तन्वी जब बहुत छोटी थी, तभी उसके पिता का साया सिर से उठ गया था। उसके बाद से शारदा जी ने ही माँ और पिता दोनों की भूमिका निभाई। वह एक स्थानीय स्कूल में सिलाई और कढ़ाई की शिक्षिका थीं। उनकी दुनिया बस तन्वी के इर्द-गिर्द ही घूमती थी।
शारदा जी का जीवन किसी शांत नदी की तरह सादगी से भरा था। तन्वी ने जब से होश संभाला था, उसने अपनी माँ को हमेशा हल्के रंग के सूती या ऊनी सलवार-सूट में ही देखा था। न हाथों में चूड़ियों की खनक, न गले में कोई भारी हार और न ही कभी किसी उत्सव में सजने-संवरने का शौक। सूट का दुपट्टा हमेशा सलीके से कंधे पर पिन किया होता था, ताकि घर और स्कूल के काम करने में कोई अड़चन न आए। तन्वी को तब यह बात बहुत सामान्य लगती थी। सच तो यह है कि अपनी किशोरावस्था और कॉलेज की भागदौड़ में तन्वी ने कभी रुककर यह सोचा ही नहीं कि उसकी माँ की अपनी भी कोई पसंद या ख्वाहिश हो सकती है। हमारे सबसे करीब रहने वाले इंसान का त्याग हमें अक्सर सबसे देर से दिखाई देता है।
समय पंख लगाकर उड़ता रहा। वह दिन भी आया जब तन्वी के कॉलेज का आखिरी दिन यानी फेयरवेल पार्टी थी। उस दिन तन्वी ने अपनी सहेलियों के कहने पर पहली बार हल्के आसमानी रंग की शिफॉन की साड़ी पहनी थी। जब वह तैयार होकर आईने के सामने खड़ी हुई, तो उसे खुद पर विश्वास नहीं हो रहा था। पीछे से शारदा जी हाथ में दही-चीनी की कटोरी लेकर कमरे में आईं। अपनी लाडली को साड़ी में देखकर शारदा जी की आँखें खुशी से भर आईं। उन्होंने तुरंत अपनी उंगली के पोर से काजल की एक छोटी सी डिब्बी से थोड़ा सा काजल लिया और तन्वी के कान के पीछे लगाते हुए बोलीं, “मेरी बच्ची तो आज बिल्कुल राजकुमारी लग रही है। भगवान बुरी नजर से बचाए।”
माँ के चेहरे की वह निश्छल मुस्कान देखकर तन्वी के मन में अचानक एक सवाल कौंधा। उसने आईने में माँ के अक्स को देखा—वही पुराना मटमैला सा सूट, कंधे पर सादा दुपट्टा और चेहरे पर ममता की आभा। तन्वी ने पलटकर माँ के कंधों को थामा और पूछा, “माँ, आज मैं पहली बार साड़ी पहन रही हूँ। लेकिन मैंने आपको कभी साड़ी पहने क्यों नहीं देखा? पड़ोस की सारी आंटियाँ तो त्योहारों और शादियों में कितनी सुंदर-सुंदर साड़ियाँ पहनती हैं। आपके पास एक भी साड़ी क्यों नहीं है?”
शारदा जी ने अपनी बेटी के गाल को सहलाया और बात को हल्के में टालते हुए कहा, “अरे पगली, पहाड़ों की चढ़ाई-उतराई और दिन भर की भागदौड़ में मुझसे साड़ी नहीं संभलती। सूट-सलवार में हाथ-पैर खुले रहते हैं, काम जल्दी हो जाता है। और फिर, मुझे सज-धज कर कौन सा कहीं जाना होता है?”
“पर माँ, कभी तो किसी खास मौके पर पहन लिया करो न! आप पर साड़ी बहुत जँचेगी,” तन्वी ने लाड़ से जिद की।
शारदा जी ने धीमे से मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ-हाँ, पहन लूँगी। अभी तो तेरी उम्र है सजने-संवरने की। मेरा मन करेगा तो फिर कभी पहन लूँगी।”
‘फिर कभी पहन लूँगी’—यह वाक्य शारदा जी का तकिया कलाम बन गया था। हर दिवाली, हर तीज-त्योहार पर तन्वी जब भी साड़ी खरीदने की बात करती, माँ यही कहकर बात टाल देतीं और उन पैसों से तन्वी के लिए कोई न कोई नई ड्रेस या किताबें ले आतीं। धीरे-धीरे तन्वी भी अपनी पढ़ाई और करियर बनाने की जद्दोजहद में ऐसी उलझी कि माँ की साड़ी की बात कहीं पीछे छूट गई।
दो साल बाद तन्वी की मेहनत रंग लाई और चंडीगढ़ की एक बड़ी आईटी कंपनी में उसकी बहुत अच्छी नौकरी लग गई। जब पहली तनख्वाह उसके बैंक खाते में आई, तो तन्वी की खुशी का ठिकाना नहीं था। उस सप्ताहांत वह शिमला आने वाली थी। चंडीगढ़ के सबसे बड़े शोरूम में जाकर उसने अपनी माँ के लिए एक बेहद खूबसूरत गहरे मैरून रंग की कांजीवरम सिल्क की साड़ी खरीदी, जिस पर सुनहरे धागों से बारीक जरी का काम किया हुआ था। साड़ी को छूते ही तन्वी ने कल्पना कर ली थी कि जब उसकी गोरी-चिट्टी माँ यह मैरून साड़ी पहनेंगी, तो कितनी भव्य लगेंगी।
शिमला पहुँचकर जब उसने वह डिब्बा माँ के हाथों में थमाया, तो शारदा जी ने डिब्बा खोलते ही साड़ी के कोने को बड़े प्यार से छुआ। उनकी आँखों में एक पल के लिए चमक आई, लेकिन अगले ही पल उन्होंने डिब्बा बंद कर दिया और बोलीं, “इतने पैसे खर्च करने की क्या जरूरत थी तन्वी? इसे संभाल कर रख दे, जब तेरा रिश्ता पक्का होगा और तेरी शादी होगी, तब मैं इसे पहनूँगी। अभी से पहनकर खराब थोड़ी करनी है।”
तन्वी ने सोचा कि चलो, कम से कम शादी के बहाने ही सही, माँ ने साड़ी पहनने के लिए हाँ तो की।
एक साल के भीतर ही तन्वी का रिश्ता देहरादून के रहने वाले प्रतीक से तय हो गया। प्रतीक एक सुलझा हुआ और नेक इंसान था, जो तन्वी की तरह ही चंडीगढ़ में काम करता था। शादी की तैयारियाँ शुरू हो गईं। शिमला के घर में रिश्तेदारों का आना-जाना शुरू हो गया था।
शादी की मुख्य रस्म वाली शाम थी। तन्वी दुल्हन के लाल जोड़े में सजी अपने कमरे में बैठी थी। तभी उसकी नजर अपनी माँ पर पड़ी, जो मेहमानों का स्वागत करने के बाद उसके कमरे में आई थीं। तन्वी उन्हें देखकर हैरान रह गई। शारदा जी ने वह मैरून कांजीवरम साड़ी नहीं पहनी थी! इसके बजाय, उन्होंने हल्के बादामी रंग का एक पुराना रेशमी सूट पहना हुआ था, जिसके गले और दामन पर हाथ से कश्मीरी कढ़ाई की गई थी।
तन्वी ने थोड़ी नाराजगी और हैरानी से पूछा, “माँ! यह आपने क्या पहना है? मैंने अपनी पहली कमाई से जो साड़ी आपके लिए खरीदी थी, आपने कहा था कि आप मेरी शादी में वही पहनेंगी। फिर आज भी यह सूट क्यों?”
शारदा जी दरवाजे की कुंडी लगाकर तन्वी के पास आकर बैठ गईं। उन्होंने अपने सूट के दुपट्टे के कोने को अपनी उंगलियों में पिरोते हुए बेहद भावुक स्वर में कहा, “तन्वी, नाराज मत हो मेरी बच्ची। यह कोई साधारण सूट नहीं है। जब मेरी शादी हुई थी, तब मेरी माँ—यानी तेरी नानी—ने रात-रात भर जागकर अपने हाथों से इस पर यह कढ़ाई की थी। नानी अब इस दुनिया में नहीं हैं, और आज जब मैं अपनी इकलौती बेटी को विदा करने जा रही हूँ, तो मेरा मन बहुत घबरा रहा है। मुझे आज अपनी माँ के सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत थी। जब मैंने यह सूट पहना, तो मुझे लगा जैसे मेरी माँ ने मुझे पीछे से कसकर पकड़ रखा है और कह रही हैं कि ‘शारदा, हिम्मत रख, तू अकेली नहीं है।’ इसलिए मैं आज तेरी नानी की यह आखिरी निशानी पहनने से खुद को रोक नहीं पाई।”
माँ की आँखों से दो बूंद आँसू छलक कर उनके गालों पर आ गिरे। तन्वी का सारा गुस्सा एक पल में हवा हो गया। अपनी माँ के भीतर छुपी उस छोटी सी बच्ची को देखकर तन्वी का कलेजा भर आया, जो आज अपनी बेटी की विदाई के वक्त अपनी माँ के आंचल की छांव ढूंढ रही थी। तन्वी ने आगे बढ़कर माँ को कसकर गले से लगा लिया और बोली, “कोई बात नहीं माँ। आप इस सूट में दुनिया की सबसे प्यारी माँ लग रही हो। वह साड़ी तो हम किसी और फंक्शन में पहन लेंगे, अभी तो पूरी जिंदगी पड़ी है।”
तन्वी विदा होकर अपने ससुराल चली गई। शादी के बाद का जीवन बहुत सुखद था। प्रतीक और उसके माता-पिता तन्वी को बहुत प्यार करते थे। तन्वी हर महीने शिमला जाने की योजना बनाती, और हर बार सोचती कि इस बार माँ को किसी मंदिर या रिश्तेदार के यहाँ ले जाकर वह मैरून साड़ी जरूर पहनाएगी। लेकिन कभी ऑफिस के प्रोजेक्ट्स, तो कभी ससुराल की जिम्मेदारियाँ आड़े आ जातीं। शारदा जी ही कभी-कभार चंडीगढ़ आकर बेटी-दामाद से मिल जाती थीं।
हम इंसान हमेशा यही सोचते हैं कि हमारे पास बहुत वक्त है, लेकिन वक्त की रेत मुट्ठी से कब फिसल जाती है, पता ही नहीं चलता।
शादी को अभी सवा साल ही बीता था कि एक रात अचानक शिमला से पड़ोसियों का फोन आया। शारदा जी को सीने में तेज दर्द उठा था और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। तन्वी और प्रतीक रातों-रात गाड़ी भगाते हुए शिमला पहुँचे। अस्पताल के आईसीयू में शारदा जी मशीनों से घिरी लेटी थीं। तन्वी ने जब माँ का ठंडा पड़ता हाथ अपने हाथों में लिया, तो शारदा जी ने बड़ी मुश्किल से अपनी आँखें खोलीं। वह कुछ बोल नहीं पा रही थीं, बस अपनी बेटी के चेहरे को एकटक देख रही थीं, मानो उसकी छवि को अपनी आत्मा में बसा लेना चाहती हों।
डॉक्टरों ने अपनी तरफ से हर संभव प्रयास किया, लेकिन नियति के आगे किसी की न चली। अगले ही दिन सुबह की पहली किरण फूटने से पहले शारदा जी अनंत यात्रा पर निकल गईं।
माँ के जाने से तन्वी की दुनिया में जैसे एक भयानक तूफान आ गया, जो अपने पीछे गहरा सन्नाटा छोड़ गया था। शादी से पहले तन्वी को कभी पूरी तरह एहसास नहीं हुआ था कि उसकी माँ की खामोश मौजूदगी ही उसकी सबसे बड़ी ताकत थी। आज जब वह छत छिन गई, तो तन्वी को हर सांस में अपनी माँ की कमी कचोटने लगी।
तेरहवीं की रस्मों के बाद जब तन्वी शिमला वाले घर को समेट रही थी, तो उसने माँ की लोहे की पुरानी अलमारी खोली। अलमारी के सबसे ऊपरी खाने में, अखबार और मलमल के कपड़े में लिपटा हुआ वही डिब्बा रखा था। तन्वी ने कांपते हाथों से वह डिब्बा उतारा और उसे खोला। अंदर वही गहरे मैरून रंग की कांजीवरम साड़ी ज्यों की त्यों रखी थी। उसकी तहों में शारदा जी ने कपूर की गोलियाँ रख छोड़ी थीं, ताकि साड़ी खराब न हो। साड़ी के साथ ही मैचिंग का ब्लाउज भी सिला हुआ रखा था, जिसे शारदा जी ने न जाने कब चुपचाप खुद ही सिलकर तैयार कर लिया था, शायद यह सोचकर कि जब तन्वी अगली बार आएगी तो वह उसे पहनकर चौंका देंगी।
ब्लाउज और साड़ी को देखते ही तन्वी के सब्र का बाँध टूट गया। वह उस साड़ी को अपने सीने से भींचकर जमीन पर बैठ गई और फूट-फूटकर रोने लगी। “माँ… आपने तो कहा था फिर कभी पहन लूँगी! आपने ब्लाउज भी सिल लिया था माँ, फिर मुझे बताया क्यों नहीं? एक बार… बस एक बार पहनकर दिखा तो देतीं!”
उसकी सिसकियाँ खाली कमरे की दीवारों से टकराकर लौट रही थीं। प्रतीक ने आकर उसे संभाला। तन्वी उस साड़ी को अपने साथ चंडीगढ़ ले आई।
महीने बीतने लगे, लेकिन तन्वी के मन की वह कसक कम होने के बजाय बढ़ती ही जा रही थी। उसने अपने बेडरूम की दीवार पर माँ की एक बड़ी सी तस्वीर लगा रखी थी, जिसमें माँ ने वही हल्का नीला सूट पहना हुआ था और वह मुस्कुरा रही थीं। तन्वी जब भी अपनी अलमारी खोलती, उस मैरून साड़ी पर हाथ फेरती और बुदबुदाती—”यह मेरी माँ की साड़ी है।” फिर दीवार पर टंगी तस्वीर को देखकर उसकी आँखें डबडबा जातीं। उसके दिल में बस एक ही हूक उठती थी कि काश, कोई जादू हो पाता और वह अपनी माँ को सिर्फ एक पल के लिए उस साड़ी में देख पाती।
एक शाम प्रतीक ने देखा कि तन्वी फिर से बालकनी में बैठी उस साड़ी को गोद में रखे शून्य में निहार रही है। प्रतीक को अपनी पत्नी का यह मौन दुख देखा नहीं गया। अगले दिन ऑफिस में प्रतीक ने अपने एक ग्राफ़िक डिज़ाइनर और एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) विशेषज्ञ दोस्त विहान से इस बारे में बात की। विहान ने प्रतीक को बताया कि आजकल की आधुनिक एआई तकनीक और इमेज प्रोसेसिंग टूल्स की मदद से किसी भी तस्वीर को इतनी बारीकी से बदला जा सकता है कि वह बिल्कुल असली और जीवंत लगती है।
घर लौटकर प्रतीक ने तन्वी को इस तकनीक के बारे में बताया। यह सुनते ही तन्वी की बुझी हुई आँखों में उम्मीद की एक किरण जाग उठी। उसने तुरंत अपनी माँ की सबसे साफ और सुंदर पासपोर्ट साइज व अन्य तस्वीरें निकालीं। फिर उसने उस मैरून कांजीवरम साड़ी को पूरी तरह खोलकर बिस्तर पर फैलाया और रोशनी में उसकी हर बारीकी, उसके बॉर्डर और पल्लू की कई तस्वीरें अपने फोन से खींचीं।
तन्वी खुद भी आईटी क्षेत्र से थी। उसने प्रतीक और विहान की मदद से कई दिनों तक उस डिजिटल तस्वीर पर काम किया। उसने कंप्यूटर को निर्देश दिए कि माँ के चेहरे की सौम्यता, उनके बालों में लगी चाँदी सी सफेदी और उनकी आँखों की ममता वैसी ही रहे, बस उनके सूट की जगह यह मैरून साड़ी ठीक उसी तरह पहनाई जाए, जैसे कोई भारतीय महिला बड़े सलीके से पल्लू कंधे पर रखकर पहनती है। साथ ही, माथे पर एक छोटी सी मैरून बिंदी और कलाई में दो सोने की चूड़ियाँ भी जोड़ी गईं।
तीन दिन की मेहनत के बाद, जब अंतिम तस्वीर कंप्यूटर की स्क्रीन पर उभर कर सामने आई, तो कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया। तन्वी ने अपने मुँह पर दोनों हाथ रख लिए। उसकी आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे, लेकिन इस बार ये आँसू बेबसी के नहीं, बल्कि एक असीम तृप्ति के थे।
स्क्रीन पर शारदा जी साक्षात खड़ी मुस्कुरा रही थीं। उस गहरे मैरून रंग की सुनहरी बॉर्डर वाली साड़ी में उनका चेहरा दमक रहा था। पल्लू ठीक वैसे ही कंधे पर टिका था, जैसी तन्वी ने हमेशा कल्पना की थी। ऐसा लग रहा था मानो शारदा जी ने अभी-अभी दूसरे कमरे से वह साड़ी पहनकर बाहर कदम रखा हो और पूछ रही हों—”कैसी लग रही हूँ मैं तन्वी?”
तन्वी ने कांपती उंगलियों से स्क्रीन को छुआ और रोते हुए मुस्कुराकर बोली, “बहुत सुंदर लग रही हो मेरी माँ… किसी की नजर न लगे।” आज तन्वी ने अपनी माँ को ठीक वही शब्द लौटा दिए थे, जो माँ ने उसके फेयरवेल वाले दिन उसे कहे थे।
प्रतीक ने उस डिजिटल तस्वीर का एक बहुत बड़ा और उच्च गुणवत्ता वाला कैनवास प्रिंट निकलवाया और उसे सागौन की लकड़ी के एक नक्काशीदार सुनहरे फ्रेम में जड़वा कर घर के मुख्य ड्राइंग रूम की दीवार पर लगवा दिया।
तन्वी ने अब रोना छोड़ दिया था। उस एक तस्वीर ने उसके भीतर के अधूरेपन को भर दिया था। लेकिन तन्वी यहीं नहीं रुकी। उसने सोचा कि माँ की वह असली साड़ी अलमारी में बंद रहकर केवल दर्द की याद दिलाती रहेगी। उसने फैसला किया कि वह अपनी माँ की सादगी और सेवा भाव को आगे बढ़ाएगी। उसने शहर के एक वृद्धाश्रम में जाना शुरू किया, जहाँ कई ऐसी बुजुर्ग माताएँ थीं जिन्हें उनके अपनों ने छोड़ दिया था। तन्वी हर त्योहार पर अपनी तनख्वाह से उन माताओं के लिए सुंदर साड़ियाँ और सूट लेकर जाती और अपने हाथों से उन्हें पहनाती। उन बुजुर्ग महिलाओं की झुर्रीदार आँखों में जब खुशी की चमक आती, तो तन्वी को लगता कि उसकी माँ शारदा जी ही मुस्कुरा रही हैं।
और वह मैरून कांजीवरम साड़ी? तन्वी ने उसे एक पारदर्शी काँच के शोकेस में बड़े सम्मान के साथ माँ की उस फ्रेम की हुई तस्वीर के ठीक नीचे सजा दिया है। आज भी जब कोई मेहमान या रिश्तेदार उनके घर आता है और ड्राइंग रूम की दीवार पर लगी शारदा जी की उस भव्य तस्वीर और नीचे रखी साड़ी को देखकर पूछता है कि “तन्वी, तुम्हारी माँ तो हमेशा सूट पहनती थीं, उन्होंने यह खूबसूरत साड़ी कब पहनी?”
तब तन्वी की आँखों में नमी नहीं, बल्कि गर्व की एक प्यारी सी मुस्कान तैर जाती है और वह बड़े सुकून से बस एक ही जवाब देती है—”यह मेरी माँ की साड़ी है… और मेरी माँ इसमें दुनिया की सबसे खूबसूरत माँ लगती हैं।”
आप इस बारे में क्या सोचते हैं?
क्या आपने भी कभी गौर किया है कि हमारी माँएं हमारी हर छोटी-बड़ी ख्वाहिश पूरी करते-करते अपनी खुद की इच्छाओं को कैसे हमेशा के लिए दफन कर देती हैं? क्या आपके पास भी अपने माता-पिता की कोई ऐसी निशानी या अधूरी ख्वाहिश है, जिसे याद करके आज भी आपकी आँखें नम हो जाती हैं? अपने दिल की बात नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें, और यदि आपके माता-पिता आपके साथ हैं, तो आज ही उनकी कोई एक छोटी सी ख्वाहिश जरूर पूरी करें!
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