“नाप ले नीरज, इस नीम के पेड़ से लेकर उस तुलसी के चौरे तक का हिस्सा आज से तेरा हुआ, और पूरब के वो दो कमरे मेरे। और हाँ, कल सुबह होते ही राजमिस्त्री आ जाएगा, इस आंगन के ठीक बीचों-बीच आठ फीट ऊँची पक्की दीवार उठ जाएगी। अब यह रोज-रोज का क्लेश और ताने-उलाहने मेरे बर्दाश्त के बाहर हैं। रसोई के मसालों के डिब्बों से लेकर तिजोरी के कागजात तक, सब कुछ आज ही तराजू में तौल कर आधा-आधा कर लेते हैं, ताकि कल को शहर की पंचायत में कोई यह उंगली न उठा सके कि बड़े भाई केशव ने अपने छोटे भाई का हक मार लिया।”
केशव की आवाज में क्रोध से ज्यादा एक रूखापन था, जो पिछले कई महीनों की कड़वाहट से पक कर अब पत्थर हो चुका था। आंगन के दूसरे छोर पर खड़े नीरज ने अपने हाथ में पकड़ी लोहे की जरीब (मापने का फीता) को जमीन पर पटक दिया और कड़वे स्वर में बोला, “रहने दीजिए भैया, बड़े होने का यह झूठा बड़प्पन अब अपने पास ही रखिए। इस घर में छोटा होने की सजा मैं पिछले पाँच सालों से भुगत रहा हूँ। दफ्तर से थक कर आओ तो दरवाजे पर शांति की जगह तानों की बौछार मिलती है। सच तो यह है कि हम दोनों का एक छत के नीचे रहना अब नासूर बन चुका है, और इस नासूर का इलाज सिर्फ और सिर्फ बंटवारा है।”
प्रयागराज के एक पुराने मोहल्ले में स्थित यह दो-मंजिला पुश्तैनी मकान, जिसे कभी बाबू हरिहर प्रसाद ने अपनी गाढ़ी कमाई और खून-पसीने से सींचा था, आज अपने ही वारिसों के हाथों टुकड़ों में बंटने जा रहा था। हरिहर बाबू को गुजरे हुए आठ बरस बीत चुके थे। जब तक वे जीवित थे, उनकी रौबदार आवाज और अनुशासन की डोर ने पूरे परिवार को एक माला में पिरोए रखा था। लेकिन उनके जाने के बाद जैसे उस माला का धागा ही टूट गया। केशव की पत्नी शोभा और नीरज की पत्नी मालती के बीच शुरू हुई छोटी-छोटी नोकझोंक ने कब महाभारत का रूप ले लिया, किसी को पता ही नहीं चला। कभी बच्चों के खिलौनों को लेकर, कभी बिजली के बिल और राशन के खर्च को लेकर, तो कभी इस बात पर कि किसने रसोई में दो रोटियां ज्यादा सेंक लीं—घर का वातावरण हर समय बारूद के ढेर जैसा सुलगता रहता था।
इस पूरे कोलाहल के बीच, बरामदे के एक कोने में रखी पुरानी, चरमराती हुई बेंत की कुर्सी पर अड़सठ वर्षीय गायत्री देवी किसी बेजान तस्वीर की तरह बैठी थीं। सफेद सूती साड़ी का पल्लू उनके सिर से खिसक कर कंधे पर आ गया था, और उनकी धुंधली आंखों के मोटे चश्मे के पीछे से आंसुओं की एक सूखी लकीर गालों की झुर्रियों में कहीं खो गई थी। पति के जाने के बाद से ही इस घर में उनकी हैसियत किसी पुराने, जंग लगे संदूक जैसी हो गई थी, जिसे न तो कोई खोलना चाहता था और न ही किसी को उसकी जरूरत थी, बस लोक-लाज के डर से उसे घर के एक कोने में पड़ा रहने दिया गया था।
दोनों बहुओं में से जिस किसी का मूड ठीक होता, वह गायत्री देवी की थाली में दो सूखी रोटियां और थोड़ी सी दाल परोस देती। और जिस दिन घर में दोनों देवरानी-जेठानी के बीच वाकयुद्ध छिड़ जाता, उस दिन गायत्री देवी के हिस्से में केवल ठंडा पानी और सन्नाटा ही आता। वे चुपचाप अपनी कोठरी में जाकर सो जातीं, मानो भूख तो उनकी उम्र के साथ ही मर चुकी हो।
आज रविवार का दिन था, और सुबह से ही आंगन में घर का सारा सामान निकाल कर ढेर लगा दिया गया था। पीतल के पुराने हंडे, फूल के कटोरे, दादाजी के जमाने की दीवार घड़ी, सिलाई मशीन, यहाँ तक कि आंगन में सूख रहे अचार के मर्तबान भी दो कतारों में रख दिए गए थे। शोभा और मालती अपने-अपने पल्लू कमर में खोंसे, बाज जैसी तीखी नजरों से एक-एक चम्मच और कटोरी की गिनती कर रही थीं। दोनों के चेहरों पर एक अजीब सी तसल्ली और लालच का भाव था, कि कहीं दूसरे के हिस्से में एक तांबे का लोटा भी फालतू न चला जाए।
दोपहर ढलते-ढलते घर का कोना-कोना खाली कर के आंगन में दो बराबर के ढेर लगा दिए गए। पसीने से तर-बतर केशव और नीरज ने जब अपने-अपने हिस्से के सामान की पर्चियां मिलाईं, तो दोनों के चेहरों पर एक ठंडी संतुष्टि उभरी। अब आंगन में बांटने के लिए न कोई तिनका बचा था, न कोई बर्तन। तभी अचानक केशव की नजर बरामदे के खंभे के सहारे टिकी अपनी माँ गायत्री देवी पर पड़ी, जिनके पास उनकी दो पुरानी साड़ियों की एक छोटी सी पोटली और दवाइयों का एक डिब्बा रखा हुआ था।
केशव के चेहरे के भाव पल भर में बदल गए। उसने अपने कंधे के गमछे से माथे का पसीना पोंछा और चेहरे पर दुनिया भर की लाचारी और बनावटी करुणा ओढ़ते हुए माँ के करीब आकर बैठ गया। उसने माँ के कांपते हाथों को अपने हाथों में लिया और बड़े ही भर्राए हुए गले से बोला, “देख लिया न माँ, तेरे लाडले नीरज ने आज बाबूजी की बनाई इस गृहस्थी के कैसे टुकड़े-टुकड़े कर दिए? मैंने तो बड़े होने के नाते बहुत चाहा कि हम साथ रहें, पर इसकी जिद के आगे मेरी एक न चली। खैर, मुझे अपने दुख की परवाह नहीं है माँ, मुझे तो बस दिन-रात तेरी ही चिंता खाए जा रही है। तू तो जानती है कि मेरी आमदनी कितनी सीमित है और बच्चों की पढ़ाई का बोझ कितना बढ़ गया है। ऊपर से तू तो बचपन से ही नीरज पर जान छिड़कती आई है। उसके बिना तुझे एक पल भी चैन नहीं पड़ता। मुझे लगता है कि तेरा मन नीरज के पास ही ज्यादा लगेगा। मैं तो अपनी रूखी-सूखी खाकर जैसे-तैसे गुजर-बसर कर लूँगा, पर तुझे कोई तकलीफ न हो, इसलिए तू नीरज के हिस्से में ही रह।”
बरामदे की सीढ़ियों के पास खड़ी नीरज की पत्नी मालती के कानों में जैसे ही जेठ के ये शब्द पड़े, उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई। उसने तुरंत आंगन में सामान बांध रहे नीरज को कोहनी मारी और आंखों ही आंखों में इशारा किया। खतरे की भनक लगते ही नीरज हाथ का काम छोड़ कर तीर की तरह माँ के पास पहुंचा।
“अरे-अरे भैया, यह आप कैसी बातें कर रहे हैं?” नीरज ने केशव से भी ज्यादा मीठी और भावुक आवाज बनाते हुए कहा, “मानता हूँ कि हमारे विचारों में मतभेद है और हम अलग हो रहे हैं, लेकिन मैं इतना भी गिरा हुआ और स्वार्थी नहीं हूँ कि आपसे आपका सबसे बड़ा अधिकार ही छीन लूँ। भैया, आप इस घर के बड़े बेटे हैं, बाबूजी की पगड़ी आपके सिर पर बंधी है। समाज में लोग क्या कहेंगे कि बड़े भाई के रहते छोटा भाई माँ को अपने हिस्से में ले गया? और फिर, माँ को तो भाभी के हाथों की बनी अदरक वाली चाय और बिना छौंक की दाल ही पचती है। मालती तो अभी गृहस्थी के कामों में कच्ची है, उससे माँ की सेवा में कोई चूक हो गई तो मुझे जिंदगी भर पाप लगेगा। माँ की सेवा का यह परम पुण्य और आशीर्वाद तो आपको ही मिलना चाहिए भैया, मैं आपके इस हक के बीच कभी नहीं आऊँगा।”
केशव और नीरज दोनों ही माँ के दोनों तरफ खड़े होकर एक-दूसरे पर ‘त्याग’ और ‘महानता’ के बाण चला रहे थे। देखने वाले को यही लगता कि श्रवण कुमार के बाद अगर धरती पर कोई मातृभक्त पैदा हुए हैं, तो वे यही दोनों भाई हैं, जो माँ के सुख और आराम के लिए अपने-अपने दावे छोड़ रहे हैं। पीतल के बर्तनों और जमीन के टुकड़ों का हिसाब तो उन्होंने आधे घंटे में निपटा दिया था, लेकिन जिस माँ ने नौ-नौ महीने अपनी कोख में रखकर अपने खून से उन्हें सींचा था, उस चलती-फिरती जिम्मेदारी का बंटवारा भला किस तराजू पर करते?
गायत्री देवी की पथराई हुई आंखों में अचानक अतीत का एक धुंधला सा दृश्य तैरने लगा। आज से पच्चीस साल पहले भी इसी आंगन में ठीक ऐसी ही बहस हुआ करती थी। तब सर्दियों की गुनगुनी धूप में जब गायत्री देवी आंगन में चटाई बिछाकर दोनों बेटों के सिर में सरसों के तेल की मालिश करती थीं, तो दोनों भाई एक-दूसरे को धक्का देकर उनकी गोद में घुसने की होड़ लगाते थे।
“माँ, आज रात को मैं तेरे गले लग कर सोऊँगा और राजा-रानी वाली कहानी सुनूँगा,” नन्हा नीरज माँ की साड़ी का पल्लू अपनी मुट्ठी में भींचते हुए जिद करता था।
तब केशव तुरंत अपने छोटे भाई का हाथ झटक कर बीच में कूद पड़ता और रूठते हुए कहता, “नहीं, बिल्कुल नहीं! कल भी तू ही माँ के पास सोया था। माँ, तुम हमेशा नीरज का ही पक्ष लेती हो, मुझे तो तुम थोड़ा भी प्यार नहीं करतीं। आज तो माँ के पास सिर्फ मैं सोऊँगा, वरना मैं खाना नहीं खाऊँगा!”
तब गायत्री देवी हंसते हुए अपनी दोनों बांहें फैला देती थीं और दोनों बेटों को अपने सीने से चिपका कर कहती थीं, “अरे मेरे पगलों, माँ का आँचल कोई छोटा थोड़ी है जो तुम दोनों के लिए कम पड़ जाएगा? तुम दोनों मेरी दो आंखें हो, भला कोई अपनी एक आंख से कम और दूसरी से ज्यादा प्यार कर सकता है?”
गायत्री देवी ने एक गहरी, ठंडी सांस ली और वर्तमान के कठोर धरातल पर लौट आईं। आज भी दोनों बेटों के शब्द लगभग वही थे—वही शिकायतें, वही एक-दूसरे को आगे करने की होड़। फर्क सिर्फ इतना था कि बचपन में वह झगड़ा माँ का आंचल पाने के लिए होता था, और आज की यह बहस माँ के आंचल से अपना दामन छुड़ाने के लिए हो रही थी।
गायत्री देवी ने अपनी कुर्सी के हत्थे पर जोर दिया और कांपते हुए पैरों के सहारे खड़ी हो गईं। उनकी कमर थोड़ी झुक गई थी, लेकिन आज उनकी रीढ़ में एक अजीब सा स्वाभिमान तन गया था। उन्होंने न केशव की तरफ देखा, न नीरज की तरफ। उन्होंने झुककर आंगन में पड़ी चूने की उस डिब्बी में से एक मुट्ठी सफेद चूना उठाया और दोनों भाइयों के बीच की खाली जमीन पर एक गोल घेरा बना दिया।
“तुम दोनों परेशान मत हो मेरे बच्चों,” गायत्री देवी की आवाज बहुत धीमी थी, लेकिन उस सन्नाटे में वह किसी मंदिर के घंटे की तरह गूंजी। “जब इस घर की हर ईंट और हर बर्तन ने अपना-अपना मालिक चुन लिया है, तो मैं तुम दोनों के सिर पर बिना बांटे बोझ बनकर क्यों रहूँ? एक माँ अपने बच्चों के बीच बंटवारे की आखिरी वजह बने, इससे बड़ा दुर्भाग्य उसके लिए और क्या होगा?”
इतना कहकर गायत्री देवी ने अपनी साड़ियों की वह छोटी सी पोटली बगल में दबाई और दवाइयों का डिब्बा हाथ में लेकर मुख्य द्वार की ओर कदम बढ़ा दिए। केशव ने नजरें चुरा कर आसमान की तरफ देखना शुरू कर दिया और नीरज अपने जूतों के फीते बांधने के बहाने नीचे झुक गया। दोनों बहुएं अपने-अपने हिस्से के पीतल के बर्तन समेट कर कमरों के अंदर जाने लगीं। किसी एक ने भी आगे बढ़कर माँ का हाथ नहीं थामा, किसी एक कंठ से यह आवाज नहीं निकली कि—’माँ, रुक जाओ, यह घर तुम्हारा है।’
चौखट लांघते ही गायत्री देवी के सामने पूरी दुनिया खुली पड़ी थी, लेकिन अपना कहने को कोई कोना नहीं था। वे शहर के बाहरी इलाके में बने ‘आश्रय वृद्धाश्रम’ में चली गईं, जहाँ उनके जैसी ही कई ठुकराई हुई ममताएं अपनी शाम गुजार रही थीं।
लेकिन यह कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। आश्रम की चारदीवारी में दो दिन तक रोने के बाद, तीसरे दिन जब गायत्री देवी ने आश्रम के बगीचे में सूखे पत्तों को देखा, तो उन्हें अपने पति हरिहर बाबू की एक बात याद आई—”गायत्री, इंसान की कीमत उसकी सांसों से नहीं, उसके हुनर और आत्मसम्मान से होती है।” गायत्री देवी के हाथों में मसालों और अचार बनाने का एक ऐसा जादू था, जिसकी तारीफ कभी पूरे मोहल्ले में हुआ करती थी। उनके हाथ का बना कटहल, आम और भरवां लाल मिर्च का अचार लोग उंगलियां चाट-चाट कर खाते थे।
गायत्री देवी ने आश्रम के संचालक विकास बाबू से बात की। विकास बाबू एक नेक और प्रगतिशील इंसान थे। उन्होंने आश्रम की बुजुर्ग महिलाओं के खाली समय और उनके अनुभव को एक नई दिशा देने के लिए गायत्री देवी का पूरा साथ दिया। महज पांच हजार रुपये की छोटी सी मदद से आश्रम के पीछे के आंगन में दस मिट्टी के मर्तबानों के साथ ‘माँ की रसोई—स्वाद ममता का’ नाम से अचार और पापड़ बनाने की शुरुआत हुई।
गायत्री देवी ने आश्रम की अन्य दस बुजुर्ग माताओं को अपने साथ जोड़ा। जिन कांपते हाथों को उनके अपने बेटों ने बेकार और बोझ समझ कर घर से निकाल दिया था, उन्हीं हाथों ने जब मसालों को कूटना और अचार के मर्तबानों को धूप दिखाना शुरू किया, तो पूरे आश्रम में एक नई जान फूंक गई। बिना किसी मिलावट के, शुद्ध सरसों के तेल और दादी-नानी के पुराने नुस्खों से बने इस अचार की खुशबू धीरे-धीरे पूरे प्रयागराज में फैलने लगी। विकास बाबू ने शहर के कुछ युवाओं की मदद से इसकी पैकिंग और सोशल मीडिया पर प्रचार शुरू करवा दिया।
उधर, पुश्तैनी मकान के आंगन में आठ फीट ऊँची पक्की दीवार उठ चुकी थी। दीवार ने आंगन को तो दो हिस्सों में बांट दिया था, पर घर की बरकत और शांति को हमेशा के लिए बाहर धकेल दिया था। माँ के जाने के बाद दोनों भाइयों को लगा था कि अब उनके घरों में स्वर्ग उतर आएगा, लेकिन हुआ ठीक उल्टा। अब जब झगड़ा करने के लिए देवरानी-जेठानी आमने-सामने नहीं थीं, तो शोभा का गुस्सा केशव पर और मालती की खीझ नीरज पर उतरने लगी।
दोनों घरों में रसोई तो अलग जलती थी, पर खाने में वह स्वाद और दुआओं की मिठास गायब हो चुकी थी। जब केशव का बेटा स्कूल से लौट कर पूछता, “पापा, दादी कहाँ चली गईं? अब मुझे स्कूल के लिए आम की खट्टी-मीठी लौंजी कौन बना कर देगा?” तो केशव के पास नजरें झुकाने के अलावा कोई जवाब नहीं होता था। रात के सन्नाटे में जब दोनों भाई अपनी-अपनी छतों पर टहलते, तो बीच की वह ऊँची दीवार उन्हें अपने ही बौनेपन का अहसास कराती थी। मोहल्ले के लोग और रिश्तेदार जब भी रास्ते में मिलते, तो उनकी नजरों में केशव और नीरज के लिए सम्मान की जगह एक मूक तिरस्कार होता था।
देखते-देखते दो साल बीत गए। एक तरफ दोनों भाइयों के व्यापार और नौकरी में तनाव बढ़ता गया, तो दूसरी तरफ गायत्री देवी का ‘माँ की रसोई’ अब प्रयागराज का एक जाना-माना गृह-उद्योग बन चुका था। आश्रम की पचास से ज्यादा बुजुर्ग महिलाएं अब न केवल आत्मनिर्भर थीं, बल्कि शहर की कई गरीब लड़कियों को रोजगार भी दे रही थीं।
एक दिन प्रयागराज के सबसे बड़े सभागार में जिला प्रशासन और व्यापार मंडल की ओर से ‘आत्मनिर्भर नारी सम्मान’ समारोह का आयोजन किया गया। केशव के दफ्तर के बड़े साहब और नीरज के व्यापारिक साझेदार भी उस समारोह में आमंत्रित थे, इसलिए दोनों भाइयों को भी अपनी-अपनी पत्नियों के साथ उस कार्यक्रम में जाना पड़ा। दोनों भाई सभागार की अलग-अलग कतारों में एक-दूसरे से अनजान बनने का नाटक करते हुए बैठे थे।
तभी मंच से उद्घोषक की आवाज गूंजी, “और अब, मैं मंच पर आमंत्रित करना चाहता हूँ उस शख्सियत को, जिन्होंने अड़सठ वर्ष की उम्र में शून्य से शुरुआत कर न केवल खुद को संभाला, बल्कि दर्जनों बेसहारा माताओं को स्वाभिमान से जीना सिखाया। जोरदार तालियों से स्वागत कीजिए, ‘माँ की रसोई’ की संस्थापक—श्रीमती गायत्री देवी का!”
पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। केशव और नीरज ने जैसे ही मंच की ओर देखा, दोनों की सांसें वहीं अटक गईं। सफेद साफ-सुथरी खादी की साड़ी पहने, चेहरे पर एक शांत तेज और आत्मविश्वास की आभा लिए उनकी माँ गायत्री देवी मंच पर आ रही थीं। शहर के जिलाधिकारी ने खुद आगे बढ़कर उन्हें शॉल ओढ़ाया और सम्मान की ट्रॉफी के साथ पांच लाख रुपये का चेक भेंट किया।
जब गायत्री देवी को दो शब्द बोलने के लिए माइक दिया गया, तो सभागार में पिन-ड्रॉप सन्नाटा छा गया। उन्होंने अपने चश्मे को ठीक किया और भीड़ की तरफ देखते हुए बेहद शांत स्वर में कहा, “आज से दो साल पहले जब मेरे अपने घर के आंगन में बंटवारे की लकीर खिंची थी, तो मुझे लगा था कि मेरी जिंदगी अब खत्म हो गई है। मेरे दोनों बेटों ने घर का हर एक सामान तो बड़ी बारीकी से बांट लिया, पर मैं किसी के हिस्से में फिट नहीं बैठ पाई। उस दिन मैं बहुत रोई थी। लेकिन आज मैं अपने उन दोनों बेटों को दिल से धन्यवाद देना चाहती हूँ। अगर उस दिन उन्होंने मुझे अपनी जिम्मेदारी समझने से इनकार न किया होता, तो शायद मैं कभी यह जान ही नहीं पाती कि एक माँ केवल आश्रित नहीं होती, वह तो खुद सृजन की शक्ति होती है। आज मेरे पास एक नहीं, इस आश्रम में पचास बेटों और बेटियों का परिवार है। मैं बस समाज के हर माता-पिता से यही कहना चाहती हूँ कि अपने बच्चों को संस्कार देने के साथ-साथ अपने बुढ़ापे के स्वाभिमान की डोर भी अपने ही हाथों में रखें, ताकि किसी आंगन की दीवार आपको बेघर न कर सके।”
माँ के एक-एक शब्द हथौड़े की तरह केशव और नीरज के सीने पर पड़ रहे थे। शर्म और ग्लानि के मारे दोनों भाई अपनी कुर्सियों में गड़ गए। शोभा और मालती ने अपने पल्लू से अपना चेहरा छिपा लिया। सभागार में बैठे लोग गायत्री देवी के सम्मान में खड़े होकर तालियां बजा रहे थे, और केशव तथा नीरज की आंखों से पश्चाताप के गर्म आंसू बह रहे थे।
समारोह समाप्त होते ही दोनों भाई भीड़ को चीरते हुए मंच के पीछे की तरफ भागे। वहां जब दोनों का आमना-सामना हुआ, तो सालों की अकड़ और अहंकार आंसुओं में बह गया। दोनों ने एक-दूसरे को देखा और बिना कुछ कहे अपनी माँ के कदमों में जाकर गिर पड़े।
“माँ, हमें माफ कर दे! हम अंधे हो गए थे माँ, हमने सोने की लंका के लालच में अपने ही भगवान को घर से निकाल दिया,” केशव माँ के पैरों पर सिर रखकर फूट-फूट कर रो पड़ा। नीरज भी अपने कान पकड़ कर घुटनों के बल बैठ गया, “माँ, घर वापस चल। हम आज ही अपने हाथों से आंगन की वह मनहूस दीवार गिरा देंगे। तेरे बिना वह घर मकान भी नहीं रहा माँ, श्मशान बन गया है।” शोभा और मालती भी पीछे खड़ी रोते हुए हाथ जोड़ रही थीं।
गायत्री देवी ने झुककर अपने दोनों बेटों के कंधों को छुआ और उन्हें ऊपर उठाया। उनकी आंखों में न कोई क्रोध था, न कोई नफरत—बस एक गहरा और शांत समंदर था। उन्होंने अपने आंचल से दोनों बेटों के आंसू पोंछे और मुस्कुराते हुए बोलीं, “माँ अपने बच्चों से कभी नाराज नहीं हो सकती केशव। मैंने तो तुम्हें उसी दिन माफ कर दिया था जिस दिन मैंने घर की चौखट लांघी थी। और तुम दोनों यह बिल्कुल मत सोचना कि मैं तुमसे दूर हूँ। कल सुबह से तुम दोनों अपने बच्चों और बहुओं को लेकर हर रविवार आश्रम आया करना, हम सब साथ बैठकर खाना खाएंगे। आंगन की वह दीवार तुम जरूर गिरा देना, क्योंकि भाई से भाई का साथ छूटना अच्छी बात नहीं है। लेकिन अब मैं उस घर में वापस नहीं लौटूंगी।”
“क्यों माँ? क्या अभी भी तेरी नाराजगी कम नहीं हुई?” नीरज ने तड़प कर पूछा।
गायत्री देवी ने आश्रम की उन बुजुर्ग महिलाओं की तरफ इशारा किया जो उनके पीछे खड़ी थीं और स्नेह से बोलीं, “नाराजगी की बात नहीं है मेरे बच्चे। उस घर में लौटकर मैं केवल दो बेटों की माँ रह जाऊँगी, लेकिन यहाँ रहकर मैं इन पचास बेसहारा माताओं की हिम्मत और सहारा बन चुकी हूँ। अब मेरा यह नया परिवार मेरे बिना अधूरा हो जाएगा। तुम दोनों अपने घर को फिर से एक कर लो, मेरे लिए इससे बड़ी खुशी और कोई नहीं होगी।”
अगले ही दिन सुबह, मोहल्ले वालों ने एक अद्भुत नजारा देखा। केशव और नीरज दोनों अपने हाथों में हथौड़ा और सब्बल लिए आंगन के बीच खड़ी उस आठ फीट की दीवार को खुद तोड़ रहे थे। जैसे-जैसे ईंटें गिर रही थीं, दोनों भाइयों के दिलों के बीच जमी सालों की मैल भी साफ हो रही थी। घर तो फिर से एक हो गया, और हर रविवार को जब दोनों परिवार अपने हाथों से बना खाना लेकर ‘आश्रय वृद्धाश्रम’ पहुंचते, तो गायत्री देवी की हंसी से पूरा आश्रम खिल उठता। दोनों बेटों को यह सबक मिल चुका था कि माता-पिता कोई बोझ या बंटवारे की वस्तु नहीं, बल्कि घर की वह नींव होते हैं, जिनके हटने से बड़े से बड़ा महल भी अपनी रौनक खो देता है।
एक सवाल आप सभी पाठकों से:
क्या गायत्री देवी का अपने बेटों को माफ कर देने के बाद भी घर वापस न लौटने और आश्रम की अन्य बेसहारा माताओं के साथ ही रहने का फैसला सही था? अगर आप उनकी जगह होते तो क्या करते? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें, आपकी एक राय समाज की सोच बदल सकती है।
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