आबरू की बेड़ियाँ

  इस घर का हर सदस्य कान खोलकर सुन ले!” प्रताप सिंह जी की आवाज़ हवेली की दीवारों से टकराकर गूँज उठी। “अपनी बेटी को ऐसे वहशी जानवर और नरक से आज़ाद करवाने से किसी खानदान पर धब्बा नहीं लगता! धब्बा तब लगता है, जब हम समाज के डर से अपनी ही फूल-सी बेटियों को जलती हुई भट्टी में झोंक देते हैं और बाहर खड़े होकर संस्कारी होने का ढोंग करते हैं। भाड़ में जाए ऐसी दुनिया और भाड़ में जाए वो समाज, जो एक औरत की चीखों से ज़्यादा उसके माथे के सिंदूर को अहमियत देता है! मुझे किसी की कोई परवाह नहीं है। एक परिवार की असली आन-बान और शान उसकी बेटियों की मुस्कुराहट और उनकी सलामती से होती है, ऐसे खोखले और सड़े हुए रिश्तों की लाश ढोने से नहीं!”

आँगन के बीचों-बीच एक सूटकेस गिरा पड़ा था और उसके पास ही घुटनों के बल बैठी थी तेईस साल की ‘अवनि’। उसकी नई-नवेली दुल्हन वाली लाल साड़ी जगह-जगह से मुड़ी-तुड़ी थी, माँग का सिंदूर पसीने और आँसुओं के साथ बहकर माथे पर फैल गया था, और गले का मंगलसूत्र टूटकर उसके ब्लाउज़ में अटका हुआ था। आज से ठीक पैंतीस दिन पहले इसी आँगन से अवनि की डोली बड़ी धूमधाम से उठी थी। शहर के जाने-माने रईस और प्रॉपर्टी डीलर के बेटे ‘विक्रांत’ के साथ उसका ब्याह हुआ था। तब सबने कहा था कि अवनि के भाग खुल गए, पर किसी ने यह नहीं देखा कि जिस सोने के पिंजरे में उसे भेजा जा रहा है, उसके भीतर एक आदमखोर भेड़िया रहता है।

अवनि को इस हालत में बिना बताए ससुराल छोड़कर मायके वापस आया देख, उसकी दादी ‘भगवती देवी’ का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। भगवती देवी हवेली के तख्त पर बैठी अपने हाथ की रुद्राक्ष की माला को इतनी ज़ोर से मसल रही थीं मानो वह माला नहीं, अवनि की गर्दन हो।

“अरे मैं पूछती हूँ, किस मुँह से वापस चली आई तू इस दहलीज पर?” भगवती देवी की कड़कदार आवाज़ हवेली के सन्नाटे को चीरती हुई गूँजी। “राठौड़ खानदान की नाक कटवाने का ठेका ले रखा है क्या तूने? अभी हाथों की मेहंदी का रंग भी पूरा नहीं उतरा और तू बोरिया-बिस्तर बाँधकर भाग आई! कल को मोहल्ले वाले सौ बातें बनाएंगे, तो क्या जवाब देंगे हम? क्या कहेंगे कि हमारी पोती से एक घर नहीं बसाया गया?”

अवनि की माँ ‘शैलजा’ रसोई के दरवाज़े के पास खड़ी अपने पल्लू से मुँह दबाए सिसक रही थीं। वह अपनी बेटी के पास जाकर उसे सीने से लगाना चाहती थीं, उसके बिखरे बालों को सहलाना चाहती थीं, लेकिन सास के खौफ़ ने उनके पैरों में जैसे जंजीरें डाल रखी थीं। अवनि के पिता ‘गिरिराज’ भी सिर झुकाए एक कोने में खड़े थे। उनमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह अपनी माँ की बात काट सकें।

अवनि ने अपनी सूजी हुई, लाल आँखों को उठाकर दादी की तरफ देखा। उसके होंठ काँप रहे थे, गले से आवाज़ नहीं निकल रही थी। उसने बड़ी मुश्किल से थूक निगलते हुए धीमी आवाज़ में कहा, “दादी… मैं वहाँ नहीं रह सकती। मैं मर जाऊँगी दादी, पर उस नरक में वापस नहीं जाऊँगी। मुझे विक्रांत से तलाक चाहिए…”

‘तलाक’ शब्द सुनते ही भगवती देवी तख्त से ऐसे उछलीं जैसे उन्हें किसी बिच्छू ने डंक मार दिया हो। उन्होंने अपने दोनों हाथों से अपनी छाती पीट ली।

“हाय राम! धरती फट क्यों नहीं जाती! तलाक? इस घर की लड़की की जुबान से तलाक शब्द निकला कैसे?” भगवती देवी चिल्लाते हुए अवनि के करीब आईं और अपनी उंगली उसके चेहरे के पास नचाते हुए बोलीं, “कान खोलकर सुन ले छोकरी! सात पुश्तों में आज तक राठौड़ खानदान की किसी बेटी या बहू ने कचहरी की सीढ़ियाँ नहीं चढ़ी हैं। हमारे यहाँ लड़कियों की डोली उठती है, तो ससुराल से अर्थी ही निकलती है! खानदान के नाम पर यह तलाक का काला धब्बा मैं जीते-जी नहीं लगने दूँगी।”

अवनि फूट-फूटकर रोने लगी। “दादी, आप समझ नहीं रही हैं…”

“चुप कर! एकदम चुप!” भगवती देवी ने उसे बीच में ही टोक दिया। “बड़ी आई है मुझे समझाने वाली! थोड़ा-सा पति ने डाँट क्या दिया, मर्द ने थोड़ा रौब क्या दिखा दिया, तो मैडम को तलाक चाहिए! अरे, गृहस्थी चलाने के लिए औरत को धरती की तरह सहनशील बनना पड़ता है। समझौता करना पड़ता है, अपनी जुबान सीनी पड़ती है। अपनी सगी बुआ ‘निर्मला’ को नहीं देखा तूने?”

भगवती देवी ने आँगन के दूसरे कोने में खड़ी एक पैंतालीस साल की औरत की तरफ इशारा किया, जो तब से बुत बनी यह सब देख रही थी। वह अवनि की बुआ निर्मला थीं, जो कल ही तीज के त्योहार के लिए मायके आई थीं। निर्मला का चेहरा वक्त से पहले ही झुर्रियों से भर गया था, आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे और शरीर सूखकर काँटा हो चुका था।

“देख अपनी बुआ को!” भगवती देवी ने गर्व और कठोरता के मिले-जुले भाव से कहा। “आज से बाईस साल पहले ये भी तेरी ही तरह शादी के छह महीने बाद रोती-धोती वापस भाग आई थी। कहती थी—’माँ, मेरा आदमी जुआरी है, शराबी है, हर रात नशे में धुत होकर मुझे बेल्ट से मारता है। मैं उसके साथ नहीं रहूँगी।’ तब अगर मैंने भी आज के ज़माने की तरह इसके सिर पर हाथ फेर दिया होता, तो आज ये भी कहीं दर-दर की ठोकरें खा रही होती। मैंने इसकी एक नहीं सुनी! उल्टे पाँव, बिना पानी पिलाए, उसी रात इसके ससुराल के दरवाज़े पर छोड़कर आई थी मैं इसे। और देख आज… बाईस साल हो गए, काट रही है न अपनी गृहस्थी? बच्चे भी बड़े हो गए, समाज में सधवा का मान-सम्मान भी है और हमारे खानदान की इज़्ज़त भी बची रही। मर्द तो थोड़ा-बहुत भटकता ही है, पर असली औरत वही है जो अपने आँसुओं से सींचकर घर को जोड़े रखे। और एक तू है! एक महीने में ही हार मानकर खानदान के माथे पर कलंक पोतने चली आई! उठ, अपना बैग उठा और अभी के अभी अपने जीजा को फोन कर कि वो आकर तुझे ले जाए।”

निर्मला बुआ ने अपनी आँखें बंद कर लीं। बाईस साल पुराना वह मंजर उनकी आँखों के सामने घूम गया, जब उनकी अपनी माँ ने उन्हें उस दरिंदे के हवाले वापस कर दिया था। तब से लेकर आज तक, निर्मला की ज़िंदगी का हर दिन एक सज़ा था, जिसे वह खानदान की झूठी इज़्ज़त के नाम पर काट रही थीं।

अवनि ने काँपते हुए हाथों से फर्श को पकड़ा। उसे चक्कर आ रहा था। उसने कल रात से पानी की एक बूँद तक नहीं पी थी। तभी हवेली के मुख्य दरवाज़े से एक गंभीर और भारी आवाज़ आई।

“भगवती! बस करो अब। साँस तो लेने दो मेरी बच्ची को।”

यह आवाज़ थी हवेली के मुखिया, अवनि के दादाजी ‘प्रताप सिंह राठौड़’ की। प्रताप सिंह जी अपनी सुबह की सैर से लौटे थे। सफेद धोती-कुर्ता पहने, हाथ में चाँदी की मूठ वाली छड़ी लिए जब वह आँगन में दाखिल हुए, तो उन्होंने सबसे पहले ज़मीन पर पड़ी अपनी लाडली पोती को देखा, जिसे उन्होंने अपने कंधों पर बिठाकर पूरा बचपन घुमाया था।

“आप बीच में मत बोलिए जी!” भगवती देवी ने तमक कर कहा। “आपके ही लाड-प्यार ने इसे इतना सिर चढ़ा दिया है। कॉलेज क्या पढ़ा दिया, इसे तो पर लग गए हैं। ससुराल से भागकर आई है और कहती है तलाक लेगी! आप समझाते क्यों नहीं इसे कि राठौड़ परिवार में ये सब नहीं चलता?”

प्रताप सिंह जी ने पत्नी की बातों को अनसुना कर दिया। वह धीरे-धीरे चलते हुए अवनि के पास पहुँचे। उन्होंने अपनी छड़ी नीचे रखी और अपने बुज़ुर्ग घुटनों के बल अपनी पोती के ठीक सामने बैठ गए। उन्होंने अपने काँपते हुए हाथों से अवनि का झुका हुआ चेहरा ऊपर उठाया। अपनी हँसमुख और चहकती रहने वाली पोती का वह उजड़ा हुआ रूप देखकर प्रताप सिंह जी का कलेजा मुँह को आ गया। अवनि के होंठ के कोने पर सूखे हुए खून की पपड़ी जमी थी।

“गिरिराज, खड़ा मुँह क्या देख रहा है? जा, अंदर से पानी का गिलास लेकर आ अपनी बेटी के लिए,” प्रताप सिंह जी ने बेटे को डपटते हुए कहा और फिर बेहद कोमल स्वर में अवनि से बोले, “अवनि बेटा… मेरी तरफ देख। मैं हूँ न तेरा दादा। किसी से डरने की ज़रूरत नहीं है। मुझे खुलकर बता गुड़िया, वहाँ क्या हुआ? क्यों छोड़ना चाहती है तू उस घर को?”

दादाजी के स्वर में वह अपनापन और सुरक्षा थी, जिसे पाने के लिए अवनि पिछले पैंतीस दिनों से तड़प रही थी। उसके सब्र का बाँध टूट गया। वह दादाजी के सीने से लगकर किसी छोटे बच्चे की तरह बिलख-बिलख कर रो पड़ी।

“दादाजी… दादाजी वो इंसान नहीं है, वो एक वहशी दरिंदा है!” अवनि की सिसकियाँ पूरे आँगन में गूँज रही थीं।

उसने खुद को दादाजी से अलग किया और पागलों की तरह अपनी साड़ी की लंबी आस्तीनें ऊपर चढ़ाने लगी। उसकी कलाइयों पर सफेद रंग की पट्टियाँ बँधी थीं। अवनि ने काँपते हाथों से उन पट्टियों को नोचकर खोल दिया, और फिर अपनी साड़ी का पल्लू कंधे से थोड़ा नीचे खिसकाया।

आँगन में खड़े हर शख्स के मुँह से एक दबी हुई चीख निकल गई। शैलजा तो चक्कर खाकर वहीं ज़मीन पर बैठ गईं।

अवनि की गोरी कलाइयों, बाजुओं और कंधे पर गोल-गोल, काले और लाल रंग के दर्जनों घाव थे—जिनमें से कुछ ताजे थे और कुछ में मवाद भर गया था। वे सिगरेट और जलती हुई तीलियों से दागे जाने के निशान थे। उसकी गर्दन के नीचे नीले और बैंगनी रंग के निशान साफ बता रहे थे कि किसी ने उसे कितनी बेरहमी से दबाया था।

भगवती देवी की आँखें फटी की फटी रह गईं। उनके हाथ से रुद्राक्ष की माला छूटकर ज़मीन पर गिर गई।

अवनि ने अपनी आस्तीनें वापस नीचे नहीं कीं। उसने उन जख्मों को अपनी दादी की आँखों के सामने करते हुए, एक टूटी लेकिन बेहद तेज़ आवाज़ में कहना शुरू किया, “देखिए दादी! अपनी आँखों से देखिए उस ‘अच्छे खानदान’ के संस्कारी बेटे का सच! जिस दिन मेरी सुहागरात थी, उसी रात मुझे पता चल गया था कि विक्रांत कोई प्रॉपर्टी का काम नहीं करता, वो चरस और कोकेन का आदी है। उसके कमरे की दराजों में नशे के इंजेक्शन और गोलियाँ भरी पड़ी हैं। शादी के दूसरे ही दिन से उसने मुझे मारना शुरू कर दिया था, क्योंकि मैंने उसे नशा करने से रोकने की कोशिश की थी। उसके अपने ही फोन में दर्जनों लड़कियों के साथ उसकी गंदी तस्वीरें और वीडियो हैं। जब मैंने सवाल किया, तो उसने जलती हुई सिगरेट मेरी कलाई पर बुझा दी और कहा कि उसे सिर्फ घर की देखभाल के लिए एक नौकरानी और समाज को दिखाने के लिए एक पढ़ी-लिखी बीवी चाहिए थी।”

अवनि की साँस फूल रही थी, लेकिन आज वह रुकने वाली नहीं थी। उसने दादी की तरफ देखते हुए कहा, “फिर भी मैंने सहा दादी! आपकी और माँ की दी हुई हर सीख को याद करके मैंने अपना मुँह बंद रखा। मैं हर रात अपने जख्मों पर बर्फ लगाती और सुबह चेहरे पर मेकअप थोपकर मुस्कुराते हुए अपनी सास के लिए चाय बनाती। जब मैंने अपनी सास को विक्रांत की हरकतों के बारे में बताया, तो उन्होंने उल्टा मुझे ही तमाचा जड़ दिया और कहा कि अमीर घरों के लड़कों में ऐसे शौक होते ही हैं, तुझे अपने पति को खुश रखना नहीं आता। मैं सब चुपचाप झेल रही थी दादी… सिर्फ इसलिए ताकि इस हवेली की इज़्ज़त पर कोई आँच न आए, ताकि मेरे बाबूजी को समाज में सिर न झुकाना पड़े।”

प्रताप सिंह जी की आँखों से आँसू बहकर उनकी सफेद मूँछों में समा रहे थे। उनकी मुट्ठियाँ गुस्से से भिंच गई थीं। “फिर… फिर कल रात क्या हुआ बेटा?” उन्होंने रुँधे गले से पूछा।

अवनि का शरीर एक बार फिर काँप उठा। उस खौफ़नाक मंजर को याद करके उसकी रूह सिहर गई।

“कल… कल रात वो अपने तीन दोस्तों को घर लेकर आया था दादाजी,” अवनि की आवाज़ काँप रही थी। “उन्होंने बैठक में बैठकर खूब शराब पी और ड्रग्स लिया। रात के दो बजे विक्रांत मेरे कमरे में आया। उसने मुझे बालों से घसीटकर उठाया और कहा कि… कि उसने जुए में अपने दोस्तों से बीस लाख रुपये हार दिए हैं… और… और उस कर्ज़ को चुकाने के लिए उसने मुझे… अपनी बीवी को एक रात के लिए अपने उन तीनों दोस्तों के हवाले करने का सौदा कर लिया है!”

“हे भगवान!” शैलजा ने अपने कानों पर हाथ रख लिए। गिरिराज का चेहरा शर्म और गुस्से से लाल पड़ गया।

“उसने मेरे कपड़े फाड़ने की कोशिश की दादाजी!” अवनि चीखते हुए बोली। “उसने कहा—’जा, मेरे दोस्तों को खुश कर, नहीं तो तेरे बाप-भाई को किसी झूठे केस में फँसाकर जेल में सड़ा दूँगा।’ दादी… आप बताइए, क्या तब भी मुझे समझौता कर लेना चाहिए था? क्या खानदान की इज़्ज़त बचाने के लिए मुझे अपनी आबरू उन दरिंदों के आगे नीलाम कर देनी चाहिए थी? मैं यह नहीं कर सकी दादाजी! मैंने पास रखा फूलदान उसके सिर पर मारा और जब वो लहूलुहान होकर गिरा, तो मैं नंगे पैर, अंधेरे में वहाँ से भाग निकली। मैं पूरी रात रेलवे स्टेशन के एक कोने में छिपकर बैठी रही और सुबह की पहली बस पकड़कर यहाँ आई हूँ… यह सोचकर कि मेरा परिवार मुझे बचा लेगा। पर यहाँ आकर पता चला कि मेरे जिंदा रहने से ज़्यादा ज़रूरी इस हवेली की झूठी शान है!”

इतना कहकर अवनि ज़मीन पर गिर पड़ी और सुबकने लगी।

पूरे आँगन में श्मशान जैसा सन्नाटा पसर गया था। नीम के पेड़ पर बैठे परिंदे भी जैसे खामोश हो गए थे। भगवती देवी का सिर शर्म से झुक गया था। उनके पास अब अपनी पोती की बात का कोई जवाब नहीं था। जिस समाज और लोक-लाज की दुहाई वह दे रही थीं, वह समाज उनकी पोती की आबरू लुटने से बचाने नहीं आया था।

तभी प्रताप सिंह जी उठे। अस्सी साल के उस बुज़ुर्ग की रीढ़ आज फिर से किसी पच्चीस साल के नौजवान की तरह तन गई थी। उन्होंने झुककर अवनि को अपने मज़बूत हाथों से सहारा देकर उठाया और अपने सीने से लगा लिया।

“तूने बिल्कुल सही किया मेरी बच्ची! मुझे तुझ पर गर्व है कि तूने अपने स्वाभिमान के साथ समझौता नहीं किया,” प्रताप सिंह जी की आवाज़ में चट्टान जैसी मज़बूती थी। उन्होंने अपनी पत्नी भगवती देवी की तरफ एक तीखी और शोले बरसाती नज़र डाली।

“सुन लो भगवती, और इस घर का हर सदस्य कान खोलकर सुन ले!” प्रताप सिंह जी की आवाज़ हवेली की दीवारों से टकराकर गूँज उठी। “अपनी बेटी को ऐसे वहशी जानवर और नरक से आज़ाद करवाने से किसी खानदान पर धब्बा नहीं लगता! धब्बा तब लगता है, जब हम समाज के डर से अपनी ही फूल-सी बेटियों को जलती हुई भट्टी में झोंक देते हैं और बाहर खड़े होकर संस्कारी होने का ढोंग करते हैं। भाड़ में जाए ऐसी दुनिया और भाड़ में जाए वो समाज, जो एक औरत की चीखों से ज़्यादा उसके माथे के सिंदूर को अहमियत देता है! मुझे किसी की कोई परवाह नहीं है। एक परिवार की असली आन-बान और शान उसकी बेटियों की मुस्कुराहट और उनकी सलामती से होती है, ऐसे खोखले और सड़े हुए रिश्तों की लाश ढोने से नहीं!”

प्रताप सिंह जी की नज़र कोने में खड़ी अपनी बेटी निर्मला पर पड़ी, जो अपनी भतीजी के जख्मों को देखकर अपने बाईस साल पुराने जख्मों को याद कर रही थी और चुपचाप रो रही थी। प्रताप सिंह जी का गला भर आया। वह चलते हुए निर्मला के पास गए और उसके सिर पर हाथ रखकर अपने हाथ जोड़ लिए।

“मुझे माफ़ कर दे निर्मला बेटा,” प्रताप सिंह जी की आवाज़ टूट गई। “आज से बाईस साल पहले मैं एक कायर बाप था। तेरी माँ की बातों में आकर और समाज के चार लोगों के डर से मैंने तुझे उस शराबी के पास वापस भेज दिया था। तेरे बाईस साल के हर आँसू का गुनहगार मैं हूँ। काश! काश मैंने उस वक्त अपनी झूठी मूँछों का ताव छोड़कर तेरे दर्द को समझा होता, तो आज मेरी बेटी यूँ घुट-घुट कर जिंदा लाश की तरह न जी रही होती। पर अब और नहीं… मैंने एक बेटी की ज़िंदगी बर्बाद होने दी, पर अपनी पोती की नहीं होने दूँगा। और निर्मला, आज के बाद तू भी उस नरक में वापस नहीं जाएगी। यह हवेली जितनी तेरे भाइयों की है, उतनी ही तेरी और अवनि की भी है।”

यह सुनकर निर्मला बुआ अपने पिता के पैरों से लिपटकर फूट-फूटकर रो पड़ीं। बाईस सालों से उनके सीने में जो पत्थर रखा था, वह आज पिघलकर बह गया था। वहीं तख्त के पास खड़ी भगवती देवी की आँखों से भी पश्चाताप के आँसू बह निकले। वह धीरे से चलकर अवनि के पास आईं, अपने पल्लू से उसके आँसू पोंछे और काँपती आवाज़ में बोलीं, “मुझे माफ़ कर दे मेरी बच्ची… अंधी हो गई थी मैं रीति-रिवाजों के घमंड में। तेरे दादाजी सही कह रहे हैं। तू कहीं नहीं जाएगी।”

उसी शाम को हवेली के दरवाज़े पर दो बड़ी गाड़ियाँ आकर रुकीं। विक्रांत अपने सिर पर पट्टी बाँधे, अपने पिता और चार गुंडों के साथ अवनि को वापस ले जाने और राठौड़ परिवार को धमकाने आया था। उसने सोचा था कि तलाक और बदनामी के डर से लड़की वाले उसके पैरों में गिरकर माफ़ी माँगेंगे।

लेकिन जैसे ही विक्रांत ने हवेली के आँगन में कदम रखा, उसने देखा कि वहाँ पहले से ही पुलिस इंस्पेक्टर अपनी पूरी टीम और महिला आयोग की अधिकारियों के साथ मौजूद थे। प्रताप सिंह जी ने दोपहर में ही अपने वकील और पुलिस को बुलाकर अवनि का मेडिकल करवाया था और विक्रांत व उसके परिवार के खिलाफ घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न, ड्रग्स रखने और देह व्यापार के लिए मजबूर करने की संगीन धाराओं में एफआईआर (FIR) दर्ज करवा दी थी।

जब पुलिस ने विक्रांत के हाथों में हथकड़ी पहनाई, तो उसके पिता ने प्रताप सिंह जी से कहा, “ठाकुर साहब, ये क्या कर रहे हैं आप? कोर्ट-कचहरी होगी तो आपकी पोती का ही नाम उछलेगा, उससे फिर कोई शादी नहीं करेगा!”

तब अवनि खुद आगे आई। उसने अब वह फटी हुई लाल साड़ी उतार दी थी और एक सादा सूट पहन रखा था। उसकी आँखों में अब डर नहीं, बल्कि एक नई आग थी।

“मेरी शादी की चिंता आप मत कीजिए,” अवनि ने निडर होकर कहा। “बदनामी उस लड़की की नहीं होती जो ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाती है, बदनामी तो उन घरों की होती है जो ऐसे दरिंदों को पालते हैं। अब फैसला समाज की पंचायत में नहीं, कानून की अदालत में होगा।”

पुलिस विक्रांत को घसीटते हुए ले गई। हवेली के बाहर मोहल्ले के लोगों की भीड़ जमा थी, कुछ लोग कानाफूसी कर रहे थे, तो कुछ लोग प्रताप सिंह जी के इस कदम की सराहना कर रहे थे। पर राठौड़ परिवार को अब किसी की फुसफुसाहट से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था।

वक्त बीतता गया। यह लड़ाई आसान नहीं थी, लेकिन जब पूरा परिवार ढाल बनकर साथ खड़ा हो, तो हर जंग जीती जा सकती है। दो साल के भीतर फास्ट-ट्रैक कोर्ट ने विक्रांत और उसके दोस्तों को कड़ी सज़ा सुनाई और अवनि को कानूनी रूप से तलाक मिल गया।

प्रताप सिंह जी ने केवल अवनि को आज़ादी ही नहीं दिलाई, बल्कि उसके टूटे हुए सपनों को फिर से पंख भी दिए। अवनि पढ़ने में हमेशा से होशियार थी। दादाजी की प्रेरणा से उसने अपनी वकालत (LLB) की पढ़ाई शुरू की। उधर निर्मला बुआ को भी उनके शराबी पति से छुटकारा दिलाया गया। निर्मला बुआ के हाथों में राजस्थानी कढ़ाई और सिलाई का अद्भुत हुनर था। गिरिराज और प्रताप सिंह जी ने हवेली के निचले हिस्से में बुआ के लिए एक बुटीक खुलवा दिया, जहाँ उन्होंने अपने जैसी कई बेसहारा और पीड़ित महिलाओं को रोज़गार देना शुरू किया।

आज उस घटना को पाँच साल बीत चुके हैं। अजमेर की उसी हवेली के बाहर की पीतल की नेमप्लेट आज भी चमकती है, लेकिन अब उसके नीचे एक और तख्ती लगी है— ‘एडवोकेट अवनि राठौड़ (महिला अधिकार एवं पारिवारिक मामलों की वकील)’। अवनि अब तक सैकड़ों ऐसी लड़कियों को न्याय दिला चुकी है, जिन्हें समाज की झूठी इज़्ज़त के नाम पर चुप करा दिया जाता था।

आज शाम जब अवनि कोर्ट से केस जीतकर अपनी काली कोट पहने हवेली के आँगन में दाखिल हुई, तो नीम के पेड़ के नीचे बैठे दादाजी और दादी के चेहरे गर्व से खिल उठे। हवेली पर कोई धब्बा नहीं लगा था, बल्कि अवनि और निर्मला की खुली हँसी ने उस पुरानी हवेली के हर कोने को एक नई और पवित्र रोशनी से भर दिया था।

एक सवाल आप सभी पाठकों से:

क्या आपको भी लगता है कि आज भी हमारे समाज में ‘लोग क्या कहेंगे’ के डर से कई बेटियों को नर्क जैसी शादी में घुटने के लिए मजबूर किया जाता है? अवनि के दादाजी ‘प्रताप सिंह’ के इस फैसले पर आपकी क्या राय है? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें, आपकी एक राय किसी की सोच बदल सकती है!

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