अँगूठे की स्याही

वह पागलों की तरह उठा, बिना जूते पहने नंगे पैर ही फ्लैट से बाहर भागा। वह भागता हुआ अपनी पुरानी बस्ती के पास शारदा देवी के घर पहुँचा। दरवाज़ा खटखटाते ही जब शारदा देवी ने दरवाज़ा खोला, तो सामने आयुष खड़ा था—उसकी आँखें लाल थीं और चेहरे पर गहरा पश्चाताप था।

अंदर कमरे में राधा तख्त पर लेटी थी और उसे तेज़ खांसी आ रही थी। आयुष दौड़ता हुआ गया और सीधा अपनी माँ के पैरों में गिर पड़ा। उसने माँ के उन खुरदुरे और काँपते पैरों को अपने सीने से लगा लिया और सिसकते हुए बोला, “माँ! मुझे माफ़ कर दे माँ! मैं अंधा हो गया था अपनी डिग्री और पैसे के घमंड में! मैं भूल गया था कि मैं जिस कुर्सी पर बैठा हूँ, उसकी नींव तेरे पसीने और तेरे त्यागे हुए निवालों से बनी है। माँ, चल मेरे साथ घर चल। मैं तुझे दुनिया के सबसे बड़े अस्पताल में दिखाऊँगा। तू मुझे छोड़कर मत जा माँ!”

बरसात की उस उमस भरी शाम में पटना के एक छोटे से किराए के कमरे में पीली रोशनी का बल्ब टिमटिमा रहा था। पचास की उम्र पार कर चुकी राधा अपने काँपते हाथों में एक कलम पकड़े बैठी थी। उसकी आँखों पर मोटे फ्रेम का एक सस्ता सा चश्मा चढ़ा था, जिसकी एक डंडी काले धागे से बँधी हुई थी। सामने मेज़ पर एक कोरा कागज़ रखा था और पास ही में नीले रंग की स्याही की दवात खुली पड़ी थी—ठीक वैसी ही नीली स्याही, जो कभी उसके दाहिने हाथ के अँगूठे पर लगा करती थी। आज वही नीली स्याही उसकी कलम की नोक से उतरकर कागज़ पर अक्षरों के मोती पिरो रही थी। कागज़ पर पहला शब्द उभरा—’आयुष’। अपने इकलौते बेटे का नाम लिखते ही राधा की झुर्रियों भरी आँखों से आँसू की एक गरम बूँद टपकी और कागज़ पर लिखे ‘आयुष’ के ऊपर फैल गई।

राधा ने अपने पल्लू के कोने से आँखें पोंछीं और खिड़की के बाहर देखने लगी। बाहर सड़क पर गाड़ियों की आवाज़ें आ रही थीं, लेकिन राधा का मन पच्चीस साल पीछे, अपने गाँव की उन धूल भरी पगडंडियों में लौट गया था, जहाँ से उसकी ज़िंदगी का यह कठिन सफ़र शुरू हुआ था।

तब आयुष महज़ छह साल का था। गाँव के कच्चे घर के आँगन में आम का एक पुराना पेड़ था, जिसके नीचे बैठकर गाँव के आवारा लड़के दिन भर ताश खेलते या गोलियाँ (कंचे) चलाते थे। राधा का पति, बिरजू, भी उन्हीं निठल्लों की जमात का हिस्सा था। बिरजू को काम-धंधे से कोई वास्ता नहीं था। सुबह उठते ही वह महुआ की कच्ची शराब के अड्डे पर पहुँच जाता और शाम को नशे में धुत होकर घर लौटता। राधा दूसरों के खेतों में धान की रोपाई करती, गेहूँ काटती और जो कुछ अनाज या पैसे मिलते, उससे घर का चूल्हा जलता।

एक दिन दोपहर के वक्त जब राधा कड़ी धूप में खेत से लौटी, तो उसने देखा कि छह साल का आयुष स्कूल जाने के बजाय गाँव के लड़कों के साथ धूल में लोट रहा है और उसके हाथ में बीड़ी का एक बुझा हुआ टुकड़ा है, जिसे वह मुंह में दबाकर बिरजू की नकल कर रहा था। यह दृश्य देखते ही राधा के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। उसने दौड़कर आयुष के हाथ से वह बीड़ी का टुकड़ा छीना और उसे सीने से लगाकर फूट-फूट कर रोने लगी। उस रात राधा सो नहीं सकी। उसे साफ दिखाई दे रहा था कि अगर वह इसी गाँव में रही, तो उसका बेटा भी अपने बाप बिरजू की तरह एक दिन नशेड़ी और मज़दूर बनकर रह जाएगा।

राधा खुद अनपढ़ थी। बचपन में उसके मायके में गरीबी के कारण कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा था। जब भी गाँव में कोई कागज़ आता या कोटेदार से राशन लेना होता, तो राधा को अपना अँगूठा लगाना पड़ता था। कोटेदार अक्सर उसके अनपढ़ होने का फायदा उठाकर पाँच किलो अनाज कम तौलता और रजिस्टर पर अँगूठा लगवा लेता। राधा को अपने उस काले अँगूठे से बड़ी नफ़रत थी। उसने तय कर लिया था कि चाहे उसे भीख क्यों न माँगनी पड़े, वह अपने बेटे आयुष के अँगूठे पर कभी वह काली स्याही नहीं लगने देगी, बल्कि उसके हाथों में कलम थमाएगी।

अगले ही दिन घर में महाभारत छिड़ गया। जब राधा ने अपनी सास और देवर से कहा कि वह आयुष को लेकर पटना शहर जाएगी और वहीं मेहनत-मज़दूरी करके उसे पढ़ाएगी, तो पूरे घर ने आसमान सिर पर उठा लिया। देवर ने साफ कह दिया, “भाभी, अगर शहर की हवा खानी है तो जाओ, लेकिन फिर गाँव की इस तीन कट्ठा ज़मीन और इस घर में अपना हिस्सा भूल जाना। एक फूटी कौड़ी नहीं मिलेगी!”

राधा ने एक पल भी नहीं सोचा। उसने कहा, “मुझे तुम्हारी यह तीन कट्ठा ज़मीन नहीं चाहिए। मेरी ज़मीन और मेरा आसमान मेरा बेटा है। मैं उसे इस नरक में सड़ने नहीं दूँगी।” उसने अपनी दो पुरानी साड़ियाँ एक गठरी में बाँधीं, नशे में झूमते बिरजू की बाँह पकड़ी और नन्हे आयुष की उंगली थामकर गाँव की दहलीज़ लाँघ गई। बिरजू को साथ लाना उसकी मजबूरी थी, क्योंकि वह जानती थी कि एक अनजान बड़े शहर में बिना पति के एक जवान औरत को लोग चील-कौवों की तरह नोचने की कोशिश करते हैं। पति भले ही नशेड़ी और निकम्मा था, लेकिन समाज की नज़रों से बचने के लिए उसके नाम का सिंदूर और उसका साथ में होना एक ढाल की तरह ज़रूरी था।

पटना जैसे बड़े शहर में कदम रखते ही राधा को समझ आ गया कि यहाँ की सड़कें जितनी चौड़ी हैं, लोगों के दिल उतने ही तंग हैं। शुरू के कुछ दिन स्टेशन के पास एक धर्मशाला के बरामदे में कटे। फिर एक बस्ती में टीन की छत वाला एक छोटा सा कमरा किराए पर मिला, जिसमें बरसात के दिनों में छत से पानी टपकता था और गर्मियों में वह कमरा तंदूर की तरह तपता था।

राधा ने अपनी कमर कस ली। सुबह चार बजे जब पूरा शहर गहरी नींद में सो रहा होता, राधा उठकर बस्ती के नल से पानी भरती, घर का काम निपटाती और छह बजे तक पास की बड़ी कॉलोनी के एक प्राइवेट स्कूल में पहुँच जाती। वहाँ उसे झाड़ू-पोछा और शौचालय साफ करने का काम मिल गया था। उसने स्कूल के बड़े बाबू के पैरों पर गिरकर विनती की थी कि उसकी आधी पगार काट ली जाए, लेकिन उसके बेटे आयुष को उसी अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल में दाखिला दे दिया जाए। बड़े बाबू को उस माँ की आँखों में तैरते सपनों पर तरस आ गया और आयुष का दाखिला हो गया।

स्कूल की घंटी बजने के बाद राधा का दूसरा संघर्ष शुरू होता। वह दोपहर में चार अलग-अलग कोठियों में बर्तन माँजने और कपड़े धोने जाती। शाम को एक सेठ के घर रसोई में रोटियाँ बेलती। रात को जब वह नौ बजे घर लौटती, तो उसकी कमर सीधी नहीं होती थी और ठंडे पानी व साबुन में काम करने से उसकी उंगलियाँ गलकर सफेद पड़ जाती थीं। उधर बिरजू दिन भर कमरे में पड़ा रहता या बस्ती के किसी कोने में सस्ती दारू पीकर नाली के पास पड़ा मिलता।

एक दिन जब आयुष तीसरी कक्षा में था, स्कूल से उसकी डायरी में एक नोट आया जिस पर माता-पिता के हस्ताक्षर चाहिए थे। आयुष ने भोलेपन से कहा, “माँ, मैडम ने बोला है इस पर साइन कर दो, कल दिखाना है।” राधा डायरी हाथ में लेकर सुन्न खड़ी रह गई। उसे तो समझ ही नहीं आ रहा था कि कागज़ सीधा किधर से है और उल्टा किधर से। जब उसने डायरी पर अपना अँगूठा लगाया, तो अगले दिन स्कूल में बच्चों ने आयुष का बहुत मज़ाक उड़ाया—”देखो रे! आयुष की माँ तो अनपढ़ है, डायरी पर अँगूठा लगाती है!”

उस शाम नन्हा आयुष घर आकर खूब रोया। राधा का कलेजा फट गया। उसने रोते हुए बेटे को गले लगाया, तो मासूम आयुष ने अपनी नन्ही हथेलियों से माँ के आँसू पोंछते हुए कहा था, “माँ, तू मत रो। जब मैं बड़ा होकर पूरी किताब पढ़ लूँगा ना, तो मैं तुझे भी क-ख-ग और तेरा नाम लिखना सिखा दूँगा। फिर कोई मेरा मज़ाक नहीं उड़ाएगा।”

बेटे के उन तोतले और मासूम शब्दों ने राधा के सीने में ठंडक पहुँचा दी थी। उसने उस वादे को अपने आँचल की गाँठ में बाँध लिया था। उसे लगा था कि उसका बेटा बड़ा होकर न सिर्फ उसकी गरीबी दूर करेगा, बल्कि उसके अनपढ़ होने के कलंक को भी धो देगा।

वक्त का पहिया अपनी रफ़्तार से घूमता रहा। आयुष जब आठवीं कक्षा में पहुँचा, तब एक रात बिरजू की कच्ची शराब पीने से तबीयत बिगड़ी और सरकारी अस्पताल ले जाते-जाते उसने दम तोड़ दिया। सिर से पति का साया तो उठ गया, लेकिन राधा के कंधों पर ज़िम्मेदारियों का बोझ दोगुना हो गया। अब आयुष की पढ़ाई का खर्च बढ़ रहा था। उसे कोचिंग की ज़रूरत थी, नई किताबों और प्रोजेक्ट के सामान की ज़रूरत थी।

राधा ने अपना पेट काटना शुरू कर दिया। कोठियों से जो बासी खाना मिलता, वह खुद वही नमक और पानी के साथ खा लेती, लेकिन आयुष के लिए हमेशा ताज़ा दाल-चावल और सब्ज़ी बनाती। सर्दियों की कड़कड़ाती ठंड में जब पटना में कोहरा छा जाता, राधा मालकिन की दी हुई एक फटी पुरानी शॉल लपेटकर काम पर जाती, लेकिन आयुष के लिए उसने पाई-पाई जोड़कर नया गर्म स्वेटर और चमचमाते काले जूते खरीदे थे। जब आयुष स्कूल की टाई और कोट पहनकर बस्ती की गली से निकलता, तो कोई कह ही नहीं सकता था कि यह उस राधा का बेटा है जो लोगों के घरों की गंदगी साफ करती है।

लगातार सीलन भरे कमरे में रहने और धूल-मिट्टी का काम करने से राधा को साँस की बीमारी (दमा) ने घेर लिया था। उसके घुटनों में गठिया का दर्द रहने लगा था, जिससे सीढ़ियाँ चढ़ते वक्त उसकी चीख निकल जाती थी। लेकिन वह केमिस्ट की दुकान से दो रुपये की दर्द की गोली खाकर काम पर लगी रहती, ताकि डॉक्टर की फीस में पैसे बर्बाद न हों और आयुष की पॉलिटेक्निक (इंजीनियरिंग डिप्लोमा) की फीस समय पर भरी जा सके।

आखिरकार राधा की बीस सालों की तपस्या रंग लाई। आयुष ने प्रथम श्रेणी से पॉलिटेक्निक की परीक्षा पास कर ली और शहर की एक बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी में उसे जूनियर इंजीनियर की नौकरी मिल गई। जिस दिन आयुष के हाथ में जॉइनिंग लेटर आया, उस दिन राधा ने पूरे मोहल्ले में गुड़ बाँटा था। उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। उसे लगा कि अब उसके दुख के दिन बीत गए।

नौकरी लगने के कुछ महीनों बाद ही आयुष के रंग-ढंग बदलने लगे। कंपनी के पढ़े-लिखे दोस्तों के बीच उठने-बैठने से उसे अपनी बस्ती के कमरे और अपनी माँ के पहनावे से शर्म आने लगी थी। उसने एक नए इलाके में दो कमरों का फ्लैट किराए पर ले लिया। घर में सोफा आ गया, टीवी आ गया, लेकिन माँ और बेटे के बीच की दूरी बढ़ने लगी। आयुष अब देर रात घर आता और सीधे अपने कमरे में चला जाता।

एक रविवार की सुबह थी। आयुष सोफे पर बैठकर अखबार पढ़ रहा था और चाय पी रहा था। राधा को उस दिन बैंक जाना था, जहाँ उसकी पुरानी पासबुक बदलनी थी। बैंक वाले हमेशा उससे अँगूठा लगवाते थे और दो गवाह माँगते थे, जिससे उसे बहुत ज़िल्लत महसूस होती थी। राधा झिझकते हुए एक पुरानी कॉपी और पेंसिल लेकर आयुष के पास आई। उसकी आँखों में वही बीस साल पुरानी उम्मीद चमक रही थी।

राधा ने बड़े प्यार से बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटा आयुष, आज तो तेरी छुट्टी है ना? देख ना, मुझे बैंक में हर बार अँगूठा लगाना पड़ता है तो बड़ा बुरा लगता है। तूने बचपन में कहा था ना कि बड़ा होकर मुझे पढ़ना-लिखना सिखाएगा। आज मुझे बस मेरा नाम ‘राधा’ लिखना सिखा दे बेटा, ताकि मैं भी कागज़ पर दस्तखत कर सकूँ।”

आयुष के माथे पर बल पड़ गए। उसने अखबार को ज़ोर से मोड़कर मेज़ पर पटका और चिढ़ते हुए बोला, “माँ! तुम्हें सुबह-सुबह कोई और काम नहीं है क्या? पूरे हफ्ते कंपनी में दिमाग खपाता हूँ, एक संडे को तो चैन से जीने दिया करो! और इस पचास साल की उमर में तुम्हें पढ़-लिखकर क्या कलेक्टर बनना है या किसी कचहरी में जज की कुर्सी पर बैठना है? ज़िंदगी भर तो अँगूठा लगाया है, अब चार दिन की ज़िंदगी बची है, उसमें साइन करके कौन सा तीर मार लोगी? जाओ जाकर रसोई में नाश्ता बनाओ, आज मेरे ऑफिस के दो दोस्त घर आने वाले हैं। और हाँ, उनके सामने यह अपनी फटी-पुरानी साड़ी पहनकर मत आ जाना, वरना मेरी इज़्ज़त का कचरा हो जाएगा!”

आयुष तो यह कहकर अपने कमरे में चला गया, लेकिन राधा वहीं पत्थर की मूरत बनी खड़ी रह गई। उसके हाथ से कॉपी और पेंसिल छूटकर फर्श पर गिर गए। “चार दिन की ज़िंदगी बची है… मेरी इज़्ज़त का कचरा हो जाएगा…”—ये शब्द राधा के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रहे थे। उसने अपनी हथेलियों को देखा, जिनकी लकीरें इस बेटे को काबिल बनाने में मिट चुकी थीं। जिस बेटे को पढ़ाने के लिए उसने अपनी जवानी, अपनी सेहत और अपना स्वाभिमान तक गिरवी रख दिया, आज वही बेटा उसे अनपढ़ और गंवार होने का ताना दे रहा था!

उस दिन राधा ने एक आँसू नहीं बहाया, बल्कि अपने सीने में उठे दर्द को एक फौलादी संकल्प में बदल लिया। उसने फर्श से वह कॉपी और पेंसिल उठाई और चुपचाप रसोई में चली गई।

अगले दिन से जब आयुष सुबह नौ बजे ऑफिस के लिए निकल जाता, तो राधा घर में ताला लगाकर उसी पुराने स्कूल के पास जाती जहाँ वह कभी झाड़ू लगाती थी। उसी कॉलोनी में एक रिटायर्ड हिंदी शिक्षिका, शारदा देवी, अकेली रहती थीं। राधा ने शारदा देवी के घर जाकर उनके पैर पकड़ लिए और अपनी सारी व्यथा सुनाई। राधा ने कहा, “बहनजी, मैं आपके घर का सारा काम कर दूँगी—झाड़ू, पोछा, बर्तन, खाना सब कुछ। मुझे बदले में एक रुपया भी पगार नहीं चाहिए। बस आप मुझे रोज़ एक घंटा पढ़ा दीजिए। मैं मरने से पहले अपने बेटे को अपने हाथ से एक चिट्ठी लिखकर दिखाना चाहती हूँ कि उसकी अनपढ़ माँ कमज़ोर नहीं है।”

शारदा देवी की आँखें भर आईं। उन्होंने राधा को उठाया और गले से लगा लिया। उन्होंने कहा, “राधा बहन, तुम काम करने वाली नहीं, आज से मेरी विद्यार्थी हो। मैं तुम्हें ज़रूर पढ़ाऊँगी।”

उस दिन से पचास साल की राधा का स्कूल शुरू हो गया। वह सुबह दस बजे से दोपहर दो बजे तक शारदा दीदी के घर का काम करती और फिर दो से चार बजे तक ज़मीन पर बैठकर स्लेट और चॉक से वर्णमाला सीखती। शुरू में उसकी सख्त और टेढ़ी हो चुकी उंगलियों में पेंसिल नहीं टिकती थी। ‘क’ लिखने में उसका हाथ काँपता था। दमा की खांसी उठती, आँखों से धुंधला दिखता, लेकिन राधा ने हार नहीं मानी। शारदा दीदी ने ही उसे अपनी पुरानी ऐनक से मिलते-जुलते नंबर का एक सस्ता चश्मा बनवा दिया था।

शाम को जब आयुष घर लौटता, तो राधा अपनी किताबें और कॉपियाँ आटे के कनस्तर के पीछे छिपा देती। रात को जब आयुष अपने कमरे में एसी चलाकर सो जाता, तो राधा रसोई के छोटे से बल्ब के नीचे बैठकर घंटों अक्षरों को जोड़-जोड़कर शब्द बनाने का अभ्यास करती। एक महीना बीता, तीन महीने बीते, और देखते-देखते एक साल गुज़र गया। राधा अब न सिर्फ अपना नाम लिख लेती थी, बल्कि हिंदी की किताबें और अखबार भी आसानी से पढ़ने लगी थी।

इधर राधा की सेहत लगातार गिरती जा रही थी। उसके फेफड़े अब जवाब देने लगे थे। डॉक्टर ने साफ कह दिया था कि उसे तुरंत आराम और महँगे इलाज की ज़रूरत है, लेकिन आयुष को अपनी नई कार की ईएमआई और दोस्तों के साथ पार्टियों से ही फुर्सत नहीं थी कि वह माँ की खांसी की आवाज़ सुन सके।

एक दिन राधा को लगा कि अब उसकी साँसों की डोर ज़्यादा लंबी नहीं है। उसने तय किया कि वह अपने बेटे से लड़कर नहीं, बल्कि अपने स्वाभिमान की जीत का प्रमाण छोड़कर जाएगी। वह अपना छोटा सा झोला लेकर बिना बताए शारदा दीदी के घर चली गई, क्योंकि वह अपने आखिरी दिनों में आयुष पर बोझ नहीं बनना चाहती थी। जाने से पहले उसने मेज़ पर अपने हाथों से लिखी वह चिट्ठी रख दी थी।

शाम को जब आयुष ऑफिस से घर लौटा, तो घर में अजीब सा सन्नाटा था। उसने आवाज़ लगाई—”माँ! अरे माँ, चाय बना दो!” कोई जवाब नहीं आया। वह झुंझलाता हुआ माँ के कमरे में गया, तो कमरा खाली था। बिस्तर करीने से लगा हुआ था और सामने मेज़ पर उसकी बचपन की एक पुरानी स्कूल डायरी के ऊपर एक कागज़ फड़फड़ा रहा था।

आयुष ने पास जाकर वह कागज़ उठाया। कागज़ पर बड़े ही साफ और सुंदर अक्षरों में लिखा था:

“मेरे प्यारे बेटे आयुष,

सदा खुश रहो। जब तुम यह चिट्ठी पढ़ रहे होगे, तो शायद तुम्हें यकीन नहीं होगा कि यह तुम्हारी उसी अनपढ़ माँ ने लिखी है, जिसके अँगूठे के निशान से तुम्हें बचपन में स्कूल में और आज अपने दोस्तों के सामने शर्म आती थी।

बेटा, मोर जब जंगल में नाचता है, तो उसे अपने पंखों पर बड़ा घमंड होता है, लेकिन वह भूल जाता है कि उसे सहारा देने वाले पैर कितने भद्दे और खुरदुरे हैं। मैं भी तुम्हारी ज़िंदगी के वही भद्दे पैर थी, जिन्होंने खुद कीचड़ और काँटों में चलकर तुम्हें आसमान की ऊँचाई तक पहुँचाया।

तुमने उस दिन मुझसे पूछा था ना कि इस उमर में पढ़-लिखकर मुझे क्या कलेक्टर बनना है? नहीं बेटा, मुझे कलेक्टर नहीं बनना था। मुझे बस तुम्हारे बचपन का वह अधूरा वादा पूरा करना था, जब तुमने मेरे आँसू पोंछकर कहा था कि ‘माँ, मैं तुझे पढ़ना सिखाऊँगा।’ तुम बड़े होकर अपना वादा भूल गए, क्योंकि शायद बड़े लोगों की याददाश्त छोटी होती है। लेकिन मैंने शारदा दीदी की मदद से पढ़ना और लिखना दोनों सीख लिया है।

इस चिट्ठी के नीचे देखो, आज मैंने अँगूठा नहीं लगाया है, बल्कि अपने हाथों से ‘राधा’ लिखा है। अपनी पुरानी स्कूल डायरी भी देख लेना, जिस पन्ने पर कभी मेरे अँगूठे का निशान देखकर तुम्हारे दोस्त हँसे थे, आज उसके ठीक बगल में तुम्हारी माँ के हस्ताक्षर हैं।

मेरी साँसें अब मेरा साथ नहीं दे रहीं। मैं तुम्हारी चमकती हुई दुनिया में अपनी फटी साड़ी और खांसी की आवाज़ से खलल नहीं डालना चाहती, इसलिए शारदा दीदी के पास आश्रम में जा रही हूँ। अपना ख्याल रखना और समय पर खाना खा लेना।

तुम्हारी माँ — राधा।”

चिट्ठी खत्म होते-होते आयुष के हाथ थर-थर काँपने लगे। उसने तुरंत मेज़ पर रखी अपनी तीसरी कक्षा की वह पुरानी डायरी खोली। पीले पड़ चुके पन्ने पर बीस साल पुराना नीले अँगूठे का निशान था, और ठीक उसके नीचे ताज़ा स्याही से लिखा था—’राधा (आयुष की माँ)’।

आयुष की आँखों के सामने से अहंकार का पर्दा एक झटके में फट गया। उसे याद आया कि कैसे उसकी माँ सर्दियों में ठंडे पानी में बर्तन माँजती थी, कैसे खुद बासी रोटी खाकर उसके लिए देसी घी का पराठा बनाती थी, और कैसे उसने उस दिन अपनी ही माँ को इतना ज़लील किया था। आयुष के सीने में एक भयानक हूक उठी और वह घुटनों के बल ज़मीन पर गिरकर बच्चों की तरह दहाड़ें मारकर रोने लगा।

वह पागलों की तरह उठा, बिना जूते पहने नंगे पैर ही फ्लैट से बाहर भागा। वह भागता हुआ अपनी पुरानी बस्ती के पास शारदा देवी के घर पहुँचा। दरवाज़ा खटखटाते ही जब शारदा देवी ने दरवाज़ा खोला, तो सामने आयुष खड़ा था—उसकी आँखें लाल थीं और चेहरे पर गहरा पश्चाताप था।

अंदर कमरे में राधा तख्त पर लेटी थी और उसे तेज़ खांसी आ रही थी। आयुष दौड़ता हुआ गया और सीधा अपनी माँ के पैरों में गिर पड़ा। उसने माँ के उन खुरदुरे और काँपते पैरों को अपने सीने से लगा लिया और सिसकते हुए बोला, “माँ! मुझे माफ़ कर दे माँ! मैं अंधा हो गया था अपनी डिग्री और पैसे के घमंड में! मैं भूल गया था कि मैं जिस कुर्सी पर बैठा हूँ, उसकी नींव तेरे पसीने और तेरे त्यागे हुए निवालों से बनी है। माँ, चल मेरे साथ घर चल। मैं तुझे दुनिया के सबसे बड़े अस्पताल में दिखाऊँगा। तू मुझे छोड़कर मत जा माँ!”

राधा ने अपने कमज़ोर हाथों से अपने भटके हुए बेटे के सिर को सहलाया। एक माँ का दिल आखिर माँ का ही होता है; बेटे के सच्चे आँसुओं ने उसके सारे घाव धो दिए। शारदा देवी की आँखों में भी खुशी के आँसू थे।

आयुष अपनी माँ को गोद में उठाकर कार तक लाया और सीधे शहर के सबसे बड़े अस्पताल ले गया। दो महीने के अच्छे इलाज और बेटे की दिन-रात की सेवा से राधा की सेहत में चमत्कारिक सुधार हुआ। आयुष ने अपने घर के सबसे बड़े और हवादार कमरे में माँ के लिए एक छोटी सी लाइब्रेरी बनवाई।

कुछ महीनों बाद, जब आयुष की कंपनी के वार्षिक समारोह में उसे ‘बेस्ट इंजीनियर’ का पुरस्कार देने के लिए मंच पर बुलाया गया, तो आयुष ने माइक थामकर कहा, “यह पुरस्कार मेरा नहीं, बल्कि उस महिला का है जिसने स्कूल के शौचालय साफ करके मुझे इंजीनियर बनाया और पचास साल की उम्र में खुद पढ़ना सीखकर मेरे अहंकार को तोड़ा।”

आयुष ने मंच से नीचे उतरकर अपनी माँ राधा का हाथ थामा और उन्हें मंच के बीचों-बीच ले आया। जब राधा ने मंच पर रखे रजिस्टर पर अँगूठा लगाने के बजाय गर्व से कलम उठाकर ‘राधा’ लिखा, तो पूरा हॉल खड़ा होकर तालियाँ बजाने लगा। आज राधा के चेहरे पर किसी मालकिन की उतरन की बेबसी नहीं, बल्कि एक स्वाभिमानी और शिक्षित माँ का तेज चमक रहा था।

क्या आपको भी लगता है कि आजकल के बच्चे कामयाब होने के बाद अपने माता-पिता के त्याग और संघर्ष को भूल जाते हैं? राधा के इस हौसले और आयुष के पछतावे के बारे में आपकी क्या राय है? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय ज़रूर लिखें और अपनी माँ के लिए एक प्यारा सा शब्द ज़रूर छोड़ें!

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मूल लेखिका : वीणा सिंह

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