हुनर की उड़ान

 दोपहर का वक्त था, डाकिया दरवाजे पर एक लाल रंग का लिफाफा दे गया। मैंने दौड़कर लिफाफा उठाया और खोलकर देखा तो खुशी से उछल पड़ा। मैंने जोर से चिल्लाते हुए मां को आवाज दी, “मां, जल्दी आओ! सुरेश भैया की शादी का कार्ड आ गया है।” मां रसोई से हाथ पोंछते हुए बाहर आईं और कार्ड देखकर हैरान रह गईं। उनके मुंह से बेसाख्ता निकला, “अरे! सुरेश की भी शादी तय हो गई? उम्र भी तो पैंतीस के पार हो रही थी, हमें तो लगा था कि अब कोई इसे अपनी लड़की नहीं देगा। चलो, भगवान का शुक्र है कि किसी ने तो हां की।”

सुरेश भैया हमारे ताऊ जी के बड़े बेटे हैं। वे पढ़ाई में हमेशा से कमजोर रहे, बमुश्किल बारहवीं पास कर पाए थे। स्वभाव से बेहद सीधे और शर्मीले थे, यहां तक कि किसी से आंख मिलाकर बात करने में भी उन्हें झिझक होती थी। उनकी अपनी कोई खास आमदनी नहीं थी, बस घर के बाहर ही एक छोटी सी लोहे और हार्डवेयर की दुकान चलाते थे, जिससे बमुश्किल घर का गुजारा चलता था। जब से सगाई की खबर मिली थी, हम सब चचेरे भाई-बहन बहुत उत्साहित थे। हम सब यही कयास लगा रहे थे कि आखिर हमारी नई भाभी कैसी होंगी? उस समय आज की तरह स्मार्टफोन या वीडियो कॉल का जमाना तो था नहीं, इसलिए हमने भाभी की कोई तस्वीर भी नहीं देखी थी।

शादी का दिन आ गया। हम सब बारात में खूब नाचे। जब विदाई के बाद नई दुल्हन घर आई और मुंह दिखाई की रस्म शुरू हुई, तो मोहल्ले की औरतों और रिश्तेदारों की फुसफुसाहटें शुरू हो गईं। भाभी का नाम मीरा था। उनका रंग काफी पक्का (सांवला) था, चेहरे पर चेचक के कुछ हल्के दाग थे और कद भी सामान्य से कम था। सुंदरता के जो पारंपरिक पैमाने समाज ने तय कर रखे हैं, मीरा भाभी उनमें कहीं से भी फिट नहीं बैठ रही थीं। कई रिश्तेदारों ने तो ताऊ जी और ताई जी को ताने भी मारे, “अरे कैलाश जी, लड़का सीधा है तो क्या हुआ, कम से कम कोई ढंग की शक्ल-सूरत वाली लड़की तो ले आते।” लेकिन ताई जी ने यह कहकर सबको शांत कर दिया कि, “जैसा हमारा बेटा है, वैसी बहू मिल गई, हमारा तो घर बस गया, यही बहुत है।”

अगले दिन पूरे परिवार को कुलदेवता के मंदिर में दर्शन के लिए जाना था। वहां भजन-कीर्तन का आयोजन किया गया था। सब लोग मगन थे, तभी ताई जी ने मीरा भाभी से कहा, “बहू, तुम भी भगवान के सामने कुछ गाकर सुनाओ।” भाभी पहले तो थोड़ा झिझकीं, लेकिन फिर उन्होंने हारमोनियम पर उंगलियां रखीं और गाना शुरू किया। उनकी आवाज में इतनी कशिश और मिठास थी कि पूरा मंदिर प्रांगण शांत हो गया। जो लोग कल तक उनके रंग-रूप को लेकर ताने मार रहे थे, वे आंखें बंद करके उनका भजन सुन रहे थे। भाभी ने अपनी आवाज से ही सबका दिल जीत लिया था।

कुछ महीनों बाद मेरा ताऊ जी के घर जाना हुआ। तब तक घर का माहौल काफी बदल चुका था। मीरा भाभी ने अपनी पाक कला से सबको अपना दीवाना बना लिया था। उनके हाथ के बने खाने में ऐसा स्वाद था जो फाइव स्टार होटल के पकवानों को भी मात दे दे। लेकिन एक बात जो मैंने गौर की, वह यह थी कि ताऊ जी के घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं चल रही थी। सुरेश भैया की हार्डवेयर की दुकान में अब पहले जैसी ग्राहकी नहीं रही थी। महंगाई बढ़ रही थी और घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था।

मीरा भाभी बहुत ही समझदार और स्वाभिमानी महिला थीं। उन्होंने देखा कि उनके पति दिन-रात परेशान रहते हैं और ताई जी को भी घर खर्च के लिए सोचना पड़ता है। भाभी ने तय किया कि वह हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठेंगी। उन्हें तरह-तरह के अचार, पापड़ और घर के शुद्ध मसाले बनाने का बहुत शौक था और इसमें वे माहिर भी थीं। उन्होंने पड़ोस की कुछ महिलाओं को अपने हाथ का बना आम और नींबू का अचार चखाया। सबको वह इतना पसंद आया कि उन्होंने भाभी से अपने लिए भी अचार बनाने की जिद की।

यहीं से भाभी के दिमाग में एक विचार आया। उन्होंने घर के आंगन में ही अचार और पापड़ बनाने का काम शुरू कर दिया। शुरुआत में जब ताऊ जी और ताई जी को इस बात का पता चला, तो वे बहुत नाराज हुए। ताऊ जी ने कहा, “हमारे घर की औरतें कभी पैसे कमाने के लिए घर से बाहर नहीं निकलीं। अब क्या हम बहू की कमाई खाएंगे? लोग क्या कहेंगे कि सुरेश अपनी पत्नी से काम करवा रहा है!”

लेकिन मीरा भाभी ने बहुत ही शांति और सम्मान के साथ उन्हें समझाया, “पिताजी, जब एक इंसान की कमाई से घर नहीं चल पा रहा है, तो दूसरे के हाथ बंटाने में क्या बुराई है? मैं कोई गलत काम तो नहीं कर रही, घर की चारदीवारी में रहकर अपनी मेहनत से कुछ पैसे ही तो कमा रही हूं। मेरे माता-पिता ने मुझे ज्यादा पढ़ाया-लिखाया नहीं, लेकिन मेहनत करना और हुनर जरूर सिखाया है। जब भगवान ने मुझे यह हुनर दिया है, तो मैं उसे व्यर्थ क्यों जाने दूं?” भाभी की इन बातों में इतनी सच्चाई और स्पष्टता थी कि ताऊ जी निरुत्तर हो गए और उन्होंने खुशी-खुशी अनुमति दे दी।

भाभी ने छोटी सी शुरुआत की थी, लेकिन उनकी मेहनत और उनके उत्पादों की शुद्धता ने जादू कर दिया। मोहल्ले की औरतों से शुरू हुआ सिलसिला पूरे शहर में फैलने लगा। जो भी एक बार उनके हाथ का मसाला या अचार खा लेता, वह बाजार का सामान भूल जाता। धीरे-धीरे ऑर्डर इतने बढ़ गए कि भाभी अकेले उन्हें पूरा नहीं कर पाती थीं। उन्होंने अपनी सूझबूझ का परिचय देते हुए मोहल्ले की उन गरीब और जरूरतमंद महिलाओं को अपने साथ काम पर रख लिया, जिन्हें पैसों की सख्त जरूरत थी। इससे न सिर्फ भाभी का काम आसान हुआ, बल्कि कई घरों के चूल्हे भी जलने लगे।

एक साल के भीतर ही, भाभी का यह छोटा सा काम एक अच्छे-खासे गृह उद्योग में बदल गया। घर के बाहर ‘मीरा शुद्ध मसाले एवं अचार’ के नाम से एक बोर्ड लग गया। आमदनी इतनी अच्छी होने लगी कि सुरेश भैया ने अपनी वह पुरानी हार्डवेयर की दुकान बंद कर दी और पूरी तरह से भाभी के व्यवसाय का हिसाब-किताब संभालने लगे। ताऊ जी के दो छोटे बेटे, जो काफी समय से नौकरी की तलाश में इधर-उधर भटक रहे थे, उन्हें भी भाभी ने पैकिंग और मार्केटिंग के काम में लगा दिया। जिस घर में कल तक एक-एक पैसे का हिसाब रखना पड़ता था, आज वहां खुशहाली और बरकत छाई हुई थी।

अभी पिछले ही महीने की बात है, मीरा भाभी ने बैंक से लोन लेकर और अपनी जमा पूंजी मिलाकर शहर के मुख्य बाजार में अपने उत्पादों का एक बहुत बड़ा और शानदार शोरूम खोला है। हम सब उसी शोरूम के उद्घाटन समारोह में गए थे। वहां बड़े-बड़े व्यापारी और शहर के गणमान्य लोग आए हुए थे। ताऊ जी और ताई जी की आंखों में अपनी बहू के लिए जो गर्व था, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। ताई जी तो हर किसी से यही कह रही थीं, “मेरी बहू तो मेरे घर के लिए साक्षात लक्ष्मी बनकर आई है।”

आज मीरा भाभी एक सफल उद्यमी हैं। लेकिन उनके स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आया है। वे आज भी वैसी ही हंसमुख, सरल और अपने काम के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं। उनके पास अब पैसों की कोई कमी नहीं है, लेकिन वे आज भी सुबह उठकर खुद अपने हाथों से मसालों की जांच करती हैं। उस साधारण सी, सांवली लड़की ने अपने हुनर और दृढ़ निश्चय से पूरे परिवार को अर्श पर बिठा दिया है।

मीरा भाभी का जीवन हम सभी के लिए एक बहुत बड़ी प्रेरणा है। उन्होंने यह साबित कर दिया कि हमें अपनी शारीरिक बनावट, रंग या रूप को कोसने के बजाय अपने भीतर छिपे हुनर को पहचानने और उसे तराशने की जरूरत है। कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता, छोटी सी शुरुआत भी आपको एक दिन सफलता के शिखर तक पहुंचा सकती है। उन्होंने समाज के तानों की परवाह किए बिना अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित किया। जो लोग कल तक उनके रंग-रूप का मजाक उड़ाते थे, आज वही लोग उनके सामने सिर झुकाते हैं और कहते हैं कि “अगर किसी को बहू मिले, तो मीरा जैसी मिले।” भाभी आज सिर्फ एक सफल व्यवसायी नहीं हैं, बल्कि अपने हुनर और अपनी मेहनत के दम पर सबके दिलों की रानी बन चुकी हैं।

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  • अर्चना खंडेलवाल
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