जीवन का प्रभात

 नंदिनी ने अपने कांपते हाथों को देखा। उसने सोचा, अगर वह आज खुद को तोड़ लेगी, अगर वह जीवन से मुंह मोड़ लेगी, तो क्या अनुराग की उस पवित्र आत्मा को शांति मिलेगी? क्या अनुराग का प्रेम इतना कमजोर था कि वह उसके जाने के बाद एक इंसान को जीने की हिम्मत भी न दे सके? सच्चा प्रेम किसी के चले जाने से खत्म नहीं होता, बल्कि वह तो जीने का संबल बन जाता है।

सिविल लाइन्स के उस पुराने परीक्षा केंद्र के बाहर धूप की तपिश दोपहर ढलने के बाद भी वैसी ही बनी हुई थी। गेट के बाहर खड़े सैकड़ों युवा चेहरों पर एक अजीब सी बेचैनी थी। प्रशासनिक सेवा की प्रारंभिक परीक्षा देकर बाहर निकले परीक्षार्थियों में से दो चेहरे ऐसे थे, जो भीड़ में एकदम अलग दिखाई दे रहे थे—अनुराग और नंदिनी। उसी शाम जब शहर के चौराहे पर लगे बड़े डिजिटल बोर्ड पर समाचार चलने लगा कि पेपर लीक होने के कारण परीक्षा निरस्त कर दी गई है, तो चारों ओर निराशा और आक्रोश फैल गया था। सड़क के किनारे चाय की एक थड़ी पर खड़े अनुराग और नंदिनी की आंखें उस शाम पहली बार मिली थीं। दोनों के चेहरों पर वर्षों की कठोर मेहनत के यूं एक झटके में बिखर जाने का दर्द था। उस अनजानी शाम हुई छोटी सी बातचीत ने दोनों के मन में एक-दूसरे के प्रति गहरी सहानुभूति जगा दी थी।

कुछ हफ़्तों बाद जब दोनों ने फिर से तैयारी शुरू करने के लिए लाइब्रेरी का रुख किया, तो वही पहचान एक गहरी और निश्चल मित्रता में बदल गई। वे कभी कंपनी बाग की घनी छांव में बैठकर किताबों के पन्ने पलटते, तो कभी संगम के किनारे ढलती शाम की शांत लहरों को निहारते हुए भविष्य के सपने बुनते। कभी कटरा के छोटे से कैफे में बैठकर कुल्हड़ वाली चाय पीते, तो कभी अलोपी देवी मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर अपने-अपने परिवारों की बातें साझा करते। दोनों के बीच रिश्ते का दायरा बेहद मर्यादित और पवित्र था। अनुराग ने कभी उस सीमा को लांघने की चेष्टा नहीं की और नंदिनी ने भी अपने आचरण में एक शालीन गरिमा बनाए रखी थी। दोनों के भीतर एक-दूसरे के प्रति केवल आकर्षण नहीं, बल्कि एक अगाध सम्मान था।

एक दिन कंपनी बाग की एक शांत बेंच पर दोनों बैठे थे। हल्की ठंडी हवा पत्तों से छनकर आ रही थी। अनुराग ने धीरे से अपना सिर नंदिनी के कंधे और गोद के सहारे टिका दिया और अपनी आंखें मूंद लीं। उसके चेहरे पर एक अलौकिक शांति तैरने लगी।

नंदिनी ने अपनी कोमल उंगलियों को अनुराग के बालों में हल्के से फेरते हुए मुस्कुराकर पूछा, “सुनिए, आप हमेशा इस तरह आंखें बंद करके शांत क्यों हो जाते हैं? क्या सोचते रहते हैं?”

अनुराग ने बिना आंखें खोले एक गहरी सांस ली और धीरे से कहा, “क्योंकि जब मैं तुम्हारे इतने करीब होता हूँ, तो दुनिया की सारी भागदौड़, सारा तनाव और असफलता का डर कहीं विलीन हो जाता है। मुझे लगता है जैसे मैं किसी सुरक्षित छांव में आ गया हूँ, जहां मुझे कुछ साबित नहीं करना है।”

नंदिनी ने उसकी गाल पर हल्की सी चपत लगाते हुए कहा, “धत! आप भी न, बच्चों जैसी बातें करते हैं। इतने संजीदा और गंभीर इंसान हैं, पर कभी-कभी बिल्कुल नादान बन जाते हैं।”

अनुराग ने आंखें खोलकर उसकी आंखों में देखा और धीमी आवाज में बोला, “नंदिनी, सच कहूं तो मैंने जीवन में जो भी अच्छाई देखी है, वह सब तुम में समाई हुई है। कभी-कभी तो मेरा दिल चाहता है कि समय यहीं थम जाए, यह शाम कभी ढले ही न और मुझे इस सुकून से कभी दूर न जाना पड़े…”

नंदिनी के हाथ की उंगलियां अचानक ठहर गईं। उसने अनुराग को सीधा बैठने का इशारा किया और बनावटी गुस्से से अपनी भौहें सिकोड़ते हुए बोली, “अगर दोबारा आपने ऐसी बातें कीं, तो मैं आपसे कभी बात नहीं करूंगी। जीवन बहुत लंबा है और हमें बहुत कुछ हासिल करना है। इस तरह की बातें आपके मुंह से शोभा नहीं देतीं।”

अनुराग मुस्कुराते हुए उठकर बैठ गया और उसने हाथ जोड़कर माफी मांग ली। नंदिनी की आंखों में हल्की सी नमी तैर गई थी, जिसे उसने अपनी चुन्नी के छोर से तुरंत पोंछ लिया। लौटते वक्त जब वे सड़क पार कर रहे थे, तो नंदिनी की पायल का एक घुंघरू उसकी साड़ी के पल्लू में उलझ गया और वह लड़खड़ाई। अनुराग ने तुरंत घुटनों के बल बैठकर बड़ी नजाकत से उस धागे को सुलझाया और बोला, “अगर गिर जातीं तो चोट लग जाती।”

नंदिनी ने भीगी पलकों से उसे देखा और मन ही मन ईश्वर का धन्यवाद किया कि उसे इतना संवेदनशील साथी मिला है।

पर नियति के अपने ही नियम होते हैं। जीवन की धारा कब किस मोड़ पर मुड़ जाएगी, इसका अंदाजा कोई नहीं लगा सकता।

कुछ महीनों बाद एक दिन नंदिनी अचानक लाइब्रेरी नहीं आई। अनुराग ने फोन लगाया, तो वह बंद आ रहा था। दो दिन, तीन दिन बीते, पर नंदिनी का कोई सुराग नहीं मिला। अनुराग जब उसके घर पहुंचा, तो मुख्य दरवाजे पर बड़ा सा ताला लटका हुआ था और पड़ोसियों से सिर्फ इतना पता चला कि परिवार किसी रिश्तेदारी में बाहर गया है। अनुराग का मन किसी अनहोनी की आशंका से घिर गया। बीस दिन तक वह एक जिंदा लाश की तरह शहर की सड़कों पर भटकता रहा, न भूख लगती थी और न प्यास।

आखिरकार, इक्कीसवें दिन दोपहर को अनुराग के फोन पर एक संक्षिप्त संदेश आया—’कंपनी बाग, उसी पुरानी बेंच पर, अभी।’

अनुराग पागलों की तरह भागा। बाग के उस कोने में जब वह पहुंचा, तो उसके कदम जड़वत हो गए। बेंच पर बैठी नंदिनी अब वह पुरानी लड़की नहीं थी। उसकी मांग में गहरा लाल सिंदूर भरा हुआ था, हाथों में कांच की हरी और लाल चूड़ियां खनक रही थीं और चेहरे पर एक ऐसा खालीपन था जो केवल वही समझ सकता था जो अंदर से पूरी तरह टूट चुका हो।

अनुराग बेंच के दूसरे कोने पर निढाल होकर बैठ गया। उसकी आवाज जैसे हलक में ही सूख गई थी, “नंदिनी… यह सब… यह कैसे हो गया?”

नंदिनी ने अपनी नजरें झुका रखी थीं। उसके आंसुओं की बूंदें उसकी रेशमी साड़ी पर टपक कर गोल धब्बे बना रही थीं। उसने कांपते होंठों से कहा, “अनुराग… पिताजी को अचानक दिल का दौरा पड़ा था। डॉक्टर ने साफ कह दिया था कि तनाव उनके लिए जानलेवा होगा। होश में आते ही उन्होंने बस यही जिद पकड़ ली कि वे अपनी इकलौती बेटी का ब्याह अपनी आंखों के सामने देखना चाहते हैं। परिवार के दबाव और पिता की नाजुक सांसों के आगे मेरे पास कुछ भी कहने या सोचने का अवसर ही नहीं बचा। जबलपुर से एक प्रतिष्ठित परिवार का रिश्ता पहले से आया हुआ था। हफ्ते भर के भीतर सब कुछ तय हुआ और मुझे विदा कर दिया गया।”

अनुराग का कलेजा फटा जा रहा था, लेकिन उसने अपने आंसुओं को भीतर ही रोक लिया। उसने देखा कि नंदिनी का दुख उसके अपने दुख से कहीं अधिक भारी था।

नंदिनी ने आगे कहा, “पर भाग्य ने मेरे पिता को तब भी मोहलत नहीं दी। मेरी विदाई के तीसरे दिन ही उनका देहांत हो गया। मां उस सदमे को सहन नहीं कर सकीं और वे भी कुछ ही दिनों में चल बसीं। सब कुछ उजड़ गया अनुराग, सब कुछ। अब मैं हमेशा के लिए अपने ससुराल जा रही हूँ।”

अनुराग ने अपनी मुट्ठियों को भींच लिया। उसने बेहद भारी मन से कहा, “नंदिनी, जो हुआ उस पर किसी का वश नहीं था। अब तुम्हें अपनी नई जिंदगी, अपने परिवार को संभालना होगा। यह समय बहुत कठिन है, पर हमें सच को स्वीकार करना ही होगा।”

नंदिनी ने अनुराग की तरफ देखा और अपने दोनों हाथ उसके आगे जोड़ दिए, “अनुराग, मेरी खातिर… तुम्हें मेरी सौगंध है, तुम खुद को नहीं तोड़ोगे। तुम अपनी पढ़ाई पूरी करोगे, एक बड़े अधिकारी बनोगे और अपने माता-पिता के सपनों को पूरा करोगे। तुम भी विवाह करके अपना घर बसाओगे। मुझे वचन दो।”

अनुराग ने बस सिर झुका दिया। वह जानता था कि वह वचन निभाने की स्थिति में शायद कभी न हो, लेकिन वह उस वक्त नंदिनी के मन पर कोई और बोझ नहीं डालना चाहता था।

उस दिन के बाद दोनों अपने-अपने रास्तों पर चले गए।

वक्त का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। नंदिनी ने अपने ससुराल में एक आदर्श बहू और पत्नी का धर्म निभाने का हरसंभव प्रयास किया। उसके पति शांत स्वभाव के थे, लेकिन नंदिनी के दिल के कोने में जो अनुराग की निश्चल छवि और अपने माता-पिता के चले जाने का गहरा घाव था, वह कभी भर नहीं पाया। वह दिनभर घर के कामों में खुद को व्यस्त रखती, पर जैसे ही रात का सन्नाटा घिरता, उसकी आंखें भीग जातीं।

शादी के ठीक एक साल बाद, एक दिन सुबह के अखबार में छपी एक खबर ने नंदिनी की दुनिया फिर से हिलाकर रख दी। शहर के पास एक राष्ट्रीय राजमार्ग पर भीषण सड़क हादसा हुआ था, जिसमें एक तेज रफ्तार ट्रक ने सामने से आ रही कार को रौंद दिया था। मरने वालों की सूची में अनुराग का नाम सबसे ऊपर था। वह अपने किसी काम से दूसरे शहर जा रहा था और वहीं उसकी सांसों की डोर टूट गई।

यह खबर पढ़ते ही नंदिनी के हाथ से चाय की प्याली छूटकर फर्श पर गिर गई। वह चीख भी न सकी। उसका गला जैसे किसी ने दबा दिया हो। उसका पहला प्रेम, उसका सबसे अच्छा मित्र, जिसने उसके लिए अपनी पूरी जिंदगी मौन रहकर कुर्बान कर दी थी, वह इस दुनिया में अब था ही नहीं।

उस दोपहर नंदिनी ने अपने पति से कहा कि वह पास के बड़े शिव मंदिर जाना चाहती है। पति ने उसकी उदासी को भांपते हुए उसे जाने दिया।

मंदिर परिसर के पिछले हिस्से में एक बड़ा सा वटवृक्ष था, जिसके नीचे पत्थर की एक बेंच बनी हुई थी। नंदिनी वहीं जाकर बैठ गई। दोपहर की धूप पत्तों से छनकर जमीन पर गिर रही थी। मंदिर से आ रही अगरबत्तियों की खुशबू और घंटों की धीमी ध्वनि वातावरण में गूंज रही थी।

नंदिनी ने अपनी आंखें बंद कीं। उसके सामने अनुराग का मुस्कुराता हुआ चेहरा घूम गया। वही चेहरा जो कहता था कि उसे इस संसार के शोर से दूर केवल सुकून चाहिए। नंदिनी के भीतर का आर्तनाद फूट पड़ा। उसने अपने मन में ईश्वर से गुहार लगाई, “हे भगवान, यह कैसी परीक्षा है? पहले मेरे माता-पिता, और अब वह इंसान जिसने मुझे बिना किसी स्वार्थ के चाहा था… मैं इस खालीपन के साथ कैसे जिऊंगी? मुझे भी अपने पास बुला लो, मेरे भीतर अब जीने की कोई शक्ति नहीं बची।”

आंखों से बहते आंसुओं के बीच उसे लगा जैसे हवा का एक झोंका आया हो और किसी ने उसके सिर पर बड़ी आत्मीयता से हाथ फेरा हो।

नंदिनी ने चौंककर आंखें खोलीं। सामने कोई नहीं था, केवल वटवृक्ष के पत्ते हवा में सरसरा रहे थे। लेकिन उसी पल, उसके कानों में अनुराग की वह पुरानी आवाज गूंज उठी जो उसने कंपनी बाग में कही थी—‘नंदिनी, अगर गिर जातीं तो चोट लग जाती… जिंदगी से हारना नहीं है।’ और फिर उसे अपना दिया हुआ वह वचन याद आया, जो उसने अनुराग से मांगा था कि चाहे जो हो जाए, टूटना नहीं है।

नंदिनी ने अपने कांपते हाथों को देखा। उसने सोचा, अगर वह आज खुद को तोड़ लेगी, अगर वह जीवन से मुंह मोड़ लेगी, तो क्या अनुराग की उस पवित्र आत्मा को शांति मिलेगी? क्या अनुराग का प्रेम इतना कमजोर था कि वह उसके जाने के बाद एक इंसान को जीने की हिम्मत भी न दे सके? सच्चा प्रेम किसी के चले जाने से खत्म नहीं होता, बल्कि वह तो जीने का संबल बन जाता है।

नंदिनी उठकर खड़ी हो गई। उसने अपने पल्लू से अपने सारे आंसू पोंछ डाले। मंदिर के गर्भगृह में जल रहे दीपक की लौ हवा के थपेड़ों के बावजूद अडिग जल रही थी। नंदिनी ने उस ज्योति की ओर देखा। उसने महसूस किया कि अनुराग मरा नहीं है, वह उसकी हिम्मत, उसकी सच्चाई और उसके संकल्पों में जीवित है।

उसने मंदिर के पवित्र जल से अपना मुंह धोया। उसके चेहरे पर अब बिखराव नहीं था, बल्कि एक नई और अडिग चमक थी। उसने तय किया कि वह अनुराग के उस निस्वार्थ प्रेम को अपनी कमजोरी नहीं, अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाएगी। वह जिएगी—अपने ससुराल के हर रिश्ते को पूरी निष्ठा से निभाएगी, समाज के जरूरतमंद और अनाथ बच्चों की शिक्षा में अपना जीवन लगाएगी और हर उस इंसान के काम आएगी जिसे सहारे की जरूरत होगी।

जब वह मंदिर की सीढ़ियां उतरकर बाहर निकली, तो शाम ढल चुकी थी। आसमान में सिंदूरी रंग फैल रहा था और शहर की बत्तियां एक-एक करके जल रही थीं। हवा में अब कोई भारीपन नहीं था, बल्कि एक नई शुरुआत की ताजगी थी। नंदिनी ने अपने घर की ओर कदम बढ़ा दिए—एक मजबूत, स्वाभिमानी और कर्तव्यनिष्ठ स्त्री के रूप में, जिसने प्रेम को खोकर भी अपने भीतर के जीवन को बचा लिया था।

जीवन में कई बार परिस्थितियां हमारे वश में नहीं होतीं और हमें ऐसे मोड़ों से गुजरना पड़ता है जहां केवल अंधेरा दिखाई देता है। लेकिन सच्चा प्रेम हमें कभी कमजोर नहीं बनाता; वह तो जीवन की सबसे कठिन घड़ियों में भी अंधेरे को चीरकर आगे बढ़ने की रोशनी देता है।

आपके विचार से, क्या अपनों के चले जाने के बाद उनके दिए संस्कारों और प्रेम को अपनी ताकत बनाकर आगे बढ़ना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि है? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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