ज्योति ने भी अनन्या के आँसू पोंछते हुए कहा, “आज के बाद इस घर में कोई भी अपना काम खुद करेगा। तुम इस घर की कोई कठपुतली या नौकरानी नहीं हो, बल्कि इस परिवार की सबसे प्यारी बेटी हो। हमारा हाथ बंटाने के लिए तुम्हारा बहुत शुक्रिया, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम तुम्हारी जान ही ले लें।”
तभी माधवानंद जी और कुणाल भी वहाँ आ गए। उन्होंने जब पूरा माज़रा समझा, तो वे भी स्तब्ध रह गए। माधवानंद जी ने गंभीर स्वर में कहा, “बहूओं, तुमने बिल्कुल सही पहचाना। इंसानियत तभी जिंदा रहती है जब हम अपनों के दर्द को अपना समझें। आज से इस घर का नियम बदलता है। हर व्यक्ति अपने हिस्से का काम स्वयं करेगा।”
‘सुखद निवास’ नाम का यह घर वाकई अपने नाम की तरह ही खुशहाल था। घर की दो बहुएँ—अपर्णा और ज्योति—देवरानी और जेठानी होने के बावजूद सगी बहनों से भी बढ़कर एक-दूसरे का साथ निभाती थीं। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक, घर का हर काम दोनों भाई-बहनों की तरह मिल-बाँट कर करती थीं। अगर कभी अपर्णा को बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना होता, तो ज्योति रसोई संभाल लेती थी; और अगर ज्योति को बैंक के किसी जरूरी काम से बाहर जाना होता, तो अपर्णा पूरे घर की कमान अपने हाथ में ले लेती थी।
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परिवार के बड़े बुजुर्ग भी इस तालमेल से बेहद खुश थे। ससुर जी, श्री माधवानंद, जो एक सरकारी बैंक से सेवानिवृत्त (रिटायर्ड) हुए थे, अक्सर यही कहा करते थे कि जिस घर की बहुएँ आपस में प्रेम से रहती हैं, उस घर में भगवान का वास होता है। उन्होंने पहले ही दोनों बहुओं को यह आज़ादी दे रखी थी कि उन्हें घर में किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो या कोई बात कहनी हो, वे बिना किसी झिझक के सीधे उनसे कह सकती हैं। यही वजह थी कि अपर्णा और ज्योति अपने सास-ससुर के साथ पूरी तरह बेबाक और सहज थीं। उनके बीच किसी भी तरह का कोई पर्दा या अनकहा तनाव नहीं था।
समय पंख लगाकर उड़ रहा था। दोनों बहुओं के बच्चे अब बड़े हो रहे थे, स्कूल जाने लगे थे, और इसके साथ ही घर की जिम्मेदारियों का दायरा भी धीरे-धीरे फैलता जा रहा था। सुबह की चाय से लेकर रात के खाने तक, काम की भागदौड़ बढ़ती जा रही थी।
तभी एक दिन, माधवानंद जी के गाँव के एक बेहद पुराने और जिगरी दोस्त अपनी इकलौती बेटी को लेकर उनके घर आए। उस लड़की का नाम अनन्या था। अनन्या एक बेहद शांत, संस्कारी और भोली-भाली युवती थी, लेकिन चेहरे पर मासूमियत ऐसी थी कि देखते ही किसी का भी दिल पिघल जाए। अनन्या की माँ का निधन ठीक छह महीने पहले ही एक लंबी बीमारी के चलते हो गया था। गाँव में उसका अब अपना कोई ऐसा सगा नहीं था जो उसकी देखरेख कर सके, क्योंकि उसके पिता को अगले दो महीनों के लिए एक बड़े व्यावसायिक सिलसिले में दक्षिण भारत के एक शहर में जाना पड़ रहा था। ऐसे संकट के समय माधवानंद जी ने अपने पुराने मित्र को आश्वस्त किया था कि अनन्या उनकी अपनी बेटी की तरह इस घर में सुरक्षित रहेगी।
जब अनन्या इस बड़े और भरे-पूरे शहर के घर में आई, तो उसने पहली बार ऐसा आलीशान जीवन देखा था। यहाँ आकर उसे अपर्णा और ज्योति जैसी स्नेहिल भाभियाँ मिलीं, तो उसकी उदास आँखों में जैसे चमक लौट आई। शुरुआत के कुछ दिनों में सब कुछ बहुत अच्छा रहा। अनन्या स्वभाव से इतनी मेहनती और सेवाभावी थी कि वह खाली बैठना जानती ही नहीं थी। वह सुबह सबसे पहले उठकर खुद ही सबके लिए छोटे-मोटे काम करने लगी थी।
कभी कोई कहता, “अनन्या बेटा, ज़रा एक कप अदरक वाली चाय बना लाना,” तो वह पलक झपकते ही गरमा-गरम चाय हाजिर कर देती। कोई कहता, “अनन्या, ज़रा डाइनिंग टेबल पर पानी की बोतल रख देना,” तो वह बिना किसी थकान के दौड़ पड़ती। बच्चों का होमवर्क कराने से लेकर उनके खिलौने समेटने तक, घर का हर छोटा-मोटा काम अब अनन्या के जिम्मे आ चुका था।
धीरे-धीरे इस परिवार की आदतें बदलने लगीं। जो काम अपर्णा और ज्योति मिलकर आपस में बाँटती थीं, अब उन सबका आसान जरिया अनन्या बन चुकी थी। घर के हर कोने से आवाज़ें गूँजने लगीं— “अनन्या, ज़रा मेरा चश्मा ढूँढ कर ला देना!” “अनन्या, ड्राइंग रूम का फर्श गंदा हो गया है, एक बार पोंछा लगा लेना।” “अनन्या, यह कपड़े इस्त्री करके मेरी अलमारी में रख जाना।” “अनन्या, ज़रा किचन से वो डिब्बा उठा लाना।”
पूरे दिन घर में जैसे अनन्या नाम की एक चलती-फिरती कठपुतली गूँजती रहती थी। वह सुबह से रात तक बिना थके, बिना किसी उफ के, सबकी उंगलियों के इशारे पर नाचती रहती थी। उसने कभी किसी काम के लिए ‘ना’ कहना सीखा ही नहीं था, या शायद उसे यह डर था कि अगर उसने मना किया, तो लोग उसे पराया समझकर बुरा मान जाएंगे।
लेकिन इंसान का शरीर कोई मशीन तो नहीं होता! लगातार बिना रुके काम करते-करते और मानसिक रूप से खुद को खपाते-कपाते एक दिन अनन्या की सेहत ने जवाब दे दिया। उस दिन सुबह से ही उसका पूरा बदन दर्द से टूट रहा था, सिर भारी था और उसे तेज ठंड के साथ बुखार चढ़ रहा था। कमजोरी इतनी थी कि उससे ठीक से खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था। उस हालत में भी वह किसी तरह घसीटते हुए रसोई में चाय बनाने की कोशिश कर रही थी।
तभी अपर्णा वहाँ से गुजरीं। उन्होंने देखा कि अनन्या का हाथ चाय की केतली उठाते समय कांप रहा है और काम बहुत धीमी गति से हो रहा है। अपर्णा को उस पर बेवजह गुस्सा आ गया। उन्होंने चिढ़कर कहा, “अरे अनन्या! तुम्हें क्या हो गया है आज? सुबह से देख रही हूँ, तुम्हारा काम करने में बिल्कुल मन नहीं लग रहा है। ऐसे सुस्त होकर घूमोगी तो पूरा दिन का शेड्यूल बिगड़ जाएगा। ज़रा फुर्ती दिखाओ, बच्चों को स्कूल के लिए भी निकलना है!”
अपर्णा के वे कड़े शब्द अनन्या के कोमल दिल पर खंजर की तरह चुभ गए। उसकी आँखें भर आईं। वह बिना एक शब्द बोले, चुपचाप रसोई के एक कोने में रखे स्टूल पर सिर झुकाकर बैठ गई और सिसक-सिसक कर रोने लगी।
कुछ ही देर बाद वहाँ ज्योति आई। उसने देखा कि अनन्या एक कोने में दुबकी हुई है और सुबक रही है। ज्योति ने आगे बढ़कर जैसे ही उसके माथे पर हाथ रखा, उसका हाथ तुरंत पीछे खिंच गया—अनन्या का माथा बुरी तरह तप रहा था। उसे बहुत तेज बुखार था, जो शायद रातभर से उसे अंदर ही अंदर जला रहा था।
ज्योति घबरा गई। उसने तुरंत आवाज़ देकर अपर्णा और सास सावित्री जी को बुलाया। घर में हड़कंप मच गया। किसी को अंदाजा नहीं था कि वह बेचारी अंदर ही अंदर इतनी बीमार थी और वे लोग उससे लगातार काम करवाए जा रहे थे। बिना एक पल गँवाए, ज्योति ने अपनी कार की चाबी उठाई और अपर्णा के साथ तुरंत अनन्या को पास के एक अच्छे अस्पताल के क्लिनिक ले गई।
डॉक्टर ने जाँच करने के बाद सख्त लहजे में कहा, “इसे अत्यधिक शारीरिक श्रम, मानसिक तनाव और समय पर भोजन न मिलने की वजह से वायरल फीवर और तीव्र कमजोरी का झटका लगा है। अगर दो घंटे की और देर होती, तो स्थिति बहुत बिगड़ सकती थी। इसे कम से कम एक हफ्ते का संपूर्ण बेड रेस्ट चाहिए।”
डॉक्टर की बात सुनकर अपर्णा और ज्योति का दिल ग्लानि से भर गया। वे दोनों अस्पताल के बाहर खुद को ही कोस रही थीं। जब अनन्या को सुई और ग्लूकोज की बोतल चढ़ने के बाद थोड़ा होश आया, तो दोनों ने प्यार से उसके हाथ सहलाए और डॉक्टर की दवाइयाँ दिलाकर घर वापस ले आईं। घर के सभी सदस्यों ने उसकी बहुत सेवा की, उसे समय पर दवा और पौष्टिक दलिया दिया। दो-तीन दिन की मुस्तैद देखभाल के बाद अनन्या की सेहत में सुधार होने लगा और वह फिर से अपने पैरों पर खड़ी हो गई।
लेकिन विडंबना यह थी कि जैसे ही अनन्या थोड़ी ठीक हुई, घर का पुराना ढर्रा फिर से शुरू हो गया। किसी ने अनजाने में ही सही, फिर से वही पुरानी बातें दोहरा दीं— “अरे अनन्या! तुम्हारे बीमार पड़ने से तो हम सबकी आदतें ही खराब हो गई थीं। लग रहा था जैसे घर का पहिया ही रुक गया हो। चलो अब ठीक हो गई हो तो ज़रा यह काम निपटा दो, वरना हम सब पर फिर से बोझ बढ़ जाएगा!”
वे सब बातें मज़ाक में या सहज भाव से कह रहे थे, लेकिन उन शब्दों की गहराई में एक अदृश्य तानाशाही छिपी थी।
एक शाम, अनन्या फिर से उदास मन से अपने कमरे की खिड़की के पास बैठी थी। उसकी आँखों से खामोश आँसू बह रहे थे। तभी सास सावित्री जी कमरे में आईं। उन्होंने अनन्या के कंधे पर हाथ रखा और प्यार से पूछा, “अरे बेटी अनन्या! आज फिर तुम्हारी आँखों में नमी क्यों है? क्या अभी भी बदन में कोई दर्द है या किसी बात का दुख है? खुलकर बताओ न।”
सावित्री जी के इस अपनेपन भरे स्पर्श ने अनन्या के भीतर के बाँध को तोड़ दिया। वह फफक-फफक कर रो पड़ी और बोली, “चाची जी… आज मेरी माँ का जन्मदिन होता है… और मुझे उनकी बहुत याद आ रही है। मेरी माँ भी बिल्कुल मेरी ही तरह थीं… बेचारी हमेशा दूसरों के लिए जीती रहीं।”
सावित्री जी ने अचरज से पूछा, “तेरी माँ? क्या हुआ था उन्हें बेटी?”
अनन्या ने रुंधे गले से अपनी अतीत की दर्दभरी दास्ताँ सुनाई, “चाची जी, मेरी दादी और घर के बाकी रिश्तेदार मेरी माँ को कभी चैन से बैठने नहीं देते थे। सुबह सूरज निकलने से पहले उठना, चक्की पर गेहूँ पीसना, मसाले कूटना, दाल दलना और घर के बीस लोगों के लिए दिन-रात खाना बनाते-बनाते उनकी रीढ़ की हड्डी तक झुक गई थी। उनके शरीर में बिल्कुल भी दम नहीं बची थी। डॉक्टर ने उन्हें सख्त बेड रेस्ट के लिए कहा था, क्योंकि उन्हें गंभीर दिल की बीमारी और उच्च रक्तचाप (ब्लड प्रेशर) था। लेकिन किसी ने उनकी एक नहीं सुनी। सब यही कहते थे कि ‘अगर ये आराम करेंगी तो घर का काम कौन करेगा? ये तो बस नाटक करती हैं!’ उनके इलाज में एक धेला भी खर्च करने के लिए कोई तैयार नहीं था। और अंत में… एक दिन वे हम सबको हमेशा के लिए छोड़कर चली गईं। मरते दम तक उनके शरीर से पसीना और काम की थकान नहीं छूटी थी… वे सचमुच एक कठपुतली की तरह जीती थीं और वैसे ही दम तोड़ गईं।”
अनन्या की यह हृदयविदारक कहानी सुनकर कमरे के दरवाजे पर खड़ी अपर्णा और ज्योति के पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्होंने जब से यह सुना था, उनके सीने में जैसे किसी ने भारी पत्थर रख दिया हो। वे दोनों दौड़कर अंदर आईं और अनन्या को अपनी छाती से लगा लिया।
अपर्णा की आँखों से अविरल धारा बह रही थी। उन्होंने रोते हुए कहा, “हमें माफ कर दो अनन्या! हमें माफ कर दो बेटी! हम लोग कितनी स्वार्थी हो गईं थीं। अपनी सहूलियत और आराम के चक्कर में हम भूल गईं थीं कि तुम भी किसी की लाडली बेटी हो, किसी के कलेजे का टुकड़ा हो। तुम्हारी मीठी मुस्कान और भोलेपन का हमने फायदा उठाया। आज तुम्हारी बात सुनकर ऐसा लगा मानो हमने अपनी ही क्रूरता का आईना देख लिया हो।”
ज्योति ने भी अनन्या के आँसू पोंछते हुए कहा, “आज के बाद इस घर में कोई भी अपना काम खुद करेगा। तुम इस घर की कोई कठपुतली या नौकरानी नहीं हो, बल्कि इस परिवार की सबसे प्यारी बेटी हो। हमारा हाथ बंटाने के लिए तुम्हारा बहुत शुक्रिया, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम तुम्हारी जान ही ले लें।”
तभी माधवानंद जी और कुणाल भी वहाँ आ गए। उन्होंने जब पूरा माज़रा समझा, तो वे भी स्तब्ध रह गए। माधवानंद जी ने गंभीर स्वर में कहा, “बहूओं, तुमने बिल्कुल सही पहचाना। इंसानियत तभी जिंदा रहती है जब हम अपनों के दर्द को अपना समझें। आज से इस घर का नियम बदलता है। हर व्यक्ति अपने हिस्से का काम स्वयं करेगा।”
घर का माहौल एकदम से बदल गया। अगले ही दिन, अपर्णा और ज्योति ने अनन्या को गले से लगाया और कहा, “चलो अनन्या, आज हम सब मिलकर शहर के उस मशहूर बाजार चलेंगे। तुम्हारे लिए तुम्हारी पसंद के सुंदर-सुंदर कपड़े और उपहार खरीदेंगे।”
शुरुआत में अनन्या ने झिझकना चाहा, लेकिन जब अपर्णा और ज्योति ने प्यार से उसका हाथ पकड़कर गाड़ी में बिठाया, तो उसके होंठों पर जो सच्ची और खिलखिलाती हुई मुस्कान आई, उसने पूरे घर को रोशन कर दिया। बाजार में घूमते हुए, हँसते-खिलखिलाते हुए ऐसा लगा मानो उस घर में कोई दुख कभी था ही नहीं। अनन्या को लगा कि उसे अपनी माँ के जाने के बाद एक बार फिर से दो-दो प्यारी बहनें और एक पूरा परिवार मिल गया हो।
इस घटना ने पूरे परिवार को हमेशा के लिए बदल दिया। इस कहानी से हमें यही सीख मिलती है कि जीवन में कभी भी किसी की सरलता और सेवाभाव का नाजायज फायदा नहीं उठाना चाहिए। इंसान को अपने छोटे-मोटे काम खुद करने की आदत डालनी चाहिए ताकि किसी दूसरे के जीवन पर अनजाने में ही सही, बोझ या अत्याचार न बन सके। प्यार और सम्मान से ही घर स्वर्ग बनता है, किसी की मजबूरी या खामोशी का फायदा उठाने से नहीं।
दोस्तों, क्या हमारे आस-पास भी कई बार ऐसा नहीं होता कि हम अपनों की ममता और सेवा को उनकी कमज़ोरी समझ बैठते हैं? इस मर्मस्पर्शी कहानी के बारे में आपके क्या विचार हैं? क्या आपने कभी अपने जीवन में ऐसा अनुभव किया है? अपने दिल की बात नीचे कमेंट बॉक्स में अवश्य साझा करें।
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मूल लेखिका : विधि जैन