सिद्धार्थ का पारा सातवें आसमान पर था। माँ के भड़काए हुए शब्दों ने उसकी बुद्धि पर पर्दा डाल दिया था। उसने अपने बुजुर्ग ससुर की तरफ उंगली उठाते हुए कहा, “आप तो रहने ही दीजिए पापा जी! गलती वैदेही की नहीं, आपकी और आपकी परवरिश की है। आपने इसे इतना सिर चढ़ा रखा है कि इसे पति और ससुराल की इज़्ज़त करना तो आता ही नहीं।
“अरे ओ महारानी जी! ज़रा आईने में अपनी सूरत तो देखो। ये किस बेपरवाही से चौखट लांघ रही हो तुम? सिर का पल्ला कंधे पर झूल रहा है और तुम मटकती हुई गली से चली आ रही हो! अरे, इस आगरा शहर के कूचे-कूचे में हमारे ठाकुर खानदान की तूती बोलती है, और तुम हो कि हमारी नाक कटवाने पर तुली हो। हमने तो बस इतना कहा था कि चौखट के बाहर कदम रखो तो सिर ढका होना चाहिए, पर तुम्हारे सिर पर तो आजकल के नए ज़माने का भूत सवार है!”
वैदेही ने अभी धूप से तपते आँगन में पहला कदम ही रखा था कि तख्त पर बैठी उसकी सास, गायत्री देवी के तीखे शब्दों ने उसके कानों में पिघले हुए सीसे सा दर्द घोल दिया। हाथ में पकड़े सब्ज़ियों के थैले का वज़न अचानक जैसे सौ गुना बढ़ गया। पसीने से भीगी लटों को समेटते हुए वैदेही ने तुरंत अपनी साड़ी का पल्लू खींचकर माथे तक कर लिया और धीमी आवाज़ में बोली, “माँजी, वो बाहर नाली के पास पत्थर से ठोकर लग गई थी, बस हाथ का थैला संभालते वक़्त पल्ला थोड़ा सा खिसक गया… मैंने जानबूझकर नहीं किया।”
“बस-बस, अब ज़बान मत लड़ाओ!” गायत्री देवी ने हाथ की सुपारी काटने वाली सरोती को ज़ोर से ताली पर पटकते हुए कहा। “एक तो गलती करती हो, ऊपर से सौ बहाने तैयार रहते हैं। तुम्हारे मायके में सिखाया होगा बड़ों के मुंह लगना, यहाँ इस घर में ये सब नहीं चलेगा। जाओ, रसोई में जाकर देखो, तेरे ससुर जी और दोनों देवरों के आने का वक़्त हो रहा है। अभी तक दाल में तड़का भी नहीं लगा होगा।”
वैदेही ने अपने होंठ भींच लिए और बिना कुछ कहे रसोई की तपती हुई दुनिया में समा गई। शादी को अभी चौदह महीने ही बीते थे, लेकिन इन चौदह महीनों में वैदेही को लगने लगा था कि वो कोई इंसान नहीं, बल्कि एक ऐसी चाबी वाली गुड़िया है जिसकी चाबी ससुराल वालों के हाथ में है। उसके पति सिद्धार्थ एक अच्छी प्राइवेट कंपनी में मैनेजर थे। घर में ससुर राजेंद्र प्रसाद जी, सास गायत्री देवी और दो छोटे देवर—रोहन और मोहित थे।
ससुराल की दहलीज़ लांघते ही वैदेही के लिए नियमों की एक अदृश्य किताब खोल दी गई थी। सुबह पाँच बजे उठकर पूरे घर की धुलाई, फिर बाबूजी की अदरक वाली चाय, गायत्री देवी के पूजा के बर्तन मांजना, दोनों देवरों की अलग-अलग फरमाइशों का नाश्ता—किसी को पनीर के पराठे चाहिए तो किसी को पोहा, और फिर सिद्धार्थ का टिफिन। रात को जब तक घर का आखिरी सदस्य सो न जाए और रसोई का सिंक चमक न उठे, वैदेही की कमर को बिस्तर नसीब नहीं होता था।
इतना सब करने के बाद भी अगर कभी सब्ज़ी में नमक रत्ती भर कम हो जाता या देवर की शर्ट की क्रीज़ थोड़ी बिगड़ जाती, तो गायत्री देवी तुरंत उसके मायके के संस्कारों पर सवालिया निशान लगा देतीं। “पता नहीं क्या सिखाकर भेजा है माँ-बाप ने” — यह वाक्य वैदेही के सीने में किसी काँच की तरह चुभता था, लेकिन अपने घर की शांति और अपने माता-पिता की दी हुई सीख की खातिर वह हर कड़वा घूंट मुस्कुराकर पी जाती थी। उसे लगता था कि शायद उसके सब्र से एक दिन इस पत्थर जैसे माहौल में भी फूल खिलेंगे। सिद्धार्थ सब देखते थे, पर माँ के डर से या फिर अपनी झूठी पुरुषवादी सोच के चलते, वे हमेशा वैदेही को ही कमरे में समझाते, “वैदेही, मम्मी की उम्र हो गई है, तुम ही थोड़ा एडजस्ट कर लिया करो। तुम्हारे चुप रहने से घर में शांति रहती है।”
इसी घुटन भरे माहौल के बीच एक दिन वैदेही के मायके से खुशखबरी आई। मथुरा में रहने वाले उसके पापा, केशव जी, सरकारी स्कूल के प्रधानाध्यापक पद से रिटायर हो रहे थे और उसी हफ्ते मम्मी-पापा की शादी की पैंतीसवीं सालगिरह भी थी। घर में एक छोटा सा समारोह रखा गया था। वैदेही का मन मयूर की तरह नाच उठा। महीनों बाद उसे अपनी माँ की गोद और अपने आँगन की खुली हवा नसीब होने वाली थी।
बड़ी मिन्नतों और गायत्री देवी की दस नसीहतों के बाद वैदेही को चार दिन के लिए मायके जाने की इजाज़त मिली। वो भी इस शर्त पर कि जाने से पहले वह तीन दिन के लिए अचार-मुरब्बा, नमकीन और सूखे नाश्ते का डिब्बा भरकर जाएगी ताकि पीछे से देवरों को कोई दिक्कत न हो।
जब वैदेही मथुरा अपने मायके पहुँची, तो जैसे किसी पिंजरे में बंद पंछी को खुला आसमान मिल गया हो। वहाँ न सिर पर पल्लू खिसकने का डर था, न सुबह पाँच बजे के अलार्म की दहशत। माँ सुधा जी ने जब अपनी बेटी के चेहरे की उड़ी हुई रौनक और आँखों के नीचे के काले घेरे देखे, तो उनका कलेजा मुँह को आ गया। पर वैदेही ने हँसकर बात टाल दी, “अरे माँ, बस सफर की थकान है, वहाँ सब मुझे बहुत प्यार करते हैं।” एक बेटी अपने माँ-बाप को दुखी न करने के लिए दुनिया का सबसे खूबसूरत झूठ कितनी आसानी से बोल लेती है, यह केवल एक औरत ही समझ सकती है।
मायके के उन चार दिनों में वैदेही फिर से वही पुरानी चुलबुली लड़की बन गई थी। पापा के साथ बैठकर घंटों अखबार पर चर्चा करना, माँ के हाथ के गर्म परांठे खाना और शाम को छत पर बिना किसी डर के टहलना। उसकी कलाइयों की चूड़ियाँ अब बोझ नहीं लग रही थीं, बल्कि पायल की झंकार के साथ उसके बचपन की यादें ताज़ा कर रही थीं।
चौथे दिन शाम को सिद्धार्थ को उसे लेने आना था। दोपहर से ही सुधा जी और केशव जी दामाद की आवभगत की तैयारियों में जुट गए थे। वैदेही ने देखा कि घर में सिद्धार्थ की पसंद की काजू कतली नहीं थी, और वह सिद्धार्थ के लिए एक अच्छी सी घड़ी भी तोहफे में लेना चाहती थी। उसने मम्मी से कहा, “माँ, सिद्धार्थ को आने में अभी एक घंटा लगेगा, मैं पास वाले बाज़ार से पंद्रह मिनट में मिठाई और घड़ी लेकर आती हूँ।”
पर किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। बाज़ार में घड़ी की दुकान पर भीड़ थी और लौटते वक़्त रेलवे फाटक बंद हो गया। उधर, सिद्धार्थ अपनी गाड़ी से पंद्रह मिनट पहले ही ससुराल पहुँच गया। केशव जी और सुधा जी ने बड़े आदर-सत्कार से दामाद को ड्राइंग रूम में बिठाया, ठंडा शरबत और समोसे परोसे। सिद्धार्थ ने इधर-उधर देखा और पूछा, “पापा जी, वैदेही कहाँ है? तैयार हो रही है क्या?”
केशव जी ने बड़ी विनम्रता से हाथ जोड़ते हुए कहा, “बेटा, वो तो बस तुम्हारे लिए ही पास की मार्केट तक गई है, तुम्हारी पसंद की मिठाई लाने। बस आती ही होगी, तब तक तुम चाय लो।”
अभी सिद्धार्थ ने चाय का प्याला होंठों से लगाया ही था कि उसका फोन बज उठा। स्क्रीन पर ‘मम्मी’ लिखा चमक रहा था। सिद्धार्थ ने फोन उठाया, “हाँ मम्मी, पहुँच गया हूँ।”
उधर से गायत्री देवी की कड़कती हुई आवाज़ आई, “पहुँच गया तो निकल क्यों नहीं रहा? सात बजने को आए हैं, रात को हाईवे पर गाड़ी चलाएगा क्या? कहाँ है तेरी महारानी, दे दे फोन उसको!”
सिद्धार्थ ने बिना सोचे-समझे कह दिया, “मम्मी, वो वैदेही अभी घर पर नहीं है, मार्केट गई है। बस पाँच-दस मिनट में आ रही है, फिर निकलते हैं।”
इतना सुनना था कि दूसरी तरफ से गायत्री देवी ने आग उगलना शुरू कर दिया। “क्या कहा? मार्केट गई है? अरे वाह! पति दरवाज़े पर खड़ा है, ससुराल लौटने का वक़्त हो रहा है और महारानी बाज़ार में हवा खा रही हैं! देखा सिद्धार्थ, मैंने पहले ही कहा था, मायके की हवा लगते ही इसके पर निकल आते हैं। तेरे ससुराल वालों को भी तमीज़ नहीं है क्या कि दामाद आने वाला है तो बेटी को घर पर रोकें? तुझे तो उन्होंने अपना नौकर समझ रखा है कि जब मन करेगा, तब भेजेंगे। तू देख लेना, यही लड़की एक दिन तुझे हमारे खिलाफ कर देगी!”
गायत्री देवी ने दस मिनट तक सिद्धार्थ के कानों में ऐसा ज़हर घोला कि उसका चेहरा गुस्से से तमतमाने लगा। उसके पुरुष अहंकार को जैसे किसी ने सीधी चोट पहुँचाई थी। उसने बिना चाय खत्म किए प्याला मेज़ पर पटक दिया। केशव जी और सुधा जी सहम गए।
ठीक उसी वक़्त वैदेही हाँफती हुई, हाथ में मिठाई का डिब्बा और गिफ्ट पैक लिए दरवाज़े से अंदर दाखिल हुई। उसके चेहरे पर सिद्धार्थ को देखने की मुस्कान थी, लेकिन सिद्धार्थ की लाल आँखें देखकर उसकी मुस्कान वहीं ठिठक गई।
“आ गईं महारानी जी? हो गई आपकी मटरगश्ती पूरी?” सिद्धार्थ सोफे से खड़े होते हुए लगभग चिल्लाकर बोला।
वैदेही घबरा गई, “सिद्धार्थ, क्या हुआ? मैं तो बस आपके लिए ही… वो फाटक बंद हो गया था…”
“चुप करो! मुझे तुम्हारी कोई बकवास नहीं सुननी!” सिद्धार्थ की आवाज़ पूरे घर में गूँज उठी। “तुम्हें ज़रा भी अक्ल है कि नहीं? मैं इतनी दूर से गाड़ी चलाकर तुम्हें लेने आया हूँ और तुम बाज़ारों में भटक रही हो? मेरी और मेरे समय की कोई कीमत है तुम्हारी नज़र में या नहीं? ससुराल के सारे नियम-कायदे यहाँ आकर भूल गईं?”
केशव जी से अपनी बेटी का यह अपमान देखा नहीं गया। वे आगे बढ़े और अपने काँपते हाथों को जोड़ते हुए बोले, “बेटा सिद्धार्थ, गुस्सा शांत करो। इसमें वैदेही की कोई गलती नहीं है, वो तो तुम्हारी ही खातिरदारी के लिए मिठाई लेने गई थी। फाटक बंद होने में किसी का क्या बस चलता है बेटा?”
सिद्धार्थ का पारा सातवें आसमान पर था। माँ के भड़काए हुए शब्दों ने उसकी बुद्धि पर पर्दा डाल दिया था। उसने अपने बुजुर्ग ससुर की तरफ उंगली उठाते हुए कहा, “आप तो रहने ही दीजिए पापा जी! गलती वैदेही की नहीं, आपकी और आपकी परवरिश की है। आपने इसे इतना सिर चढ़ा रखा है कि इसे पति और ससुराल की इज़्ज़त करना तो आता ही नहीं। दामाद घर पर बैठा इंतज़ार कर रहा है और आपकी बेटी सड़कें नाप रही है! कैसे संस्कार दिए हैं आपने इसे? हमारे घर के नियम तो बड़े खलते हैं इसे, और यहाँ आपके घर में कोई अनुशासन नाम की चीज़ ही नहीं है!”
ये शब्द नहीं थे, बल्कि तेज़ाब की बूँदें थीं जो सीधे केशव जी के स्वाभिमान पर गिरी थीं। जिस पिता ने अपनी पूरी ज़िंदगी एक आदर्श शिक्षक के रूप में बिताई हो, हजारों बच्चों को संस्कार दिए हों, और अपनी इकलौती बेटी को रानी की तरह पालकर इस घर को सौंपा हो, आज उसी पिता की सफेद दाढ़ी और झुकी हुई कमर का यह अपमान! केशव जी की आँखों से दो गर्म आँसू लुढ़क कर उनके गालों पर आ गिरे। वे सिर झुकाए शून्य में ताकने लगे।
वैदेही के हाथ से मिठाई का डिब्बा छूटकर ज़मीन पर गिर गया। अपने पिता की आँखों में आँसू देखकर उसका कलेजा फट गया। उसके अंदर का ज्वालामुखी फूटने ही वाला था, उसने मुंह खोला ही था कि पीछे खड़ी उसकी माँ सुधा जी ने तेज़ी से आकर उसका हाथ कसकर पकड़ लिया और अपनी भीगी आँखों से उसे चुप रहने का इशारा किया। माँ की आँखों में वही सदियों का डर था—’बेटी, अगर अभी पलटकर जवाब दिया तो तेरा घर टूट जाएगा।’
वैदेही ने अपने होंठ इतनी ज़ोर से काटे कि खून का स्वाद उसके मुंह में घुल गया। उसने चुपचाप अपना बैग उठाया। जाते वक़्त उसने अपने पापा के पैर छुए, पर केशव जी के हाथ आशीर्वाद देने के लिए भी काँप रहे थे।
मथुरा से आगरा तक का रास्ता वैदेही ने पत्थर की मूरत बनकर तय किया। कार के अंदर एक भयानक सन्नाटा था। सिद्धार्थ का गुस्सा अब थोड़ा ठंडा पड़ चुका था, शायद उसे अपनी गलती का हल्का सा एहसास भी था, लेकिन उसके अहंकार ने उसे माफ़ी मांगने की इजाज़त नहीं दी। वहीं, दूसरी तरफ वैदेही की आँखों के सामने बार-बार अपने पिता का झुका हुआ सिर और बहते हुए आँसू घूम रहे थे।
उस दो घंटे के सफर में वैदेही के अंदर की वह डरपोक, सहमी हुई और हर बात पर समझौता करने वाली बहू हमेशा के लिए मर चुकी थी। उसने सोच लिया था—’जब बात सिर्फ मेरे अपमान की थी, तो मैंने उसे अपने घर की शांति के लिए सह लिया। लेकिन आज बात मेरे उन माँ-बाप के सम्मान की है जिन्होंने मुझे जन्म दिया, पढ़ाया-लिखाया और इस काबिल बनाया। अगर आज भी मैं चुप रही, तो मेरी शिक्षा और मेरा अस्तित्व दोनों बेकार हैं।’
रात के साढ़े आठ बजे गाड़ी आगरा वाले घर के बाहर रुकी। वैदेही ने बैग उठाया और घर के अंदर कदम रखा। आज उसके सिर पर पल्लू नहीं था।
आँगन में तख्त पर बैठी गायत्री देवी ने जैसे ही उसे देखा, वे फिर शुरू हो गईं, “लो आ गईं महारानी! अरे सिद्धार्थ, देख रहा है इसके तेवर? एक तो मायके से इतनी देर से आई है, ऊपर से सिर का पल्ला भी गायब है! और तेरे समधी जी ने कुछ कहा नहीं? बेशर्मी की भी हद होती है…”
“बस कीजिए माँजी!”
वैदेही की आवाज़ इतनी शांत, पर इतनी बुलंद और कड़क थी कि पूरे आँगन में पिन ड्रॉप साइलेंस छा गया। रसोई से निकलते दोनों देवर वहीं ठिठक गए, अखबार पढ़ते ससुर राजेंद्र प्रसाद जी ने चश्मा उतारकर वैदेही की तरफ देखा, और गायत्री देवी का मुंह खुला का खुला रह गया। सिद्धार्थ भी हैरानी से वैदेही को देख रहा था।
गायत्री देवी संभलते हुए चिल्लाईं, “क्या कहा? तू मुझे चुप करा रही है? सिद्धार्थ, देख रहा है इसकी ज़बान कैसी कैंची की तरह चल रही है!”
वैदेही ने अपना बैग ज़मीन पर रखा और आँगन के ठीक बीचों-बीच खड़ी हो गई। उसकी आँखों में आँसू नहीं थे, बल्कि एक अजीब सी चमक थी।
“हाँ माँजी, आज मैं बोलूँगी और आप सबको सुनना पड़ेगा,” वैदेही ने सधे हुए शब्दों में कहा। “पिछले चौदह महीनों से मैं इस घर में एक बहू का हर फ़र्ज़ निभा रही हूँ। आपके बनाए हर सही-गलत नियम को मैंने सिर झुकाकर माना। आपने मेरे खाने पर, मेरे पहनने पर, मेरे हँसने पर पाबंदियाँ लगाईं, मैंने उफ़ तक नहीं की। आपने बात-बात पर मेरे मायके को कोसा, मैं चुप रही क्योंकि मुझे सिखाया गया था कि बड़ों का जवाब नहीं देते। लेकिन मेरी उस चुप्पी को आप लोगों ने मेरी कमज़ोरी और मेरे माँ-बाप की लाचारी समझ लिया!”
वह सिद्धार्थ की तरफ मुड़ी, “और आप सिद्धार्थ? आप तो पढ़े-लिखे हैं न? आज मेरे सत्तर साल के पिता ने आपके सामने हाथ जोड़े, और आपने उन्हें उनकी परवरिश पर ताने मारे? क्यों? सिर्फ इसलिए कि मैं आपकी पसंद की मिठाई लाने के लिए दस मिनट लेट हो गई? जिस पिता ने अपनी जीवन भर की कमाई लगाकर आपकी शादी में कोई कमी नहीं छोड़ी, जो आपके आने की खबर सुनकर दोपहर की धूप में खुद बाज़ार से समोसे लेकर आए, आपने उन्हें कहा कि उनमें तमीज़ और संस्कार नहीं हैं?”
ससुर राजेंद्र प्रसाद जी अपनी जगह से खड़े हो गए और हैरानी से पूछा, “सिद्धार्थ! क्या यह सच है? तुमने केशव समधी जी से इस तरह बात की?”
सिद्धार्थ ने शर्म से नज़रें झुका लीं। वह कुछ बोल नहीं पाया।
वैदेही ने अपनी सास की तरफ देखते हुए आगे कहा, “माँजी, आप दिन-रात मुझे इस खानदान की इज़्ज़त और मर्यादा का पाठ पढ़ाती हैं। आप कहती हैं कि मेरे सिर से एक इंच पल्लू खिसकने से इस घर की इज़्ज़त चली जाती है। तो मुझे आज यह बताइए कि जब आपके बेटे ने मेरे घर में घुसकर मेरे बुजुर्ग माता-पिता को अपमानित किया, उनकी आँखों में आँसू ला दिए, तब आपके इस खानदान की इज़्ज़त और संस्कार कहाँ गए थे? क्या इज़्ज़त सिर्फ बहू के घूंघट में होती है, बेटे की ज़बान और उसके व्यवहार में नहीं?”
गायत्री देवी बगलें झाँकने लगीं, “अरे तो… तो उसने गुस्से में कह दिया होगा। लड़के का पक्ष है, इतना तो चलता है…”
“नहीं चलता माँजी! अब बिल्कुल नहीं चलेगा!” वैदेही ने दृढ़ता से कहा। “लड़की के माँ-बाप ने अपनी बेटी का कन्यादान किया है, अपना स्वाभिमान आपके पैरों तले रौंदने के लिए गिरवी नहीं रखा है। मैं इस घर की बहू हूँ, कोई खरीदी हुई दासी नहीं। और सिद्धार्थ, मैं आपकी जीवनसाथी हूँ। अगर आप मेरे माता-पिता को वो सम्मान नहीं दे सकते जो मैं आपके माता-पिता को देती हूँ, तो मुझे भी इस खोखले रिश्ते और इस झूठी मर्यादा का कोई बोझ नहीं उठाना।”
वैदेही ने अपना बैग फिर से हाथ में उठा लिया। “मैं इस घर का काम कर सकती हूँ, आप सबकी सेवा कर सकती हूँ, लेकिन अपने माँ-बाप के अपमान की कीमत पर नहीं। इस घर में मैं अब तभी रुकूँगी जब मेरे माता-पिता को उनका खोया हुआ सम्मान वापस मिलेगा, वरना मेरे पापा का घर और मेरी डिग्रियाँ मुझे पालने के लिए काफी हैं।”
आँगन में सन्नाटा पसर गया। वैदेही के शब्दों ने हर किसी के ज़मीर को झकझोर कर रख दिया था। ससुर राजेंद्र प्रसाद जी आगे आए और उन्होंने गायत्री देवी की तरफ गुस्से से देखते हुए कहा, “गायत्री, तुम्हारी इसी छोटी सोच और हर बात में दखलअंदाजी ने आज हमारे घर को इस मोड़ पर ला खड़ा किया है। बहू बिल्कुल सही कह रही है। जिस घर में नारी और उसके मायके का सम्मान न हो, वहाँ की इज़्ज़त सिर्फ दिखावा है।”
फिर उन्होंने सिद्धार्थ के कंधे पर हाथ रखा, “बेटा, केशव जी उम्र में और ज्ञान में हम सबसे बड़े हैं। तुमने जो किया है, उससे मेरा सिर शर्म से झुक गया है।”
सिद्धार्थ का झूठा अहंकार वैदेही के सच्चे और तीखे शब्दों के आगे मोम की तरह पिघल चुका था। उसे अपने किए पर गहरा पछतावा हो रहा था। उसने तुरंत अपनी जेब से फोन निकाला, स्पीकर ऑन किया और केशव जी का नंबर मिलाया।
दूसरी घंटी पर ही केशव जी की भारी और उदास आवाज़ आई, “हेलो…”
सिद्धार्थ का गला भर आया, “पापा जी… मैं सिद्धार्थ बोल रहा हूँ। मुझे माफ़ कर दीजिए पापा जी। मैंने आज गुस्से और नासमझी में आपका और मम्मी जी का बहुत दिल दुखाया है। मेरी परवरिश में ही शायद कोई कमी रह गई थी जो मैं आपके बड़प्पन को समझ नहीं पाया। मैं कल सुबह ही वैदेही को लेकर मथुरा आ रहा हूँ, अपने हाथों से आपके पैर छूकर माफ़ी मांगने और आपकी बनाई हुई चाय पीने।”
उधर से केशव जी की सिसकी की आवाज़ आई, “अरे नहीं बेटा, ऐसा मत कहो… तुम तो हमारे बच्चे हो…”
सिद्धार्थ ने फोन अपनी माँ गायत्री देवी की तरफ बढ़ाया। राजेंद्र प्रसाद जी की कड़ी नज़रों और वैदेही के तेवर को देखकर गायत्री देवी ने भी धीरे से कहा, “समधी जी, सिद्धार्थ की तरफ से और अपनी तरफ से मैं भी माफ़ी मांगती हूँ। वैदेही जैसी संस्कारी और समझदार बेटी देने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।”
फोन कटते ही वैदेही की आँखों से आँसू छलक पड़े, लेकिन ये आँसू बेबसी के नहीं, बल्कि गर्व और सुकून के थे। राजेंद्र प्रसाद जी ने वैदेही के सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “बेटा, आज से इस घर में किसी बहू को अपनी इज़्ज़त साबित करने के लिए घूंघट की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। आज तुमने इस घर की असली इज़्ज़त बचाई है।”
उस रात के बाद उस घर की हवा ही बदल गई। वैदेही ने यह साबित कर दिया था कि सहनशीलता तब तक ही अच्छी है जब तक वह आपके स्वाभिमान को चोट न पहुँचाए। जब एक औरत अपने और अपने माता-पिता के सम्मान के लिए आवाज़ उठाती है, तो वह घर तोड़ती नहीं, बल्कि रिश्तों की एक नई और मज़बूत नींव रखती है।
दोस्तों, वैदेही का अपने माता-पिता के सम्मान के लिए आवाज़ उठाना क्या आपको सही लगा? क्या आपको भी लगता है कि शादी के बाद सिर्फ लड़की के ससुराल वालों का ही नहीं, बल्कि लड़की के माता-पिता का सम्मान होना भी उतना ही ज़रूरी है? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें!
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