तिजोरी से बड़ा पिता का दिल

जब तक पिता की जेब भरी थी, वो अपनी लाडली बेटी के लिए भगवान थे, लेकिन जैसे ही बीमारी ने उनकी जमापूंजी छीन ली, उसी बेटी ने मौत से लड़ते पिता से मुंह मोड़ लिया… फिर अस्पताल के उस वार्ड में कुछ ऐसा हुआ जिसने खून के रिश्तों की परिभाषा ही बदल दी।

आज के दौर में रिश्तों की बुनियाद स्नेह और समर्पण से ज्यादा जरूरत और सहूलियत पर टिकने लगी है। जब तक किसी से हमारा स्वार्थ सिद्ध होता है, तब तक वह इंसान हमारे लिए दुनिया का सबसे अजीज होता है, लेकिन जैसे ही परिस्थितियां बदलती हैं और सामने वाला देने की स्थिति में नहीं रहता, वैसे ही हमारे व्यवहार और अपनत्व के मायने भी बदलने लगते हैं। यह कड़वी सच्चाई केवल बाहरी दुनिया तक सीमित नहीं है, बल्कि अब तो घर के आंगन और खून के रिश्तों में भी इसने अपनी जड़ें जमा ली हैं।

कानपुर के एक शांत मोहल्ले में मनोहर लाल जी का घर था। मनोहर लाल जी एक प्रसिद्ध चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) रहे थे। अपने दौर में उनका काम इतना अच्छा चलता था कि शहर के बड़े-बड़े व्यापारी उनसे ही अपने खातों का हिसाब-किताब करवाते थे। उन्होंने अपनी मेहनत और ईमानदारी से न केवल एक सुंदर मकान बनाया, बल्कि अपने तीनों बच्चों—बेटे सिद्धार्थ और दोनों बेटियों, निधि व मानसी को बेहतरीन परवरिश और उच्च शिक्षा दी। उनकी पत्नी शारदा जी एक बेहद शांत और धार्मिक विचारों वाली महिला थीं, जिन्होंने पूरे परिवार को एक माला की तरह पिरोकर रखा था।

तीनों बच्चों की शादियां अच्छे घरों में हो चुकी थीं। बेटा सिद्धार्थ और उसकी पत्नी पल्लवी, मनोहर लाल जी और शारदा जी के साथ ही रहते थे। आज के जमाने में जहां लोग माता-पिता को बोझ समझने लगते हैं, वहीं सिद्धार्थ और पल्लवी के लिए उनके माता-पिता ही उनके चार धाम थे। पल्लवी सुबह उठकर सबसे पहले सास-ससुर के पैर छूती, उनकी चाय-दवाइयों का ध्यान रखती और सिद्धार्थ भी ऑफिस से लौटकर कम से कम एक घंटा अपने पिता के पास बैठकर दिनभर की बातें साझा करता था।

मनोहर लाल जी की बड़ी बेटी निधि की शादी दिल्ली में हुई थी और वह अपने परिवार में सुखी थी। वहीं, छोटी बेटी मानसी की शादी कानपुर से महज बीस किलोमीटर दूर एक छोटे से कस्बे में हुई थी। मानसी के पति विकास की एक छोटी सी किराने की दुकान थी। मानसी घर में सबसे छोटी थी, इसलिए मनोहर लाल जी की जान उसमें बसती थी। कस्बे में बहुत ज्यादा सुविधाएं नहीं थीं और विकास की आमदनी भी सीमित थी, इसलिए मनोहर लाल जी ने शादी के बाद भी मानसी के परिवार की जिम्मेदारी एक तरह से अपने कंधों पर ही उठा रखी थी।

हर महीने की पहली तारीख को मनोहर लाल जी अपनी कार में घर का सारा राशन, बेहतरीन किस्म के सूखे मेवे, मौसमी फल, और मानसी के बेटे रोहन के लिए कपड़े व खिलौने भरकर उसके ससुराल पहुंच जाते थे। यही नहीं, जब भी मानसी या विकास को पैसों की जरूरत होती, वे बिना किसी झिझक के मनोहर लाल जी के सामने अपनी बात रख देते। कभी दुकान में माल भरने के लिए, तो कभी घर की मरम्मत के लिए, मनोहर लाल जी ने अपनी तिजोरी हमेशा अपनी छोटी बेटी के लिए खुली रखी। मानसी को भी अब यह लगने लगा था कि पिता की कमाई और संपत्ति पर उसका अघोषित अधिकार है। वह जब भी मायके आती, खाली हाथ कभी नहीं लौटती थी।

घर में बेटा सिद्धार्थ और बहू पल्लवी सब कुछ देखते थे, लेकिन उन्होंने कभी इस बात का विरोध नहीं किया। पल्लवी अक्सर कहती, “बाबूजी ने अपनी मेहनत से कमाया है, अगर वे अपनी बेटी की मदद कर रहे हैं तो इसमें हमारा बोलने का कोई हक नहीं है। मानसी खुश रहेगी तो बाबूजी को भी सुकून मिलेगा।” इस उदारता की वजह से घर में कभी क्लेश नहीं हुआ।

लेकिन समय का पहिया हमेशा एक जैसा नहीं घूमता। करीब दो साल पहले मनोहर लाल जी को पेट में हल्का दर्द और अपच की शिकायत रहने लगी। शुरुआत में उन्होंने इसे उम्र का तकाजा और खान-पान की गड़बड़ी समझकर नजरअंदाज किया। शारदा जी उन्हें घर में ही अजवाइन का पानी और कुछ देसी चूर्ण दे दिया करती थीं। कुछ महीने ऐसे ही बीत गए, लेकिन दर्द कम होने के बजाय धीरे-धीरे बढ़ने लगा और उनका वजन भी अचानक गिरने लगा।

जब तकलीफ बढ़ी, तो सिद्धार्थ उन्हें शहर के एक अच्छे डॉक्टर के पास ले गया। डॉक्टर ने शुरुआती जांच के बाद पेट के अल्सर और लिवर में सूजन की बात कही और कुछ महीनों का कोर्स लिख दिया। मनोहर लाल जी ने अब काम पर जाना कम कर दिया था। थकान और कमजोरी की वजह से उनका ऑफिस बैठना मुश्किल हो गया था, इसलिए अंततः उन्होंने अपना ऑफिस पूरी तरह बंद कर दिया।

दवाइयां चलती रहीं, पर आराम एक प्रतिशत भी नहीं मिला। लगभग आठ महीने तक अलग-अलग डॉक्टरों के चक्कर काटने, दर्जनों ब्लड टेस्ट, अल्ट्रासाउंड और एंडोस्कोपी करवाने के बाद भी जब मर्ज पकड़ में नहीं आया, तो एक बड़े विशेषज्ञ ने सीटी स्कैन और लिवर बायोप्सी करवाने की सलाह दी। जब बायोप्सी की रिपोर्ट आई, तो पूरे परिवार के पैरों तले जमीन खिसक गई। मनोहर लाल जी को लिवर का कैंसर था, जो काफी बढ़ चुका था।

इस खबर ने हंसते-खेलते परिवार में मातम सा पसार दिया। लेकिन सिद्धार्थ ने हिम्मत नहीं हारी। उसने अपने पिता का इलाज देश के सबसे अच्छे अस्पताल में करवाने का फैसला किया। पिछले डेढ़ साल में मनोहर लाल जी की अपनी जमापूंजी का एक बड़ा हिस्सा विभिन्न जांचों और महंगे इलाज में खर्च हो चुका था। अब आगे के इलाज और कीमोथेरेपी का सारा खर्च सिद्धार्थ अपने वेतन और अपनी बचत से उठा रहा था।

उधर, जब से मनोहर लाल जी का ऑफिस बंद हुआ था और वे बीमारी से घिरे थे, मानसी के घर उनका जाना बंद हो गया था। शुरुआत में तो मानसी ने फोन पर हाल-चाल लिया, लेकिन जब उसे एहसास हुआ कि अब मायके से हर महीने आने वाला सामान और आर्थिक मदद रुक गई है, तो उसके स्वर बदलने लगे।

असली दरार तब पड़ी जब ऑपरेशन से ठीक तीन महीने पहले मानसी के बेटे रोहन ने बारहवीं की परीक्षा पास की। मानसी चाहती थी कि रोहन किसी बड़े प्राइवेट कॉलेज से होटल मैनेजमेंट का कोर्स करे, जिसकी फीस करीब चार लाख रुपये थी। मानसी अपने पति विकास के साथ सीधे मायके आई और मनोहर लाल जी के पास बैठकर बोली, “बाबूजी, रोहन के एडमिशन के लिए तीन लाख रुपये कम पड़ रहे हैं। आपने तो हमेशा कहा था कि रोहन की आगे की पढ़ाई आप करवाएंगे। कल तक फीस जमा करनी है, आप व्यवस्था कर दीजिए।”

बिस्तर पर लेटे कमजोर मनोहर लाल जी ने अपनी बेटी का हाथ पकड़ा और बड़ी बेबसी से कहा, “बेटा मानसी, मेरी हालत तो तुम देख ही रही हो। दो साल से काम बंद है। जो कुछ बैंक में था, वह सब मेरी जांचों और दवाइयों में लग गया। अब तो तुम्हारे भैया सिद्धार्थ ही मेरे इलाज का और घर का सारा खर्च उठा रहे हैं। इस वक्त मेरे पास तुम्हें देने के लिए वाकई पैसे नहीं हैं।”

पिता की यह मजबूरी सुनने के बजाय मानसी का चेहरा गुस्से से तमतमा गया। उसने अपना हाथ झटकते हुए कहा, “बाबूजी, आप मुझे बहलाइए मत! इतनी बड़ी कोठी है, भैया इतना अच्छा कमाते हैं। अगर आपके पास पैसे नहीं हैं, तो आप सिद्धार्थ भैया से लेकर मुझे दे दीजिए। आखिर आपकी संपत्ति और इस घर पर मेरा भी तो उतना ही अधिकार है जितना भैया का है! जब देने का मन न हो, तो बीमारी का बहाना सबसे आसान होता है।”

शारदा जी और पल्लवी कमरे के बाहर खड़े होकर यह सब सुन रहे थे। उनकी आंखों में आंसू आ गए। मनोहर लाल जी को लगा जैसे किसी ने उनके सीने में खंजर घोंप दिया हो। जिस बेटी की हर छोटी-बड़ी ख्वाहिश पूरी करने के लिए उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी लगा दी, आज वही बेटी उनकी लाचारी को बहाना बता रही थी। सिद्धार्थ से मांगकर बहन को देना मनोहर लाल जी के स्वाभिमान के खिलाफ था, क्योंकि सिद्धार्थ पहले ही उनके भारी-भरकम मेडिकल बिलों के नीचे दबा हुआ था और उसके अपने भी दो छोटे बच्चे थे।

मानसी उस दिन पैर पटकते हुए जो घर से निकली, तो फिर मुड़कर नहीं आई। उसने फोन करना भी बंद कर दिया।

पांच दिन पहले मनोहर लाल जी की हालत अचानक बहुत बिगड़ गई। डॉक्टरों ने तुरंत ऑपरेशन करने का फैसला किया ताकि लिवर के खराब हो चुके हिस्से को हटाया जा सके। करीब छह घंटे चले जटिल ऑपरेशन के बाद जब डॉक्टर ऑपरेशन थिएटर से बाहर आए, तो उनके चेहरे पर निराशा थी। उन्होंने सिद्धार्थ के कंधे पर हाथ रखकर कहा, “सिद्धार्थ जी, हमने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की, लेकिन कैंसर आसपास के अंगों में भी फैल चुका है। अब दवाइयां बहुत ज्यादा काम नहीं करेंगी। आपके पिताजी के पास कुछ ही दिनों का समय बचा है। बेहतर होगा कि उनके जो भी करीबी लोग हैं, आप उन्हें बुला लें ताकि वे उनसे मिल सकें।”

सिद्धार्थ अपनी मां और पत्नी को संभालते हुए फूट-फूट कर रो पड़ा। तुरंत सभी रिश्तेदारों और दोनों बहनों को खबर दी गई। बड़ी बेटी निधि खबर सुनते ही पहली फ्लाइट पकड़कर दिल्ली से कानपुर पहुंच गई और पिता के सिरहाने बैठकर उनकी सेवा में जुट गई। आईसीयू से शिफ्ट करने के बाद मनोहर लाल जी को एक प्राइवेट वार्ड में रखा गया था। उनकी आंखें बार-बार दरवाजे की तरफ उठती थीं। ऑक्सीजन मास्क के पीछे से उनकी धीमी आवाज में बस एक ही नाम निकलता था— “मानसी… मेरी मानसी नहीं आई?”

शारदा जी ने मानसी को फोन किया और रोते हुए सारी बात बताई, लेकिन मानसी के दिल पर तो जैसे पैसों के लालच की पत्थर की शिला रखी हुई थी। उसने रूखे स्वर में कहा, “मां, रोहन के कॉलेज के काम चल रहे हैं और घर में भी बहुत काम है। डॉक्टर तो ऐसे ही डराते रहते हैं, बाबूजी को कुछ नहीं होगा। मुझे जब समय मिलेगा, मैं आ जाऊंगी।”

दो दिन बीत गए, लेकिन मानसी नहीं आई। मनोहर लाल जी की हालत हर घंटे गिरती जा रही थी, पर उनकी प्राण-वायु जैसे अपनी छोटी बेटी को देखने के लिए ही अटकी हुई थी। अंततः सिद्धार्थ से अपने पिता की यह तड़प देखी नहीं गई। उसने तीसरे दिन सुबह मानसी को फोन लगाया।

मानसी ने जैसे ही फोन उठाया और फिर से व्यस्त होने का बहाना बनाना शुरू किया, शांत रहने वाले सिद्धार्थ की आवाज में एक गहरा दर्द और सख्ती उभर आई। उसने कहा, “मानसी, आज मैं तुम्हारा भाई बनकर नहीं, एक बेटे के फर्ज से बोल रहा हूं। जिस इंसान ने अपनी जवानी के पसीने की हर बूंद तुम्हारी खुशियों पर लुटा दी, जो इंसान कड़ाके की ठंड और चिलचिलाती धूप में भी तुम्हारे घर के राशन का डिब्बा पहुंचाने जाता था, आज वह इंसान मौत के बिस्तर पर अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है। उनकी आंखें दरवाजे पर टिकी हैं और होंठों पर सिर्फ तुम्हारा नाम है। अगर तुम्हारे अंदर जरा सी भी इंसानियत बची है, तो अपने जन्मदाता की आखिरी इच्छा समझकर अस्पताल आ जाओ, वरना जिंदगी भर खुद से नजरें नहीं मिला पाओगी।”

सिद्धार्थ की बातों ने मानसी को झकझोर दिया, लेकिन उसके मन का अहंकार अभी पूरी तरह पिघला नहीं था। वह अनमने मन से अपने पति विकास के साथ दोपहर तक अस्पताल पहुंची। वार्ड में घुसते ही उसने देखा कि उसके हट्टे-कट्टे, रौबदार पिता आज हड्डियों का एक ढांचा मात्र रह गए हैं। दर्जनों नलियां उनके शरीर से जुड़ी थीं।

मानसी के पास जाते ही मनोहर लाल जी की बंद पड़ती आंखों में एक अजीब सी चमक आ गई। उन्होंने कांपते हुए हाथों से अपना ऑक्सीजन मास्क थोड़ा सा हटाया और मानसी का हाथ अपने ठंडे पड़ते हाथों में ले लिया। मानसी को लगा कि पिताजी शायद उसकी बेरुखी के लिए उसे ताना मारेंगे, लेकिन मनोहर लाल जी की आंखों से दो गर्म आंसू लुढ़क कर तकिए पर गिर गए।

उन्होंने बेहद टूटी हुई और धीमी आवाज में कहा, “आ गई मेरी गुड़िया… मुझे माफ कर दे बेटा, तेरा बाप आखिरी वक्त में तेरे बेटे के काम नहीं आ सका। मैं बहुत बेबस हो गया था लाड़ो…”

इतना कहकर उन्होंने तकिए के नीचे हाथ डाला और एक छोटा सा लिफाफा निकालकर मानसी की हथेली पर रख दिया।

मानसी ने हैरानी से लिफाफा खोला। उसमें सत्तर हजार रुपये का एक चेक था और साथ में उनकी अपनी सोने की वह अंगूठी और चेन थी, जो वे पिछले चालीस सालों से पहन रहे थे।

पास खड़ी पल्लवी ने सिसकते हुए कहा, “दीदी, जब आप उस दिन नाराज होकर गईं, तो बाबूजी तीन दिन तक सो नहीं पाए थे। उन्होंने अपनी पेंशन के बचे-खुचे पैसे जोड़े और अपनी अंगूठी व चेन उतारकर सिद्धार्थ को दी कि इसे बेचकर रोहन की फीस के पैसे पूरे कर दो। सिद्धार्थ ने जेवर बेचे नहीं, बल्कि बाबूजी की तसल्ली के लिए अपनी तरफ से पैसे मिलाकर यह चेक बनवाया था, पर बाबूजी खुद अपने हाथों से आपको यह देना चाहते थे।”

पल्लवी के शब्द मानसी के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह पड़े। उसके हाथ से वह लिफाफा छूटकर जमीन पर गिर गया। जिस पिता को वह स्वार्थी और कंजूस समझ रही थी, उस पिता ने तो अपनी सांसों की डोर टूटने से पहले अपनी आखिरी निशानी भी अपनी बेटी के नाम कर दी थी!

अचानक मानसी की आंखों के सामने से स्वार्थ और लालच का वह काला पर्दा हट गया। उसे बचपन से लेकर आज तक का हर वह पल याद आ गया जब उसके पिता ने अपनी जरूरतें मारकर उसकी हर जिद पूरी की थी। शर्मिंदगी, पश्चाताप और ग्लानि के मारे मानसी का रोम-रोम कांप उठा। वह चीख मारकर अपने पिता के पैरों पर गिर पड़ी।

“मुझे माफ कर दीजिए बाबूजी! मैं अंधी हो गई थी… मैं कितनी गिर गई थी कि पैसों के आगे मुझे आपके खून और आपके प्यार का मोल ही नहीं दिखा! मुझे आपका एक रुपया नहीं चाहिए बाबूजी, मुझे बस आप चाहिए… मुझे छोड़कर मत जाइए!” मानसी बच्चों की तरह बिलख-बिलख कर रो रही थी और पिता के पैरों को चूम रही थी। उसके पति विकास की आंखें भी शर्म और दुख से झुक गई थीं।

मनोहर लाल जी ने कांपते हाथ से अपनी बेटी के सिर पर हाथ फेरा। उनके चेहरे पर अब एक असीम शांति और संतोष का भाव था। मानो जिस बोझ को वे अपने सीने पर लिए जी रहे थे, वह आज उतर गया था। अपनी बेटी के आंसुओं में उन्हें अपनी पुरानी, निश्छल मानसी वापस मिल गई थी।

मानसी उस दिन आधे घंटे में वापस नहीं लौटी। उसने अपना सारा अहंकार और स्वार्थ अस्पताल के उस कूड़ेदान में फेंक दिया। उसने अपनी मां और भाभी से हाथ जोड़कर माफी मांगी और अगले कई दिनों तक दिन-रात अपने पिता के पास बैठकर उनकी सेवा करती रही। उसने अपने हाथों से पिता को सूप पिलाया, उनके पैर दबाए और उनसे ढेर सारी बातें कीं।

पिता के प्रति बेटी के इस बदले हुए रूप और सच्चे प्रेम ने जैसे किसी संजीवनी बूटी का काम किया। डॉक्टरों ने जिन्हें कुछ ही दिनों का मेहमान बताया था, उन मनोहर लाल जी की सेहत में चमत्कारिक रूप से थोड़ा सुधार होने लगा। उनकी जीवन-शक्ति लौट आई थी, क्योंकि जिस मानसिक आघात ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया था, बेटी के पश्चाताप ने उस घाव पर मरहम लगा दिया था।

दो हफ्ते बाद मनोहर लाल जी को अस्पताल से छुट्टी मिल गई और वे घर आ गए। मानसी ने अपने बेटे रोहन का एडमिशन एक सरकारी कॉलेज में करवाया और तय किया कि अब वह अपने माता-पिता से कुछ लेने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें अपना समय और प्यार देने के लिए ही मायके आएगी। बीमारी अभी खत्म नहीं हुई थी, लेकिन परिवार का टूटा हुआ विश्वास और रिश्तों की गर्माहट फिर से लौट आई थी, जिसने मनोहर लाल जी की बची हुई जिंदगी को खुशियों और सुकून से भर दिया था।

आप क्या सोचते हैं? क्या आज के समय में माता-पिता की संपत्ति से बड़ा उनका आशीर्वाद और साथ नहीं होना चाहिए? क्या आपने भी अपने आसपास ऐसे रिश्ते देखे हैं जो पैसों की वजह से बदल गए? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें, आपकी एक राय किसी की सोच बदल सकती है।

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मूल लेखिका : रेखा जैन, अहमदाबाद

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