विश्वंभर जी और उमा जी ने सोचा कि जीवन का अंतिम पड़ाव अपने इकलौते बेटे, बहू और पोते-पोतियों के संग बिताना ही उचित होगा। लेकिन जाने से पहले उन्हें ‘स्नेह छाया’ की चिंता थी। उस समय तक मयंक एक प्रतिष्ठित कंपनी में इंजीनियर बन चुका था और पूनम एक स्कूल में शिक्षिका। अनाथालय में साथ-साथ सेवा करते हुए दोनों के बीच एक पवित्र प्रेम पनपा था, और विश्वंभर जी ने ही कन्यादान करके दोनों का विवाह संपन्न कराया था।
विदेश जाने से पहले विश्वंभर जी ने अनाथालय का पूरा कानूनी दायित्व, ट्रस्ट की ज़िम्मेदारी और अपना पुराना मकान मयंक और पूनम को सौंप दिया। उन्होंने मयंक के कंधे पर हाथ रखकर कहा था, “मयंक बेटा, ये बच्चे अनाथ नहीं रहने चाहिए। हमने जो दीपक जलाया है, उसकी बाती तुम्हें संभालनी है।” मयंक और पूनम ने उनकी चरण रज माथे से लगाकर इस दायित्व को स्वीकार किया था।
चंडीगढ़ के सेक्टर नौ में स्थित उस पुराने मगर करीने से सजे बंगले में सुबह के पाँच बजे से ही चहल-पहल मची हुई थी। रसोई से उठती ताज़े शुद्ध घी के हलवे, हींग-जीरे के तड़के और इलायची वाली कड़क चाय की भीनी-भीनी खुशबू पूरे घर में तैर रही थी। पूनम ने अपनी सूती साड़ी का पल्लू कमर में खोंस रखा था। उसके चेहरे पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं, लेकिन होंठों से मुस्कान ओझल होने का नाम नहीं ले रही थी। कभी वह बैठक के नए मखमली पर्दों की सिलवटें ठीक करती, तो कभी मुख्य कमरे के गद्दों पर खिली धूप जैसी सफेद चादर बिछाती।
दालान के पीतल के बड़े से परात में उसने ताज़े गुलाब और गेंदे की पंखुड़ियाँ पानी में तैरा रखी थीं, जिनके बीच जलते नन्हे दीये पूरे वातावरण को पावन बना रहे थे। पूजाघर से आ रही अगरबत्ती की महक और पार्श्व में धीमी आवाज़ में बजते मंत्र घर के हर कोने को एक मंदिर का रूप दे रहे थे। आज का दिन पूनम और उसके पति मयंक के जीवन का सबसे बड़ा, सबसे भावुक और बहुप्रतीक्षित दिन था। पूरे सात समंदर पार, टोरंटो की बर्फीली और बेदर्द दुनिया से कोई अपना, वर्षों के दर्दनाक निर्वासन के बाद, अपने वतन, अपनी माटी और अपने असली घर लौट रहा था।
मयंक बैठक में खड़ा बार-बार अपनी कलाई घड़ी देख रहा था। उसके चेहरे पर बेचैनी और इंतज़ार की लकीरें साफ पढ़ी जा सकती थीं। उसके दोनों बच्चे—दस साल का आरव और आठ साल की नन्ही पंखुड़ी—नए पारंपरिक कुर्ते-पायजामे और लहंगे में सजे, हाथों में फूलों के गुलदस्ते लिए मुख्य द्वार पर टकटकी लगाए खड़े थे।
“मम्मी, दादू और दादी की गाड़ी आने में और कितनी देर है? आपने कहा था कि सात बजे तक वे एयरपोर्ट से यहाँ पहुँच जाएँगे!” आरव ने उतावली आवाज़ में पूछा।
पूनम ने रसोई से बाहर आकर आरव के माथे को चूमा और प्यार से कहा, “बस आ ही रहे हैं मेरे बच्चे। सुबह की फ्लाइट थोड़ी लेट हो गई थी। मयंक जी, ज़रा फोन करके ड्राइवर से पूछिए कि गाड़ी ट्रिब्यून चौक पार कर गई क्या?”
मयंक ने फोन कान से लगाया ही था कि बाहर सड़क पर गाड़ी के हॉर्न की परिचित आवाज़ गूँज उठी। एक सफेद इनोवा कार घर के लोहे के भारी गेट के भीतर दाखिल हुई।
“आ गए! वो आ गए!” पंखुड़ी खुशी से उछल पड़ी।
पूनम के हाथ में पकड़ी आरती की थाली हल्की सी काँप गई। उसने अपनी आँखों में उमड़ आए खुशी और दर्द के मिले-जुले आँसुओं को पल्लू से रोका और तेज कदमों से बाहर बरामदे की ओर भागी। मयंक और दोनों बच्चे भी उसके पीछे-पीछे दौड़ पड़े।
कार का पिछला दरवाज़ा खुला। एक बेहद कमज़ोर, लाठी का सहारा लिए अस्सी वर्षीय बुज़ुर्ग—विश्वंभर जी—पहले बाहर निकले। उनकी कमर थोड़ी झुक चुकी थी, चेहरे पर झुर्रियों का घना जाल था और आँखों के नीचे गहरे काले घेरे उनके वर्षों के मानसिक संताप की गवाही दे रहे थे। उनके पीछे कार से उतरीं उनकी धर्मपत्नी, बहत्तर वर्षीया उमा जी। उमा जी का शरीर बीमारी और उपेक्षा के कारण सूखकर काँटा हो चुका था, बाल पूरी तरह सफेद हो चुके थे और उनके चेहरे पर एक अजीब सा सहमा हुआ, अविश्वास भरा भाव था।
जैसे ही उन दोनों के पैर चंडीगढ़ की इस धरती पर पड़े, मयंक और पूनम बिना एक पल गँवाए आगे बढ़े और ज़मीन पर झुककर दोनों बुजुर्गों के चरणों में अपना सिर रख दिया।
“बाबूजी… माँ जी… आप आ गए! अपने घर आ गए आप!” मयंक की आवाज़ भर्रा गई। उसके आँसू विश्वंभर जी के पैरों को भिगो रहे थे।
विश्वंभर जी के काँपते, कमजोर हाथ अनायास ही मयंक और पूनम के सिर पर टिक गए। उनकी आँखों से बरसों से जमा आँसुओं का बाँध टूट पड़ा। होंठ थरथरा रहे थे, पर कंठ से आवाज़ नहीं निकल पा रही थी। पूनम ने आगे बढ़कर उमा जी को अपनी बाँहों में समेट लिया। दोनों औरतें एक-दूसरे के गले लगकर फफक-फफक कर रो पड़ीं। यह मिलन केवल दो पीढ़ियों का नहीं था, यह उस निस्वार्थ रिश्ते का पुनर्जन्म था जिसे समाज किसी कानूनी दस्तावेज़ या खून के रिश्ते में नहीं बाँध सकता।
पूनम ने आरती की थाली उठाई। कुमकुम का तिलक लगाया, अक्षत छिड़के, कपूर की लौ से उनकी नज़र उतारी और दोनों बच्चों से कहा, “आरव, पंखुड़ी… पैर छुओ अपने दादू-दादी के।”
बच्चों ने बड़े अदब से पैर छुए। उमा जी ने झुककर दोनों बच्चों को अपने सीने से लगा लिया और उनके गालों को चूमते हुए बुदबुदाईं, “ईश्वर… क्या मैं सचमुच अपने देश में हूँ? क्या यह कोई सपना तो नहीं?”
“नहीं माँ जी, यह सपना नहीं है। यह आपका अपना घर है, और अब आपको यहाँ से कोई कहीं नहीं भेज सकता,” पूनम ने आत्मीयता से उनका हाथ थामते हुए कहा और उन्हें सहारा देकर आदरपूर्वक बैठक के भीतर ले आई।
पूनम और मयंक के जीवन की जड़ें इसी बुजुर्ग दंपत्ति के त्याग और तपस्या से जुड़ी हुई थीं। आज से लगभग पच्चीस वर्ष पहले, पूनम और मयंक दोनों का ही बचपन कालका के पास स्थित एक अनाथालय ‘स्नेह छाया’ की चारदीवारी में बीता था। पूनम जब केवल तीन वर्ष की थी, तो किसी ने उसे रेलवे स्टेशन पर लावारिस छोड़ दिया था। वहीं मयंक को उसके जन्म के कुछ ही दिनों बाद अनाथालय के पालने में पाया गया था।
उस अनाथालय की स्थापना और संचालन विश्वंभर जी और उमा जी ही करते थे। विश्वंभर जी एक प्रतिष्ठित कॉलेज में भौतिक विज्ञान के विभागाध्यक्ष रहे थे और उमा जी समाजशास्त्र की विदुषी थीं। ईश्वर ने उन्हें सब कुछ दिया था—धन, मान, प्रतिष्ठा और रूप। उनका एक सगा बेटा था—गौरव। गौरव बचपन से ही तीव्र बुद्धि का था, लेकिन उसके भीतर केवल अपनी महत्वाकांक्षाओं के लिए जगह थी, संवेदनाओं के लिए नहीं।
विश्वंभर जी और उमा जी ने अपने वेतन और पेंशन का पाई-पाई ‘स्नेह छाया’ में झोंक दिया था। वे वहाँ रहने वाले पचास बच्चों को केवल खाना और कपड़ा नहीं देते थे, बल्कि उन्हें अपनी सगी औलाद की तरह संस्कार और शिक्षा देते थे। मयंक और पूनम उन बच्चों में सबसे होनहार थे। विश्वंभर जी ने मयंक की गणित में रुचि देखकर उसे खुद पढ़ाया, उसे इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा की तैयारी कराई। वहीं उमा जी ने पूनम को अपनी बेटी मानकर उसे गृह विज्ञान, साहित्य और जीवन के मूल्य सिखाए।
उधर, उनका सगा बेटा गौरव कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई पूरी करके कनाडा चला गया। टोरंटो में एक विशाल बहुराष्ट्रीय सॉफ्टवेयर कंपनी में उसे लाखों डॉलर का पैकेज मिला। कुछ ही वर्षों में उसने वहीं की नागरिकता ले ली और एक विदेशी महिला से प्रेम विवाह कर लिया।
जैसे-जैसे विश्वंभर जी की उम्र बहत्तर के पार पहुँची, उनका शरीर थकने लगा था। गौरव ने बार-बार फोन करके दबाव बनाना शुरू किया, “डैड, आप लोग अब इस उम्र में उस अनाथालय का झंझट छोड़िए। मेरे पास टोरंटो आ जाइए। यहाँ इतना बड़ा विला है, नौकर-चाकर हैं। आप लोग यहाँ आराम से रहिए।”
विश्वंभर जी और उमा जी ने सोचा कि जीवन का अंतिम पड़ाव अपने इकलौते बेटे, बहू और पोते-पोतियों के संग बिताना ही उचित होगा। लेकिन जाने से पहले उन्हें ‘स्नेह छाया’ की चिंता थी। उस समय तक मयंक एक प्रतिष्ठित कंपनी में इंजीनियर बन चुका था और पूनम एक स्कूल में शिक्षिका। अनाथालय में साथ-साथ सेवा करते हुए दोनों के बीच एक पवित्र प्रेम पनपा था, और विश्वंभर जी ने ही कन्यादान करके दोनों का विवाह संपन्न कराया था।
विदेश जाने से पहले विश्वंभर जी ने अनाथालय का पूरा कानूनी दायित्व, ट्रस्ट की ज़िम्मेदारी और अपना पुराना मकान मयंक और पूनम को सौंप दिया। उन्होंने मयंक के कंधे पर हाथ रखकर कहा था, “मयंक बेटा, ये बच्चे अनाथ नहीं रहने चाहिए। हमने जो दीपक जलाया है, उसकी बाती तुम्हें संभालनी है।” मयंक और पूनम ने उनकी चरण रज माथे से लगाकर इस दायित्व को स्वीकार किया था।
शुरुआती कुछ वर्षों तक सब कुछ ठीक रहा। विश्वंभर जी साल में एक बार भारत आते थे, ट्रस्ट की बैठकें लेते और फिर लौट जाते। फोन पर भी हर हफ्ते बात होती थी। मयंक और पूनम उन्हें हर महीने अनाथालय की प्रगति और बच्चों की रिपोर्ट भेजते थे।
लेकिन फिर वैश्विक महामारी कोरोना का काला साया पूरी दुनिया पर छा गया। पूरे दो वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर पाबंदी लग गई। इसी दौरान टोरंटो से विश्वंभर जी के फोन आने अचानक बंद हो गए। जब भी मयंक टोरंटो वाले नंबर पर फोन लगाता, तो फोन कट जाता या गौरव का रूखा संदेश आता—’डैड इज़ बिज़ी’ या ‘दे आर रेस्टिंग’।
मयंक और पूनम की रातों की नींद उड़ गई। पूनम अक्सर रात को रोते हुए कहती, “मयंक जी, मेरा दिल गवाही दे रहा है कि माँ जी और बाबूजी किसी भारी संकट में हैं। गौरव भैया कभी सीधे मुँह बात नहीं करते। वे दोनों इतने बूढ़े हैं, परदेस में उनका कौन ख्याल रख रहा होगा?”
मयंक ने कनाडा के दूतावास से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन व्यक्तिगत पारिवारिक मामलों में कोई ठोस जानकारी नहीं मिल पा रही थी।
तभी ईश्वर ने एक रास्ता खोला। मयंक का एक कॉलेज का पुराना मित्र, कबीर, जो टोरंटो में ही एक लॉ फर्म में काम करता था, छुट्टियों में चंडीगढ़ आया। मयंक जब उससे मिलने पहुँचा और उसने अपनी व्यथा सुनाई, तो कबीर ने वादा किया कि वह टोरंटो लौटते ही व्यक्तिगत रूप से गौरव के पते पर जाकर जानकारी जुटाएगा।
तीन हफ्ते बाद आधी रात को कबीर का फोन आया। उस फोन कॉल ने मयंक के पैरों तले ज़मीन खिसका दी।
कबीर ने बताया, “मयंक, जो सच मैं तुम्हें बताने जा रहा हूँ, उसे सुनकर तुम्हारा कलेजा फट जाएगा। गौरव और उसकी पत्नी ने मानवता की सारी हदें पार कर दी हैं। जब विश्वंभर अंकल को हल्का सा पैरालिसिस का अटैक आया और उमा आंटी को गठिया के कारण चलने में दिक्कत होने लगी, तो गौरव की पत्नी ने घर में क्लेश शुरू कर दिया। उसने कहा कि वह दो बूढ़े, बीमार लोगों की सेवा नहीं कर सकती। गौरव ने अपने माता-पिता के भारत वाले सारे बैंक खातों से पैसे ट्रांसफर करवा लिए, उनकी पेंशन की रकम पर कब्ज़ा कर लिया और महामारी के दौरान ही उन दोनों को टोरंटो के बाहरी इलाके में स्थित एक सस्ते, बदहाल ‘ओल्ड एज होम’ (वृद्धाश्रम) में लावारिसों की तरह पटक दिया!”
मयंक की आँखों से अंगारे बरसने लगे। उसका पूरा शरीर कांपने लगा।
कबीर ने आगे बताया, “मैं उस वृद्धाश्रम में होकर आया हूँ मयंक। उस ठंडे, सीलन भरे कमरे में अंकल और आंटी फटे हुए कंबलों में ठिठुर रहे थे। उन्हें सही समय पर खाना तक नहीं मिलता, दवाइयां नहीं मिलतीं। आंटी की आँखों की रोशनी कम हो गई है और अंकल दिन-रात सिर्फ तुम्हारा और पूनम का नाम लेकर रोते रहते हैं। गौरव महीने में एक बार सिर्फ वहाँ का न्यूनतम बिल भरने जाता है, मिलने तक अंदर नहीं जाता। वे दोनों वहाँ तिल-तिल कर मर रहे हैं।”
मयंक ने फोन काट दिया और फफक-फफक कर रो पड़ा। पूनम जब दौड़ी आई और उसने पूरी बात सुनी, तो उसका मातृत्व और बेटी का स्वाभिमान एक साथ जाग उठा।
“मयंक जी! हम एक पल भी अब हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठेंगे,” पूनम ने आंसुओं को पोंछते हुए अपने सोने के कंगन उतारे और मेज़ पर रख दिए। “मेरी शादी के ये कंगन, हमारी जितनी भी बचत है, सब लगा दीजिए। मुझे मेरे बाबूजी और मेरी माँ उस नर्क से वापस चाहिए। जिस माँ-बाप ने हमें सड़क से उठाकर इंसान बनाया, आज जब उनकी अपनी औलाद ने उन्हें कूड़ेदान में फेंक दिया है, तो यह हमारा धर्म है कि हम उनके बुढ़ापे की लाठी बनें!”
मयंक ने तुरंत कदम उठाए। उसने कबीर की कानूनी मदद ली। कबीर ने टोरंटो के उस ओल्ड एज होम के प्रशासन से संपर्क किया। इसके बाद मयंक ने सीधे गौरव को वीडियो कॉल किया।
स्क्रीन पर जब गौरव का चेहरा आया, तो मयंक ने बिना किसी भूमिका के बेहद कड़े और संयमित शब्दों में कहा, “गौरव भैया, आपने जो किया है, वह कानूनन अपराध है और ईश्वर की नज़रों में महापाप। लेकिन मैं आपसे कोई बहस करने नहीं आया हूँ। मैं और पूनम, बाबूजी और माँ जी को हमेशा के लिए अपने पास भारत वापस लाना चाहते हैं। हम उनकी कानूनी कस्टडी और पूरी ज़िम्मेदारी लेने के लिए तैयार हैं।”
गौरव के चेहरे पर पश्चाताप की एक भी लकीर नहीं उभरी। इसके विपरीत, उसके चेहरे पर एक कुटिल राहत का भाव तैर गया। उसने सोचा कि चलो, हर महीने वृद्धाश्रम को जाने वाले दो हज़ार डॉलर की चपत से भी जान छूटी और इन दोनों बीमार बुज़ुर्गों के अंतिम संस्कार के झंझट से भी हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाएगी।
गौरव ने तुरंत एक सांस में कहा, “मुझे कोई आपत्ति नहीं है। अगर तुम लोग उनकी ज़िम्मेदारी उठाना चाहते हो, तो मैं कल ही पॉवर ऑफ अटॉर्नी और नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट साइन करके भेज देता हूँ। बस याद रखना, इसके बाद मुझसे किसी पैसे या मदद की उम्मीद मत रखना।”
मयंक ने अपने गुस्से को घूँट लिया और बोला, “गौरव भैया, पैसों की भूख आपको मुबारक हो। हमने अपने बाबूजी से संस्कार सीखे हैं, सौदेबाजी नहीं। आप बस कागज़ात भेजिए।”
अगले दो महीने मयंक और पूनम के लिए अग्निपरीक्षा जैसे थे। मयंक ने अपनी जीवन भर की जमा-पूँजी, फिक्स्ड डिपॉजिट और पूनम के गहने बेचकर मेडिकल वीज़ा, स्पेशल व्हीलचेयर सपोर्ट वाली एयर एम्बुलेंस टिकटों और कानूनी प्रक्रियाओं की भारी-भरकम फीस चुकाई। कबीर ने टोरंटो में रहकर हर कागज़ी औपचारिकता पूरी करवाई। और अंततः, वह शुभ दिन आ ही गया जब विश्वंभर जी और उमा जी को उस विदेशी नर्क से निकालकर सुरक्षित भारत की पावन माटी पर लाया गया।
आज जब वे दोनों उस सजे-धजे घर के दालान में बैठे थे, तो घर का हर कोना उनकी उपस्थिति से धन्य हो रहा था।
पूनम ने रसोई से गरमा-गरम दलिया और मूँग दाल की खिचड़ी लाकर उमा जी के सामने रखी और खुद अपने हाथों से उन्हें पहला निवाला खिलाने लगी। उमा जी का हाथ काँप रहा था। उन्होंने पूनम का चेहरा अपनी हथेलियों में थामा।
“पूनम… बेटी…” उमा जी की आँखों से आँसू छलक कर उस खिचड़ी की कटोरी में गिर पड़े। “हमने तो तुझे अपनी कोख से जन्म भी नहीं दिया था। जिस बेटे को हमने नौ महीने पेट में रखा, जिसके लिए मैंने अपनी सारी खुशियाँ कुर्बान कर दीं, उसने हमें जीते जी नर्क में धकेल दिया। और तुम दोनों ने… हमारे लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया? हम अभागे हैं बेटी, जो अपने ही बेटे द्वारा ठुकरा दिए गए।”
विश्वंभर जी ने भी अपनी लाठी एक तरफ रखी और भरे गले से कहा, “मयंक, लोग कहते हैं कि बेटा कुल का नाम रोशन करता है, वंश चलाता है। लेकिन आज मुझे समझ आया कि वंश खून से नहीं, संस्कारों से चलता है। तूने आज मुझे बेटा होने का वो अर्थ समझाया है जो बड़े-बड़े धर्मग्रंथ भी नहीं सिखा पाते। हमने अनाथालय में तुम्हें सहारा दिया था, लेकिन आज तुमने हमें अनाथ होने से बचा लिया।”
मयंक आगे बढ़ा और उसने विश्वंभर जी के घुटनों पर सिर रख दिया। “बाबूजी, ऐसा कहकर हमें पराया मत कीजिए। आपने और माँ ने हमें तब अपनाया था जब इस दुनिया में हमारा कोई नाम तक नहीं था। आपने हमें रोटी नहीं दी थी, आपने हमें आत्मसम्मान और पहचान दी थी। अगर आज हम आपके काम न आते, तो हमारी इस देह का, हमारी इस शिक्षा का क्या मोल रह जाता? यह कोई अहसान नहीं है बाबूजी, यह तो उस ईश्वर की कृपा है जिसने हमें आपकी सेवा का यह सौभाग्य बख्शा।”
तभी आरव और पंखुड़ी दौड़ते हुए आए। पंखुड़ी ने अपनी नन्हीं बाहें उमा जी के गले में डाल दीं और बोली, “दादी, अब आप कभी मत रोना। जब तक मैं और आरव भैया हैं, हम आपको रोज़ कहानियाँ सुनाएँगे और दादू को वॉक पर ले जाएँगे!”
बच्चों की इस मासूमियत ने उस कमरे में घुले सारे गम को एक पल में धो दिया। बैठक में एक दिव्य, पवित्र और निश्छल हँसी गूँज उठी।
विश्वंभर जी ने खिड़की से बाहर देखा। बाहर तुलसी के चौबारे पर सुनहरी धूप खिली थी और चिड़ियाँ चहक रही थीं। उनके मन में अब अपने सगे बेटे के प्रति कोई कड़वाहट या शिकायत नहीं बची थी; उनके दिल में केवल उस परमपिता परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता थी।
सच्चाई यही है कि इंसान जो बोता है, वही काटता है। कभी किसी लाचार के आँसू पोंछने के लिए उठाया गया एक छोटा सा कदम, वक्त आने पर एक विशाल वटवृक्ष बनकर आपको अपनी छाँव में समेट लेता है। नेकी कभी व्यर्थ नहीं जाती; वह किसी न किसी रूप में, किसी न किसी फरिश्ते के वेश में लौटकर ज़रूर आती है। आज उस घर में कोई अनाथ नहीं था—न वे बच्चे, और न ही वे बूढ़े माता-पिता। प्रेम और कृतज्ञता की उस पवित्र डोर ने सबको एक अटूट, अखंड परिवार के सूत्र में बाँध दिया था।
प्रिय पाठकों,
क्या खून का रिश्ता ही हमेशा सबसे बड़ा सच होता है, या फिर संस्कारों और सेवा से जुड़ा दिल का रिश्ता उससे कहीं अधिक पवित्र और मजबूत होता है? जिस तरह मयंक और पूनम ने अपने पालक माता-पिता को उस विदेशी नर्क से बचाकर नई ज़िंदगी दी, उस पर आपकी क्या राय है? अपने अनमोल विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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मूल लेखिका : कविता भड़ाना