई की बारी आई, तो पूरे परिवार के सामने गायत्री जी ने अनन्या को एक सोने का कंगन पहनाने के साथ-साथ कपड़े के कवर में लिपटी एक पुरानी, मोटी सी लाल जिल्द वाली डायरी उसके हाथ में थमा दी। गायत्री जी ने बेहद कोमल स्वर में उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटी, यह कोई मामूली डायरी नहीं है। यह मेरे जीवन का निचोड़ है। मैं कल रहूं या ना रहूं, यह डायरी आजीवन एक मार्गदर्शक बनकर तुम्हारे साथ रहेगी। जब भी जिंदगी या रसोई के किसी मोड़ पर उलझन हो, इसके पन्नों को पलट लेना।”
अनन्या ने श्रद्धा से वह डायरी माथे से लगा ली, पर मन ही मन अचरज में डूब गई। उसने सोचा, आखिर इस पुरानी डायरी में ऐसा क्या लिखा होगा? क्या इसमें खानदान के कोई गुप्त नियम हैं या कोई पुरानी वसीयत?
शादी के चौथे दिन रस्म के अनुसार अनन्या का अपने पति अक्षत के साथ पहली बार मायके जाना हुआ। मायके की चौखट लांघते ही अनन्या को लगा जैसे वह किसी कैद से छूटकर अपनी पुरानी दुनिया में आ गई हो। मां मनोरमा जी ने बेटी के स्वागत में उसके पसंदीदा व्यंजनों का अंबार लगा रखा था। सुगंधित पुलाव, पनीर लबाबदार, दाल मखनी, कुरकुरी पूरियां और बादाम का हलवा देखकर अनन्या के पेट में जैसे भूख की आंधी चल पड़ी। ससुराल में संकोच और मर्यादा के कारण वह ढंग से खा भी नहीं पा रही थी।
थाली सामने आते ही अनन्या ऐसे टूटी मानो बरसों की भूखी हो। एक निवाला मुंह में तो दूसरा हाथ में। उसके पापा और छोटा भाई रोहन उसे खाते देख हंसते-हंसते लोटपोट हो रहे थे। वहीं उसके पति अक्षत की हालत देखने लायक थी। अक्षत का चेहरा शर्म और हैरानी से पीला पड़ गया। वह धीरे से अनन्या की कोहनी मारते हुए फुसफुसाया, “अरे अनन्या, थोड़ा धीरे खाओ! तुम्हारे घरवाले सोचेंगे कि हमने दो दिन से तुम्हें दाने-दाने को तरसा रखा है। मेरी इज्जत का तो ख्याल करो!”
अनन्या ने मुंह में पूरी भरते हुए मासूमियत से कहा, “अरे अक्षत, ससुराल में तो सिर्फ औपचारिकता का भोजन किया था, आत्मा तो आज तृप्त हो रही है! मां के हाथ के खाने का कोई मुकाबला है क्या भला?” यह सुनकर पूरा कमरा ठहाकों से गूंज उठा।
दो दिन मायके में पलक झपकते ही हवा की तरह बीत गए। तीसरे दिन विदा होकर जब अनन्या ससुराल लौटी, तो घर का माहौल बिल्कुल अलग था। बैठक में परिवार के सबसे बुजुर्ग सदस्य यानी अक्षत की दादी अम्मा तख्त पर विराजमान थीं। अनन्या ने जैसे ही उनके पैर छुए, दादी अम्मा गंभीर और रोबीली आवाज में बोलीं, “बहू, आज ससुराल की रसोई में तुम्हारा पहला कदम है। पहली रसोई की रस्म बड़ी पावन होती है। हमारे जमाने में तो सास-ससुर जो हुक्म दे देते थे, वही बनाना पड़ता था, चाहे वह कितना भी कठिन पकवान क्यों न हो। पर अब जमाना बदल गया है। आज इंटरनेट और मोबाइल का जमाना है। जो भी मीठा तुम्हें पसंद हो, अपने हाथों से बनाकर भगवान को भोग लगाओ और हमें भी चखाओ। आखिर हमें भी तो पता चले कि हमारी नई बहू के हाथ में कितना हुनर है!”
दादी अम्मा की बात सुनते ही अनन्या के हाथ-पैर ठंडे पड़ गए। माथे पर पसीने की बूंदें चमकने लगीं। जिसे चाय की पत्ती और चीनी का सही अनुपात तक नहीं मालूम, वह पूरे परिवार के लिए मीठा कैसे बनाएगी? वह बगले झांकने लगी। लगा कि अभी पोल खुल जाएगी और पूरे खानदान में थू-थू हो जाएगी।
तभी सासू मां गायत्री जी स्थिति की नजाकत को भांपते हुए आगे आईं और स्नेह से अनन्या का हाथ पकड़ लिया। वे दादी अम्मा से बोलीं, “अम्मा जी, बहू अभी-अभी लंबे सफर से आई है। मैं जरा इसे रसोई का कोना-कोना दिखा दूं, बता दूं कि शक्कर, मेवे और कड़ाही कहां रखी है। फिर यह अपनी पाक कला का ऐसा कमाल दिखाएगी कि आप उंगलियां चाटती रह जाएंगी।”
अनन्या के पैर जैसे जमीन में धंस रहे थे। रसोई तक जाने की उसमें रत्ती भर भी हिम्मत नहीं बची थी। उसे लगा कि वह अभी चक्कर खाकर गिर पड़ेगी। जैसे-तैसे पसीना पोंछते हुए वह रसोई में पहुंची। जैसे ही रसोई का पर्दा गिरा, अनन्या की आंखों से आंसू छलक आए। वह रोते हुए बोली, “मम्मी जी, मुझसे नहीं होगा। मुझे तो मीठा बनाना बिल्कुल नहीं आता। दादी अम्मा के सामने मेरी और मेरे मायके की बहुत बेइज्जती हो जाएगी।”
गायत्री जी ने मुस्कुराकर अनन्या के आंसू पोंछे और उसके कान में धीरे से कुछ फुसफुसाया। सासू मां के उन दो शब्दों ने अनन्या के अशांत मन पर ठंडे पानी का काम किया। सासू मां ने कहा, “पगली, जब तक मैं तेरे पीछे ढाल बनकर खड़ी हूं, तुझे डरने की क्या जरूरत है? तू बस आराम से स्टूल पर बैठ और देख।”
गायत्री जी ने तेजी से हाथ चलाए। फ्रिज से गाढ़ा मलाईदार दूध निकाला, उसे गैस पर चढ़ाया। केसर, इलायची और पिस्ते का ऐसा जादुई मिश्रण तैयार किया कि मिनटों में शाही रबड़ीदार रसमलाई की मनमोहक खुशबू पूरे घर में फैलने लगी। गायत्री जी ने अनन्या को पास बुलाकर रसमलाई के छैने को चाशनी में डुबोने का तरीका भी सिखाया और साथ ही कुछ जरूरी नुस्खे समझाए।
लगभग सवा घंटे बाद, चांदी के बड़े से कटोरे में सजी ठंडी-ठंडी, केसरिया रसमलाई लेकर अनन्या बेहद शालीनता से दादी अम्मा के चरणों के पास पहुंची। दादी अम्मा ने मुस्कुराते हुए अपना पुराना बटुआ निकाला।
तभी अक्षत की छोटी बहन श्रेया चहकते हुए बोली, “दादी अम्मा, बटुआ बाद में खोलना। पहले भाभी के हाथ की रसमलाई चख तो लीजिए! फिर तय कीजिएगा कि कितनी नेग देनी है।”
दादी अम्मा ने आंखें तरेरते हुए कहा, “हट पगली! मेरी लाडली बहू ने इतने प्यार से पहला कदम रखा है। अगर इसमें शक्कर की जगह नमक भी गिरा होता, तो भी मैं इसे पूरे में से पूरे नंबर देती। आखिर मूल से ज्यादा ब्याज प्यारा होता है।” यह कहकर दादी अम्मा ने अपने बटुए से 2100 रुपये का नोट निकाला और बड़े मान से अनन्या की हथेली पर रख दिया।
फिर दादी अम्मा ने चम्मच से रसमलाई का एक टुकड़ा काटकर अनन्या के मुंह में डाला। जैसे ही वह टुकड़ा अनन्या की जीभ पर घुला, उसकी आंखों से बरबस ही आंसुओं की दो बूंदें टपक पड़ीं। वह स्वाद किसी अमृत से कम नहीं था। उसमें केवल मेवे और दूध का स्वाद नहीं था, बल्कि वही ममतामयी वात्सल्य घुला था जो उसकी अपनी मां के हाथों में हुआ करता था।
दादी अम्मा ने एक निवाला खुद खाया और आंखें बंद करके बोलीं, “अरे वाह! क्या स्वाद है! बिल्कुल मुंह में घुल गई।” घर के सभी लोगों ने रसमलाई की भूरि-भूरि प्रशंसा की। अक्षत भी मजे से खाते हुए अनन्या को हैरानी भरी नजरों से देख रहा था।
अनन्या का मन ग्लानि से भर गया। वह दादी अम्मा से सच बोलने ही वाली थी कि “दादी जी, यह मैंने नहीं मम्मी जी ने…” तभी गायत्री जी ने तुरंत टोकते हुए कहा, “अरे बहू, बहुत देर से चूल्हे के सामने खड़ी थी, चेहरा लाल हो गया है तुम्हारा। अब तारीफें बाद में सुनना, पहले जाकर अपने कमरे में थोड़ा विश्राम कर लो।”
अनन्या चुपचाप अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। जाते-जाते उसके कानों में दादी अम्मा की आवाज पड़ी, जो गायत्री जी से कह रही थीं, “बहू, तुम्हारी बहू के हाथ में तो बिल्कुल तुम्हारे ही हाथों जैसा जादू है। एकदम वही स्वाद, वही खुशबू!”
अनन्या के चेहरे पर एक कृतज्ञता भरी मुस्कान तैर गई। उसने मन ही मन सोचा कि हम लड़कियां कितनी नासमझ होती हैं। हम सास को हमेशा एक सख्त और पराई औरत समझ बैठती हैं, जबकि उनके सीने में भी एक मां का ही दिल धड़कता है, बस उसे समझने की दृष्टि हमारे पास होनी चाहिए।
कमरे में पहुंचते ही अनन्या की नजर अलमारी में रखी उसी लाल जिल्द वाली डायरी पर पड़ी। उसने उत्सुकता से अलमारी खोली और डायरी के पन्ने पलटने लगी। पन्ने पलटते ही उसकी आंखें खुली की खुली रह गईं। उस डायरी में केवल पकवानों की विधियां नहीं थीं, बल्कि परिवार के हर सदस्य की पसंद-नापसंद, दादी अम्मा के पुराने नुस्खे, त्योहारों की विशेष परंपराएं और हर मौसम के अनुकूल मसालों के मेल को मोतियों जैसे सुंदर अक्षरों में पिरोया गया था।
अनन्या सोच में पड़ गई, “क्या मैं कभी इस विरासत को, इस विश्वास को संभाल पाऊंगी?”
तभी अक्षत कमरे में दाखिल हुआ। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “क्यों मैडम, आज तो आपकी रसमलाई ने पूरे खानदान का दिल जीत लिया! वैसे सच-सच बताओ, यूट्यूब से सीखा था या मां ने कोई जादुई मंत्र फूंका था?”
अनन्या ने भावुक होकर कहा, “अक्षत, मां अगर प्यार से सूखी रोटी पर नमक रखकर भी दे दे, तो वह छप्पन भोग बन जाती है। आज जो कुछ हुआ, वह सिर्फ मां की ममता का चमत्कार था।”
उसी समय गायत्री जी भी कमरे में आ गईं। अनन्या के हाथ में डायरी देखकर वे प्यार से बोलीं, “बेटी, इस डायरी को देखकर घबराना मत। जब तक मेरे शरीर में सांस है, मैं तुम्हें किसी बात की आंच नहीं आने दूंगी। पर यह भी सच है कि आने वाले कल में इस घर की बागडोर और इन संस्कारों की छत्रछाया तुम्हें ही संभालनी है। यह डायरी उसी सफर के लिए मेरा एक छोटा सा प्रयास है। रोज थोड़ा-थोड़ा सीखोगी, तो सब आ जाएगा।”
समय अपनी गति से पहिए की तरह घूमता रहा। दिन महीनों में और महीने सालों में बदलते चले गए। अनन्या ने उस डायरी की मदद से और गायत्री जी की उंगली पकड़कर न केवल घर की हर छोटी-बड़ी रस्म सीख ली, बल्कि उसके हाथों में भी वही पारंपरिक जादू उतर आया। परिवार में सब कुछ सुख-शांति से चल रहा था।
लेकिन जीवन हमेशा एक जैसा नहीं रहता। अचानक पूरी दुनिया में एक भयानक महामारी ने दस्तक दी। चारों तरफ त्राहि-त्राहि मच गई। तालाबंदी और संकट के उस काले दौर में अनन्या के ससुराल पर भी दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। अक्षत जिस निजी कंपनी में काम करता था, वह भारी घाटे के चलते बंद हो गई और अक्षत की नौकरी चली गई। परिवार की आर्थिक स्थिति दिन-प्रतिदिन बदतर होती चली गई। जमा-पूंजी इलाज और घर के खर्चों में धीरे-धीरे समाप्त होने लगी।
इसी विपदा के बीच, एक दिन बीमारी के चलते सासू मां गायत्री जी का साया परिवार के सिर से हमेशा के लिए उठ गया। घर में कोहराम मच गया। दादी अम्मा रो-रोकर बेहाल थीं, अक्षत अपनी सुध-बुध खो चुका था। ऐसा लग रहा था मानो उस भरे-पूरे घर की छत ही छिन गई हो। घर के चूल्हे तक जलने बंद हो गए।
एक दिन जब घर में राशन के डिब्बे खाली होने लगे और अक्षत लाचार होकर अपने सिर पर हाथ रखकर बैठ गया, तब अनन्या ने अपनी सासू मां की तस्वीर के सामने खड़े होकर हाथ जोड़े। उसने मन ही मन कहा, “मां जी, आपने मुझे कमजोर बनना नहीं सिखाया। आपने कहा था कि यह डायरी हर मोड़ पर मेरा साथ देगी।”
अनन्या ने अलमारी से वही लाल जिल्द वाली डायरी निकाली। उसने देखा कि डायरी के अंतिम पन्नों में पारंपरिक मसालों, औषधीय काढ़ों, घर के बने शुद्ध आचारों और पौष्टिक पारंपरिक मिठाइयों के अचूक फार्मूले लिखे थे।
अनन्या ने हिम्मत बांधी। उसने अक्षत से कहा, “अक्षत, जब तक हमारे हाथ-पैर सलामत हैं, हम हार नहीं मान सकते। मम्मी जी का आशीर्वाद हमारे साथ है।”
अनन्या ने अपने ही किचन से शुरुआत की। उसने डायरी की विधियों के अनुसार शुद्ध देशी घी की पारंपरिक मिठाइयां, इम्युनिटी बढ़ाने वाले पौष्टिक लड्डू और सासू मां के हाथ के स्वाद वाले मसाले तैयार करने शुरू किए। शुरुआत में साधन कम थे। अक्षत अपनी पुरानी बाइक पर उन डिब्बों को रखकर आसपास की सोसायटियों और घरों तक पहुंचाता था।
जिसने भी अनन्या के हाथ का बना वह सामान चखा, वह उस स्वाद का मुरीद हो गया। शुद्धता, परंपरा और उस बेजोड़ स्वाद ने ऐसा रंग जमाया कि धीरे-धीरे फोन पर ऑर्डर की झड़ी लग गई। लोगों को उस भोजन में अपनी दादी-नानी के दौर का खोया हुआ स्वाद महसूस होने लगा।
देखते ही देखते कुछ ही महीनों में वह छोटा सा घरेलू प्रयास एक प्रतिष्ठित क्लाउड किचन और होम-मेड ब्रांड के रूप में स्थापित हो गया। अक्षत ने डिलीवरी और फाइनेंस का काम संभाला, जबकि अनन्या ने पूरी रसोई की कमान अपने हाथों में रखी। घर के हालात पूरी तरह सुधर गए। अक्षत का खोया हुआ आत्मविश्वास लौट आया और दादी अम्मा के चेहरे पर फिर से वही पुरानी चमक दिखाई देने लगी।
अनन्या की इस सफलता की चर्चा जब स्थानीय पत्रिकाओं और महिला संगठनों तक पहुंची, तो शहर के एक बड़े मंच पर उसे ‘सर्वश्रेष्ठ महिला उद्यमी’ के सम्मान से नवाजा गया। सभागार खचाखच भरा हुआ था। जब मंच पर एंकर ने अनन्या से माइक पर पूछा, “अनन्या जी, जिस उम्र में लोग संकटों से घबराकर टूट जाते हैं, आपने अपनी रसोई के दम पर पूरे परिवार की तकदीर बदल दी। आपकी इस अद्भुत पाक कला और इस जादुई स्वाद का राज क्या है? क्या आपने कोई बड़ा होटल मैनेजमेंट का कोर्स किया है?”
अनन्या की आंखें भर आईं। उसने मंच से सामने बैठी जनता की ओर देखा और बहुत ही शांत, गंभीर स्वर में कहा, “नहीं, मैंने कोई कोर्स नहीं किया। सच तो यह है कि जब मेरी शादी हुई थी, मुझे ठीक से चाय तक बनानी नहीं आती थी। मेरी अपनी मां ने मुझे जीवन दिया, मुझे पढ़ाया और अपने हाथों के स्वादिष्ट व्यंजनों से मुझे पाला। लेकिन विपरीत परिस्थितियों में जीवन को जीना, संघर्षों के सामने सीना तानकर खड़े होना और मेरे हाथों में यह स्वाद का जादू भरना… यह सब मेरी स्वर्गीय सासू मां की देन है। मेरे हर व्यंजन की सुगंध, मेरी सफलता का हर कदम, मेरी सासू मां की उसी पुरानी लाल डायरी से निकलकर आप तक पहुंचता है। वह सिर्फ मेरी सास नहीं थीं, वे मेरी मार्गदर्शक और मेरी दूसरी मां थीं जिन्होंने मेरी कमियों को अपनी ममता से ढंक लिया।”
पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। सामने बैठे अक्षत और दादी अम्मा की आंखों से गर्व के आंसू बह रहे थे। अनन्या के चेहरे पर खिली वह आत्मविश्वास भरी मुस्कान यह गवाही दे रही थी कि जब एक सास अपनी बहू को बेटी बनाकर उसे संस्कारों की ढाल देती है, तो वह बहू पूरे कुल का मान कभी गिरने नहीं देती।
यह कहानी हमें यह सुंदर संदेश देती है कि बहू कोई पराई अमानत नहीं होती जिसे बात-बात पर परखा जाए। अगर हर सास गायत्री जी की तरह धैर्य और ममता से नई बहू की कमियों को स्वीकार कर ले, तो हर घर स्वर्ग बन सकता है।
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लेखिका : अर्चना भाटी