“अरे अवनि, क्या बात है? जब से छोटी दीदी मानसी के घर से लौटकर आई हो, तुम्हारे चेहरे पर बारह क्यों बजे हुए हैं? रास्ते में भी तुमने एक शब्द नहीं बोला और घर आकर भी गुमसुम बैठी हो। आखिर हुआ क्या है वहां?”
प्रणव ने अपने ऑफिस के जूते उतारते हुए और टाई ढीली करते हुए अपनी पत्नी अवनि से पूछा। अवनि, जो अपनी अलमारी के सामने खड़ी होकर अपनी बनारसी साड़ी की तह लगा रही थी, उसने बिना प्रणव की तरफ देखे एक गहरी सांस ली और बुझे हुए स्वर में कहा, “कुछ नहीं प्रणव, जाने भी दीजिए। अगर मैंने कुछ कह भी दिया, तो भी आप मुझे कहां समझने वाले हैं? उल्टा मुझे ही चार बातें सुना देंगे कि मैं छोटी सोच रखती हूं और आपके परिवार में कमियां निकालती हूं।”
इतना कहकर अवनि ने साड़ी अलमारी में रखी, नाइटसूट बदला और चुपचाप बिस्तर के एक कोने में जाकर लेट गई। उसने अपनी आंखें तो बंद कर लीं, लेकिन नींद उसकी आंखों से कोसों दूर थी। करवटें बदलते हुए उसके जहन में बार-बार वही एक दृश्य घूम रहा था, जो आज शाम उसने अपनी ननद मानसी के घर देखा था। वह लाख कोशिशों के बाद भी यह समझ नहीं पा रही थी कि उसकी सासु मां, कौशल्या जी ने आखिर उसके साथ ऐसा छल क्यों किया? क्या एक बहू होने का मतलब यह है कि उसकी अपनी चीजों पर भी उसका कोई अधिकार न रहे?
अवनि और प्रणव की शादी को अभी महज नौ महीने ही हुए थे। अवनि का ससुराल देहरादून के एक बड़े और प्रतिष्ठित परिवार में था, जहां उसकी सास कौशल्या जी और बड़े जेठ अनिरुद्ध तथा जेठानी चारु अपने दो बच्चों के साथ रहते थे। प्रणव की एक छोटी बहन मानसी भी थी, जिसकी शादी दो साल पहले देहरादून के ही एक अच्छे परिवार में हुई थी। प्रणव खुद चंडीगढ़ की एक मल्टीनेशनल कंपनी में ऊंचे पद पर कार्यरत था। शादी के बाद शुरुआती दो महीने अवनि देहरादून अपने ससुराल में ही रही, ताकि नए परिवार के रीति-रिवाजों को समझ सके और सबके साथ घुल-मिल सके।
इसके बाद जब प्रणव के साथ चंडीगढ़ जाकर अपनी नई गृहस्थी बसाने का समय आया, तो अवनि के मन में हजारों सपने हिलोरें लेने लगे। हर नई दुल्हन की तरह वह भी अपने पिया के साथ अपना एक छोटा सा, सुंदर सा आशियाना सजाना चाहती थी।
अवनि अपने माता-पिता की इकलौती और बेहद लाडली बेटी थी। उसके पिता श्रीकांत जी एक रिटायर्ड बैंक मैनेजर थे और मां शशि जी एक गृहणी। जब अवनि का रिश्ता तय हुआ, तो पिछले छह महीनों से शशि जी और श्रीकांत जी ने आगरा के बाजारों में घूम-घूमकर, एक-एक चीज बड़े ही चाव और दुलार से खरीदी थी। उन्हें पता था कि अवनि को खाना बनाने और घर सजाने का बहुत शौक है। इसलिए उन्होंने पीतल के नक्काशीदार बर्तनों से लेकर, ब्रांडेड नॉन-स्टिक कुकवेयर सेट, पांच लीटर का भारी इंडक्शन प्रेशर कुकर, माइक्रोवेव, बेल्जियम ग्लास का छत्तीस पीस वाला बेहद कीमती डिनर सेट, मखमली बेडशीट्स और जाने क्या-क्या अपनी बेटी के लिए इकट्ठा किया था।
शशि जी अक्सर सामान पैक करते हुए कहती थीं, “मेरी लाडो जब अपने घर जाएगी और अपनी रसोई में ये बर्तन सजाएगी, तो उसे कभी किसी चीज की कमी महसूस नहीं होनी चाहिए। उसे हर बर्तन में अपने मायके का प्यार और आशीर्वाद नजर आएगा।”
उन्हीं भावनाओं और यादों को समेटे हुए, देहरादून से चंडीगढ़ जाने से दो दिन पहले जब अवनि अपने कमरे में सारा सामान बड़े मनोभाव से कार्टन में पैक कर रही थी, तभी सासु मां कौशल्या जी कमरे में दाखिल हुईं। कमरे में फैले हुए डिब्बों को देखकर कौशल्या जी के माथे पर बल पड़ गए। उन्होंने अपने चश्मे को नाक पर ठीक करते हुए थोड़ा तीखे स्वर में कहा, “अरे रे बहू! यह क्या? तुम तो अपना सारा सामान ऐसे समेट कर बांध रही हो जैसे इस घर से हमेशा के लिए नाता तोड़कर जा रही हो! यहां फिर कभी लौटकर आना ही नहीं है क्या तुम्हें?”
सासु मां के ये शब्द सुनते ही थर्माकोल में क्रॉकरी लपेटती अवनि के हाथ वहीं के वहीं थम गए। उसका दिल धक से रह गया। वह कुछ बोल पाती, उससे पहले ही प्रणव कमरे में आ गया। माहौल की गंभीरता को भांपते हुए प्रणव ने बात संभालने की कोशिश की, “अरे मां, ऐसी बात नहीं है। आप तो जानती हैं कि चंडीगढ़ वाले फ्लैट में मैं अब तक बैचलर की तरह रहता था। वहां रसोई का ज्यादा सामान नहीं है, बस कामचलाऊ बर्तन हैं। अब अवनि वहां चलेगी, तो अपने हिसाब से गृहस्थी जमाएगी। इसलिए मैंने ही इससे कहा कि तुम्हारे मायके से जो रसोई के बर्तन और जरूरी सामान मिले हैं, उन्हें पैक कर लो। हमारी कार की डिक्की और पिछली सीट पर जितना सामान आ पाएगा, उतना हम साथ ले चलते हैं।”
प्रणव की बात सुनकर कौशल्या जी ने मुंह बनाते हुए कहा, “अच्छा-अच्छा ठीक है, पर इस तरह झाड़ू लगाकर सब कुछ बटोर कर ले जाने की क्या जरूरत है? तीज-त्योहार पर तो यहीं आओगे न? फिर जो अभी तुरंत के लिए जरूरी हो, बस वही ले जाओ। बाकी सामान यहीं स्टोर रूम में पड़ा रहने दो, कौन सा कोई चुरा लेगा।”
अवनि ने मन मसोस कर हामी भर दी। वह जैसे ही अपने मायके से मिला पांच लीटर वाला नया स्टील का कुकर डिब्बे में रखने के लिए झुकी, कौशल्या जी ने तुरंत आगे बढ़कर उसके हाथ से वह डिब्बा ले लिया।
“अरे बहू, यह इतना बड़ा कुकर लेकर कहां जाओगी? चंडीगढ़ में तो तुम दोनों सिर्फ मियां-बीवी ही रहोगे। दो लोगों के दाल-चावल के लिए तो दो लीटर वाला छोटा कुकर ही काफी है। और वैसे भी, अपने इस घर की रसोई का बड़ा कुकर कब से सीटी नहीं दे रहा, उसका ढक्कन खराब हो गया है। बड़ी बहू चारु कब से कह रही थी नया कुकर लाने को। लाओ, इसे यहीं रसोई के लिए निकाल लेते हैं। आखिर यह घर भी तो तुम्हारा ही है न, पराये थोड़े ही हैं हम!” कौशल्या जी ने बड़े ही अधिकार से कहा और वह कुकर उठाकर दरवाजे के पास रख दिया।
अवनि के गले में जैसे कुछ अटक गया। वह कुकर उसके पापा ने खास तौर पर इसलिए दिलाया था ताकि जब कभी प्रणव के दोस्त या रिश्तेदार घर आएं, तो अवनि को खाना बनाने में दिक्कत न हो। लेकिन नई नवेली दुल्हन होने की मर्यादा ने उसके होंठ सिल दिए। तभी पीछे से जेठानी चारु भी कमरे में आ गई और कुकर देखकर मुस्कुराते हुए बोली, “अरे वाह मांजी! यह तो बहुत बढ़िया कंपनी का कुकर है, भारी तले वाला। अब तो रसोई में छोले-राजमा बनाने में बिल्कुल दिक्कत नहीं होगी।” चारु तुरंत वह कुकर उठाकर बाहर ले गई और अवनि बस बेबसी से देखती रह गई।
इसके बाद अवनि की नजर कोने में रखे उस बड़े से लाल डिब्बे पर पड़ी, जिसमें बेल्जियम ग्लास का कीमती डिनर सेट था। उस डिब्बे पर अभी तक तोहफे की पन्नी चढ़ी हुई थी। अवनि ने उम्मीद भरी नजरों से प्रणव की तरफ देखा और धीरे से पूछा, “प्रणव, यह डिनर सेट तो रख लें न? वहां कोई मेहमान आएगा तो…”
प्रणव ने उस बड़े से भारी डिब्बे को देखा और अपनी घड़ी पर नजर डालते हुए लापरवाही से कहा, “अरे यार अवनि, इतना बड़ा और नाजुक डिब्बा कार में कहां फिट होगा? रास्ते में झटके लगने से कांच टूट-फूट गया तो सारा नुकसान हो जाएगा। इसे अभी यहीं रहने दो, फिर कभी दिवाली की छुट्टियों में आएंगे तो आराम से ले चलेंगे।”
प्रणव का इतना कहना था कि कौशल्या जी को जैसे और शह मिल गई। उन्होंने अवनि के फूड प्रोसेसर, सैंडविच मेकर, पीतल के पूजा के बर्तनों और दो मखमली कंबलों को भी यह कहकर रुकवा दिया कि, “अभी नई-नई गृहस्थी में इतनी शौकिया और तामझाम वाली चीजें रखने की क्या जरूरत है? किराए के मकान में जितना कम सामान रहे, शिफ्टिंग में उतनी आसानी होती है। बस रोजमर्रा के काम का सामान ले जाओ, बाकी सब यहीं सुरक्षित रहेगा।”
अवनि भारी मन से सिर्फ चार जोड़ी कपड़े, दो-चार साधारण पतीले, एक छोटा पैन और थोड़ी बहुत गृहस्थी का सामान लेकर प्रणव के साथ चंडीगढ़ आ गई। चंडीगढ़ पहुंचकर जब उसने अपनी रसोई संभाली, तो हर कदम पर उसे अपनी उन चीजों की कमी खलने लगी जो देहरादून छूट गई थीं।
जब भी वह प्रणव से कहती कि रसोई में मिक्सर ग्राइंडर अच्छा नहीं है, या कढ़ाई छोटी पड़ रही है, या एक अच्छा कैसरोल सेट चाहिए, तो प्रणव चिढ़ जाता। महीने के बजट का हवाला देकर वह अक्सर अवनि पर गुस्सा करते हुए कहता, “अवनि, तुम्हें तो बस रसोई भरने और फिजूलखर्ची करने का शौक है! दो लोगों के खाने में इतना क्या तामझाम करना? जैसे काम चल रहा है, वैसे चलाओ न!”
पति के ये तीखे बोल अवनि के कलेजे को छलनी कर देते। वह मन ही मन सोचती कि मेरे मां-बाप ने तो मुझे किसी चीज की कमी नहीं होने दी थी, सब कुछ तो दिया था उन्होंने! आज मेरी ही चीजें ससुराल के स्टोर रूम में बंद पड़ी हैं और यहां मुझे एक-एक बर्तन के लिए अपने ही पति के ताने सुनने पड़ रहे हैं।
इसी तरह चार महीने बीत गए। एक दिन प्रणव ने ऑफिस से फोन करके बताया कि आज शाम को उसके बॉस और दो सीनियर कलीग्स अपनी पत्नियों के साथ अचानक डिनर पर घर आ रहे हैं। अवनि ने पनीर लबाबदार, दाल मखनी, पुलाव और गुलाब जामुन तो बहुत स्वादिष्ट बना लिए, लेकिन जब खाना परोसने की बारी आई, तो रसोई में स्टील की पुरानी, बेमेल और घिसी हुई प्लेटें देखकर उसकी आंखों में आंसू आ गए।
मेहमानों के जाने के बाद उस रात अवनि का सब्र टूट गया। उसने रोते हुए प्रणव से कहा, “प्रणव, आज मुझे उन पुरानी प्लेटों में आपके बॉस के सामने खाना परोसते हुए कितनी शर्मिंदगी महसूस हुई, यह मैं ही जानती हूं। अगर आज मेरे मायके वाला वह डिनर सेट हमारे पास होता, तो क्या हमारी शान न बढ़ती? आपने तो वहां बड़े आराम से कह दिया कि बाद में ले आएंगे। अब जाइए और कल ही बाजार से एक नया डिनर सेट लेकर आइए, वरना मैं किसी मेहमान के सामने नहीं आऊंगी!”
प्रणव ने भी उस दिन अपनी गलती महसूस की थी क्योंकि उसके बॉस की पत्नी ने दबे शब्दों में क्रॉकरी पर तंज कस दिया था, लेकिन फिर भी उसने बात को टाल दिया।
उधर, एक हफ्ते बाद मानसी की शादी की सालगिरह थी। कौशल्या जी ने फोन करके प्रणव और अवनि को सख्त हिदायत दी कि उन्हें देहरादून आना ही पड़ेगा। प्रणव और अवनि दो दिन की छुट्टी लेकर देहरादून पहुंचे।
शाम को मानसी के घर पर एक शानदार पार्टी रखी गई थी। अवनि और प्रणव भी सज-धज कर मानसी के घर पहुंचे। घर में घुसते ही जब अवनि ने ड्राइंग रूम के सोफे और कुशन देखे, तो वह ठिठक गई। सोफे पर वही कश्मीरी कढ़ाई वाले कुशन कवर चढ़े थे, जो अवनि की मौसी ने उसे मुंहदिखाई में दिए थे। अवनि ने सोचा शायद एक जैसी डिजाइन के बाजार में और भी मिलते होंगे, यह सोचकर उसने अपने मन को समझा लिया।
लेकिन असली झटका तो उसे तब लगा, जब रात को डिनर शुरू हुआ। मानसी अपनी सहेलियों और ससुराल वालों के सामने बड़े गर्व से डाइनिंग टेबल पर खाना लगा रही थी। टेबल के बीचों-बीच वही बेल्जियम ग्लास का छत्तीस पीस वाला डिनर सेट चमक रहा था, जिस पर सुनहरे फूलों की बारीक कारीगरी थी। और तो और, पास ही रखे फूड वार्मर और सूप बाउल्स भी वही थे, जिन्हें शशि जी ने आगरा के सबसे बड़े शोरूम से अपनी बेटी के लिए खरीदा था।
अवनि की आंखें फटी की फटी रह गईं। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था। तभी मानसी की सास ने डिनर सेट की तारीफ करते हुए कहा, “वाह कौशल्या समधन जी, मानना पड़ेगा आपकी पसंद को! सालगिरह पर आपने मानसी को यह डिनर सेट और किचन के जो उपकरण तोहफे में भेजे हैं, वे वाकई लाजवाब हैं। पूरे देहरादून में ऐसी क्रॉकरी ढूंढने से भी नहीं मिलेगी।”
कौशल्या जी ने गर्व से मुस्कुराते हुए अपनी साड़ी का पल्लू संभाला और बोलीं, “अरे समधन जी, हमारी एक ही तो बेटी है! इसके सुख और शान के आगे हमें कुछ भी महंगा नहीं लगता। बस मेरी बेटी का घर भरा-पूरा रहे।”
अवनि के पैरों तले से जमीन खिसक गई। उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके सीने में खंजर भोंक दिया हो। वह चुपचाप हाथ धोने के बहाने मानसी की रसोई की तरफ गई, तो वहां का नजारा देखकर उसका खून खौल उठा। रसोई के स्लैब पर उसका वही फूड प्रोसेसर और सैंडविच मेकर रखा हुआ था, जिस पर अभी भी आगरा की उस दुकान का छोटा सा बारकोड स्टीकर चिपका हुआ था, जहां से उसके पिता ने उसे खरीदा था।
यानी सासु मां ने जिस सामान को ‘अमानत’ और ‘सुरक्षित रखने’ के नाम पर देहरादून में रुकवाया था, वह सारा सामान उन्होंने अपनी बेटी की ससुराल में अपनी झूठी शान दिखाने के लिए तोहफे में बांट दिया था! और जो बचा-खुचा सामान था, जैसे बड़ा कुकर और मखमली कंबल, वह जेठानी चारु के कमरे की शोभा बढ़ा रहे थे। एक पिता के पसीने की कमाई और एक मां के अरमानों को कौशल्या जी ने बिना अवनि से पूछे, इतनी बेदर्दी से लूट लिया था।
उस रात मानसी के घर से लौटते वक्त अवनि के हलक से निवाला तक नहीं उतरा था, और यही कारण था कि घर लौटकर वह प्रणव से बिना कुछ कहे बिस्तर पर लेट गई थी।
अगली सुबह रविवार था। घर के आंगन में धूप खिली हुई थी। कौशल्या जी और चारु बैठकर चाय पी रही थीं और रात की पार्टी की तारीफों के पुल बांध रही थीं। अवनि नहा-धोकर रसोई से बाहर आई। रात भर जागने के बाद उसने तय कर लिया था कि अगर आज वह चुप रही, तो जिंदगी भर उसके आत्मसम्मान को ऐसे ही रौंदा जाता रहेगा। रोना या पति से झगड़ना किसी समस्या का हल नहीं है, आज उसे बहुत ही शांत लेकिन सख्त तरीके से अपनी बात रखनी होगी।
तभी प्रणव भी तैयार होकर बाहर आया और बोला, “मां, नाश्ता जल्दी बनवा दीजिए, हमें दोपहर तक वापस चंडीगढ़ के लिए निकलना है।”
अवनि ने चाय की ट्रे मेज पर रखी और बहुत ही शांत व सधे हुए स्वर में कहा, “प्रणव, निकलने से पहले आप जरा स्टोर रूम की चाबी मांजी से ले लीजिए। पिछली बार जब हम चंडीगढ़ जा रहे थे, तो आपने कहा था न कि मेरा डिनर सेट, फूड प्रोसेसर और बाकी सामान दिवाली से पहले ले चलेंगे। आज गाड़ी में जगह भी पूरी है, तो चलिए, आज मैं अपना सारा सामान पैक करके ही साथ ले जाऊंगी।”
अवनि की बात सुनते ही कौशल्या जी के हाथ से चाय का कप छूटते-छूटते बचा और चारु के चेहरे का रंग उड़ गया।
प्रणव ने नासमझी में कहा, “अरे हां मां, अवनि बिल्कुल ठीक कह रही है। वहां चंडीगढ़ में हमें सच में इन चीजों की बहुत जरूरत पड़ती है। लाइए चाबी दीजिए, मैं ऊपर से डिब्बे उतार लाता हूं।”
कौशल्या जी हड़बड़ा गईं। उन्होंने नजरें चुराते हुए कहा, “अरे… वो… अभी ले जाकर क्या करोगे? फिर कभी ले जाना न! स्टोर रूम में तो बहुत धूल जमी है, कौन अभी सफाई करेगा।”
अवनि ने सासु मां की आंखों में आंखें डालते हुए बेहद विनम्रता से, लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, “मांजी, स्टोर रूम में धूल जमी है या स्टोर रूम खाली हो चुका है? आप सच-सच प्रणव को क्यों नहीं बता देतीं कि मेरा वह बेल्जियम ग्लास का डिनर सेट, फूड प्रोसेसर और सैंडविच मेकर अब इस घर के स्टोर रूम में नहीं, बल्कि कल रात मानसी दीदी के घर की डाइनिंग टेबल और रसोई में सज चुके हैं?”
प्रणव ने चौंककर अपनी मां की तरफ देखा, “मां! यह अवनि क्या कह रही है? कल रात मानसी के यहां जो क्रॉकरी थी… क्या वो अवनि के मायके का सामान था?”
कौशल्या जी अपनी चोरी पकड़े जाने पर सकपका गईं, लेकिन अपनी गलती मानने के बजाय उन्होंने तुरंत पैंतरा बदला और आवाज ऊंची करते हुए बोलीं, “तो क्या हो गया अगर मैंने अपनी बेटी को दे दिया तो? मानसी इस घर की बेटी है, उसका हक बनता है! और वैसे भी, एक बार लड़की ब्याह कर ससुराल आ जाती है, तो उसके मायके से आया हर सामान ससुराल की संपत्ति होता है। मैं इस घर की मालकिन हूं, मेरी मर्जी मैं जिसे जो दूं! तुम दोनों इस घर में फूट डालने की कोशिश मत करो।”
सास के मुंह से ऐसी बातें सुनकर प्रणव का सिर शर्म से झुक गया। जिस पत्नी को वह पिछले छह महीनों से फिजूलखर्ची और रसोई भरने के ताने दे रहा था, आज उसे समझ आया कि वह बेचारी तो अपने ही हक की चीजों के लिए तरस रही थी।
अवनि ने एक गहरी सांस ली और बिना अपना आपा खोए बोली, “मांजी, अगर आप मुझसे एक बार प्यार से कहतीं कि ‘बहू, मानसी को देने के लिए अभी बजट नहीं बन पा रहा है, क्या मैं तुम्हारा डिनर सेट उसे दे दूं?’, तो यकीन मानिए, मैं खुशी-खुशी खुद अपने हाथों से उसे तोहफे की पन्नी में लपेट कर आपको दे देती। लेकिन आपने मुझसे झूठ बोला। मुझे यह कहकर रोक दिया कि मेरी गृहस्थी में इन चीजों की जरूरत नहीं है, जबकि यहां भाभी जी की रसोई से लेकर ननद के घर तक में मेरी ही चीजों की जरूरत पड़ गई।”
अवनि थोड़ा रुकी और फिर प्रणव की तरफ मुड़कर बोली, “और मांजी, यह सामान सिर्फ कागज के नोटों से नहीं खरीदा गया था। इसमें मेरे रिटायर्ड पिता की आंखों की रोशनी और मेरी मां के घुटनों का दर्द शामिल है, जिन्होंने आगरा की तपती दोपहरी में बाजारों के चक्कर काटकर अपनी बेटी के लिए यह गृहस्थी जोड़ी थी। इसे ‘स्त्रीधन’ कहते हैं मांजी, जिस पर कानूनन और नैतिक रूप से सिर्फ एक लड़की का अधिकार होता है। जिस तरह आपको अपनी बेटी मानसी की ससुराल में उसकी शान बढ़ाने की चिंता है, ठीक वैसे ही मेरे मां-बाप ने भी मेरी शान और सुविधा के लिए मुझे ये चीजें दी थीं, न कि इसलिए कि मैं चंडीगढ़ में टूटी-फूटी प्लेटों में मेहमानों को खाना परोसूं और मेरे ही पति मुझे ताने मारें।”
अवनि की बातों में इतना दर्द और इतनी सच्चाई थी कि चारु चुपचाप उठकर अपने कमरे में चली गई और थोड़ी देर बाद वह पांच लीटर वाला नया कुकर और दोनों कंबल लाकर मेज के पास रख दिए। उसने धीमी आवाज में कहा, “अवनि, मुझे माफ कर देना। कुकर तो अभी तक इस्तेमाल नहीं हुआ है, डिब्बे में ही बंद था। तुम इसे ले जाओ।”
अब बारी प्रणव की थी। वह अपनी जगह से उठा और अपनी मां के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। उसकी आवाज में एक बेटे का सम्मान तो था, लेकिन एक पति का फर्ज भी साफ झलक रहा था।
“मां, आज आपने मेरी नजरों में मुझे ही बहुत छोटा कर दिया,” प्रणव ने भरे हुए गले से कहा। “मैं पिछले छह महीनों से अवनि को डांटता रहा कि वह हर चीज की फरमाइश क्यों करती है। मुझे क्या पता था कि आपने इसके मायके की अमानत को ही यहां बांट दिया है। मां, मानसी मेरी भी बहन है, मैं उससे बहुत प्यार करता हूं। अगर उसे तोहफा देना था, तो आप मुझसे पैसे मांगतीं, मैं अपनी कमाई से उसे इससे भी महंगा डिनर सेट दिला देता। लेकिन किसी एक बेटी का घर उजाड़कर या उसका दिल दुखाकर दूसरी बेटी का घर सजाना कहां का न्याय है? क्या अगर कल को मानसी की सास मानसी के मायके से मिले सामान को अपनी बेटी को दे दें, तो आप सहन कर पाएंगी?”
अपने ही बेटे के मुंह से यह सटीक सवाल सुनकर कौशल्या जी निरुत्तर हो गईं। उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि अगर यही बात मानसी के साथ हुई होती, तो वह अब तक मानसी के ससुराल में तूफान खड़ा कर चुकी होतीं। ममता के अंधेपन में वह यह भूल ही गई थीं कि अवनि भी किसी के घर की मानसी है, किसी के आंगन की लाडली है।
कौशल्या जी की आंखों में पश्चाताप के आंसू छलक आए। उन्होंने आगे बढ़कर अवनि के सिर पर हाथ रखा और कांपती आवाज में बोलीं, “मुझे माफ कर दे बहू। मैं वाकई अपनी बेटी के मोह में अंधी हो गई थी। मैं भूल गई थी कि बर्तन तो बाजार से दोबारा खरीदे जा सकते हैं, लेकिन अगर बहू के मन से सास के लिए सम्मान और विश्वास उठ जाए, तो वह किसी बाजार में नहीं मिलता। जो सामान मानसी के घर चला गया, उसे वापस मांगकर तो मैं अपनी जगहंसाई नहीं करा सकती, लेकिन मैं वादा करती हूं…”
इतना कहकर कौशल्या जी अपने कमरे में गईं और अपनी अलमारी से पचास हजार रुपये की गड्डी और अपनी सोने की दो चूड़ियां निकालकर लाईं। उन्होंने वह रुपये और चूड़ियां अवनि की हथेली पर रखते हुए कहा, “यह मेरी तरफ से तेरी नई गृहस्थी के लिए आशीर्वाद है। चंडीगढ़ जाकर अपनी पसंद का सबसे सुंदर डिनर सेट और जो भी सामान कम हो, वह खरीद लेना। और आज के बाद इस घर में तेरे मायके की सुई भी तेरी इजाजत के बिना कोई नहीं छुएगा।”
अवनि ने तुरंत सासु मां के पैर छू लिए और रुपये वापस उनके हाथ में रखते हुए मुस्कुरा कर बोली, “मांजी, मुझे पैसे या सोने की चूड़ियां नहीं चाहिए थीं। मुझे बस अपना सम्मान और अपने माता-पिता की भावनाओं की कद्र चाहिए थी, जो आज मुझे मिल गई। आपने अपनी गलती मान ली, मेरे लिए यही सबसे बड़ा डिनर सेट है। मानसी दीदी को जो सामान गया, वह मेरी तरफ से उनकी सालगिरह का तोहफा समझिए। और रही बात चंडीगढ़ की रसोई की, तो अब आपके बेटे को सच पता चल गया है, तो वो खुद ही मुझे शॉपिंग करवा देंगे!”
अवनि की इस समझदारी और बड़प्पन ने माहौल के सारे तनाव को पल भर में खत्म कर दिया। प्रणव ने गर्व से अपनी पत्नी की तरफ देखा और कौशल्या जी ने अवनि को कसकर अपने गले से लगा लिया। उस दिन देहरादून से लौटते वक्त कार की डिक्की में सामान भले ही कम था, लेकिन अवनि और प्रणव के दिलों में एक-दूसरे के लिए प्यार और परिवार में आपसी सम्मान की गठरी पूरी तरह से भरी हुई थी।
दोस्तों, हमारे समाज में अक्सर यह देखा जाता है कि सास को अपनी बेटी के मायके का सामान तो बेटी का ‘हक’ लगता है, लेकिन जब बात बहू के मायके से आए सामान की होती है, तो उसे पूरे ससुराल की ‘जागीर’ समझ लिया जाता है। क्या आपके आसपास या आपके अपने जीवन में भी कभी ऐसा हुआ है? क्या अवनि ने अपने हक और अपने माता-पिता के सम्मान के लिए आवाज उठाकर सही किया? अपनी राय हमें नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं, आपके विचारों का हमें इंतजार रहेगा!
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मूल लेखिका : रश्मि प्रकाश