अनकहे स्वाद

 रीता आगे बोलती गई, “भैया, अम्मा की जीभ चटोरी नहीं है, उनकी आत्मा प्यासी है! सत्तर साल से वह औरत सिर्फ दूसरों की थालियाँ भरती रही और खुद झूठे बहाने बनाकर भूखी सोती रही। आज जब उन्हें लगा कि अब वो अपने बेटे के भरे-पूरे घर में थोड़ा सा सुख भोग सकती हैं, तो डॉक्टर के परहेज़ से ज्यादा तुम्हारे उस एक ताने ने उन्हें मार डाला। जाकर देखो उनके कमरे में, सुबह से उन्होंने पानी की एक बूँद तक नहीं पी है!”

“डॉक्टर सिन्हा, अम्मा की रिपोर्ट्स में कुछ गंभीर तो नहीं है न? कल रात से उन्हें बेचैनी हो रही थी।” आलोक ने चश्मा ठीक करते हुए डॉक्टर के केबिन में बैठकर पूछा।

प्रयागराज के एक प्रतिष्ठित अस्पताल में बैठे डॉक्टर सिन्हा ने फाइल पर नज़र दौड़ाई और मुस्कुराते हुए कहा, “घबराने की बिल्कुल बात नहीं है आलोक जी। उम्र के इस पड़ाव पर थोड़ा-बहुत ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल बढ़ना आम बात है। बस, अब अम्मा जी को अपने खान-पान में थोड़ा सख्त परहेज़ करना होगा। तला-भुना, ज्यादा घी-तेल और खासकर मिठाइयों से तो बिल्कुल तौबा करनी होगी। एकदम सादा, उबला या कम मसाले का खाना ही इनके लिए अमृत है।”

आलोक ने राहत की सांस ली और बाहर आकर अपनी पत्नी नीलिमा और माँ शारदा देवी को देखा। घर लौटते ही आलोक ने जूते उतारते हुए नीलिमा को हिदायत दी, “नीलिमा, सुन लिया न डॉक्टर ने क्या कहा? आज से अम्मा का खाना अलग बनेगा। बिना छौंक की दाल और उबली सब्जियाँ। और हाँ, फ्रिज में जो रसमलाई और गाजर का हलवा रखा है, उसे थोड़ा छिपाकर ऊपर वाले खाने में रखना। अम्मा की उम्र तो सत्तर पार हो गई है, लेकिन उनकी इस ‘चटोरी जीभ’ पर आज भी काबू नहीं है। कल ही मैंने उन्हें छुपकर मीठे का डिब्बा खोलते देखा था। बुढ़ापे में यह स्वाद का लालच हमें अस्पताल के चक्कर लगवाएगा।”

इतना कहकर आलोक तो अपना बैग उठाकर दफ्तर निकल गया, लेकिन उसके शब्द तीर की तरह शारदा देवी के सीने में उतर गए।

‘चटोरी जीभ!’

बरामदे के तख्त पर बैठी शारदा देवी पथराई आँखों से आँगन की तरफ देखती रहीं। उनके कानों में बार-बार यही दो शब्द गूँज रहे थे। क्या सच में उनकी जीभ चटोरी थी? या फिर यह उन सत्तर सालों के सूनेपन की एक छोटी सी हसरत थी, जिसे उनके अपने ही बेटे ने लालच का नाम दे दिया था? शारदा देवी ने अपनी झुर्रियों भरी हथेलियों को देखा, जिनमें से आज भी हल्दी और चौके-बर्तन की गंध आती थी। उनकी आँखों के आगे अतीत के पन्ने फड़फड़ाने लगे।

शारदा जब महज सात बरस की थीं, तब अकाल में उनके पिता गुजर गए थे। माँ ने किसी तरह सिलाई-कढ़ाई करके उन्हें और उनके दो छोटे भाइयों को पाला। घर में गरीबी का यह आलम था कि त्योहार के दिन भी गुड़ की डली को चार हिस्सों में बाँटा जाता था। शारदा सबसे बड़ी थीं, इसलिए माँ हमेशा कहतीं, “बिटिया, तू तो समझदार है, छोटे भाइयों को खा लेने दे, लड़की की जात को तो वैसे भी सब्र करना सीखना पड़ता है।”

नन्हीं शारदा अपने हिस्से का गुड़ और दूध की मलाई छोटे भाइयों की कटोरी में डाल देतीं। जब भी पड़ोस के घर से देसी घी के हलवे की खुशबू आती, शारदा अपनी फ्रॉक का कोना मुँह में दबाकर अपनी लार निगल जातीं। तभी से उन्होंने अपने मन को मारना सीख लिया था।

सोलह की उम्र होते-होते माँ ने अपनी जिम्मेदारियों का बोझ हल्का करने के लिए मेरठ के एक साधारण से संयुक्त परिवार में उनका ब्याह कर दिया। पति केदारनाथ जी डाकघर में क्लर्क थे। वेतन सीमित था और परिवार बड़ा। घर में बूढ़े सास-ससुर, तीन देवर और दो ननदें थीं। शारदा इस घर की सबसे बड़ी बहू बनकर आई थीं, और बड़ी बहू का मतलब होता है—त्याग की प्रतिमूर्ति।

ससुराल की रसोई में जब शारदा पहली बार गईं, तो उन्हें लगा कि शायद यहाँ उनके बचपन की अधूरी इच्छाएँ पूरी होंगी। पर गृहस्थी का गणित बड़ा निर्मम होता है। सुबह से रात तक शारदा चूल्हे के आगे तपतीं। जब गरमा-गरम पूड़ियाँ और खीर बनती, तो पहले ससुर जी, फिर पति, देवर और ननदों की थाली सजती। अंत में जब शारदा और उनकी सास खाने बैठतीं, तो पतीले की तली में खुरचन ही बचती थी।

एक बार करवा चौथ के दिन घर में इमरती आई थी। शारदा का मन हुआ कि एक पूरी इमरती खाएँ। पर जब ननद ने अपनी सहेली के लिए दो इमरतियाँ मांग लीं, तो शारदा ने अपने हिस्से की मिठाई खुशी-खुशी थाली से उठाकर ननद को दे दी और खुद पानी पीकर व्रत खोल लिया। उन्होंने सोचा— “अभी तो पूरी उम्र पड़ी है, देवर-ननद अपने घर के हो जाएँ, फिर आराम से खाऊँगी।”

वक्त बीतता गया। देवरों की शादियाँ हुईं, ननदें विदा हो गईं। घर का बँटवारा हुआ तो शारदा और केदारनाथ जी के हिस्से में अपनी छोटी सी गृहस्थी आई। पर तब तक आलोक और उसकी बहन रीता का जन्म हो चुका था। अब शारदा की दुनिया उन दोनों बच्चों के इर्द-गिर्द घूमने लगी।

केदारनाथ जी की तनख्वाह बच्चों की फीस और घर के खर्च में ही सिमट जाती थी। जब बाजार से एक किलो आम आते, तो शारदा उसकी फांकें काटकर आलोक और रीता को खिलातीं और खुद गुठलियाँ चूसकर कहतीं, “अरे, मुझे तो गुठली का ही स्वाद सबसे अच्छा लगता है, फांकों में वो मज़ा कहाँ!”

आलोक को गाजर का हलवा और रसमलाई बहुत पसंद थी। शारदा घंटों खड़े होकर दूध का खोया बनातीं, हलवा तैयार करतीं। जब आलोक कहता, “अम्मा, तुम भी खाओ न,” तो शारदा हँसकर टाल देतीं, “बेटा, बनाते-बनाते इसकी भाप से ही मेरा पेट भर गया। मेरा क्या है, मुझे तो मीठा वैसे भी कम भाता है।”

यह सफेद झूठ बोलते-बोलते शारदा के बाल काले से सफेद हो गए। उन्हें हमेशा लगता कि जब आलोक कमाने लगेगा, रीता ससुराल चली जाएगी, तब वह और केदारनाथ जी बैठकर अपनी पसंद का खाएँगे।

आखिर वह दिन भी आया। आलोक की अच्छी नौकरी लग गई, रीता का ब्याह हो गया। आलोक अपने काम के सिलसिले में प्रयागराज चला गया और मेरठ के पुराने घर में रह गए सिर्फ दो प्राणी—शारदा और केदारनाथ। जिस दिन रीता की विदाई के बाद घर शांत हुआ, केदारनाथ जी बाजार से गरमा-गरम जलेबियाँ और रबड़ी लेकर आए थे। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा था, “शारदा, आज तुम्हें कोई बहाना नहीं बनाने दूँगा। पूरी जिंदगी तुमने सबके लिए अपनी इच्छाएँ मारी हैं, अब हमारे दिन हैं।”

शारदा की आँखों में खुशी के आँसू आ गए थे। उन्होंने पहली बार जी भरकर जलेबी खाई थी। लेकिन नियति को यह सुख भी रास नहीं आया। ठीक एक महीने बाद केदारनाथ जी को चक्कर आया और जांच में पता चला कि उन्हें गंभीर डायबिटीज और हृदय रोग है। डॉक्टर ने सख्त हिदायत दी—घर में चीनी, आलू, चावल और घी का प्रवेश पूरी तरह बंद।

शारदा देवी के सपनों पर एक बार फिर तुषारापात हो गया। जिस पति के साथ बैठकर वह अपने जीवन के बचे-खुचे स्वाद चखना चाहती थीं, अब उसी पति की लंबी उम्र के लिए उन्हें रसोई का नक्शा बदलना पड़ा। भला यह कैसे हो सकता था कि पति उबली लौकी खाएँ और शारदा उनके सामने बैठकर मिठाई या पराठे खाएँ?

शारदा ने उसी दिन से चीनी का डिब्बा रसोई के सबसे ऊँचे ताक पर रख दिया। उन्होंने भी केदारनाथ जी के साथ फीकी चाय पीनी शुरू कर दी। केदारनाथ जी अक्सर कहते, “शारदा, तुम क्यों अपनी जीभ को सज़ा दे रही हो? अपने लिए अलग से मीठा बना लिया करो।”

शारदा मुस्कुराकर कहतीं, “आपकी सेहत से बढ़कर मेरे लिए कोई स्वाद नहीं है जी।”

पंद्रह साल तक शारदा ने अपने पति का साथ देते हुए बिना नमक-मसाले और बिना चीनी का जीवन जिया। तीन साल पहले केदारनाथ जी उन्हें अकेला छोड़कर इस दुनिया से विदा हो गए। पति के जाने के बाद तो शारदा जैसे जिंदा लाश बन गई थीं। अकेलेपन ने उन्हें इस कदर घेरा कि भूख-प्यास ही मर गई। भरा पूरा घर काटने को दौड़ता था।

तब आलोक और नीलिमा उन्हें अपने साथ प्रयागराज ले आए। यहाँ आकर जब शारदा ने अपने पोते-पोती को चहकते देखा, नीलिमा के हाथों से सजी रसोई देखी, तो उनके भीतर सूख चुकी जीवन की डाली पर फिर से एक नन्हीं सी कोंपल फूटी।

कल शाम जब फ्रिज में रसमलाई का डिब्बा रखा था, तो शारदा देवी को अचानक अपने बचपन, जवानी और बुढ़ापे के वो सारे त्याग याद आ गए। उनके मन में एक मासूम सी इच्छा जागी— “अब तो न बच्चों की पढ़ाई का खर्च है, न पति के परहेज़ की मजबूरी। क्या आज मैं अपने मन से एक रसमलाई नहीं खा सकती?”

बस, यही सोचकर उन्होंने काँपते हाथों से डिब्बा खोला था, और तभी आलोक की नज़र उन पर पड़ गई थी। और आज… आज डॉक्टर के परहेज़ और बेटे के ‘चटोरी जीभ’ वाले ताने ने उनके जीवन की आखिरी इच्छा पर भी कफ़न डाल दिया था।

दोपहर को जब नीलिमा उनके कमरे में उबली हुई मूंग की दाल और दो सूखी रोटियाँ लेकर आई, तो शारदा देवी ने बिना कुछ कहे थाली सरका दी। “मुझे भूख नहीं है बहू, तुम रख दो,” उनकी आवाज़ में गहरा सूनापन था।

नीलिमा कोई साधारण बहू नहीं थी, वह एक संवेदनशील और पढ़ी-लिखी स्त्री थी। सुबह जब आलोक ने ‘चटोरी जीभ’ वाला ताना मारा था, तब भी नीलिमा को बहुत बुरा लगा था। उसने देखा था कि अम्मा की आँखों के कोने भीग गए थे। नीलिमा ने थाली मेज पर रखी और शारदा देवी के पास तख्त पर बैठ गई। उसने उनके ठंडे हाथों को अपने हाथों में लिया और धीरे से पूछा, “अम्मा, आलोक की बात का बुरा मान गईं न आप?”

शारदा देवी ने चेहरा घुमा लिया, पर एक गर्म आँसू उनकी झुर्रियों से फिसलकर नीलिमा की हथेली पर गिर पड़ा।

“नहीं बहू, वो गलत थोड़े ही कह रहा है। बुढ़ापे में जब राम नाम जपने की उम्र है, तब मेरा मन खाने-पीने में भटक रहा है। मैं वाकई चटोरी हो गई हूँ,” शारदा देवी का गला भर आया।

उसी शाम घर में आलोक की बहन रीता आई हुई थी। जब नीलिमा ने रीता को सुबह की बात बताई, तो रीता की आँखें छलक पड़ीं। शाम को जब आलोक दफ्तर से लौटा और चाय की चुस्कियाँ ले रहा था, तब रीता उसके पास बैठी और गंभीर स्वर में बोली, “भैया, आज तुमने अम्मा को ‘चटोरी’ कहा? क्या तुम्हें पता भी है कि जिस माँ को तुम आज स्वाद का लालची कह रहे हो, उसने आखिरी बार अपनी पसंद का खाना कब खाया था?”

आलोक ने अचरज से देखा, “अरे रीता, मैंने तो बस उनकी सेहत के लिए कहा था…”

“सेहत की चिंता करने और अपमान करने में फर्क होता है भैया!” रीता की आवाज़ काँप रही थी। “तुम्हें याद है जब हम छोटे थे और घर में पनीर बनता था? अम्मा हमेशा कहती थीं कि उन्हें पनीर से एलर्जी है, और वो सिर्फ तरी से रोटी खा लेती थीं ताकि तुम्हें और मुझे पनीर के ज्यादा टुकड़े मिल सकें। तुम्हें याद है भैया, जब तुम्हारी इंजीनियरिंग की फीस भरनी थी, तो अम्मा ने पूरे दो साल तक अपने लिए दूध मँगाना बंद कर दिया था और काली चाय पीती थीं, यह कहकर कि दूध से उन्हें गैस बनती है? और बाबूजी की बीमारी के पंद्रह सालों में उन्होंने एक दाना चीनी नहीं छुई, सिर्फ इसलिए ताकि बाबूजी का मन न ललचाए!”

आलोक के हाथ में पकड़ा चाय का कप काँपने लगा। नीलिमा रसोई के दरवाजे पर खड़ी होकर यह सब सुन रही थी और उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

रीता आगे बोलती गई, “भैया, अम्मा की जीभ चटोरी नहीं है, उनकी आत्मा प्यासी है! सत्तर साल से वह औरत सिर्फ दूसरों की थालियाँ भरती रही और खुद झूठे बहाने बनाकर भूखी सोती रही। आज जब उन्हें लगा कि अब वो अपने बेटे के भरे-पूरे घर में थोड़ा सा सुख भोग सकती हैं, तो डॉक्टर के परहेज़ से ज्यादा तुम्हारे उस एक ताने ने उन्हें मार डाला। जाकर देखो उनके कमरे में, सुबह से उन्होंने पानी की एक बूँद तक नहीं पी है!”

आलोक के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसके सामने बचपन से लेकर आज तक के सारे दृश्य घूम गए—अम्मा का गुठलियाँ चूसना, अम्मा का खुरचन खाना, अम्मा का फीकी चाय पीना। उसे अपने शब्दों पर इतनी ग्लानि हुई कि उसका सिर शर्म से झुक गया।

आलोक और नीलिमा तुरंत एक-दूसरे की तरफ देखे। नीलिमा ने तुरंत अपने फोन से एक परिचित सीनियर डाइटिशियन और डॉक्टर को फोन लगाया और अम्मा की रिपोर्ट्स भेजकर विस्तार से बात की। इसके बाद नीलिमा रसोई में गई और आलोक बाजार की तरफ भागा।

रात के आठ बजे थे। शारदा देवी अंधेरे कमरे में करवट लिए लेटी थीं और मन ही मन भगवान से प्रार्थना कर रही थीं कि अब उन्हें इस दुनिया से उठा ले, जहाँ इंसान की छोटी सी इच्छा भी बोझ बन जाती है। तभी कमरे की लाइट जली।

शारदा देवी ने आँखें खोलीं तो देखा—आलोक अपने हाथों में एक सुंदर सी थाली लिए खड़ा था, और पीछे नीलिमा और रीता मुस्कुरा रहे थे।

आलोक ने थाली तख्त पर रखी और सीधा अपनी माँ के चरणों में सिर रखकर फूट-फूटकर रो पड़ा। “मुझे माफ कर दो अम्मा! मैं कितना अंधा और स्वार्थी बेटा हूँ। जिस माँ ने मेरे मुँह का स्वाद बनाए रखने के लिए अपनी पूरी जिंदगी बेस्वाद कर ली, मैंने उसी माँ को ऐसी घटिया बात कह दी। मुझे पाप लगेगा अम्मा, मुझे माफ कर दो!”

शारदा देवी तड़पकर उठीं और बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं, “अरे पगले, ये क्या कर रहा है? माँ कभी बेटे से नाराज होती है क्या? उठ, ऊपर उठ।”

नीलिमा ने आगे बढ़कर थाली का कपड़ा हटाया। थाली में देखकर शारदा देवी की आँखें फटी की फटी रह गईं। थाली में केसरिया रंग की रसमलाई थी, मूंग दाल का हलवा था, और साथ में कुरकुरी मिस्सी रोटी और पनीर की सब्जी थी।

“बहू, ये सब क्या है? डॉक्टर ने तो मना किया है न…” शारदा देवी ने घबराकर कहा।

नीलिमा ने प्यार से अम्मा के गाल को छूते हुए कहा, “अम्मा, डॉक्टर ने चीनी और ज्यादा तेल-घी मना किया है, स्वाद थोड़ी मना किया है! मैंने डॉक्टर से बात कर ली है। ये रसमलाई गाय के स्किम्ड दूध और ‘स्टीविया’ यानी बिना शुगर वाली प्राकृतिक मिठास से मैंने खुद घर पर बनाई है। और इस हलवे में देसी घी की जगह बादाम का दूध और खजूर की मिठास है। इसमें न कोलेस्ट्रॉल है, न शुगर। अब मेरी अम्मा को अपनी किसी भी इच्छा को मारने की जरूरत नहीं है। अब से इस रसोई में सबसे पहले आपकी पसंद का, आपकी सेहत के अनुकूल स्वादिष्ट खाना बनेगा!”

आलोक ने अपने हाथों से रसमलाई का एक टुकड़ा तोड़ा और माँ के मुँह के पास ले जाते हुए रुँधे गले से बोला, “अम्मा, आज यह कहकर टालना मत कि तुम्हारा पेट भाप से भर गया है। आज अपने इस नादान बेटे के हाथों से खा लो।”

शारदा देवी की आँखों से गंगा-यमुना बह निकलीं। सत्तर सालों का बांध आज टूट गया था। जैसे ही उन्होंने वह पहला निवाला मुँह में रखा, उन्हें लगा कि जीवन भर की सारी कड़वाहट और सूनापन उस एक मीठे निवाले में घुलकर समाप्त हो गया है। वह मिठास सिर्फ रसमलाई की नहीं थी, वह बेटे के पश्चाताप और बहू के अपनेपन की मिठास थी। आज सच में शारदा देवी की वर्षों पुरानी भूख शांत हो गई थी।

दोस्तों, हमारे घरों में भी हमारी माँ, दादी या नानी ऐसी ही कितनी इच्छाओं को अपने आँचल की गाँठ में बाँधकर चुपचाप जी रही होती हैं। क्या आपने कभी अपनी माँ से पूछा है कि “माँ, आज तुम्हारा क्या खाने का मन है?” इस कहानी को पढ़ने के बाद आपके मन में अपनी माँ के किस त्याग की याद आई? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी भावनाएँ ज़रूर साझा करें।

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 मूल लेखिका : विभा गुप्ता

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