अनामिका अपनी लाल, सूजी हुई आँखों से उस नजारे को देखती रही। वह समझ नहीं पा रही थी कि यह क्या हो रहा है। क्या उसके परिवार को पता नहीं है कि वह किस हाल में वापस आई है? या वे सब इतने निष्ठुर हो गए हैं कि अपनी बेटी की उजड़ती दुनिया को देखकर भी हँस रहे हैं?
अनामिका ने भर्राई हुई, कांपती आवाज में पूछा, “पापा… पल्लवी… यह सब क्या है? तुम लोग इतने खुश क्यों हो? क्या तुम लोगों को नहीं पता कि मैं यहाँ किस हाल में आई हूँ?
रेलवे के रिटायर्ड सुपरवाइजर चंद्रप्रकाश जी के जीवन की सबसे बड़ी पूँजी उनकी चार बेटियाँ थीं—अनामिका, पल्लवी, कृतिका और तान्या। कोई आठ साल पहले पत्नी मालती के अचानक देहांत के बाद, जब पूरा संसार चंद्रप्रकाश जी को वीरान नजर आने लगा था, तब इन्हीं चार बेटियों के मासूम चेहरों ने उन्हें टूटने से बचा लिया था। उन्होंने अकेले ही इन चारों कलियों को धूप-छांव से बचाकर फूल बनाया था।
सबसे बड़ी बेटी अनामिका अब सत्ताईसवें साल में कदम रख चुकी थी। अनामिका का स्वभाव अत्यंत शांत, गंभीर और धैर्यवान था। माँ के जाने के बाद उसने अपनी किशोरावस्था की सारी अल्हड़ता को एक कोने में समेटकर खुद को तीनों छोटी बहनों के लिए माँ के सांचे में ढाल लिया था। सुबह सबके उठने से पहले जागना, सबकी पसंद का नाश्ता बनाना, कपड़े संभालना और किसी भी बहन की आँख में आंसू न आने देना—यह अनामिका का जीवन बन चुका था। उसने अपने सपनों, अपनी ख्वाहिशों को बहनों के भविष्य पर न्योछावर कर दिया था।
दूसरे नंबर की बहन पल्लवी बिल्कुल अलग मिजाज की थी। अत्यंत तेज-तर्रार, हाजिरजवाब और स्वाभिमानी। पल्लवी का सीधा सा सिद्धांत था—जो सच है, वो मुँह पर बोलो। चाहे सामने कोई भी हो, गलत बात पर समझौता करना उसने कभी नहीं सीखा था। तीसरे नंबर की कृतिका बचपन में हुए एक तेज बुखार की वजह से एक पैर से थोड़ा लड़खड़ा कर चलती थी। शारीरिक कमजोरी के बावजूद कृतिका का दिल गंगाजल जैसा निर्मल था। वह दिन-रात किताबों, चित्रकारी और घर के हल्के-फुल्के कामों में व्यस्त रहती और पूरे घर में सकारात्मकता की महक बिखेरती रहती थी। और सबसे छोटी थी तान्या, जो अभी कॉलेज के पहले साल में थी। तान्या घर की लाडली थी। उसमें अनामिका की ममता, पल्लवी का साहस और कृतिका की सहनशीलता—तीनों का खूबसूरत संगम था।
जब अनामिका सत्ताईस की हुई, तो चंद्रप्रकाश जी की चिंताएँ बढ़ने लगीं। एक रिटायर्ड कर्मचारी के पास अपनी सीमित पेंशन और बची-खुची जमा-पूँजी के अलावा कुछ न था। तभी अनामिका के लिए रिश्ते की बात आई। लड़का चंडीगढ़ की एक प्रतिष्ठित आर्किटेक्चर फर्म में कार्यरत था, नाम था अनुराग। अनुराग का परिवार संभ्रांत था, लेकिन वह खुद जमीन से जुड़ा और सुलझा हुआ नौजवान था। जब अनुराग और उसके पिता रिश्ते की बात करने आए, तो अनामिका की सादगी, उसकी शालीनता और उसके संस्कारों ने पहली ही नजर में उनका दिल जीत लिया। चंद्रप्रकाश जी ने हाथ जोड़कर कहा था, “समधी जी, मैं एक साधारण नौकरीपेशा रहा हूँ। अपनी बेटियों को संस्कार और शिक्षा ही दे पाया हूँ, किसी दिखावे की मेरी हैसियत नहीं है। पर अपनी तरफ से कोई कमी नहीं रहने दूँगा।” अनुराग के पिता ने मुस्कुराते हुए कहा था, “हमें सिर्फ आपकी यह संस्कारी बेटी चाहिए, बाकी ईश्वर की दी हुई सब कृपा है।”
शादी की तैयारियाँ जोरों पर शुरू हुईं। चारों बहनों ने मिलकर एक-एक रस्म को त्यौहार बना दिया। अनामिका की मेहंदी की रात पल्लवी और तान्या ने खूब ठुमके लगाए, तो कृतिका ने अपनी दीदी के हाथों पर सबसे गहरी रचने वाली मेहंदी सजाई। विदाई के वक्त जब अनामिका चंद्रप्रकाश जी के गले लगी, तो बूढ़े बाप की छाती से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। अनामिका ने मुड़कर अपनी तीनों बहनों को देखा और कहा, “पापा का ख्याल रखना, अब तुम ही सब कुछ हो।”
विवाह संपन्न हुआ। शादी के बाद दो दिन तक चंडीगढ़ में अनुराग के घर पर बहुत मधुर वातावरण रहा। अनुराग का व्यवहार अनामिका के प्रति अत्यंत प्रेमपूर्ण था। ससुराल के लोग भी बहुत आत्मीय थे। तीसरे दिन सुबह पगफेरे की रस्म भी पूरी हो चुकी थी और अनामिका शाम को वापस ससुराल आ गई थी। अनामिका अपने मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दे रही थी कि उसकी जैसी साधारण घर की लड़की को इतना अच्छा, समझदार और प्यार करने वाला जीवनसाथी मिला है।
लेकिन उस शाम, जब सूरज ढल चुका था और कमरे में हल्की सी ठंडक उतर आई थी, अचानक अनुराग कमरे में आया। उसके चेहरे पर रोज वाली वो खिली हुई मुस्कान नहीं थी। वह कुछ असहज, गंभीर और बेचैन दिख रहा था। वह कमरे में इधर-उधर टहलता रहा, जैसे कुछ कहने की हिम्मत जुटा रहा हो।
अनामिका ने शॉल को कंधे पर ठीक करते हुए पूछा, “क्या बात है? आप कुछ परेशान लग रहे हैं। तबीयत तो ठीक है आपकी?”
अनुराग ने नजरें चुराते हुए धीमे स्वर में कहा, “अनामिका… वो… चलो, तुम्हें तुम्हारे मायके छोड़ आता हूँ। अपना बैग पैक कर लो।”
अनामिका सन्न रह गई। उसके हाथ में पकड़ा कंगन छूटते-छूटते बचा। “मायके? पर अभी क्यों? पगफेरे की रस्म तो आज दोपहर ही पूरी हो चुकी है। और मुझे आए अभी चंद घंटे ही हुए हैं। अगर मैं इस वक्त दोबारा मायके जाऊँगी, तो आस-पड़ोस के लोग क्या कहेंगे? पापा तो घबरा जाएँगे!”
अनुराग की आवाज में एक अजीब सी झिझक, कृत्रिम सख्ती और थोड़ी घबराहट थी। उसने सीधे अनामिका की आँखों में न देखकर दीवार की तरफ देखते हुए कहा, “नहीं अनामिका… बात पगफेरे की नहीं है। बात कुछ और है।”
अनामिका का दिल किसी अनजाने डर से तेजी से धड़कने लगा। उसका गला सूखने लगा। उसने आगे बढ़कर अनुराग की बांह थाम ली, “बताइए ना, क्या बात है? मुझसे कोई भूल हो गई क्या? या सासू माँ को मेरा कोई तौर-तरीका पसंद नहीं आया? प्लीज, साफ-साफ कहिए, मेरी जान निकल रही है।”
अनुराग ने एक गहरी सांस भरी और दबे, भारी शब्दों में कहा, “अनामिका, शादी के समय तुम्हारे पापा ने हमारे परिवार से वादा किया था कि वे शादी में कोई कसर बाकी नहीं रखेंगे। उन्होंने कहा था कि वे अपनी सामर्थ्य से बढ़कर खातिरदारी करेंगे। लेकिन शायद… शायद बहुत बड़ी कमी रह गई।”
अनामिका के पैरों तले से जमीन खिसक गई। उसके चेहरे का रंग उड़ गया। उसकी कांपती हुई आवाज निकली, “कमी? कैसी कमी? पापा ने अपने जीवन की आखिरी बचत लगा दी थी आपके स्वागत में। उन्होंने अपनी पेंशन का बड़ा हिस्सा शादी के टेंट, हलवाई और कपड़ों में खर्च कर दिया। फिर ऐसी क्या कमी रह गई?”
अनुराग ने मुंह फेरते हुए कहा, “कमी यह रह गई कि तुम्हारे पापा ने सब कुछ तो किया, लेकिन शादी में कैश—यानी नकद लिफाफा—एक फूटी कौड़ी भी नहीं दी। हमारे समाज में क्या लेन-देन का कोई नियम नहीं होता? हमारे खानदान की भी कोई नाक है। इसलिए बेहतर होगा कि तुम अभी कुछ दिन अपने घर जाकर रहो।”
यह सुनते ही अनामिका के सीने पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा। जिस अनुराग को वह समझदार, आधुनिक और सुसंस्कृत समझ रही थी, वह भी दहेज का लोभी निकला? वही पुराना घिसा-पिटा रूप?
अनामिका की आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली। वह बुरी तरह कांपने लगी। अपने बूढ़े पिता का लाचार चेहरा, उनकी झुकी हुई कमर और उनकी गरीबी की तस्वीर अनामिका की बंद आँखों के सामने नाचने लगी। अनामिका बिना सोचे-समझे सीधे अनुराग के पैरों में गिर पड़ी।
उसने अनुराग के जूते पकड़ लिए और हिचकियों के बीच रोते हुए बोली, “भगवान के लिए ऐसा मत कीजिए! मुझे इस तरह घर से मत निकालिए। मेरे पापा बहुत स्वाभिमानी इंसान हैं, पर उनके पास अब देने के लिए कुछ नहीं बचा है। जो था, उन्होंने मेरी शादी में लुटा दिया। हमारी इतनी हैसियत नहीं है कि हम आपको लाखों रुपये नकद दे सकें। अगर समाज को पता चला कि आप मुझे इस वजह से वापस छोड़ आए हैं, तो मेरे पापा यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे, उनका दिल का दौरा पड़ जाएगा। मेरी तीन छोटी बहनें हैं, उनकी शादियाँ कैसे होंगी? आप जो सजा देना चाहें मुझे दीजिए, मुझे नौकरानी बनाकर रख लीजिए, पर मेरे पापा के स्वाभिमान को मत कुचलिए!”
अनुराग एक पल के लिए एकदम खामोश हो गया। उसकी आँखों की पुतलियाँ हिलीं, उसके चेहरे पर एक अजीब सी तड़प उभरी, लेकिन उसने तुरंत खुद को कड़ा दिखाते हुए अनामिका को हाथ पकड़कर उठाया और कहा, “बस, बहुत हुआ। मैंने जो फैसला कर लिया, सो कर लिया। चलो, अपना सामान बाँधो।”
अनामिका का वजूद बिखर चुका था। उसका आत्मसम्मान, उसका विश्वास और उसका संसार धूल में मिल चुका था। उसने रोते-रोते अपना छोटा सा सूटकेस उठाया, अपने आंसुओं को पल्लू से दबाया और सिर झुकाकर अनुराग के पीछे-पीछे गाड़ी में बैठ गई।
पूरे रास्ते गाड़ी में सन्नाटा पसरा रहा। अनामिका खिड़की से बाहर अंधेरी सड़कों को देख रही थी और सोच रही थी कि वह अपने पिता और बहनों को क्या मुँह दिखाएगी। कैसे कहेगी कि जिस घर में उसे रानी बनाकर भेजा गया था, वहाँ से उसे चंद रुपयों की खातिर धक्के मारकर निकाल दिया गया? क्या कहेगी वो पल्लवी से, जो हमेशा कहती थी कि ‘जीजाजी बहुत सुलझे हुए हैं’?
गाड़ी अंबाला में उनके घर के बाहर रुकी। घर के मुख्य द्वार पर हल्की रोशनी जल रही थी। अनामिका के कदम उठ नहीं रहे थे, उसके घुटने कांप रहे थे। अनुराग ने उसका सूटकेस उठाया और आगे-आगे दरवाजे की ओर बढ़ गया। अनामिका ने कांपते हाथों से दरवाजे को छुआ।
दरवाजा खुला था। जैसे ही वे दोनों दालान में दाखिल हुए, अनामिका ने जो देखा, उसने उसके होश उड़ा दिए।
घर में किसी मातम या चिंता का कोई नामोनिशान नहीं था। घर के भीतर का माहौल इतना जीवंत, उल्लासपूर्ण और रंगीन था कि अनामिका को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ। पूरे कमरे में गेंदे के फूलों और मोगरे की लड़ियाँ सजी थीं। दीवार पर रंग-बिरंगे गुब्बारे टंगे थे।
कमरे के बीच में चंद्रप्रकाश जी एक नई खादी की सफेद कमीज पहने, चेहरे पर असीम संतोष और मुस्कान लिए खड़े थे। उनके बगल में पल्लवी, कृतिका और तान्या नए सलवार-सूट पहने, खिलखिलाती हुई खड़ी थीं। उनके चेहरों पर इतनी चमक थी मानो आज कोई बहुत बड़ा त्यौहार हो। अनुराग भी दरवाजे पर सूटकेस रखकर तुरंत उन सबके बीच जाकर खड़ा हो गया और अपनी बाँहें फैलाकर मुस्कुराने लगा।
अनामिका अपनी लाल, सूजी हुई आँखों से उस नजारे को देखती रही। वह समझ नहीं पा रही थी कि यह क्या हो रहा है। क्या उसके परिवार को पता नहीं है कि वह किस हाल में वापस आई है? या वे सब इतने निष्ठुर हो गए हैं कि अपनी बेटी की उजड़ती दुनिया को देखकर भी हँस रहे हैं?
अनामिका ने भर्राई हुई, कांपती आवाज में पूछा, “पापा… पल्लवी… यह सब क्या है? तुम लोग इतने खुश क्यों हो? क्या तुम लोगों को नहीं पता कि मैं यहाँ किस हाल में आई हूँ?”
पल्लवी आगे बढ़ी। उसके चेहरे पर वही पुरानी शरारत और तेज मुस्कान थी। उसने अनामिका के दोनों कंधे पकड़कर हल्के से झकझोरा और बोली, “अरे मेरी भोली दीदी! ज़रा अपने इस खूबसूरत दिमाग पर ज़ोर तो डालो! अपने आंसुओं के समंदर से बाहर निकलो और सोचो कि आज की तारीख क्या है? आज क्या है?”
अनामिका ने शून्य में देखा। पिछले दस दिनों की भागदौड़, शादी की रस्मों, विदाई के आंसुओं और आज शाम के उस भयानक सदमे के बीच वह सब कुछ भूल चुकी थी। उसने तारीख याद करने की कोशिश की।
तभी कृतिका ने अपनी छड़ी को दीवार से टिकाया और लड़खड़ाते कदमों से आगे बढ़कर अनामिका का हाथ अपने हाथ में ले लिया। “दीदी, यहाँ आओ ना…”
जैसे ही अनामिका दो कदम आगे बढ़ी, सबसे छोटी तान्या ने पलक झपकते ही कमरे की मुख्य लाइट बंद कर दी।
अंधेरा होते ही एक कोने में रखी मोमबत्तियाँ जगमगा उठीं। मेज पर अनामिका का सबसे पसंदीदा होममेड मलाई-केक सजा हुआ था, जिसके ऊपर जलती हुई मोमबत्तियों की सुनहरी रोशनी नाच रही थी। और ठीक उसी पल, तीनों बहनों ने एक साथ ताली बजाते हुए, बेहद सुरीले और भावुक स्वर में गाना शुरू कर दिया—
“हैप्पी बर्थडे टू यू… हैप्पी बर्थडे टू यू… हैप्पी बर्थडे प्यारी अनामिका दीदी… हैप्पी बर्थडे टू यू!”
अनामिका जड़वत खड़ी रह गई।
आज उसका अठाइसवां जन्मदिन था!
वह दिन, जिसे वह खुद भूल चुकी थी, उसकी तीनों बहनों और उसके पिता के सीने में धड़क रहा था। अनामिका की आँखों में जो आंसू कुछ देर पहले अपमान और भय के थे, वे एक ही पल में पिघलकर कृतज्ञता, आश्चर्य और असीम वात्सल्य की बाढ़ बन गए। उसके पैरों के नीचे की जमीन अब कांप नहीं रही थी, बल्कि उसे लग रहा था मानो वह बादलों पर खड़ी हो।
अनामिका ने नम आँखों से घूमकर अनुराग की तरफ देखा, जो कोने में खड़ा मंद-मंद मुस्कुरा रहा था।
अनामिका की आवाज भीग गई, “तो… तो वो सब? वो नकद पैसों की मांग… वो दहेज के ताने… वो मुझे घर छोड़ने की धमकी… वो सब झूठ था?”
अनुराग खिलखिलाकर हँस पड़ा। उसने आगे बढ़कर अनामिका के दोनों हाथ थाम लिए और बहुत ही प्यार से कहा, “अनामिका, मुझे माफ कर देना अगर मेरी बातों ने तुम्हारे दिल को ठेस पहुँचाई। लेकिन भाई, जैसी स्क्रिप्ट मुझे तुम्हारी इन तीनों बहनों ने फोन पर दी थी, मुझे बिल्कुल वैसा ही अभिनय करना पड़ा! तुम्हारी बहन पल्लवी ने मुझे फोन करके सख्त हिदायत दी थी कि ‘जीजाजी, चाहे जो हो जाए, दीदी को शाम आठ बजे से पहले घर लेकर आना है। कोई ऐसा बहाना बनाइएगा कि दीदी बिना किसी शक के तुरंत आपके साथ चल पड़े!’ अब तुम ही बताओ, अगर मैं सच कहता तो क्या तुम इतनी जल्दी सामान बाँधकर आतीं? तुम तो कहतीं कि अभी ससुराल में सबको चाय पिलानी है, काम करना है। इसलिए मुझे यह बुरा इंसान बनने का नाटक करना पड़ा।”
पल्लवी ने हँसते हुए अनुराग की पीठ थपथपाई, “वाह जीजाजी! क्या शानदार एक्टिंग की आपने! ऑस्कर मिलना चाहिए आपको तो!”
कृतिका ने अनामिका के गले में बाहें डालते हुए कहा, “दीदी, आपने अपनी पूरी जिंदगी हमें माँ बनकर पाला। अपने जन्मदिन पर आपने कभी एक नया सूट तक नहीं सिलवाया, हमेशा हमारे लिए फ्रॉक और कॉपियाँ खरीदीं। आज जब आपकी शादी हो गई, तो हम यह कैसे भूल सकते थे कि शादी के बाद आपका पहला जन्मदिन है? हमने अपनी पॉकेट मनी और सिलाई के पैसों से आपके लिए यह केक और तोहफा तैयार किया था। हम बस चाहते थे कि आपका यह दिन हम सब एक साथ मिलकर मनाएँ।”
तान्या ने एक सुंदर सी हस्तनिर्मित डायरी अनामिका के हाथ में थमाई, जिसमें पिछले दस सालों की उनकी चारों बहनों की पुरानी तस्वीरें और उनके बचपन के संस्मरण लिखे थे।
अनामिका अपने आंसुओं को रोक नहीं पाई। वह अपनी तीनों बहनों को अपनी बाहों में समेटकर फूट-फूट कर रो पड़ी। वे चारों बहनें एक-दूसरे से इस कदर लिपटी थीं जैसे किसी वटवृक्ष की मजबूत शाखाएं किसी भी आंधी में अलग न होने की कसम खा रही हों।
कमरे के एक कोने में खड़े चंद्रप्रकाश जी की आँखें भी भीगी हुई थीं, पर उनका सीना गर्व से चौड़ा था। एक साधारण रिटायर्ड क्लर्क, जिसके पास दुनियावी दौलत के नाम पर कोई बड़ा बैंक बैलेंस या सोना-चांदी नहीं था, आज खुद को दुनिया का सबसे अमीर इंसान महसूस कर रहा था। उसके पास एकता, अटूट प्रेम और संस्कारों की वह अक्षय संपदा थी, जिसे दुनिया की कोई ताकत नहीं खरीद सकती थी।
चंद्रप्रकाश जी ने आगे बढ़कर अपनी चारों बेटियों के सिर पर हाथ रखा और अनुराग के कंधे को थपथपाया।
“जब तक मेरे घर में यह प्यार और विश्वास जिंदा है,” चंद्रप्रकाश जी ने भरे गले से कहा, “तब तक मेरी बेटियाँ कभी अनाथ या बेसहारा नहीं हो सकतीं। अनुराग बेटा, तुमने आज इस परिवार के मान को जो सम्मान दिया है, उसने मुझे जीवन भर का सुकून दे दिया।”
चारों बहनों ने केक काटा। पहला टुकड़ा अनामिका ने अपने पिता को खिलाया, फिर अनुराग को और फिर अपनी तीनों बहनों को। चारों बहनों ने एक सुर में हँसते हुए कहा, “एक दूसरे से करते हैं प्यार हम… एक दूसरे के लिए जीते हैं हम!”
उस रात उस छोटे से घर की दीवारों में जो उजास फैली थी, वह किसी भी महल की रोशनी से कहीं ज्यादा दिव्य थी। यह साबित हो चुका था कि रिश्ते रुपयों और दहेज की बुनियाद पर नहीं, बल्कि निस्वार्थ प्रेम, त्याग और एक-दूसरे के सम्मान पर टिके होते हैं।
प्रिय पाठकों,
क्या बहनों का ऐसा निस्वार्थ और अटूट प्यार आज के इस दौर में सबसे बड़ी प्रेरणा नहीं है? क्या आपको लगता है कि समाज में दहेज और दिखावे की खोखली दीवारों से कहीं ऊँचा स्थान पारिवारिक संस्कारों और आपसी समझदारी का होना चाहिए? इस भावनात्मक और सुखद अंत वाली कहानी ने आपके दिल में क्या भाव जगाए, हमें नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखकर बताएं।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद।