फ़ासलों के पार एक मां की पुकार

 गरिमा को इस चौखट को पार किए लगभग ढाई साल बीत चुके थे। इन ढाई सालों में उसने घर के हर कोने को अपने प्यार और सलीके से सजाया था। परिवार छोटा पर भरा-पूरा था—ससुर हरीश जी, सास कल्याणी जी, ननद तान्या और गरिमा के पति निशांत।

ससुराल में गरिमा को कभी यह एहसास ही नहीं होने दिया गया कि वह किसी दूसरे परिवार से आई है। ससुर हरीश जी हमेशा बिटिया कहकर बुलाते और छोटी ननद तान्या तो अपनी हर बात, कॉलेज के किस्सों से लेकर अपनी सहेलियों के झगड़ों तक, सबसे पहले अपनी गरिमा भाभी से ही साझा करती थी। सास कल्याणी जी का स्वभाव नारियल जैसा था—ऊपर से अनुशासन प्रिय, लेकिन अंदर से ममता और समझदारी से लबालब। वे गरिमा को काम में कभी पिसने नहीं देती थीं, बल्कि अक्सर दोपहर को चाय की चुस्कियों के साथ दोनों बैठकर पुरानी बातें करतीं।

सब कुछ बहुत सुंदर था, लेकिन इस खूबसूरत रिश्ते के आंगन में एक छोटा सा कांटा अक्सर गरिमा के दिल में चुभ जाया करता था। वह कांटा था उसके पति निशांत की एक अजीब सी ज़िद। निशांत गरिमा से बेइंतहा मोहब्बत करता था। उसकी हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का ख्याल रखना, दफ़्तर से लौटते हुए उसके पसंदीदा फूल या मिठाइयां लाना, गरिमा की ज़रा सी तबीयत नासाज़ होने पर बेचैन हो जाना—यह सब निशांत के स्वभाव में था। लेकिन निशांत का एक गहरा और अड़ियल दृष्टिकोण था। उसका मानना था कि विवाह के बाद लड़की का असली और एकमात्र घर उसका ससुराल ही होता है।

निशांत अक्सर कहता, “गरिमा, अब तुम्हारा वजूद इस चौखट से जुड़ा है। मायके से अब उतना ही नाता होना चाहिए जितना औपचारिकता के लिए ज़रूरी हो। बार-बार वहां जाना या वहां की समस्याओं में उलझना ठीक नहीं। अब तुम्हारे अपने हम हैं, वो सिर्फ एक बीता हुआ पड़ाव थे।”

गरिमा के मायके में सूरत में उसके सीधे-सादे पिता रामरतन जी, ममतामयी मां शारदा जी और एक छोटी बहन राधिका थी। गरिमा जानती थी कि उसके माता-पिता ने बड़ी कठिनाइयों से उसे पढ़ाया-लिखाया था। उसका दिल अपने माता-पिता के लिए हमेशा धड़कता रहता था, लेकिन निशांत के इस हठ और उसके गहरे प्यार के आगे वह कभी इस मुद्दे पर बहस नहीं करती थी। वह सोचती थी कि जब निशांत इतना प्यार करता है, तो छोटी-मोटी बातों पर घर की शांति क्यों भंग करना। वह तीज-त्योहारों पर ही किसी तरह मायके जा पाती थी, वह भी सिर्फ एक-दो दिन के लिए, क्योंकि निशांत उसके बिना अकेला महसूस करने लगता था और तुरंत वापस बुला लेता था।

दिन पंख लगाकर उड़ रहे थे। घर में एक बहुत बड़ी खुशखबरी आई। ननद तान्या का रिश्ता वडोदरा के एक प्रतिष्ठित और सुशिक्षित परिवार में तय हो गया। लड़के वाले बेहद संस्कारी थे और दोनों परिवारों की सहमति से छह महीने बाद शादी का शुभ मुहूर्त निश्चित हुआ।

घर में खुशियों की शहनाइयां बजने लगीं। पूरा परिवार तैयारियों में जुट गया। शादी की खरीदारी, गहनों की पसंद, रिश्तेदारों की सूचियां और हलवाई से लेकर टेंट वालों तक की बातें दिन-रात चलने लगीं। गरिमा ने खुद को पूरी तरह इन तैयारियों में झोंक दिया। तान्या के लहंगे से लेकर संगीत की थीम तक, हर चीज़ गरिमा की देखरेख में हो रही थी। एक दिन दोपहर को जब गरिमा बाज़ार से थकी-हारी लौटी, तो सास कल्याणी जी ने खुद उसके लिए नींबू पानी बनाया और प्यार से सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं, “बहू, तू सारा दिन भागदौड़ करती रहती है। तान्या की शादी ज़रूर है, पर इसका मतलब यह नहीं कि तू अपनी सेहत भूल जाए। अभी छह महीने बाकी हैं, धीरे-धीरे सब हो जाएगा। थोड़ा आराम भी कर लिया कर।”

सास के मुंह से यह बात सुनकर गरिमा की आंखें भर आईं। उसने मुस्कुराकर कहा, “मां जी, तान्या मेरी भी तो छोटी बहन जैसी है। उसकी शादी में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।”

लेकिन नियति के पन्नों में कुछ और ही लिखा था। अचानक एक शाम गरिमा का फोन बजा। स्क्रीन पर छोटी बहन राधिका का नाम चमक रहा था। गरिमा ने मुस्कुराते हुए फोन उठाया, “हां राधिका, कैसी चल रही है तेरी पढ़ाई?”

लेकिन दूसरी तरफ से रोने की सिसकियों भरी आवाज आई, “दीदी… मां… मां सीढ़ियों से फिसलकर गिर गईं। उनके पैर में बहुत भयानक चोट आई है। पापा और मैं उन्हें अस्पताल लाए हैं, डॉक्टर कह रहे हैं कि कूल्हे की हड्डी और घुटने के पास गहरा फ्रैक्चर है। तुरंत बड़ा ऑपरेशन करना पड़ेगा।”

यह सुनते ही गरिमा के हाथ से पानी का गिलास छूटकर फर्श पर गिर पड़ा। उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। कल्याणी जी और निशांत तुरंत कमरे में दौड़कर आए। कल्याणी जी ने घबराकर पूछा, “क्या हुआ गरिमा? इतनी बदहवास क्यों है बेटी?”

गरिमा ने रोते हुए मां के साथ हुए हादसे के बारे में बताया। कल्याणी जी ने तुरंत निशांत से कहा, “निशांत, देर मत कर। गाड़ी निकाल और गरिमा को तुरंत सूरत ले जा। इस वक्त वहां तेरी सास को अपनों की ज़रूरत है।”

निशांत ने अनिच्छा से सिर हिलाया। वह गरिमा को लेकर उसी रात सूरत अस्पताल पहुंच गया। अस्पताल की बदबू और सफेद दीवारों के बीच स्ट्रेचर पर दर्द से कराहती मां को देखकर गरिमा का कलेजा मुंह को आ गया। पिता रामरतन जी एक कोने में सिर थामे बेबस बैठे थे। राधिका की आंखें रो-रोकर सूज चुकी थीं।

अगली सुबह शारदा जी का लगभग चार घंटे लंबा ऑपरेशन चला। ऑपरेशन तो सफल रहा, लेकिन डॉक्टरों ने साफ कह दिया कि उम्र अधिक होने के कारण कम से कम तीन से चार महीने तक इन्हें बिस्तर से बिल्कुल नहीं हिलना है। पूरी तरह बेड रेस्ट रहेगा और हर छोटी-बड़ी ज़रूरत के लिए किसी को चौबीसों घंटे साथ रहना पड़ेगा।

शाम को पिता जी ने भारी मन से कहा, “राधिका की अंतिम वर्ष की बोर्ड परीक्षाएं अगले हफ्ते से शुरू हो रही हैं। उसका पूरा साल और भविष्य दांव पर लगा है। मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं अस्पताल की दवाइयां, घर का काम, राधिका की पढ़ाई और शारदा की सेवा अकेले कैसे संभालूंगा।”

गरिमा ने अपने पिता के कांपते हाथों को थामा और हिम्मत बंधाते हुए कहा, “पापा, आप चिंता क्यों करते हैं? मैं यहीं रुकूंगी। जब तक राधिका की परीक्षाएं खत्म नहीं हो जातीं और मां थोड़ी संभल नहीं जातीं, मैं मां की पूरी देखभाल करूंगी। आप बस राधिका की पढ़ाई पर ध्यान दीजिए।”

निशांत, जो बाहर गलियारे में खड़ा था, कमरे में आया और गरिमा को इशारे से बाहर बुलाया। बाहर आते ही निशांत के माथे पर त्योरियां चढ़ गईं। उसने दबी हुई मगर सख्त आवाज में कहा, “गरिमा, तुम्हारा दिमाग तो ठीक है? तुम एक महीने यहां कैसे रुक सकती हो? घर पर तान्या की शादी की तैयारियां चल रही हैं। मेहमानों के आने-जाने का सिलसिला शुरू होने वाला है। तुम यहां नहीं रुक सकतीं। हम एक काम करते हैं, एक अच्छी सी चौबीस घंटे की आया या नर्स रख देते हैं, उसका जितना भी खर्चा होगा, मैं दे दूंगा। तुम दो दिन बाद मेरे साथ अहमदाबाद वापस चलोगी।”

गरिमा स्तब्ध रह गई। उसने नम आंखों से निशांत की ओर देखा और हाथ जोड़कर बोली, “निशांत, समझने की कोशिश कीजिए। पैसे से नर्स मिल सकती है, पर इस वक्त मेरी मां को अपनी बेटी के सहारे की ज़रूरत है। नर्स सिर्फ दवा दे सकती है, लेकिन एक बीमार मां के माथे पर हाथ फेरकर जो सुकून उसकी बेटी दे सकती है, वो कोई और नहीं दे सकता। राधिका की परीक्षाएं हैं, पापा अकेले टूट जाएंगे। मैं सिर्फ एक महीने की बात कर रही हूं।”

निशांत ने चिढ़कर कहा, “नहीं गरिमा! शादी के बाद तुम्हारी पहली ज़िम्मेदारी तुम्हारा ससुराल है। वहां मम्मी जी अकेले सब कैसे संभालेंगी? तुम्हें वहां होना चाहिए। तुम कल सुबह मेरे साथ चल रही हो, बस बात खत्म।”

गरिमा लाचार होकर दीवार से टिक गई। वह अपने पति के प्यार और अपनी मां के प्रति अपने कर्तव्य के बीच बुरी तरह पिस रही थी।

उसी शाम निशांत किसी काम से अहमदाबाद वापस लौट गया और उसने गरिमा को हिदायत दी कि वह दो दिन में सामान समेटकर तैयार रहे, वह उसे लेने आएगा। गरिमा ने रात भर जागकर अपनी मां के पैर दबाए और आंसुओं को पीती रही।

अगले दिन दोपहर को गरिमा ने हिम्मत जुटाकर अहमदाबाद फोन मिलाया। फोन निशांत ने ही उठाया। गरिमा ने बहुत संकोच और गिड़गिड़ाते हुए कहा, “निशांत, प्लीज मेरी बात समझिए। मां अभी करवट भी नहीं ले पा रही हैं। मुझे कम से कम पंद्रह-बीस दिन का समय दीजिए। मैं दिन-रात एक करके वहां का काम भी फोन पर संभाल लूंगी, पर इस वक्त मुझे अपनी मां को छोड़कर आने के लिए मत कहिए।”

निशांत फोन पर उखड़ गया, “गरिमा, मैंने एक बार कह दिया न कि तुम तुरंत छुट्टी मिलते ही वापस आओगी! तुम्हें समझ क्यों नहीं आता कि तुम्हारा असली घर यह है? वहां के लिए एक सहायिका रख लो, पैसे की कमी नहीं है। तुम वहां रहकर सिर्फ अपनी मनमानी कर रही हो। यहां घर पर सब तुम्हारे बिना परेशान हो रहे हैं।”

गरिमा रो पड़ी। वह कुछ बोल पाती, तभी फोन के दूसरी तरफ से एक गंभीर, कड़क और जानी-पहचानी आवाज़ गूंजी।

“निशांत! फोन मुझे दे!”

यह कल्याणी जी थीं, जो काफी देर से कमरे के दरवाजे पर खड़ी अपने बेटे की बातें सुन रही थीं। उन्होंने निशांत के हाथ से लगभग झपटते हुए फोन ले लिया। निशांत सहम कर पीछे हट गया।

कल्याणी जी ने फोन कान पर लगाया और गरिमा से बेहद कोमल, वात्सल्य भरे स्वर में कहा, “बहू… मेरी बात सुन।”

गरिमा की घबराहट बढ़ गई, उसे लगा शायद सास भी अब नाराज़ होकर उसे डांटेंगी। उसने कांपती आवाज़ में कहा, “जी मां जी…”

कल्याणी जी ने कहा, “गरिमा, तू ज़रा भी परेशान मत हो और न ही अपनी आंखों में एक भी आंसू ला। तू वहीं रुकेगी। जब तक तेरी मां अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो जातीं और जब तक राधिका की परीक्षाएं खत्म नहीं हो जातीं, तू वहीं रहकर अपनी मां की सेवा करेगी। यह मेरा हुक्म भी है और एक मां का दूसरी मां के लिए फर्ज़ भी। सुन रही है न तू?”

गरिमा अवाक रह गई। उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ।

कल्याणी जी ने आगे कहा, “तान्या की शादी में अभी छह महीने हैं, और यहां घर पर मैं अभी ज़िंदा हूं। हम सब मिलकर सब संभाल लेंगे। एक बात हमेशा याद रखना बहू, तू हमारे घर की बहू बाद में बनी है, उस मां की बेटी पहले है जिसने तुझे नौ महीने अपनी कोख में रखकर, अपनी खुशियां मारकर तुझे इतना संस्कारवान बनाया है। जो लड़की अपनी जन्म देने वाली बीमार मां का साथ छोड़ दे, वो कभी अपने ससुराल की सच्ची सेवा कर ही नहीं सकती। तू बेफिक्र होकर अपनी मां की सेवा कर। हम सब तेरे साथ हैं।”

यह सुनते ही गरिमा की रुलाई फूट पड़ी, लेकिन यह आंसुओं का सैलाब दुख का नहीं, असीम कृतज्ञता और सम्मान का था। उसके मुंह से सिर्फ इतना निकला, “मां जी… मैं दुनिया की सबसे खुशनसीब बेटी हूं, जिसे भगवान ने एक नहीं, बल्कि दो-दो माएं दी हैं।”

फोन काटने के बाद कल्याणी जी घूमीं और उनकी नज़रें निशांत पर पड़ीं। निशांत नज़रें झुकाए खड़ा था।

कल्याणी जी की आंखों में गुस्सा और दिल में गहरी पीड़ा थी। उन्होंने अपने बेटे के कंधे पर हाथ रखा और बेहद ठहरे हुए, लेकिन चुभते हुए लहजे में पूछा, “निशांत, यह क्या तरीका है तुम्हारा? क्या यही संस्कार मैंने तुम्हें दिए हैं?”

निशांत ने धीरे से कहा, “मां, मैं तो बस इसलिए कह रहा था कि तान्या की शादी है और गरिमा का घर अब यह है…”

“उसका घर यह है, इसका मतलब यह तो नहीं कि जहां उसका बचपन बीता, जिसने उसे जीवन दिया, वो घर उसके लिए पराया हो गया?” कल्याणी जी ने बात काटते हुए कहा। “सुख में इंसान भले ही थोड़ा कम जाए, लेकिन दुख और विपत्ति के समय अगर अपने ही साथ खड़े न हों, तो फिर दुनिया में अपनों का क्या मोल रह जाता है? आज तेरी सास अस्पताल में लाचार पड़ी हैं, कायदे से तो इस समय तुझे वहां उनके पास खड़े होकर उनका बेटा बनना चाहिए था, उनके इलाज और सेवा की ज़िम्मेदारी उठानी चाहिए थी। और तू क्या कर रहा है? तू उनकी सेवा करने वाली उनकी बेटी को भी उनसे छीनने की कोशिश कर रहा है?”

निशांत का सिर और झुक गया। वह एक शब्द भी नहीं बोल सका।

कल्याणी जी ने अपनी बात आगे बढ़ाई, “निशांत, ज़रा सोच, कल को जब हमारी तान्या विदा होकर वडोदरा जाएगी, और कल को भगवान न करे अगर मुझे कोई गंभीर बीमारी हो जाए या मुझ पर कोई संकट आए, और तब तान्या का पति या उसके ससुराल वाले उसे मुझसे मिलने आने से रोक दें, यह कहकर कि अब तुम्हारा मायके से क्या वास्ता, तब तेरे कलेजे पर क्या बीतेगी? तब तू क्या कहेगा?”

यह बात निशांत के सीने में तीर की तरह लगी। उसने अपनी छोटी बहन तान्या का चेहरा याद किया और कल्पना मात्र से ही उसकी रूह कांप गई कि अगर तान्या के साथ ऐसा हुआ तो वह कितना तड़प उठेगा।

कल्याणी जी ने एक गहरी सांस ली और बोलीं, “तुझे शायद इस बात का अहसास कभी नहीं होगा निशांत, क्योंकि तू एक बेटा है। तुझे कभी अपना घर, अपने माता-पिता, अपना कमरा, अपना बचपन छोड़कर किसी पराए घर की चौखट को अपना बनाने के लिए नहीं जाना पड़ा। एक औरत जब शादी करके आती है, तो वह अपना पूरा संसार पीछे छोड़कर सिर्फ अपने पति के भरोसे नए रिश्ते जोड़ती है। और अगर वही पति उसके मायके की इज़्ज़त न करे, उसके माता-पिता के आंसुओं की कद्र न करे, तो अंदर ही अंदर उस औरत का मन टूटकर बिखर जाता है। पैसे से दवा खरीदी जा सकती है बेटा, पर आत्मीयता और सेवा नहीं।”

मां के एक-एक शब्द ने निशांत की बंद आंखों पर पड़े अहंकार और संकीर्णता के पर्दे को पूरी तरह फाड़ दिया था। उसे पहली बार अपनी गलती, अपने स्वार्थ और अपनी छोटी सोच का भयानक अहसास हुआ। उसकी आंखें शर्म से गीली हो गईं।

उधर सूरत में, तीन दिन बाद जब शारदा जी को अस्पताल से घर लाया गया, तो वे बहुत कमज़ोर थीं। उन्होंने बिस्तर पर लेटे-लेटे गरिमा से कहा, “गरिमा बेटी, तू अब अहमदाबाद लौट जा। वहां तेरी ननद की शादी का घर है। तेरी सास कहीं मन ही मन बुरा न मान जाएं कि बहू मायके आकर बैठ गई है। मैं किसी तरह संभाल लूंगी, तू अपने घर जा।”

गरिमा ने अपनी मां के हाथों को अपने गालों से लगाया और मुस्कुराते हुए कहा, “मां, आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। सासू मां ने खुद मुझे यहां रुकने के लिए कहा है। उन्होंने कहा है कि जब तक आप पूरी तरह ठीक नहीं हो जातीं, मैं कहीं नहीं जाऊंगी।”

शारदा जी की आंखों से खुशी के आंसू बह निकले। उन्होंने हाथ जोड़कर ऊपर वाले को देखा और बोलीं, “बेटी, तू सच में बहुत भाग्यशाली है। जिस घर में ऐसी देवी जैसी और समझदार सास हो, वह घर किसी मंदिर से कम नहीं होता। काश, ऐसी विशाल सोच और खुला दिल हर सास को मिले।”

अगले ही दिन शाम को अचानक घर की डोरबेल बजी। राधिका ने दरवाज़ा खोला तो सामने निशांत खड़ा था। उसके दोनों हाथों में ताजे फल, पौष्टिक सूप के डिब्बे और दवाइयों के पैकेट थे। उसके पीछे कल्याणी जी और हरीश जी भी मुस्कुराते हुए खड़े थे।

अचानक पूरे ससुराल को अपने घर के दरवाज़े पर देखकर गरिमा और उसके पिता हक्के-बक्के रह गए। गरिमा तुरंत आगे बढ़ी, लेकिन इससे पहले कि वह कुछ कहती, निशांत सीधा शारदा जी के कमरे में गया। उसने झुककर शारदा जी के चरण छुए और बेहद विनम्रता से बोला, “मां जी, अब आपकी तबीयत कैसी है? मुझे आने में थोड़ी देर हो गई, मुझे क्षमा कर दीजिएगा।”

शारदा जी ने कांपते हाथों से उसके सिर पर आशीर्वाद दिया, “अरे दामाद जी, आप सब यहां क्यों परेशान हुए?”

निशांत ने हाथ जोड़कर कहा, “मां जी, मुझे दामाद कहकर पराया मत कीजिए। अगर गरिमा आपकी बेटी है, तो मैं भी आपका ही बेटा हूं। जब तक आप पूरी तरह अपने पैरों पर नहीं चलने लगतीं, गरिमा यहीं रहेगी और हर शनिवार-रविवार को मैं भी यहीं आकर आपकी सेवा करूंगा। किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो, तो बस अपने इस बेटे को याद कीजिएगा।”

गरिमा एकटक अपने पति को देख रही थी। उसके चेहरे पर पश्चाताप और आंखों में बेपनाह प्यार था। उसने पलटकर अपनी सास कल्याणी जी की ओर देखा, जो एक कोने में खड़ी संतोष भरी मुस्कान के साथ अपने बेटे को देख रही थीं। गरिमा की आंखें भर आईं। उसने आगे बढ़कर कल्याणी जी के पैर छुए और उन्हें कसकर गले से लगा लिया। दिल ही दिल में उसने अपनी सास का वह उपकार स्वीकार किया, जिसने न केवल उसकी मां को सहारा दिया था, बल्कि उसके पति की सोच को भी हमेशा के लिए एक नया और खूबसूरत नज़रिया दे दिया था।

एक महीने बाद, जब शारदा जी वॉकर के सहारे धीरे-धीरे कदम बढ़ाने लगीं और राधिका के पेपर भी बहुत अच्छे बीत गए, तब गरिमा पूरे सम्मान और आत्मसंतोष के साथ अपने ससुराल अहमदाबाद लौटी। अब उसके कदम पहले से कहीं ज्यादा हल्के थे और ससुराल के प्रति उसका प्रेम और निष्ठा पहले से कहीं ज्यादा गहरी हो चुकी थी।

तान्या की शादी बड़े धूमधाम से संपन्न हुई। विदाई के वक्त जब तान्या रो रही थी, तो निशांत ने उसके कान में फुसफुसाया, “गुड़िया, रो मत। यह घर हमेशा तेरा था, है और रहेगा। जब भी मन करे, अपने इस भाई और मां के पास बेझिझक चली आना।” यह कहते हुए निशांत ने गरिमा की तरफ देखा, और दोनों की आंखें एक मूक सहमति और आदर से मुस्कुरा दीं।

एक बेटी जब अपना सब कुछ छोड़कर ससुराल आती है, तो वह पूरे दिल से उस घर को अपना ही मानती है। लेकिन जब उसी ससुराल में उसे एक ऐसी सास मिलती है जो बेटी और बहू के फर्क को मिटाकर उसके मायके के सम्मान और उसकी भावनाओं को अपनी प्राथमिकता बना लेती है, तो उस बहू के दिल में ससुराल के लिए आदर कई गुना बढ़ जाता है। सच तो यह है कि एक समझदार सास ही एक लड़के को अच्छा पति और एक संपूर्ण बेटा बना सकती है।

क्या आपको भी लगता है कि हर परिवार में अगर कल्याणी जी जैसी सोच वाली सास हो, तो कभी किसी बेटी को मायके और ससुराल के फर्ज़ के बीच रोना नहीं पड़ेगा? इस बारे में आपकी क्या राय है, हमें ज़रूर बताएं।

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