प्रतीक की बातें सुनकर मालती जी की आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े। उन्होंने गर्व से अपनी बेटी की तरफ देखा। वहीं आलोक जी का सिर शर्म और पश्चाताप से झुक गया था। उन्हें आज समझ आ गया था कि जिस साँवले रंग को वे अपनी बेटी की कमजोरी समझ रहे थे और जिसे छिपाने के लिए वे उसे ब्यूटी पार्लर भेजना चाहते थे, असल में उनकी बेटी की काबिलियत और सादगी के आगे वह रंग तो एक गहना था।
शाम के ठीक साढ़े छह बजे थे। आलोक जी ने घर के मुख्य द्वार की घंटी बजाई, तो उनके चेहरे पर एक अजीब सी हड़बड़ाहट और खुशी का मिला-जुला भाव था। दरवाजा उनकी पत्नी मालती जी ने खोला। आलोक जी ने अपने हाथ का ब्रीफकेस सोफे पर लगभग पटकते हुए कहा, “अरे मालती! कहाँ हो भाई, जरा जल्दी से बैठो, तुम्हें एक बहुत बड़ी खुशखबरी सुनानी है। समझो कि आज तो भगवान ने हमारी सुन ली है!”
रसोई से हाथ पोंछती हुई मालती जी बाहर आईं और अपने पति की इस बेताबी को देखकर थोड़ा मुस्कुराते हुए बोलीं, “पहले साँस तो ले लीजिए। ऑफिस से सीधे दौड़ते हुए आ रहे हैं क्या? मैं पानी लेकर आती हूँ, फिर आराम से बताइए कि ऐसी कौन सी लॉटरी लग गई है।”
आलोक जी ने मालती का हाथ पकड़कर पास ही की कुर्सी पर बैठाते हुए कहा, “अरे पानी बाद में पिएंगे, पहले मेरी बात तो सुनो। हमारे दफ्तर के जो पुराने मित्र हैं न, महेंद्र बाबू… आज उन्होंने खुद मुझे फोन किया था। उनके बड़े भाई के बेटे, यानी उनके भतीजे प्रतीक के लिए उन्होंने हमारी अक्षरा का हाथ माँगा है। तुम्हें पता भी है प्रतीक क्या करता है? कस्टम विभाग में क्लास-वन ऑफिसर है! देखने में एकदम राजकुमार जैसा और खानदान तो इतना रईस और संस्कारी है कि पूछो मत। कल रविवार है, और वे लोग कल सुबह ही ग्यारह बजे अक्षरा को देखने हमारे घर आ रहे हैं।”
यह सुनते ही मालती जी के चेहरे की मुस्कान अचानक कहीं गायब हो गई और माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं। आलोक जी ने अपनी बात जारी रखते हुए एक आदेशात्मक लहजे में कहा, “देखो मालती, यह रिश्ता किसी भी कीमत पर हमारे हाथ से निकलना नहीं चाहिए। अभी सात बजने वाले हैं, अक्षरा भी अपने कॉलेज से आने ही वाली होगी। जैसे ही वह आए, तुम उसे तुरंत शहर के सबसे महंगे ब्यूटी पार्लर में ले जाओ। पार्लर वाली से कहना कि कोई बढ़िया सा फेशियल या ब्लीच कर दे, जिससे चेहरे का दबदबा और चमक बढ़ जाए। कल जब लड़के वाले आएं, तो मेरी बेटी एकदम चकाचक और गोरी-चिट्टी दिखनी चाहिए। पैसे की चिंता मत करना, जितना लगे लगा देना।”
पति की यह बात सुनकर मालती जी के सब्र का बाँध टूट गया। उनके स्वर में एक गहरी पीड़ा और नाराजगी उतर आई। वे बोलीं, “आप भी कैसी बातें करते हैं जी! ब्यूटी पार्लर जाने से धूल-मिट्टी साफ हो सकती है, थोड़ा निखार आ सकता है, लेकिन भगवान ने जो कुदरती साँवला रंग दिया है, वह रातों-रात दूध जैसा सफेद तो नहीं हो जाएगा न! और आप अपनी ही बेटी को इस तरह कम क्यों आँकते हैं? हमारी अक्षरा सरकारी कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर है, पीएचडी कर चुकी है, पूरे घर की जिम्मेदारी उठाती है और इतनी सलीकेदार है। क्या उसकी यह काबिलियत उसके रंग से छोटी है? जो इंसान उसकी डिग्री और उसके संस्कारों को छोड़कर सिर्फ चमड़ी का रंग देखने आएगा, उसके लिए हमें अपनी बेटी पर नकली परतों का मुखौटा चढ़ाने की कोई जरूरत नहीं है।”
आलोक जी ने झल्लाते हुए कहा, “तुम औरतों की यही तो समस्या है, हमेशा भावनाओं में बह जाती हो! अरे भई, समाज के हिसाब से चलना पड़ता है। कस्टम ऑफिसर का रिश्ता रोज-रोज चलकर दरवाजे पर नहीं आता। जब लड़का इतना आला अफसर है, तो परिवार वाले लड़की में थोड़ी सुंदरता तो खोजेंगे ही न! इसमें बुराई क्या है? अगर थोड़ा मेकअप कर लेगी तो रिश्ता पक्का हो जाएगा, हमारी भी समाज में नाक ऊँची हो जाएगी।”
मालती जी ने गहरी साँस ली और उदास मन से बोलीं, “नाक ऊँची करने के चक्कर में आप अपनी ही बेटी का आत्मसम्मान बार-बार कुचल रहे हैं। पिछले एक साल में चार परिवार इस घर की दहलीज पर आ चुके हैं। हर बार आपने उसे पार्लर भेजा, हर बार वह किसी सजावटी गुड़िया की तरह ट्रे लेकर बाहर आई, और हर बार लड़के वालों ने समोसे-मिठाई खाकर यही संदेश भिजवाया कि ‘लड़की गुणी तो बहुत है, पर रंग थोड़ा दबा हुआ है।’ आप नहीं जानते कि हर इनकार के बाद मेरी बेटी रात-रात भर तकिए में मुँह छिपाकर कितना रोई है। अब वह कोई सामान नहीं है जिसे बार-बार बाजार में नुमाइश के लिए रखा जाए।” इतना कहकर मालती जी बिना कुछ सुने रसोई में चाय बनाने चली गईं।
तभी बाहर स्कूटी रुकने की आवाज आई और कुछ ही पलों में अक्षरा ने घर में कदम रखा। साँवले-सलोने चेहरे पर काम की हल्की थकान थी, लेकिन आँखों में एक पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर लड़की की गजब की चमक थी। उसने अपनी माँ के हाथ से चाय का कप लिया ही था कि आलोक जी ने फिर वही पार्लर वाला फरमान सुना दिया।
अक्षरा ने एक नजर अपने पिता की तरफ देखा और फिर अपनी माँ की तरफ। उसने बिना कोई बहस किए शांत स्वर में कहा, “पापा, मैं आज किसी पार्लर नहीं जाऊँगी। और माँ, आप मेरे कमरे में आइए, मुझे आपसे कुछ बात करनी है।”
मालती जी जब अक्षरा के कमरे में पहुँचीं, तो देखा कि अक्षरा अलमारी से अपनी एक बेहद सादगी भरी सूती साड़ी निकाल रही थी। माँ को देखते ही अक्षरा का गुस्सा और दर्द आँखों में छलक आया। वह बोली, “माँ, पापा को आखिर हो क्या गया है? क्या मेरा प्रोफेसर होना, मेरा अपने पैरों पर खड़ा होना उनके लिए कोई मायने नहीं रखता? यह पाँचवीं बार है जब मुझे किसी तमाशे की तरह चार अनजान लोगों के सामने परोसा जाएगा। वे लोग आएंगे, मुझसे मेरे ही विषय के दो-चार फालतू सवाल पूछेंगे, मुझे ऊपर से नीचे तक ऐसे घूरेंगे जैसे कोई सब्जी खरीद रहे हों, और फिर मेरे साँवले रंग पर अफ़सोस जताते हुए चले जाएंगे।”
मालती जी ने बेटी के सिर पर हाथ फेरते हुए उसे शांत करने की कोशिश की, “बेटा, तेरे पापा के दोस्त ने खुद सामने से रिश्ता भेजा है, शायद ये लोग वैसे न हों…”
अक्षरा ने माँ की बात बीच में ही काटते हुए दृढ़ता से कहा, “माँ, मुझे किसी से कोई उम्मीद नहीं है। लेकिन आज मैं आपको साफ-साफ बता दे रही हूँ। मैं कल सिर्फ पापा का मान रखने के लिए उन लोगों के सामने आऊँगी, वह भी बिना किसी मेकअप के, जैसी मैं असल में हूँ। लेकिन अगर कल उन लोगों में से किसी ने भी मेरे रंग-रूप को लेकर कोई भी तंज कसा या दबी जुबान में भी कोई टिप्पणी की, तो मैं लिहाज का सारा घूँघट उतार फेंकूँगी। मैं उन्हें वहीं सबके सामने जवाब दूँगी और उसके बाद इस घर में मेरी शादी की बात कभी नहीं होगी। मुझे अकेले रहना मंजूर है, पर अपमान का घूँट पीकर किसी के गले पड़ना मंजूर नहीं!”
बेटी के तेवर देखकर मालती जी का कलेजा काँप उठा। उन्हें अपनी बेटी की बात सौ फीसदी सही लग रही थी, लेकिन एक माँ का दिल आने वाले कल के तूफान की आशंका से घबरा भी रहा था। उन्होंने मन ही मन हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना की, “हे ईश्वर! कल मेरी बेटी के स्वाभिमान की रक्षा करना। अब उसमें और टूटने की हिम्मत नहीं बची है।”
अगली सुबह घर में पकवानों की खुशबू तो फैल रही थी, लेकिन माहौल में एक अजीब सा तनाव था। आलोक जी बार-बार घड़ी देख रहे थे और ड्राइंग रूम के पर्दों को ठीक कर रहे थे। ठीक ग्यारह बजे बाहर एक बड़ी सी गाड़ी रुकी। आलोक जी ने दौड़कर दरवाजा खोला।
सामने उनके मित्र महेंद्र जी, अपने बड़े भाई सतीश जी, भाभी वंदना जी, भतीजे प्रतीक और भतीजी चहक के साथ खड़े थे। आलोक जी ने बड़े ही आदर और उत्साह के साथ सबका स्वागत किया। ड्राइंग रूम में बैठते ही बातों का सिलसिला शुरू हुआ। आलोक जी मन ही मन थोड़े सहमे हुए थे कि कहीं अक्षरा अपने गुस्से में कुछ गड़बड़ न कर दे, वहीं मालती जी ने जब वंदना जी और सतीश जी से बात की, तो उन्हें उन लोगों के व्यवहार में रईसी का कोई घमंड नहीं, बल्कि एक अजीब सी शालीनता और अपनापन महसूस हुआ।
प्रतीक एक कोने के सोफे पर बैठा अपनी छोटी बहन चहक के साथ धीरे-धीरे कुछ बात कर रहा था और बीच-बीच में दरवाजे की तरफ ऐसे देख रहा था मानो उसे किसी का बेसब्री से इंतजार हो। चहक बार-बार अपने भाई को कोहनी मारकर छेड़ रही थी और दोनों मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे।
लगभग बीस मिनट की औपचारिक बातचीत के बाद, अंदर के दरवाजे का पर्दा हटा और अक्षरा हाथ में नाश्ते की ट्रे लिए बाहर आई। उसने हल्के पीले रंग की सादगी भरी सूती साड़ी पहन रखी थी। चेहरे पर मेकअप के नाम पर सिर्फ आँखों में हल्का सा काजल और माथे पर एक छोटी सी काली बिंदी थी। लेकिन उसके चलने के अंदाज में एक गजब का आत्मविश्वास था।
अक्षरा को देखते ही आलोक जी के दिल की धड़कन बढ़ गई कि पता नहीं अब लड़के वालों की क्या प्रतिक्रिया होगी। लेकिन तभी जो हुआ, उसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी।
प्रतीक की माँ वंदना जी सोफे से तुरंत खड़ी हो गईं और आगे बढ़कर अक्षरा के हाथ से ट्रे खुद ले ली। उन्होंने ट्रे मेज पर रखते हुए बड़े ही स्नेह से अक्षरा की ठोड़ी छुई और अपनी बगल में बैठाते हुए बोलीं, “अरे वाह! अक्षरा बेटा, तुम तो जितनी तस्वीरों और बातों में सुंदर लगती थीं, सामने से तो उससे भी कहीं ज्यादा प्यारी और सौम्य हो। आओ, मेरे पास बैठो।”
अक्षरा ने जब अपने सिर पर वंदना जी का स्नेहभरा हाथ महसूस किया, तो उसका सारा गुस्सा और तनाव पल भर में बर्फ की तरह पिघलने लगा। वंदना जी ने मालती जी की तरफ देखते हुए कहा, “बहन जी, सच कहूँ तो आज हम यहाँ अक्षरा को देखने नहीं आए हैं, बल्कि हम तो आज आपसे और भाई साहब से अपनी इस होनहार बेटी को अपने घर की लक्ष्मी बनाने की विनती करने आए हैं। हम तो कब से इसके गुणों के कायल हैं!”
यह सुनकर अक्षरा के साथ-साथ आलोक जी और मालती जी भी हैरान रह गए। अक्षरा से रहा नहीं गया, उसने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों में आश्चर्य भरकर पूछा, “नमस्ते आंटी जी, आपकी इन प्यारी बातों के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद… पर मुझे समझ नहीं आया, आप लोग मुझे पहले से कैसे जानते हैं? हम तो आज पहली बार मिल रहे हैं।”
अक्षरा का यह मासूम सवाल सुनते ही प्रतीक की बहन चहक खिलखिलाकर हँस पड़ी और सतीश जी व महेंद्र जी के चेहरे पर भी एक गहरी मुस्कान तैर गई।
तभी प्रतीक ने अपना गला साफ करते हुए बड़े ही अदब और हल्के मजाकिया अंदाज में कहा, “माफ़ कीजिएगा मैडम जी, लगता है कॉलेज में छात्रों को पढ़ाते-पढ़ाते आपकी खुद की याददाश्त थोड़ी कमजोर हो गई है। घर के बाकी लोग भले ही आपसे आज पहली बार मिल रहे हों, लेकिन हमारी मुलाकात तो आज से दो महीने पहले ही हो चुकी है।”
अक्षरा ने चौंककर प्रतीक की तरफ देखा। उसने अपने दिमाग पर बहुत जोर डाला, लेकिन उसे यह चेहरा कहीं याद नहीं आया। उसने झिझकते हुए कहा, “माफ़ कीजिए, पर मुझे सच में याद नहीं आ रहा कि हम कहाँ मिले थे।”
प्रतीक मुस्कुराया और बोला, “चलिए, मैं ही आपकी मदद कर देता हूँ। आज से ठीक दो महीने पहले शिमला के टाउन हॉल में एक राष्ट्रीय स्तर का साहित्य और शिक्षा सेमिनार हुआ था। मैं वहाँ अपने विभाग की तरफ से मुख्य अतिथि के सहयोगी के रूप में आया था। उसी सेमिनार में देहरादून से आई एक युवा प्रोफेसर ने ‘आधुनिक समाज में बेटियों का स्वाभिमान और वास्तविक सुंदरता’ विषय पर एक व्याख्यान दिया था। मंच पर खड़ी उस साँवली-सलोनी लड़की ने जब बिना किसी कागज को देखे अपनी बुलंद आवाज में समाज की दकियानूसी सोच पर प्रहार किया था, तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा था।”
अक्षरा की आँखें आश्चर्य से फैल गईं, उसे वह सेमिनार तुरंत याद आ गया। प्रतीक ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा, “सिर्फ इतना ही नहीं, उस सेमिनार के बाद शाम को जब सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ, तो आपकी सहकर्मियों के जिद करने पर आपने जिस नजाकत और गरिमा के साथ शास्त्रीय नृत्य प्रस्तुत किया था, उसने वहाँ बैठे हर इंसान का दिल जीत लिया था। सच कहूँ अक्षरा जी, मैं उसी दिन आपकी उस सादगी, आपकी बुद्धिमत्ता और आपके इस सलोने रूप पर अपना दिल हार बैठा था। मेरे लिए सुंदरता का मतलब गोरा रंग कभी था ही नहीं, मेरे लिए सुंदरता का मतलब आपका वह आत्मविश्वास था जो मंच पर आपके चेहरे से नूर बनकर टपक रहा था।”
कमरे में एकदम सन्नाटा छाया हुआ था, सब मंत्रमुग्ध होकर प्रतीक की बातें सुन रहे थे। प्रतीक ने आलोक जी की तरफ हाथ जोड़ते हुए कहा, “अंकल जी, शिमला से लौटने के बाद मैंने ही उस सेमिनार के आयोजकों से अक्षरा जी के कॉलेज का पता निकाला और जब मुझे पता चला कि आप मेरे चाचा जी के पुराने मित्र हैं, तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मैंने तुरंत अपने मम्मी-पापा को सारी बात बताई और उन्होंने मेरे फैसले का पूरा सम्मान करते हुए मुझे आज आपके दरवाजे पर ले आए। अब अगर अक्षरा जी की हाँ हो, तो मैं जीवन भर उनके इस स्वाभिमान और मुस्कान का हमसफर बनना चाहता हूँ।”
प्रतीक की बातें सुनकर मालती जी की आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े। उन्होंने गर्व से अपनी बेटी की तरफ देखा। वहीं आलोक जी का सिर शर्म और पश्चाताप से झुक गया था। उन्हें आज समझ आ गया था कि जिस साँवले रंग को वे अपनी बेटी की कमजोरी समझ रहे थे और जिसे छिपाने के लिए वे उसे ब्यूटी पार्लर भेजना चाहते थे, असल में उनकी बेटी की काबिलियत और सादगी के आगे वह रंग तो एक गहना था।
अक्षरा के चेहरे पर आज किसी फेशियल या मेकअप की नहीं, बल्कि अपने सम्मान और सच्चे प्रेम के मिलने की एक ऐसी अद्भुत लाली छाई हुई थी, जिसके आगे दुनिया भर की गोराई फीकी लग रही थी। उसने अपनी पलकें झुकाकर धीरे से मुस्कुराते हुए अपनी सहमति दे दी। पूरे घर में बधाइयों और ठहाकों की गूँज उठने लगी। आज सिर्फ एक रिश्ता तय नहीं हुआ था, बल्कि रंगभेद की खोखली मानसिकता पर गुणों और स्वाभिमान की एक बहुत बड़ी जीत हुई थी।
दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि आज के समाज में भी लड़कियों की काबिलियत से ज्यादा उनके गोरे रंग को महत्व दिया जाता है? आलोक जी की सोच और प्रतीक के इस कदम के बारे में आपकी क्या राय है? कमेंट बॉक्स में अपने विचार जरूर लिखें!
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