फरिश्ते का स्पर्श

 हरिमोहन जी को देखते ही केशव के मुरझाए हुए चेहरे पर एक अजीब सी चमक आ गई। वह बिस्तर से उठने की कोशिश करने लगा।

“अरे-अरे, लेटा रह भाई! उठने की जरूरत नहीं है,” हरिमोहन जी ने पास आकर फलों की टोकरी स्टूल पर रखी और बेहद प्यार से केशव के माथे और सिर पर अपना हाथ फेरा। “अब बता, कैसा महसूस कर रहा है मेरा शेर? दर्द तो ज्यादा नहीं है ना?”

जैसे ही हरिमोहन जी की स्नेह भरी हथेली केशव के सिर पर पड़ी, केशव के सब्र का बांध टूट गया। उसकी आंखों से झर-झर आंसू बहकर तकिए को भिगोने लगे। उसने अपने दाहिने हाथ से हरिमोहन जी का हाथ पकड़ लिया और उसे अपने माथे से लगा लिया।

“अरे बाबूजी, रुकिए ना! ताजे सेब और अमरूद हैं, बिल्कुल मीठे और रसीले… बाजार से दस रुपये सस्ते में ही तौल दूंगा। ले लीजिए ना बाबूजी, सुबह से बोहनी भी नहीं हुई है!”

कानपुर के व्यस्त बड़ा चौराहा बाजार की तपती दोपहरी में केशव अपने फलों के ठेले को एक हाथ से धकेलते हुए आने-जाने वाले राहगीरों के सामने गिड़गिड़ा रहा था। उसके माथे से पसीने की बूंदें टपककर उसकी सूजी हुई आंखों में गिर रही थीं, जिनमें भूख और लाचारी की गहरी परछाई साफ दिखाई दे रही थी। केशव के बाएं कंधे से लेकर कलाई तक एक मोटा सफेद प्लास्टर चढ़ा हुआ था, जो गले में डाली गई एक मटमैली सूती पट्टी के सहारे लटक रहा था।

कंधे पर टंगे झोले को संभालते हुए एक राहगीर ने केशव के ठेले की ओर देखा, फिर उसके प्लास्टर चढ़े हाथ पर नजर डाली और मुंह फेरते हुए बोला, “नहीं भाई, मुझे जल्दी में घर पहुंचना है। तुम्हारे एक हाथ में चोट लगी है, तुम एक हाथ से फल कब तौलोगे, कब पन्नी में बांधोगे और कब हिसाब करोगे? इसमें बहुत वक्त लग जाएगा। मैं आगे वाली दुकान से ले लूंगा।”

“साहब, ऐसा मत कहिए! बस दो मिनट लगेंगे, मैं एक हाथ से ही बहुत फुर्ती से तौल दूंगा। आप बैठिए तो सही, पांच रुपये कम दे दीजिएगा साहब, पर खाली हाथ मत जाइए!” केशव लगभग दौड़ते हुए उस आदमी के पीछे लपका, जिससे ठेले पर रखे कुछ अमरूद लुढ़ककर नीचे सड़क की धूल में गिर गए।

आदमी ने केशव की बात को अनसुना कर दिया और तेज कदमों से आगे बढ़ गया। केशव ने झुककर अपने दाहिने हाथ से उन धूल सने अमरूदों को उठाया, उन्हें अपने कुर्ते के पल्लू से पोंछा और वापस ठेले पर रख दिया। उसकी आंखों के कोने भीग गए थे। पिछले चार दिनों से यही सिलसिला चल रहा था। जब से उसके हाथ पर यह प्लास्टर चढ़ा था, लोग उसके ठेले के पास रुकने से कतराने लगे थे। किसी को लगता कि वह देरी कर देगा, तो कोई उसकी लाचारी देखकर ही रास्ता बदल लेता। फल धूप में सूखकर खराब हो रहे थे और उधर घर में राशन का डिब्बा खाली हो चुका था।

केशव ने आसमान की तरफ देखा। सूरज आग उगल रहा था, लेकिन उसके सीने के अंदर जो बेबसी की आग जल रही थी, वह इस धूप से कहीं ज्यादा तल्ख थी। घर में उसकी बूढ़ी मां कमला देवी थीं, जिन्हें सांस की बीमारी थी और उनकी दवाइयां दो दिन पहले ही खत्म हो चुकी थीं। साथ में उसकी छोटी बहन गौरी भी थी, जिसकी स्कूल की फीस भरने की आखिरी तारीख सिर पर खड़ी थी। मकान मालिक ने सुबह ही चेतावनी दी थी कि अगर इस महीने की दस तारीख तक कोठरी का किराया नहीं मिला, तो वह उनका सामान बाहर फेंक देगा।

“हे भगवान, आखिर गरीब की ही इतनी परीक्षा क्यों लेता है तू? अगर हाथ ही तोड़ना था, तो जान ही ले लेता, कम से कम अपने परिवार को यूं तिल-तिल कर भूख से तड़पते तो नहीं देखना पड़ता!” केशव अपने ठेले के हत्थे पर सिर टिकाकर फूट-फूटकर रो पड़ा। बाजार के शोरगुल में उसकी सिसकियां कहीं दबकर रह गईं।

तभी सड़क के ठीक उस पार स्थित ‘अग्रवाल टिंबर एंड हार्डवेयर’ के मालिक हरिमोहन जी की नजर केशव पर पड़ी। पचास की उम्र पार कर चुके हरिमोहन जी बेहद शांत स्वभाव के, धर्म-कर्म में विश्वास रखने वाले और नेक दिल इंसान थे। उनके चेहरे पर हमेशा एक सौम्य मुस्कान रहती थी और माथे पर चंदन का टीका चमकता रहता था। वे पिछले आधे घंटे से अपनी दुकान की गद्दी पर बैठे केशव को लोगों के पीछे भागते और फिर निराश होकर रोते हुए देख रहे थे। उनसे रहा नहीं गया। उन्होंने अपने मुनीम को गद्दी संभालने का इशारा किया और खुद सड़क पार करके केशव के ठेले के पास जा पहुंचे।

“केशव… अरे भाई केशव, क्या हुआ? ऐसे बीच बाजार में ठेले पर सिर रखकर क्यों रो रहा है? और यह तेरे हाथ में इतना बड़ा प्लास्टर कैसे बंधा है?” हरिमोहन जी की आवाज में गहरी चिंता और अपनापन था।

अपने नाम की पुकार सुनकर केशव ने सिर उठाया। आंसुओं से धुंधली हो चुकी आंखों को हथेली से रगड़कर जब उसने सामने खड़े हरिमोहन जी को देखा, तो उसने तुरंत अपने हाथ जोड़ लिए—या यूं कहें कि अपना एक ही सही सलामत हाथ उनके सामने उठाया।

“बाबूजी… प्रणाम बाबूजी,” केशव का गला भर आया था, आवाज कांप रही थी। “बस अपनी किस्मत को रो रहा हूं बाबूजी। पांच दिन पहले की बात है, अम्मा की तबीयत अचानक बहुत बिगड़ गई थी। उन्हें सांस लेने में तकलीफ हो रही थी, तो मैं रात को ही उन्हें मोहल्ले के क्लीनिक ले जा रहा था। सड़क पर अंधेरा था, तभी पीछे से एक तेज रफ्तार कार ने मुझे साइड से टक्कर मार दी। कार वाला तो रुका भी नहीं, भाग गया। मैं सड़क पर गिरा तो मेरा बायां हाथ पत्थर से जा टकराया और हड्डी टूट गई। सरकारी अस्पताल गया तो डॉक्टरों ने प्लास्टर चढ़ा दिया और कहा कि सवा महीने तक कोई वजन मत उठाना।”

अपनी बात कहते-कहते केशव फिर से सुबकने लगा, “बाबूजी, आप तो जानते हैं कि बापू के गुजर जाने के बाद घर में कमाने वाला मैं अकेला हूं। अगर सवा महीने तक घर बैठ गया, तो अम्मा की दवाई कहां से आएगी? गौरी की पढ़ाई छूट जाएगी और हम सब भूखे मर जाएंगे। इसीलिए दर्द की गोली खाकर ठेला लेकर निकल आया, पर इस टूटे हाथ को देखकर कोई मुझसे फल भी नहीं खरीद रहा। सुबह से एक रुपया भी नहीं कमाया है बाबूजी…”

हरिमोहन जी का हृदय केशव की व्यथा सुनकर मोम की तरह पिघल गया। उन्होंने देखा कि केशव का चेहरा बुखार और कमजोरी से तप रहा था, फिर भी वह अपने परिवार के पेट की खातिर टूटे हाथ के साथ धूप में खड़ा था। हरिमोहन जी ने तुरंत केशव के कंधे पर अपना हाथ रखा और बड़े स्नेह से बोले, “अरे पगले, इतना छोटा दिल क्यों करता है? ऊपर वाले ने अगर दुख दिया है, तो उससे लड़ने की ताकत भी वही देगा। और जब तक तेरा यह हाथ ठीक नहीं हो जाता, तुझे इस तरह धूप में भटकने की कोई जरूरत नहीं है।”

हरिमोहन जी ने अपने नौकर को आवाज देकर बुलाया और कहा, “छोटू, केशव के ठेले पर जितने भी फल हैं, सब तौल कर दुकान के अंदर रखवा ले और हमारे सभी कारीगरों में बांट दे।” इसके बाद उन्होंने अपनी जेब से पर्स निकाला, फलों की पूरी कीमत से कहीं ज्यादा पैसे केशव की जेब में डाले और पास ही की किराने की दुकान से उसके घर के लिए पूरे डेढ़ महीने का राशन—आटा, दाल, चावल, तेल, मसाले और चीनी—बंधवाकर एक रिक्शे में रखवा दिया।

“बाबूजी, यह आप क्या कर रहे हैं? मैं इतना बड़ा कर्ज कैसे उतारूंगा?” केशव संकोच और कृतज्ञता के मारे जमीन में गड़ा जा रहा था।

“इसे कर्ज मत समझ केशव, यह एक बड़े भाई और पिता के नाते मेरा फर्ज है। अभी तेरे शरीर को आराम की सख्त जरूरत है। अगर कच्ची हड्डी पर जोर पड़ेगा तो बात और बिगड़ जाएगी। तू चुपचाप घर जा, अम्मा की दवाई ले और आराम कर। जब हाथ बिल्कुल ठीक हो जाए, तभी काम पर लौटना।” हरिमोहन जी ने उसे रिक्शे में बैठाया और उसका ठेला अपनी दुकान के पीछे सुरक्षित रखवा लिया।

केशव की आंखों से कृतज्ञता के आंसू बह रहे थे। वह बिना कुछ कहे बस हाथ जोड़े रिक्शे में बैठकर अपने घर चला गया।

दिन बीतने लगे। हरिमोहन जी अपनी दुकानदारी में व्यस्त रहते, लेकिन दिन में एकाध बार उनकी नजर सड़क के उस कोने पर जरूर जाती जहां केशव अपना ठेला लगाया करता था। उन्हें केशव और उसके परिवार की चिंता बनी रहती थी। इस तरह देखते-देखते करीब चालीस दिन बीत गए।

एक सुबह जब हरिमोहन जी अपनी दुकान पर बैठे हिसाब-किताब देख रहे थे, तभी उन्हें अपनी दुकान की सीढ़ियों के पास केशव खड़ा दिखाई दिया। केशव के हाथ से प्लास्टर उतर चुका था। हरिमोहन जी के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उन्होंने चश्मा उतारते हुए कहा, “अरे आ केशव! बहुत दिनों बाद दिखाई दिया। अब कैसा है तेरा हाथ? अम्मा की तबीयत तो ठीक है ना?”

केशव धीरे-धीरे कदम बढ़ाता हुआ दुकान के अंदर आया। उसके चेहरे पर ठीक होने की कोई खुशी नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी मुर्दनी और घोर निराशा छाई हुई थी। उसने अपनी पूरी बांह की कमीज पहन रखी थी, लेकिन हरिमोहन जी की पारखी नजरों ने तुरंत भांप लिया कि कुछ गड़बड़ है।

“क्या बात है केशव? तू इतना उदास क्यों है? जरा अपना हाथ तो दिखा मुझे,” हरिमोहन जी ने अपनी कुर्सी से उठते हुए कहा।

केशव ने कांपते हाथों से अपनी बाईं आस्तीन ऊपर चढ़ाई। आस्तीन हटते ही हरिमोहन जी सन्न रह गए। उनके मुंह से अचानक निकला, “हे भगवान! यह क्या हुआ केशव? तेरा हाथ तो कोहनी के थोड़ा नीचे से बिल्कुल टेढ़ा हो गया है!”

वाकई, केशव की कलाई और कोहनी के बीच की हड्डी एक अजीब से कोण पर मुड़ी हुई थी। हाथ में सूजन अभी भी थी और उंगलियां पूरी तरह से मुड़ भी नहीं पा रही थीं।

केशव की आंखों से बांध टूट गया और वह घुटनों के बल बैठकर रोने लगा, “बाबूजी, मैं कहीं का नहीं रहा! मेरी जिंदगी बर्बाद हो गई। सरकारी अस्पताल में जिस दिन प्लास्टर चढ़ाया गया था, वहां बहुत भीड़ थी। किसी जूनियर डॉक्टर ने बिना एक्स-रे ठीक से देखे ही हड्डी बिठाए बिना ऊपर से पट्टी बांध दी। कल जब प्लास्टर कटा, तो डॉक्टर कहने लगे कि हड्डी गलत जुड़ गई है और अब इसमें कुछ नहीं हो सकता। जब मैंने कहा कि मैं इस हाथ से काम कैसे करूंगा, तो उन्होंने मुझे डांटकर भगा दिया कि जान बच गई यही बहुत है, अब अगर सीधा करवाना है तो बड़े प्राइवेट अस्पताल में जाकर ऑपरेशन करवाओ, जिसमें पचास-साठ हजार का खर्चा आएगा। बाबूजी, मेरे पास तो जहर खाने के भी पैसे नहीं हैं, मैं इतना बड़ा ऑपरेशन कहां से करवाऊंगा? इस टेढ़े और बेजान हाथ से तो मैं ठेला भी नहीं धकेल सकता…”

केशव की हालत देखकर हरिमोहन जी की आत्मा कांप उठी। एक गरीब इंसान, जो अपनी मेहनत की रोटी कमाना चाहता है, व्यवस्था की थोड़ी सी लापरवाही ने उसे जीवन भर के लिए अपाहिज बना दिया था। हरिमोहन जी ने एक पल की भी देरी नहीं की। उन्होंने केशव को बांह पकड़कर उठाया और अपने मुनीम से कहा, “मुनीम जी, आज मैं दुकान पर देर से आऊंगा, आप काम संभालिएगा।”

“चल केशव, मेरे साथ गाड़ी में बैठ,” हरिमोहन जी ने अपनी कार की चाबी उठाई।

“कहां बाबूजी?” केशव ने सहमे हुए स्वर में पूछा।

“जहां तेरी टूटी हुई उम्मीद और यह टेढ़ा हाथ दोनों सीधे हो सकें। अब तू चुपचाप बैठ, कोई सवाल मत करना,” हरिमोहन जी की आवाज में एक दृढ़ निश्चय था।

वे केशव को लेकर शहर के सबसे प्रसिद्ध हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉक्टर सिन्हा के मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल पहुंचे। हरिमोहन जी का शहर में अच्छा नाम था और डॉक्टर सिन्हा उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानते भी थे। हरिमोहन जी ने तुरंत केशव की फाइल बनवाई और डॉक्टर के केबिन में ले गए।

डॉक्टर सिन्हा ने केशव के हाथ का नया डिजिटल एक्स-रे करवाया। एक्स-रे की फिल्म को लाइट बॉक्स पर लगाकर देखते हुए डॉक्टर सिन्हा ने गंभीर स्वर में कहा, “हरिमोहन जी, केस काफी बिगड़ चुका है। हड्डी एक-दूसरे के ऊपर चढ़कर जुड़ गई है, जिसे मेडिकल भाषा में ‘मैल-यूनियन’ (Malunion) कहते हैं। इसकी वजह से नसें भी दब रही हैं। अगर इसे ऐसे ही छोड़ दिया गया, तो धीरे-धीरे इस हाथ की बची-खुची ताकत भी खत्म हो जाएगी और यह हाथ पूरी तरह से बेकार हो जाएगा।”

“तो फिर इसका उपाय क्या है डॉक्टर साहब? पैसे की आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए, बस इस गरीब का हाथ पहले जैसा ठीक होना चाहिए,” हरिमोहन जी ने तुरंत कहा।

डॉक्टर सिन्हा ने बताया, “हमें एक जटिल ऑपरेशन करना होगा। पहले इस गलत जुड़ी हुई हड्डी को ऑपरेशन के जरिए दोबारा काटकर अलग करना पड़ेगा, फिर उसे सही जगह पर बिठाकर अंदर टाइटेनियम की प्लेट और स्क्रू लगाने होंगे। इसके बाद कुछ हफ्तों की फिजियोथेरेपी चलेगी, तब जाकर इसका हाथ पहले की तरह काम करने लायक बनेगा।”

“ठीक है डॉक्टर साहब, आप आज ही ऑपरेशन की तैयारी कीजिए,” हरिमोहन जी ने बिना एक सेकंड गंवाए अपनी सहमति दे दी।

कोने में खड़ा केशव हक्का-बक्का होकर यह सब सुन रहा था। उसने हरिमोहन जी का कुर्ता पकड़कर धीरे से खींचा और फुसफुसाते हुए बोला, “बाबूजी, इतना बड़ा अस्पताल है… यहां तो हजारों-लाखों रुपये लग जाएंगे। मत करवाइए बाबूजी, मैं अपने एक हाथ से ही कुछ न कुछ भीख मांगकर या छोटा-मोटा काम करके गुजारा कर लूंगा, आप मेरे लिए इतना बोझ मत उठाइए।”

हरिमोहन जी ने पलटकर केशव के दोनों कंधों को थामा और उसकी आंखों में देखते हुए बोले, “केशव, आज के बाद कभी भीख मांगने की बात अपनी जुबान पर मत लाना। ईश्वर ने मुझे अगर सामर्थ्य दिया है, तो वह तिजोरी भरने के लिए नहीं, बल्कि तेरे जैसे मेहनतकश इंसान के काम आने के लिए दिया है। तुझे अपने पैरों पर खड़ा करना अब मेरी जिम्मेदारी है।”

हरिमोहन जी ने रिसेप्शन काउंटर पर जाकर ऑपरेशन और कमरे का पूरा एडवांस जमा किया और केशव को अस्पताल में भर्ती करवा दिया। उन्होंने केशव के घर जाकर उसकी बूढ़ी मां और बहन को भी पूरी बात बताई और उन्हें ढांढस बंधाया कि वे बिल्कुल चिंता न करें।

अगले दिन दोपहर को केशव का ऑपरेशन हुआ, जो करीब तीन घंटे तक चला। ऑपरेशन सफल रहा। डॉक्टरों ने गलत जुड़ी हड्डी को सुधार कर प्लेट डाल दी थी। जब केशव को होश आया, तो वह वार्ड के बिस्तर पर लेटा हुआ था और दर्द की दवाओं के असर से नींद में था।

उससे अगले दिन सुबह जब अस्पताल की खिड़कियों से सूरज की पहली किरण छनकर केशव के बिस्तर पर पड़ी, तो दरवाजा खुला और हरिमोहन जी हाथ में फलों की टोकरी और नारियल पानी लिए अंदर दाखिल हुए।

हरिमोहन जी को देखते ही केशव के मुरझाए हुए चेहरे पर एक अजीब सी चमक आ गई। वह बिस्तर से उठने की कोशिश करने लगा।

“अरे-अरे, लेटा रह भाई! उठने की जरूरत नहीं है,” हरिमोहन जी ने पास आकर फलों की टोकरी स्टूल पर रखी और बेहद प्यार से केशव के माथे और सिर पर अपना हाथ फेरा। “अब बता, कैसा महसूस कर रहा है मेरा शेर? दर्द तो ज्यादा नहीं है ना?”

जैसे ही हरिमोहन जी की स्नेह भरी हथेली केशव के सिर पर पड़ी, केशव के सब्र का बांध टूट गया। उसकी आंखों से झर-झर आंसू बहकर तकिए को भिगोने लगे। उसने अपने दाहिने हाथ से हरिमोहन जी का हाथ पकड़ लिया और उसे अपने माथे से लगा लिया।

बचपन में जब केशव के पिता का साया उसके सिर से उठा था, तब वह मात्र बारह साल का था। तब से लेकर आज तक उसने दुनिया के सिर्फ धक्के और ताने ही सहे थे। जिम्मेदारियों के बोझ ने उसे वक्त से पहले बड़ा कर दिया था। इतने सालों में आज पहली बार किसी ने उसके सिर पर ठीक वैसे ही प्यार और फिक्र से हाथ फेरा था, जैसे कभी उसके पिता फेरा करते थे। केशव को हरिमोहन जी के चेहरे में साक्षात अपने पिता और भगवान का रूप दिखाई दे रहा था।

“बाबूजी…” केशव सिसकते हुए बोला, “इस दुनिया में जहां सगे रिश्तेदार भी मुसीबत के वक्त मुंह मोड़ लेते हैं, वहां आपने मेरे जैसे गैर और गरीब इंसान के लिए इतना कुछ किया। अगर आज आप न होते, तो मैं जीवन भर के लिए अपाहिज हो जाता। मेरी अम्मा और बहन सड़क पर आ जातीं। आपने सिर्फ मेरा हाथ ही नहीं जोड़ा बाबूजी, आपने मेरे पूरे परिवार की सांसें जोड़ दी हैं। मैं आपका यह उपकार सात जन्मों तक नहीं उतार पाऊंगा।”

हरिमोहन जी की आंखें भी नम हो गईं। उन्होंने अपनी जेब से रूमाल निकालकर केशव के आंसू पोंछे और अपनी जेब से दस हजार रुपये की एक गड्डी निकालकर उसके तकिए के नीचे रखते हुए बोले, “रोते नहीं केशव। तेरा और मेरा कोई पिछले जन्म का नाता रहा होगा, जो भगवान ने मुझे इस नेक काम के लिए माध्यम बनाया। शुक्रिया अदा करना है तो उस परमपिता परमेश्वर का कर। यह कुछ पैसे रखे हैं, जब तक अस्पताल से छुट्टी होने के बाद तू पूरी तरह ठीक न हो जाए, घर के खर्च और अपनी दवाइयों में कोई कमी मत आने देना। और सुन, आगे भी जिंदगी में कभी भी कोई तकलीफ आए, तो यह मत सोचना कि तू अकेला है। तेरा यह बाबूजी हमेशा तेरे साथ खड़ा है।”

केशव के पास शब्द नहीं थे, बस उसकी जुड़ी हुई हथेली और बहते आंसू ही उसकी अंतरात्मा की कृतज्ञता बयां कर रहे थे। उसने मन ही मन संकल्प लिया कि आज से हरिमोहन जी ही उसके पिता समान हैं।

अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी हरिमोहन जी ने केशव की फिजियोथेरेपी का पूरा ध्यान रखा। करीब दो महीने की देखभाल और कसरत के बाद केशव का हाथ बिल्कुल पहले की तरह सीधा और मजबूत हो गया। जब वह पहली बार अपना फलों का ठेला लेकर वापस बाजार में लौटा, तो उसने सबसे पहले अपनी कमाई के पैसे से मंदिर में प्रसाद चढ़ाया और सीधा हरिमोहन जी की दुकान पर जाकर उनके चरणों में अपना सिर रख दिया। हरिमोहन जी ने उसे गले से लगा लिया। केशव को फिर से हंसता-मुस्कुराता और मेहनत करता देख हरिमोहन जी के मन को जो असीम शांति और संतोष मिलता था, वह करोड़ों की दौलत कमाने से भी नहीं मिल सकता था।

वक्त का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। केशव ने अपनी कड़ी मेहनत और ईमानदारी से धीरे-धीरे ठेले से एक छोटी सी फलों की दुकान कर ली। उसने अपनी बहन गौरी को पढ़ा-लिखाकर उसकी अच्छी जगह शादी की और अपनी मां का भी खूब ख्याल रखा। इन सबके बीच एक नियम ऐसा था जो कभी नहीं टूटा—चाहे होली हो, दिवाली हो या कोई भी तीज-त्योहार, केशव सबसे पहले मिठाई और फलों का टोकरा लेकर हरिमोहन जी के घर जाता, उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेता और फिर अपने घर का त्योहार मनाता।

आज इस घटना को बीते हुए पूरे बीस साल हो चुके हैं। हरिमोहन जी अब इस दुनिया में नहीं हैं, कुछ वर्ष पूर्व वे स्वर्ग सिधार गए। लेकिन केशव की फलों की बड़ी दुकान में आज भी भगवान की तस्वीर के ठीक बगल में हरिमोहन जी की एक बड़ी सी तस्वीर लगी हुई है, जिस पर रोज सुबह ताजे फूलों की माला चढ़ाई जाती है। केशव जब भी अपने उस बाएं हाथ से फलों की तराजू उठाता है, तो उसकी आंखें श्रद्धा से अपने बाबूजी की तस्वीर के सामने झुक जाती हैं। हरिमोहन जी तो चले गए, लेकिन उनकी दिखाई हुई दया और करुणा की रोशनी ने एक गरीब परिवार को अंधेरों में डूबने से बचा लिया और आज केशव भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी न किसी जरूरतमंद की मदद करके अपने बाबूजी के संस्कारों को जिंदा रखे हुए है।

दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि आज की इस स्वार्थी दुनिया में हरिमोहन जी जैसे फरिश्ते ही इंसानियत को जिंदा रखे हुए हैं? अगर आपने भी कभी किसी की निस्वार्थ मदद की है या किसी ने बुरे वक्त में आपका हाथ थामा है, तो अपना अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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