ढलती उम्र का आईना

जानकी जी ने बिना एक पल गँवाए सहारा देकर रोहिणी को धीरे-धीरे उठाया, लेकिन जब देखा कि रोहिणी वजन बिल्कुल नहीं ले पा रही है, तो उन्होंने अपनी कमजोर देह का पूरा सहारा बहू को दे दिया। किसी तरह घसीटते हुए वे उसे हॉल के सोफे तक लाईं। जानकी जी की खुद की सांस फूल चुकी थी, उनके अपने जोड़ों में दर्द की लहरें उठ रही थीं, लेकिन उन्होंने उफ तक नहीं की। उन्होंने तुरंत रोहिणी के पैर के नीचे तकिया लगाया, फ्रिज से बर्फ लाकर सेंक करना शुरू किया और कांपते हाथों से आकाश को फोन मिलाकर तुरंत घर लौटने को कहा।

  शाम के करीब चार बज रहे थे। बाहर हल्की हवा चल रही थी और बंगले के मुख्य द्वार पर एक महँगी कैब आकर रुकी। गाड़ी से रोहिणी उतरी। उसके चेहरे पर शहर के सबसे नामी स्पा और सैलून से कराए गए महंगे हर्बल फेशियल, मेनीक्योर और पेडीक्योर की चमक साफ झलक रही थी। वह अपनी उँगलियों के नए चमकीले नेल आर्ट को निहारती हुई, हाथों में शॉपिंग बैग्स लिए बड़े इत्मीनान से घर के मुख्य दरवाजे की तरफ बढ़ी। उसका मूड बहुत अच्छा था, क्योंकि उसने पूरे तीन घंटे खुद को लाड़-प्यार देने में बिताए थे।

जैसे ही रोहिणी ने घर का मुख्य दरवाजा खोला, उसके कानों में ठहाकों और पुरानी बातों की मीठी चहचहाहट गूँज उठी। बैठक में माहौल एकदम अलग था। कालीन पर और सोफे पर उसकी सास जानकी जी अपनी तीन पुरानी हमउम्र सहेलियों के साथ बैठी हुई थीं। बीच की गोल मेज पर भुने हुए मखाने, अदरक वाली चाय की खाली प्यालियाँ और ककड़ी-टमाटर के टुकड़े रखे हुए थे। कोई अपने पोते के नटखटपन का किस्सा सुना रहा था, तो कोई अपने घुटनों के दर्द के घरेलू नुस्खों पर खिलखिला रही थी। जानकी जी के चेहरे पर बहुत दिनों बाद एक बेपरवाह, खिली हुई मुस्कान थी।

लेकिन रोहिणी का कदम वहीं ठिठक गया। जो सुकून वह पार्लर से समेट कर लाई थी, वह एक ही पल में काफूर हो गया। उसके माथे पर गहरी सलवटें उभर आईं और आँखों में चिढ़ तैर गई। उसने मन ही मन सोचा—”हद है! जब से इनकी रीढ़ की हड्डी और घुटनों में तकलीफ बढ़ी है और बाहर टहलने जाना बंद हुआ है, तब से यह नया ढकोसला शुरू हो गया है। अब घर को ही धर्मशाला और मोहल्ला क्लब बना दिया है। पूरा दिन आराम से अपनी दुनिया में रहो तो चैन नहीं, यहाँ पूरी महफिल जमा ली। अब अगर मैं बिना पूछे कमरे में जाऊँगी तो ताने मिलेंगे कि बहू को तमीज नहीं, और चाय-नाश्ते की पूछ-परख करूँ तो मेरा सारा आराम मिट्टी में मिल जाए।”

रोहिणी ने किसी से नजरें नहीं मिलाईं। उसने अपनी चाल तेज की और सैंडल की खट-खट की आवाज के साथ बिना किसी को ‘नमस्ते’ कहे सीधे अपने बेडरूम की तरफ बढ़ गई। जाते-जाते उसने कमरे का दरवाजा इतनी जोर से बंद किया कि उसकी धमक बैठक तक साफ महसूस हुई। बैठक में पल भर के लिए सन्नाटा छा गया। जानकी जी की सहेली कांता जी ने धीमी आवाज में कहा, “जानकी, लगता है बहू दफ्तर या बाहर से बहुत थक कर आई है। हम लोगों की वजह से उसे शायद आराम में खलल पड़ा। हमें अब चलना चाहिए।”

जानकी जी ने बात को संभालते हुए चेहरे पर फीकी मुस्कान लाई और कहा, “अरे नहीं कांता, आजकल की भागदौड़ में बच्चे जल्दी तनाव में आ जाते हैं। तुम लोग बैठो न।” लेकिन माहौल का सहजपन टूट चुका था। कुछ ही मिनटों में तीनों सहेलियाँ उठकर विदा हो गईं।

घर खाली होते ही जानकी जी धीरे-धीरे लाठी के सहारे कदमों को संभालती हुई बहू के कमरे के पास पहुँचीं। दरवाजा खुला हुआ था और रोहिणी ड्रेसिंग टेबल के सामने बैठकर अपने चेहरे पर लगी क्रीम को हल्के हाथों से मिला रही थी।

जानकी जी ने बहुत ही ममतामयी आवाज में पूछा, “रोहिणी बेटा, सब ठीक तो है न? चेहरे पर कुछ परेशानी दिख रही है, तबियत तो ठीक है तुम्हारी?”

रोहिणी ने हाथ में पकड़ा कॉटन पैड झटके से मेज पर पटका और मुड़कर तीखे स्वर में बोली, “मेरी तबियत को क्या होना है माँ जी? आप लोग ठीक रहने दें तब न! रोज-रोज कोई न कोई नया बहाना ढूंढ ही लेती हैं मुझे परेशान करने का। जानती हैं कि मैं हफ्ते भर की थकान के बाद आज थोड़ा वक्त खुद के लिए निकाल कर आई थी। घर लौटी तो लगा शांति मिलेगी, पर यहाँ तो पूरा मेला लगा रखा था। जब आपसे बाहर चला-फिरा नहीं जाता, तो घर पर ही सहेलियों का जमघट जुटाना क्या जरूरी है? कल को कोई कहेगा कि बहू घर पर बूढ़ी सास की सहेलियों की खिदमत नहीं करती, तो बदनामी किसकी होगी? कभी तो इस उम्र में इंसान को थोड़ा शांत और एकांत पसंद होना चाहिए।”

रोहिणी की तीखी बातें जानकी जी के सीने में किसी खंजर की तरह चुभीं। जिस सास ने कभी अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं किया था, उसकी आँखें भर आईं। मगर उन्होंने खुद को संभाला। उनकी आवाज में गुस्सा नहीं, बल्कि जिंदगी की तपिश से जन्मा गहरा अनुभव और एक बेबाक सच्चाई थी।

जानकी जी ने गहरी सांस ली और सीधे रोहिणी की आँखों में देखते हुए शांत स्वर में कहा, “बहू, अपनी जवानी, अपनी ताकत और इस रूप-रंग का इतना अहंकार ठीक नहीं होता। उम्र का पहिया कभी किसी के लिए थमता नहीं है। आज मैं लाठी के सहारे हूँ, कल तुम भी इस मोड़ पर खड़ी होगी। बुढ़ापा तो तुम्हारा भी आना तय है रोहिणी… तब क्या करोगी? क्या तब तुम सिर्फ इसलिए एक कोने में घुट-घुट कर मर जाओगी क्योंकि तुम्हारी देह शिथिल हो चुकी है? क्या उम्र ढलते ही इंसान को अपनों से बतियाना, हँसना और जीना छोड़ देना चाहिए? बुढ़ापे में दवाइयों से ज्यादा इंसान को बातों और हमउम्र के साथ की जरूरत होती है। पर खैर, तुम्हें यह बात आज समझ नहीं आएगी, क्योंकि अभी तुम्हारे हिस्से का सूरज सिर पर तप रहा है, ढला नहीं है।”

इतना कहकर जानकी जी बिना किसी बहस के अपनी लाठी की टेक लिए धीमे कदमों से अपने कमरे में चली गईं।

रोहिणी के सीने में सास की बात सुनकर एक अजीब सी बेचैनी भर गई, लेकिन उसके भीतर का अहंकार अभी भी बड़ा था। उसने खुद से कहा, “हाँ-हाँ, हमेशा की तरह भावनात्मक भाषण शुरू! मैं तो बस प्राइवेसी चाहती हूँ, इसमें बुराई क्या है?” उसने कमरे का दरवाजा बंद कर लिया और एयर कंडीशनर चलाकर सोफे पर लेट गई, लेकिन कानों में बार-बार वही वाक्य गूँज रहा था—”तब क्या तुम जीना छोड़ दोगी?”

शाम ढलते ही रोहिणी का पति आकाश घर लौटा। आकाश एक समझदार और संवेदनशील व्यक्ति था, जो माँ और पत्नी दोनों के स्वभाव को भली-भाँति जानता था। उसने देखा कि घर में अजीब सी खामोशी है। रसोई में काम करने वाली बाई चुपचाप काम कर रही थी, माँ अपने कमरे में बंद थीं और रोहिणी अपने लैपटॉप पर कुछ काम करने का नाटक कर रही थी। आकाश ने रोहिणी से बात करने की कोशिश की, तो उसने चिढ़कर कह दिया कि उसका सिर दर्द कर रहा है।

रात का खाना किसी तरह बेमन से खाया गया। मेज पर किसी ने कोई बात नहीं की। जानकी जी ने बस एक रोटी खाई और पानी पीकर उठ गईं। आकाश ने अपनी माँ की उदास आँखों को पढ़ लिया था, लेकिन उसने रात को कोई विवाद खड़ा करना उचित नहीं समझा।

अगले दिन रविवार था। आकाश को सुबह किसी पारिवारिक काम से कुछ घंटों के लिए बाहर जाना पड़ा। रोहिणी घर में अकेली थी। दोपहर के समय उसने सोचा कि बालकनी में रखे गमलों को ठीक कर ले। वह बालकनी की तरफ गई। उसी समय उसके पैर के नीचे अचानक पानी का गीलापन आया और पैर बुरी तरह फिसल गया।

इससे पहले कि रोहिणी खुद को संभाल पाती, वह जोर से फर्श पर गिरी और उसका दायाँ पैर एक भारी गमले के कोने से बुरी तरह टकरा गया।

“आह! माँ!” रोहिणी के मुँह से असहनीय दर्द की एक चीख निकल गई।

दर्द इतना भयानक था कि उसकी आँखों के आगे अंधेरा छा गया। उसने उठने की कोशिश की, लेकिन टखने में ऐसी चुभन हुई जैसे हड्डी टूट गई हो। वह कराहते हुए फर्श पर ही गिर पड़ी। उसका फोन ड्राइंग रूम के सोफे पर रखा था और वह खुद को घसीट कर वहाँ तक ले जाने की हालत में भी नहीं थी।

उसकी चीख सुनकर जानकी जी, जो दूसरे कमरे में आराम कर रही थीं, घबराकर अपनी लाठी संभालती हुई भागी चली आईं। बहू को जमीन पर तड़पते देख वह अपना घुटनों का सारा दर्द भूल गईं। वह लड़खड़ाते कदमों से रोहिणी के पास पहुँचीं और जमीन पर ही घुटनों के बल बैठ गईं।

“रोहिणी! क्या हुआ बेटा? कहाँ चोट लगी?” जानकी जी के चेहरे पर जो भय और फिक्र थी, वह किसी सगी माँ से कम नहीं थी।

“माँ जी… पैर… बहुत दर्द हो रहा है, मुझसे उठा नहीं जा रहा,” रोहिणी दर्द से रो पड़ी।

जानकी जी ने बिना एक पल गँवाए सहारा देकर रोहिणी को धीरे-धीरे उठाया, लेकिन जब देखा कि रोहिणी वजन बिल्कुल नहीं ले पा रही है, तो उन्होंने अपनी कमजोर देह का पूरा सहारा बहू को दे दिया। किसी तरह घसीटते हुए वे उसे हॉल के सोफे तक लाईं। जानकी जी की खुद की सांस फूल चुकी थी, उनके अपने जोड़ों में दर्द की लहरें उठ रही थीं, लेकिन उन्होंने उफ तक नहीं की। उन्होंने तुरंत रोहिणी के पैर के नीचे तकिया लगाया, फ्रिज से बर्फ लाकर सेंक करना शुरू किया और कांपते हाथों से आकाश को फोन मिलाकर तुरंत घर लौटने को कहा।

जब तक आकाश घर पहुँचा, जानकी जी रोहिणी के पास बैठी उसका सिर सहला रही थीं और दर्द कम करने के लिए हल्दी वाला गर्म दूध बनाकर ले आई थीं। रोहिणी सोफे पर लेटी अपनी सास के चेहरे को देख रही थी। वह चेहरा, जिस पर उसने कल ही न जाने कितने ताने जड़े थे, आज उसी चेहरे पर उसके लिए चिंता की गहरी लकीरें खिंची हुई थीं।

आकाश के आते ही दोनों रोहिणी को नजदीकी हड्डी के अस्पताल ले गए। एक्स-रे के बाद डॉक्टर ने बताया कि टखने में गंभीर हेयरलाइन फ्रैक्चर है और लिगामेंट बुरी तरह खिंच गया है। डॉक्टर ने प्लास्टर चढ़ा दिया और सख्त हिदायत दी—”कम से कम चार से छह हफ्ते तक पूरा बेड रेस्ट। पैर पर बिल्कुल वजन नहीं पड़ना चाहिए। चलना-फिरना पूरी तरह बंद।”

अस्पताल से जब रोहिणी घर लौटी, तो उसकी दुनिया पूरी तरह बदल चुकी थी। जो लड़की कल तक पूरे घर में अपनी तेज रफ्तार से चलती थी, हर काम अपनी मर्जी से करती थी, वह आज पूरी तरह एक बिस्तर और व्हीलचेयर पर सिमट कर रह गई थी।

शुरुआती दो-तीन दिन तो रोहिणी ने मोबाइल और टीवी देखकर बिता लिए, लेकिन चौथे दिन से उसका दम घुटने लगा। आकाश सुबह दफ्तर चला जाता। घर में सन्नाटा पसर जाता। वह अपनी मर्जी से पानी का एक गिलास तक लेने के लिए मोहताज थी। उसे हर छोटी-बड़ी जरूरत के लिए किसी को आवाज लगानी पड़ती थी। कभी पानी चाहिए, कभी दवाई, कभी करवट बदलने में मदद।

और यह सारा काम कोई और नहीं, बल्कि वही जानकी जी कर रही थीं, जिनकी बीमारी और उम्र का रोहिणी ने कभी मजाक उड़ाया था। जानकी जी समय पर उसका नाश्ता लातीं, उसे दवाइयाँ देतीं और जब वह दर्द से कराहती तो प्यार से उसकी पीठ सहलातीं।

एक हफ्ता बीतते-बीतते रोहिणी चिड़चिड़ी और अवसादग्रस्त होने लगी। उसका मन करता कि कोई उससे बात करे, कोई उसके पास बैठे। टीवी के पर्दे और सोशल मीडिया की स्क्रीन उसे बेजान और डरावनी लगने लगीं। उस चारदीवारी के सन्नाटे में उसे महसूस हुआ कि लाचारी और अकेलापन इंसान की आत्मा को कैसे धीरे-धीरे नोचता है।

तभी एक दोपहर, जब रोहिणी अपने कमरे में खिड़की से बाहर खाली आसमान को देखकर अपनी बेबसी पर आँसू बहा रही थी, जानकी जी कमरे में आईं। उनके हाथ में सूप का कटोरा था।

रोहिणी ने रोते हुए कहा, “माँ जी, मैं पागल हो जाऊँगी इस कमरे में पड़े-पड़े। कोई बात करने वाला नहीं है। ऐसा लगता है जैसे मैं किसी जेल में बंद हूँ। जिंदगी कितनी बोझिल हो गई है। मुझसे यह अकेलापन अब सहा नहीं जाता।”

जानकी जी ने सूप की कटोरी मेज पर रखी और बहुत ही प्यार से रोहिणी के सिर पर हाथ फेरा।

उन्होंने बहुत शांत और मर्मस्पर्शी स्वर में कहा, “रोहिणी बेटा, यही तो अकेलापन होता है। जब शरीर साथ छोड़ दे और दुनिया अपनी रफ्तार से आगे भाग रही हो, तब इंसान को सिर्फ चार दीवारों की छत नहीं, बल्कि कुछ ऐसे कंधों और चेहरों की जरूरत होती है जो उसे महसूस कराएं कि वह अभी भी जिंदा है। जब मेरे पैर साथ नहीं देते, तो मेरी सहेलियाँ आकर मेरे अतीत के दिनों को जिंदा कर देती हैं। हम थोड़ी देर हँस लेते हैं, अपने सुख-दुख बाँट लेते हैं, तो लगता है कि जिंदगी अभी खत्म नहीं हुई है। उस दिन जब तुमने कहा था कि घर में जमात क्यों इकट्ठा करती हैं, तो मुझे गुस्सा नहीं आया था बेटा, बस दुख हुआ था कि तुम उस दर्द को नहीं समझ पाईं जो शरीर के थक जाने के बाद आत्मा महसूस करती है।”

सास का एक-एक शब्द रोहिणी के दिल की गहराइयों में उतरता चला गया। उसे लगा जैसे किसी ने उसकी बंद आँखों पर से अज्ञान का भारी पर्दा हटा दिया हो। उसे अपनी कही हर बात याद आने लगी—“जब चला नहीं जाता तो जमात क्यों इकट्ठा करती हैं… बुढ़ापे में शांत रहना चाहिए…”

रोहिणी की आँखों से पश्चाताप के आँसू छलक पड़े। उसने लड़खड़ाते हुए अपने दोनों हाथ जोड़े और जानकी जी के हाथों को थाम लिया।

“माँ जी, मुझे माफ कर दीजिए,” रोहिणी सिसकते हुए बोली। “मैंने अपनी जवानी और ताकत के नशे में आपको कितना दुख पहुँचाया। मैंने कभी सोचा ही नहीं कि शरीर तो सिर्फ एक जरिया है, असली जिंदगी तो रिश्तों और अपनों के साथ में है। आज जब मैं सिर्फ कुछ दिनों के लिए इस बिस्तर पर लाचार हुई हूँ, तो मेरा दम घुट रहा है। आपने तो सालों की बीमारी और इस उम्र को इतनी जिंदादिली से संभाला हुआ है। मैंने आपके जीने के हक को छीनने की कोशिश की थी, मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया है माँ जी।”

जानकी जी ने आगे बढ़कर रोहिणी को गले से लगा लिया। उस एक आलिंगन ने सालों से चली आ रही सास-बहू की कड़वाहट और दीवारों को पल भर में ढहा दिया।

अगले दो हफ्ते रोहिणी के ठीक होने के साथ-साथ रिश्तों के पनपने के दिन थे। रोहिणी अब जानकी जी से अपने बचपन के किस्से सुनती, उनके साथ बैठती। जानकी जी उसे रामायण और पुरानी कहानियों के रोचक प्रसंग सुनातीं।

तीन हफ्ते बाद, जब डॉक्टर ने रोहिणी को व्हीलचेयर के सहारे थोड़ा बाहर बैठने की अनुमति दी, तो रोहिणी ने आकाश से एक विशेष आग्रह किया। उसने कहा कि वह शाम को एक छोटी सी पार्टी रखना चाहती है।

शाम के पाँच बजे थे। जानकी जी जब अपने कमरे से बाहर आईं, तो उन्होंने देखा कि ड्राइंग रूम को बहुत ही खूबसूरती से सजाया गया था। मेज पर गरमा-गरम ढोकला, समोसे, गुलाब जामुन और जानकी जी की पसंद की इलायची वाली चाय के कप सजे हुए थे।

और सबसे बड़ा आश्चर्य यह था कि दरवाजे की घंटी बजी और सामने जानकी जी की वही तीनों सहेलियाँ—कांता जी, प्रमिला जी और ऊषा जी मुस्कुराती हुई खड़ी थीं।

रोहिणी व्हीलचेयर पर बैठी थी। उसने हाथ जोड़कर तीनों बुजुर्ग महिलाओं को प्रणाम किया और मुस्कराते हुए कहा, “आंटी जी, आइए न, अंदर बैठिए। उस दिन मेरी नासमझी की वजह से आप लोग अधूरी बातचीत छोड़कर चली गई थीं। आज मैंने खुद आप सबको चाय पर बुलाया है। जब तक आप लोग मेरी सास के साथ हँसती-खिलखिलाती नहीं हैं, तब तक इस घर की रौनक अधूरी लगती है।”

यह देखकर जानकी जी की आँखों में खुशी और गर्व के आँसू छलक आए। कांता जी ने आगे बढ़कर रोहिणी के सिर पर हाथ रखा और ढेरों आशीर्वाद दिए।

उस शाम ‘आनंद निकेतन’ का वह हॉल सचमुच अपने नाम को सार्थक कर रहा था। बुजुर्गों के ठहाकों, पुरानी यादों और अपनेपन की मिठास से पूरा घर गूँज रहा था। रोहिणी व्हीलचेयर पर बैठी उन सबको देख रही थी और सोच रही थी कि सुंदरता चेहरे के फेशियल या मेनीक्योर में नहीं होती, बल्कि सुंदरता तो उस दिल में होती है जो ढलती उम्र के अकेलेपन को समझकर उसमें खुशियों के रंग भर सके।

उसने समझ लिया था कि बुढ़ापा कोई अभिशाप या सजा नहीं, बल्कि जिंदगी का वह खूबसूरत पड़ाव है जहाँ इंसान को सबसे ज्यादा सम्मान, समझदारी और अपनों के संग की दरकार होती है।

दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि अक्सर हम अपनी व्यस्त और आधुनिक जीवनशैली की भागदौड़ में अपने घर के बुजुर्गों के छोटे-छोटे सुखों और उनके अकेलेपन को अनदेखा कर बैठते हैं? क्या उम्र ढल जाने के बाद इंसान को अपनी खुशियाँ समेट लेनी चाहिए या फिर खुलकर जीना उनका भी उतना ही हक है जितना हमारा? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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