पत्थरदिल

 शारदा की नजरें झुक गईं। नलिनी को ऐसा लगा मानो किसी ने उसके मुंह पर करारा तमाचा जड़ दिया हो। प्रज्ञा और तान्या शर्म के मारे एक-दूसरे का मुंह देखने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रही थीं। वे औरतें, जो दोपहर में अस्पताल के गलियारे में बैठकर अपनी-अपनी संपत्तियों को बचाने का ताना-बाना बुन रही थीं और अपने पतियों को ‘पत्थरदिल’ समझकर खुश हो रही थीं, आज उन पतियों के विशाल हृदय के सामने खुद को कितना बौना, कितना संकीर्ण और कितना तुच्छ महसूस कर रही थीं।

इंदौर के सबसे बड़े सुपर-स्पेशियलिटी अस्पताल के तीसरे माले पर आईसीयू के बाहर एक अजीब-सी बेचैनी पसरी हुई थी। एयरकंडीशनर की धीमी गूंज और फर्श पर रेंगते जूतों की आवाज के बीच चारों बहुएं—शारदा, नलिनी, प्रज्ञा और तान्या—गोल घेरा बनाकर बैठी थीं। उनकी नजरें आईसीयू के लाल बल्ब पर कम और एक-दूसरे के चेहरों पर ज्यादा टिकी थीं।

“दीदी, आपने सुना डॉक्टर साहब क्या कह रहे थे? कह रहे थे कि दिल की दो नसें पूरी तरह ब्लॉक थीं, स्टेंट डालने पड़े हैं,” सबसे छोटी तान्या ने अपने बैग का फीता उंगलियों में लपेटते हुए फुसफुसाहट में कहा।

बड़ी बहू शारदा ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए गहरी सांस छोड़ी, “हाँ तान्या, सुन तो मैं भी रही थी। अब शहर के इतने बड़े कॉर्पोरेट अस्पताल में भर्ती कराया है, तो खर्चा तो आसमान छुएगा ही। आईसीयू का एक-एक दिन का चार्ज ही दस-पंद्रह हजार होता है। दवाइयां, ऑपरेशन और टेस्ट मिलाकर बिल तो कम से कम छह-सात लाख के पार जाएगा।”

दूसरी बहू नलिनी ने तुरंत अपनी चूड़ियों को सहेजते हुए बात आगे बढ़ाई, “वही तो मैं सोच रही हूँ जीजी। आजकल तो बीमार पड़ना भी सिर्फ रईसों के बस की बात रह गई है। मध्यमवर्गीय परिवार तो जीते जी ही मर जाए। हमारे घर की हालत कौन सी बहुत छिपी है? बच्चों के कॉलेज की फीस सिर पर खड़ी है, अगले महीने घर की ईएमआई जानी है। हमारे पास कहाँ कोई कुबेर का खजाना गड़ा है जो ऐसे मौकों पर लुटाया जाए।”

तीसरे नंबर की प्रज्ञा ने मुंह बिचकाते हुए अपने माथे की बिंदी को छुआ, “और नहीं तो क्या भाभी! बहन जी के पति का कपड़ों का छोटा-मोटा काम है, पूरे महीने में बमुश्किल घर का खर्च निकल पाता है। कोई बचत तो उनकी होगी नहीं। मुझे तो रह-रहकर यही डर सता रहा है कि कहीं सारा बोझ हमारे ही सिर न आ पड़े। चारों भाई सीधे हैं, बहन का रोना देखकर कहीं अपनी जेबें खाली न कर बैठें।”

यह चर्चा चल ही रही थी कि अस्पताल के गलियारे की नीरवता को चीरती हुई सिसकियों की आवाज आई। चारों ने चौंककर देखा। वंदना आईसीयू के दरवाजे से निकलकर लड़खड़ाते कदमों से उनकी ओर आ रही थी। वंदना, जो उन चारों भाइयों—अभिषेक, मयंक, आलोक और कुणाल—की इकलौती और सबसे लाडली बहन थी। उसके पति हेमंत को अचानक सीने में भयानक दर्द उठा था और डॉक्टर ने बताया था कि अगर आधे घंटे की भी देरी होती तो अनहोनी हो सकती थी। वंदना की आंखों के नीचे काले घेरे साफ बता रहे थे कि वह पिछले अड़तालिस घंटों से एक पल के लिए भी नहीं सोई थी। उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं और पैरों में मानो जान ही नहीं बची थी।

शारदा ने तुरंत अपने चेहरे के भाव बदले, चेहरे पर कृत्रिम हमदर्दी का लेप चढ़ाया और आगे बढ़कर वंदना का हाथ थाम लिया, “अरे वंदना, हौसला रखो मेरी बच्ची। भगवान पर भरोसा रखो, सब अच्छा ही होगा।”

नलिनी ने भी तुरंत वंदना की पीठ सहलाते हुए कहा, “हाँ दीदी, बिल्कुल घबराओ मत। सही समय पर तुम अस्पताल ले आईं, यही बहुत बड़ी बात है। डॉक्टर साहब बहुत काबिल हैं, अब तो संकट टल ही चुका है।”

भाभियों की ढांढस भरी बातें सुनकर वंदना का सब्र टूट गया। वह शारदा के कंधे से लगकर फफक-फफक कर रो पड़ी, “भाभी… मैं तो लुट ही गई थी। अगर उस वक्त भैया लोग न होते तो मैं अकेले क्या कर पाती? डॉक्टरों ने कहा है कि अब वे खतरे से बाहर हैं। शायद कल दोपहर तक प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट कर दें या छुट्टी की बात कहें।”

‘छुट्टी’ शब्द सुनते ही चारों देवरानी-जेठानियों के कान खड़े हो गए। उनकी रीढ़ में एक सिहरन दौड़ गई। छुट्टी का सीधा मतलब था—अंतिम बिल का भुगतान। चारों ने एक-दूसरे को कनखियों से देखा। उन सब के मन में एक ही खौफ तैर रहा था कि अब वंदना रोते हुए कहेगी कि उसके पास बिल भरने के पैसे नहीं हैं और भैया लोगों से मदद की गुहार लगाएगी।

तान्या ने धीरे से प्रज्ञा की साड़ी का कोना खींचा, मानो आगाह कर रही हो कि अब कोई नया मोड़ आने वाला है।

तभी भारी कदमों की आवाज आई। चारों भाई—अभिषेक, मयंक, आलोक और कुणाल—सामने से आते दिखाई दिए। उनके चेहरों पर थकान की गहरी लकीरें थीं, आंखें लाल थीं, लेकिन चाल में एक अजीब सा ठहराव था।

सबसे बड़े भाई अभिषेक ने आकर वंदना के सिर पर स्नेह से हाथ रखा, “वंदना, रोना बंद कर। डॉक्टर माथुर तुझे अपने केबिन में बुला रहे हैं। कुछ जरूरी कागजों पर दस्तखत करने हैं और आगे की दवाइयों के बारे में समझाना है। जा, शाबाश।”

“जी भैया,” वंदना ने अपनी साड़ी के पल्लू से आंसू पोंछे और लड़खड़ाते कदमों से डॉक्टर के केबिन की तरफ बढ़ गई।

जैसे ही वंदना गलियारे के मोड़ पर ओझल हुई, शारदा ने तुरंत आगे बढ़कर अभिषेक से पूछा, “सुनिए जी, अब तो सब ठीक है न? मरीज भी खतरे से बाहर हैं, तो क्या अब हम लोग घर चलें? घर पर बच्चे अकेले हैं और सुबह से चूल्हा भी ठीक से नहीं जला है।”

मयंक, आलोक और कुणाल ने भी एक-दूसरे की ओर देखा। मयंक ने धीमी आवाज में कहा, “हाँ, तुम लोग सही कह रही हो। यहाँ अस्पताल में भीड़ लगाने का कोई मतलब नहीं है। चलो, हम सब भी घर ही चलते हैं। वंदना अंदर डॉक्टर से बात कर ले, तब तक हम बाहर गाड़ी निकालते हैं।”

चारों भाई आगे-आगे अस्पताल के मुख्य निकास द्वार की ओर बढ़ गए। उनके पीछे-पीछे चलती चारों देवरानी-जेठानियों के दिलों से जैसे एक भारी पत्थर हट गया था। उनके चेहरों पर राहत की चमक साफ नजर आने लगी।

गाड़ियों की पार्किंग की ओर बढ़ते हुए तान्या ने प्रज्ञा के कान में फुसफुसाया, “देखा जीजी, मैंने कहा था न? अपनी तरफ से पहल करने की कोई जरूरत नहीं थी। अच्छा हुआ बहन जी ने पैसों की कोई बात ही नहीं छेड़ी, वरना खामखां लाखों का चूना लग जाता।”

नलिनी ने भी धीमे से हंसते हुए चुटकी ली, “वैसे सच कहूं तो मुझे अपने पतियों पर ताज्जुब भी हो रहा है। कितने पत्थरदिल भाई हैं ये चारों! अपनी इकलौती बहन से एक बार भी औपचारिकता के लिए भी नहीं पूछा कि ‘वंदना, तुझे किसी चीज की जरूरत तो नहीं है? पैसों का कोई इंतजाम हुआ या नहीं?’ ऐसे बेफिक्र होकर घर चलने को तैयार हो गए जैसे किसी पड़ोसी का हालचाल पूछकर लौट रहे हों।”

शारदा ने तुरंत नलिनी की बांह पर हल्का-सा दबाव देते हुए डांटा, “अरे, अब तू चुप भी रह नलिनी! क्यों बैठे-बिठाए अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने पर तुली है? उन्होंने नहीं पूछा तो हमारे लिए तो अच्छा ही हुआ न। हमारी गृहस्थी बच गई, पैसे बच गए। जब वो खुद ही कोई मदद नहीं मांग रही, तो तुम्हें क्या पड़ी है बहन-भाई के बीच में धर्मराज बनने की? चलो, चुपचाप घर निकलो।”

चारों औरतें मन ही मन अपनी समझदारी और किस्मत पर इतराती हुईं, मंद-मंद मुस्कुराती हुई गाड़ियों में जाकर बैठ गईं। उन्हें लग रहा था कि आज उन्होंने चतुराई से अपने परिवारों की गाढ़ी कमाई को एक बहुत बड़े खर्च के गर्त में गिरने से बचा लिया था।

उधर, अस्पताल के भीतर, वंदना भारी कदमों से डॉक्टर माथुर के केबिन का दरवाजा धकेलकर अंदर दाखिल हुई। उसका दिल अभी भी किसी अनजाने डर से कांप रहा था। वह सोच रही थी कि न जाने अस्पताल का बिल कितना बना होगा। उसके पास अपनी शादी के कुछ सोने के कंगन और थोड़ी-बहुत जमा-पूंजी थी, जो शायद इस विशाल बिल के सामने ऊंट के मुंह में जीरे के समान साबित होने वाली थी। वह यही सोच रही थी कि वह डॉक्टर से कहेगी कि कुछ दिनों की मोहलत दे दें या किस्तों में पैसे चुकाने की इजाजत दे दें।

“आइए वंदना जी, बैठिए,” डॉक्टर माथुर ने अपनी फाइल से नजरें उठाकर अत्यंत सौम्य मुस्कान के साथ कहा।

वंदना ने हाथ जोड़ते हुए कांपती आवाज में पूछा, “डॉक्टर साहब, मेरे पति अब कैसे हैं? और… और अस्पताल का बिल… कितना बना है? क्या मैं कुछ पैसे अभी और बाकी बाद में दे सकती हूँ? मेरे पास इस वक्त…”

डॉक्टर माथुर ने अपने चश्मे को ठीक किया और हाथ उठाकर वंदना को बीच में ही रोक दिया। उनके चेहरे पर एक गहरा और आदरपूर्ण भाव उभर आया।

डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए एक रसीद वंदना की ओर बढ़ा दी, “वंदना जी, आपको अब किसी बिल की चिंता करने की कतई जरूरत नहीं है। अस्पताल का पूरा भुगतान—दवाइयों, आईसीयू, ऑपरेशन और आने वाले दो दिनों के रूम चार्ज समेत—पाई-पाई चुकता हो चुका है। कुल साढ़े छह लाख का बिल बना था, और वह पूरा का पूरा जमा हो गया है।”

वंदना की आंखें फटी की फटी रह गईं। उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने हकलाते हुए पूछा, “क्या? लेकिन डॉक्टर साहब… यह किसने किया? मैंने तो किसी को कोई चेक या कैश नहीं दिया…”

डॉक्टर माथुर ने कुर्सी से पीछे टेक लगाते हुए एक गहरी सांस ली और बोले, “वंदना जी, जब आपके पति को यहां लाया गया था और स्थिति बेहद नाजुक थी, तभी आपके चारों भाई मेरे केबिन में आए थे। उस वक्त आपने केवल उन्हें बाहर खड़े देखा होगा। आपके सबसे बड़े भाई अभिषेक जी ने अपनी जेब से अपना क्रेडिट कार्ड निकाला और बाकी तीनों भाइयों ने अपनी-अपनी चेकबुक मेज पर रख दी। उन्होंने मुझसे सिर्फ एक बात कही थी—’डॉक्टर साहब, हमारी बहन की मांग का सिंदूर और उसकी मुस्कान हर हाल में सलामत रहनी चाहिए। इलाज में पैसे की कोई कमी नहीं आनी चाहिए। दुनिया की सबसे बेहतरीन तकनीक का इस्तेमाल कीजिए, सारा हिसाब हम चारों भाई बराबर-बराबर बांटकर चुकाएंगे।’ और उन्होंने वही किया। अभी आधे घंटे पहले ही चारों ने मिलकर पूरा बिल क्लियर कर दिया है। कल सुबह आप अपने पति को सम्मान के साथ घर ले जा सकती हैं।”

डॉक्टर की एक-एक बात वंदना के कानों में अमृत की तरह घुल रही थी, लेकिन साथ ही उसकी आंखों से पश्चाताप और असीम कृतज्ञता के आंसू बहने लगे। वह सोच रही थी कि बाहर जब चारों भाई शांत खड़े थे, तो वह समझ नहीं पाई थी कि वे अपनी बहन के आंसुओं की कीमत पहले ही चुका चुके थे। उन्होंने बहन के स्वाभिमान को एक खरोंच तक नहीं आने दी। उन्होंने मदद का दिखावा नहीं किया, उन्होंने बहन के सामने अपनी महानता का ढिंढोरा नहीं पीटा, बल्कि बिना एक शब्द कहे, बिना जताए, अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था।

वंदना जब केबिन से बाहर निकली, तो उसकी आंखें अपने उन चार भाइयों को तलाश रही थीं जो खामोशी से अपना धर्म निभाकर जा चुके थे।

शाम को जब चारों भाई अपने-अपने घर पहुंचे, तो चारों बहुओं के चेहरे पर एक अजीब-सा सुकून था कि आज उनका घर एक बड़े आर्थिक झटके से बच गया। रात को खाने की मेज पर जब पूरा परिवार साथ बैठा, तो माहौल बिल्कुल सामान्य था। भाई आपस में दफ्तर और कारोबार की बातें कर रहे थे, मानो कुछ हुआ ही न हो।

तभी दरवाजे की घंटी बजी। कुणाल ने जाकर दरवाजा खोला तो सामने वंदना खड़ी थी। उसके हाथ में भगवान का प्रसाद था और आंखों में आंसुओं की नमी।

“अरे वंदना! तू इस वक्त यहाँ? अस्पताल में हेमंत के पास कौन है?” अभिषेक ने चौंककर उठते हुए पूछा।

“भैया, हेमंत की मौसी जी और उनका छोटा भाई आ गए हैं रात के लिए,” वंदना ने भीतर आते हुए कहा। उसकी नजरें अपने चारों भाइयों पर टिकी थीं। उसने आगे बढ़कर सबसे पहले अभिषेक के पैर छुए, फिर मयंक, आलोक और कुणाल के।

शारदा ने आगे आकर पूछा, “वंदना, सब ठीक तो है न? तू इतनी रात को अचानक क्यों आई?”

वंदना ने अपनी कांपती हथेलियों में रखी अस्पताल की ‘फुल पेड’ रसीद मेज पर रख दी। उसने रोते हुए कहा, “भाभी, मैं यहाँ यह पूछने आई हूँ कि क्या दुनिया में ऐसे भाई भी होते हैं? जो अपनी बहन के आंसुओं का मोल अपनी जेब से चुका देते हैं और पलटकर एक लफ्ज भी नहीं कहते? मुझे लगा था कि मैं अनाथ हो गई, मेरा संसार उजड़ जाएगा… लेकिन मेरे इन चार भगवानों ने मुझे अहसास कराया कि जब तक ये चारों जिंदा हैं, उनकी इस बहन का सुहाग कभी बेसहारा नहीं हो सकता।”

यह सुनते ही चारों बहुओं—शारदा, नलिनी, प्रज्ञा और तान्या—के पैरों तले से जमीन खिसक गई। उनके चेहरों का रंग उड़ गया। उन्होंने कांपते हाथों से मेज पर रखी उस रसीद को देखा, जिस पर साढ़े छह लाख रुपये के पूरे भुगतान की मुहर लगी थी और नीचे चारों भाइयों के दस्तखत थे।

शारदा की नजरें झुक गईं। नलिनी को ऐसा लगा मानो किसी ने उसके मुंह पर करारा तमाचा जड़ दिया हो। प्रज्ञा और तान्या शर्म के मारे एक-दूसरे का मुंह देखने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रही थीं। वे औरतें, जो दोपहर में अस्पताल के गलियारे में बैठकर अपनी-अपनी संपत्तियों को बचाने का ताना-बाना बुन रही थीं और अपने पतियों को ‘पत्थरदिल’ समझकर खुश हो रही थीं, आज उन पतियों के विशाल हृदय के सामने खुद को कितना बौना, कितना संकीर्ण और कितना तुच्छ महसूस कर रही थीं।

अभिषेक ने आगे बढ़कर वंदना के सिर पर हाथ रखा और बेहद सहजता से कहा, “पगली, तू यह क्या कह रही है? तू हमारी इकलौती बहन है। बचपन में जब पिताजी का साया हमारे सिर से उठा था, तो तूने ही तो हम चारों भाइयों को संभाला था। हमारे फटे कपड़ों में सुई-धागा पिरोने से लेकर हमारे टिफिन तैयार करने तक, तूने कभी अपनी खुशियों की परवाह की थी क्या? आज अगर हम चारों मिलकर अपनी बहन के घर को बिखरने से न बचा पाते, तो हमारे मर्द होने पर और हमारे भाई कहलाने पर लानत थी। रिश्तों का हिसाब पैसों से नहीं होता वंदना, प्यार और फर्ज से होता है।”

बाकी तीनों भाइयों ने भी वंदना को गले से लगा लिया। चारों भाइयों के चेहरों पर जो संतोष और गर्व की चमक थी, वह किसी भी धन-दौलत से कहीं बढ़कर थी।

उस पल, डाइनिंग हॉल के एक कोने में खड़ी चारों भाभियों की आंखें भी भर आईं। लेकिन इस बार उन आंसुओं में डर या लालच नहीं था, बल्कि पश्चाताप और आत्मग्लानि की आग थी।

शारदा धीरे से आगे बढ़ी। उसने अपने दोनों हाथ जोड़े और वंदना के सामने सिर झुका दिया, “वंदना… हमें माफ कर दे। हम औरतें इतनी संकीर्ण सोच की हो गई थीं कि हमें सिर्फ अपना नफा-नुकसान दिख रहा था। हम भूल गई थीं कि परिवार क्या होता है। आज तुम्हारे इन भाइयों ने हमारी आंखें खोल दी हैं। इन्होंने हमें सिखाया है कि असली दौलत तिजोरियों में बंद रुपयों में नहीं, बल्कि अपनों के आंसुओं को पोंछने में होती है।”

नलिनी, प्रज्ञा और तान्या ने भी आगे बढ़कर वंदना को अपनी बांहों में समेट लिया। उस रात उस घर से स्वार्थ, संकीर्णता और पराएपन की सारी दीवारें हमेशा-हमेशा के लिए ढह गईं। एक भाई का अपनी बहन के प्रति निस्वार्थ प्रेम केवल एक रिश्ते की रक्षा नहीं कर गया, बल्कि उसने चार अलग-अलग सोच रखने वाली बहुओं को भी एक सच्चे, अटूट और संवेदनशील परिवार के धागे में पिरो दिया।

अस्पताल के उस संकट ने जहाँ एक ओर हेमंत को नई जिंदगी दी थी, वहीं दूसरी ओर पूरे परिवार को प्रेम, त्याग और समर्पण का वह पाठ पढ़ा दिया था जो सदियों तक उनके दिलों में रोशनी बनकर जगमगाता रहने वाला था।

एक सच्चा परिवार वही होता है जहाँ सुख में सब साथ हँसते हैं, लेकिन संकट आने पर बिना पुकारे, बिना किसी शर्त के एक-दूसरे की ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं। जब नीयत में स्वार्थ नहीं बल्कि समर्पण होता है, तो सबसे कठिन रास्ते भी आसान हो जाते हैं।

क्या आपके अनुसार आज के दौर में भी ऐसे निस्वार्थ भाइयों और परिवारों का अस्तित्व बचा हुआ है? क्या भाइयों का बिना बहन को बताए यह फर्ज निभाना सही था? अपनी राय और विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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मूल लेखिका : *नम्रता सरन”सोना”*

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