देवानंद को लगा कि इतने सालों बाद शायद भाभी का दिल पिघल गया हो, और वैसे भी अनन्य उनकी अपनी ही भतीजी थी। अपनी लाडली के सुनहरे भविष्य की खातिर देवानंद अपना आत्मसम्मान एक तरफ रखकर फिर से कामिनी के आलीशान बंगले पर पहुँचे। उन्होंने विनती करते हुए कहा, “भाभी, अनन्य का दाखिला यहाँ के बड़े कॉलेज में हुआ है। शहर उसके लिए बिल्कुल नया है। आपका इतना बड़ा घर है, एक कोने में वह भी पड़ी रहेगी और अपनी पढ़ाई पूरी कर लेगी। आप बस उसे अपने साए में रख लीजिए।”
नदी किनारे बसे सुंदरपुर गाँव में परशुराम जी का भरा-पूरा परिवार कभी पूरे इलाके में मिसाल माना जाता था। परशुराम जी के चार बेटे थे—जगदीश, देवानंद, त्रिलोकी और सबसे छोटा भुवन। चारों बेटों का स्वभाव एक-दूसरे से बिल्कुल अलग था, लेकिन जब तक माँ-बाबूजी का साया सिर पर रहा, घर की दीवारें कभी अलग नहीं हुईं। सबसे छोटे बेटे भुवन के ब्याह के दो वर्ष बाद, घर के आँगन में आपसी सहमति से बँटवारे की रेखा खिंच गई। कोई मनमुटाव या लड़ाई-झगड़ा नहीं हुआ, बस सबकी अपनी-अपनी राहें तय हो गईं।
देवानंद, जो दूसरे नंबर के थे, बचपन से ही मिट्टी से जुड़े इंसान थे। उन्होंने और सबसे छोटे भाई भुवन ने पुरखों की खेती सँभालने के लिए गाँव में ही रहने का फैसला किया। तीसरे नंबर के भाई त्रिलोकी ने पास के कस्बे में जाकर मोटर मैकेनिक का काम सीखा और बाद में अपनी एक छोटी सी ऑटो पार्ट्स और गैरेज की दुकान जमा ली। सबसे बड़े भाई जगदीश हमेशा से बड़े सपने देखने वाले और महत्वाकांक्षी इंसान थे। बँटवारे से पहले ही उन्होंने कानपुर जाकर चमड़े और जूतों के कच्चे माल का एक छोटा कारखाना शुरू कर दिया था। वक्त का पहिया घूमा और कारोबार में ऐसी बरकत हुई कि बँटवारे के महज दो साल के भीतर ही जगदीश ने दो और नई यूनिटें खड़ी कर लीं।
गाँव की पुश्तैनी हवेली में बूढ़े परशुराम जी और उनकी धर्मपत्नी यशोदा जी अपने दूसरे बेटे देवानंद के साथ ही रहते थे। देवानंद और भुवन रहते तो अलग-अलग चूल्हे पर थे, मगर खेतों की जुताई, बुवाई और कटाई में दोनों कंधे से कंधा मिलाकर पसीना बहाते। देवानंद की बेटी अनन्य बचपन से ही पढ़ने-लिखने में होशियार और समझदार थी। जगदीश भैया जब कानपुर में अपनी नई यूनिटों का उद्घाटन कर रहे थे, तो उन्होंने बाबूजी और माँ को बहुत मनुहार करके शहर बुलाया। बूढ़े माँ-बाप कुछ दिन शहर के उस बड़े से मकान में रहे, लेकिन वहाँ की भागदौड़ और बंद कमरों की घुटन उन्हें रास नहीं आई। वे गाँव लौट आए और फिर साल में एकाध बार ही पोते-पोतियों से मिलने शहर जाया करते थे।
जगदीश के ठाठ-बाट अब बदल चुके थे। जब उन्होंने कारखाने का विस्तार किया था, तब बिना किसी को बताए बड़ा कर्ज़ उठा लिया था, मगर उस वक्त देवानंद और त्रिलोकी ने अपनी बचत और मेहनत लगाकर उनका साथ दिया और सब कुछ सँभल गया। इसके बाद जगदीश का उठना-बैठना शहर के रईसों और उद्योगपतियों में होने लगा। गाँव की पगडंडियाँ अब उनके चमचमाते जूतों को गंदी लगने लगी थीं। त्योहारों पर वे गाँव आने के बजाय केवल महंगे उपहार, मिठाइयों के डिब्बे और साड़ियाँ भिजवाकर अपने पारिवारिक कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते थे। देवानंद हमेशा खुश रहते कि उनका बड़ा भाई शहर में नाम कमा रहा है।
देवानंद के खेतों में हरियाली लहलहा रही थी, बच्चे बड़े हो रहे थे और जिंदगी अपने सहज ढर्रे पर चल रही थी। लेकिन जगदीश की महत्वाकांक्षाओं की कोई सीमा न थी। वे कानपुर के सबसे बड़े चमड़ा व्यापारी बनना चाहते थे। बिना सोचे-समझे और बाज़ार की मंदी को नज़रअंदाज़ करते हुए उन्होंने इस बार शहर के कुछ कुख्यात और दबंग सूदखोरों से भारी ब्याज पर मोटी रकम उठा ली। दुर्भाग्य से उसी साल मॉनसून ने दगा दे दिया। देवानंद और भुवन के खेत सूखे की मार झेलने लगे, कुएँ सूख गए और फसलें मुरझा गईं। देवानंद खुद तंगी से घिर गए थे, इसलिए जगदीश की उनसे मदद माँगने की हिम्मत ही नहीं हुई।
इधर सूदखोरों ने जगदीश के कारखाने और घर पर पहरे बैठा दिए। हर दिन गालियाँ, धमकियाँ और बेइज्जती उनका पीछा करने लगी। जगदीश अंदर ही अंदर घुटने लगे। घर में उनकी पत्नी कामिनी अपनी किटी पार्टियों, महंगे आभूषणों और सहेलियों के दायरे में मशगूल रहती थी। बेटा और बेटी महंगे लैपटॉप और आईफोन में अपनी अलग दुनिया बसाए बैठे थे। किसी को यह देखने की फुर्सत ही नहीं थी कि घर का मुखिया किस मानसिक अवसाद से गुजर रहा है। जिन भाइयों ने पहले संकट में जान लड़ा दी थी, उनसे झूठी शान के चलते जगदीश ने पहले ही दूरी बना ली थी।
दबाव और अपमान जब बर्दाश्त से बाहर हो गया, तो एक खौफनाक रात जगदीश ने जहर खाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। उन्होंने एक पत्र छोड़ा था जिसमें लिखा था कि उनकी भारी-भरकम जीवन बीमा पॉलिसी की रकम से परिवार का भविष्य संवर जाएगा और सूदखोर उनकी मौत के बाद परिवार को छोड़ देंगे। जब यह खबर गाँव पहुँची, तो मानो आसमान टूट पड़ा। देवानंद बदहवास होकर शहर भागे। सदमे के कारण बाबूजी परशुराम जी को दिल का गंभीर दौरा पड़ा। देवानंद ने जैसे-तैसे बाबूजी को अस्पताल में भर्ती कराया और बड़े भाई का अंतिम संस्कार कर उनकी बिलखती पत्नी कामिनी और दोनों बच्चों को लेकर गाँव आ गए।
सूदखोरों का आतंक अब भी खत्म नहीं हुआ था। उन्होंने कारखाने की दो यूनिटों और शहर के आलीशान बंगले पर कब्ज़ा करके नीलाम करवा दिया। इसके बावजूद भारी ब्याज और मूलधन बाकी रह गया। कानून और गुंडों के डर से पूरे खानदान की पगड़ी दांव पर थी। अपने स्वर्गीय बड़े भाई के परिवार की लाज बचाने और सूदखोरों के चंगुल से उन्हें छुड़ाने के लिए देवानंद ने अपने हिस्से की उपजाऊ जमीन का आधा हिस्सा औने-पौने दाम में बेच दिया। भुवन ने भी अपनी बचत झोंक दी। तब जाकर जगदीश का परिवार कर्ज़ के फंदे से मुक्त हुआ।
गाँव के सादे माहौल में कामिनी और उनके बच्चों का दम घुटने लगा। जो बच्चे शहर के वातानुकूलित कमरों और महंगे गैजेट्स के आदी थे, उन्हें गाँव की धूल, कच्ची रसोई और बिजली की आँख-मिचौनी नरक जैसी लगने लगी। मुश्किल से दो महीने बीते होंगे कि कामिनी ने देवानंद के सामने हाथ नचाते हुए कह दिया, “देवर जी, हम इस पिछड़े गाँव में कीड़े-मकोड़ों की तरह नहीं जी सकते। हमारे रहने का बंदोबस्त शहर में कराइए।”
देवानंद ने लाचारी से सिर झुका लिया, “भाभी, सूखा पड़ा है, आधा खेत भाई साहब का कर्ज़ चुकाने में बिक गया। बाबूजी के इलाज में सब खत्म हो गया। इस वक्त मेरे पास इतना सामर्थ्य नहीं है कि मैं शहर में आपके लिए अलग घर का खर्च उठा सकूँ। आप साल-छह महीने यहीं सब्र से रहें, हालात सुधरते ही मैं खुद व्यवस्था करूँगा।”
गाँव का रूखा-सूखा खाना और अभाव कामिनी को बर्दाश्त नहीं हुआ। आठ महीने जैसे-तैसे काटकर वह अपने बच्चों को लेकर अपने मायके चली गईं। इधर देवानंद पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। भतीजे-भतीजी और भाभी की जिम्मेदारी उठाने और खेती को दोबारा खड़ा करने के लिए उन्हें खुद साहूकार से ऊँचे ब्याज पर कर्ज़ लेना पड़ा था। फसलें ठीक नहीं हुईं और कर्ज़ का बोझ साल-दर-साल बढ़ता चला गया।
उधर एक गहरा सच देवानंद से छिपा हुआ था। जगदीश के कारखाने की एक छोटी यूनिट कामिनी के नाम पर थी, जो नीलामी से बच गई थी। साथ ही जगदीश के बीमा क्लेम की एक मोटी रकम भी कामिनी के खाते में आ चुकी थी। कामिनी ने अपने चालाक भाइयों की मदद से उस पैसे को उस बची हुई यूनिट में लगाया और धीरे-धीरे कारोबार को फिर से खड़ा कर लिया। महज दो साल में कामिनी का परिवार फिर से शहर में ठाठ की जिंदगी जीने लगा।
गाँव में देवानंद जब कर्ज़ की किस्तों में पूरी तरह घिर गए, तो एक दिन हिम्मत जुटाकर वे शहर पहुँचे। उन्होंने कामिनी से हाथ जोड़कर कहा, “भाभी, भैया का कारखाना फिर से चल निकला है, यह जानकर बहुत तसल्ली हुई। अगर आप कुछ हज़ार रुपयों से मेरी मदद कर दें, तो मैं साहूकार का ब्याज चुका दूँ, नहीं तो वह बाकी बचा खेत भी कुर्क करवा लेगा।”
कामिनी ने चाय का प्याला मेज पर पटकते हुए सूखा सा जवाब दिया, “देवर जी, आपको क्या लगता है कि हम नोट छाप रहे हैं? यह कारखाना शुरू करने के लिए मेरे मायके वालों ने कर्ज़ लिया है, हम खुद एक-एक पैसे के मोहताज हैं।” देवानंद ने भाभी की बात पर यकीन कर लिया और बिना कोई शिकायत किए, आँखों में आँसू लिए गाँव लौट आए। उन्होंने और ज्यादा मेहनत करनी शुरू कर दी, सुबह से लेकर देर रात तक वे खेतों में हल चलाते ताकि अपनी बेटी अनन्य और छोटे बेटे को पढ़ा सकें।
समय अपनी गति से बीतता रहा। सात साल गुजर गए। इन सात सालों में गाँव ने बहुत कुछ खोया। बाबूजी परशुराम जी का देहांत हो गया। कामिनी इन सात वर्षों में केवल दो बार गाँव आई—एक बार जब ससुर का देहांत हुआ तो रस्म निभाने के लिए दो घंटे रुकीं, और दूसरी बार अपनी बड़ी बेटी के विवाह का निमंत्रण देने के लिए।
कामिनी की बेटी का विवाह शहर के एक पाँच सितारा हेरिटेज रिसॉर्ट में हुआ था। जब देवानंद, उनकी पत्नी और भुवन का परिवार शादी में पहुँचा, तो वहाँ की चकाचौंध, फूलों की सजावट और शाही दावत देखकर उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। लाखों रुपये पानी की तरह बहाए जा रहे थे। अनन्य, जो अब बारहवीं में पूरे जिले में अव्वल आई थी, शहर की उस चमक-दमक और वहाँ के प्रतिष्ठित कॉलेज को देखकर एक नया सपना बुनने लगी। उसने राज्य स्तरीय प्रवेश परीक्षा पास कर ली थी और उसे उसी शहर के सबसे बड़े डिग्री कॉलेज में दाखिला मिल गया था।
गाँव लौटकर अनन्य ने हिचकिचाते हुए अपने पिता से कहा, “बाबूजी, मुझे शहर के कॉलेज में पढ़ना है। अगर मैं ताई जी के बड़े से घर में रहकर पढ़ाई कर लूँ, तो हॉस्टल का भारी भरकम खर्च बच जाएगा और मैं आपके कर्ज़ का बोझ नहीं बनूँगी।”
देवानंद को लगा कि इतने सालों बाद शायद भाभी का दिल पिघल गया हो, और वैसे भी अनन्य उनकी अपनी ही भतीजी थी। अपनी लाडली के सुनहरे भविष्य की खातिर देवानंद अपना आत्मसम्मान एक तरफ रखकर फिर से कामिनी के आलीशान बंगले पर पहुँचे। उन्होंने विनती करते हुए कहा, “भाभी, अनन्य का दाखिला यहाँ के बड़े कॉलेज में हुआ है। शहर उसके लिए बिल्कुल नया है। आपका इतना बड़ा घर है, एक कोने में वह भी पड़ी रहेगी और अपनी पढ़ाई पूरी कर लेगी। आप बस उसे अपने साए में रख लीजिए।”
कामिनी के चेहरे पर हिकारत के भाव तैर गए। उन्होंने तुनककर कहा, “माफ कीजिए देवर जी, हमारे पास इतना फालतू वक्त नहीं है कि किसी गाँव की लड़की की रखवाली करें। और भूलिए मत, जब हम बेसहारा होकर गाँव आए थे, तो आपने हमें रूखी रोटियों के लिए भी तरसा दिया था। हमें एहसान मत जताइए। अगर बेटी को पढ़ाने का इतना ही शौक है, तो किसी हॉस्टल में रखिए, हमारे घर में रिश्तेदारों के लिए कोई जगह नहीं है।”
देवानंद के पैरों तले से जमीन खिसक गई। जिस भाभी और बच्चों के लिए उन्होंने अपनी आधी पुश्तैनी जमीन कुर्बान कर दी थी, आज उसी भाभी ने उनके मुँह पर अपमान का ऐसा तमाचा मारा था। वे सिर झुकाए, भीगी आँखों से गाँव लौटे।
घर के दालान में जब देवानंद ने सिसकते हुए अपनी बूढ़ी माँ यशोदा जी और बेटी अनन्य को सारी बात बताई, तो अनन्य की आँखों से आँसू छलक पड़े। बूढ़ी यशोदा जी ने अपनी कांपती लाठी को फर्श पर पटका और अपने बेटे के कंधे पर हाथ रखकर बड़े धीरज से कहा, “बेटा देवानंद, रोना बंद कर। जब बड़का बेटा ही नहीं रहा, तो काहे की भौजाई और काहे के रिश्ते! वे सब सिर्फ मतलब के साथी थे। जब तक तुमसे लेना था, तब तक तुम अपने थे; जब देने की बारी आई, तो उन्होंने अपनी औकात दिखा दी। तू बिल्कुल हिम्मत मत हार। मैं अपने हिस्से के जो दो कंगन बचे हैं, उन्हें बेच दूँगी। तू अपनी बेटी को हॉस्टल में रखकर ही पढ़ाएगा। हमारी अनन्य किसी के रहमो-करम पर नहीं, अपने दम पर आगे बढ़ेगी। आज से यह मान ले कि इस चौखट के बाहर तेरा कोई सगा नहीं है।”
दादी के इन शब्दों ने अनन्य के भीतर एक नई ज्वाला प्रज्वलित कर दी। उसने अपने आँसू पोंछे और पिता के हाथ थामकर कहा, “बाबूजी, मैं ताई जी के तानों को अपनी ताकत बनाऊँगी। आप देखिएगा, एक दिन आपका यह सिर गर्व से ऊँचा होगा।”
दादी के कंगन बिके, देवानंद ने दिन-रात मजदूरी और खेती करके पैसे जुटाए और अनन्य को शहर के एक साधारण हॉस्टल में दाखिल कराया गया। अनन्य ने एक-एक पल का सदुपयोग किया। उसने न केवल कॉलेज में टॉप किया, बल्कि सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी भी पूरी लगन से शुरू कर दी। वह छुट्टियों में भी घर नहीं जाती थी, हॉस्टल के एक छोटे से कमरे में टेबल लैंप की रोशनी में रात-रात भर पढ़ती थी।
चार साल की अटूट तपस्या रंग लाई। अनन्य ने अपने पहले ही प्रयास में संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में शीर्ष स्थान हासिल किया और वह उसी शहर में सहायक ज़िला दंडाधिकारी (एडीएम) के पद पर नियुक्त हुई। जिस दिन यह खबर सुंदरपुर गाँव पहुँची, पूरे गाँव में ढोल-नगाड़े बजने लगे। देवानंद की आँखों से आज भी आँसू बह रहे थे, लेकिन वे अपमान के नहीं, स्वाभिमान और विजय के आँसू थे।
गाँव से जब देवानंद, उनकी माँ यशोदा जी और भुवन शहर में अनन्य के सरकारी आवास पर पहुँचे, तो पूरे सम्मान के साथ उनका स्वागत हुआ। अनन्य ने अपनी पहली तनख्वाह और मिलने वाले भत्तों से सबसे पहले अपने पिता के सिर पर लदे साहूकार के पूरे कर्ज़ का पाई-पाई चुकता किया और अपनी बिकी हुई जमीन को वापस खरीदकर पिता के हाथों में उसके कागज़ात रख दिए।
उधर वक्त ने कामिनी के साथ भी अपना इंसाफ किया था। कामिनी के बेटे ने बुरी संगत में पड़कर सट्टेबाजी और अय्याशी में कारखाने को भारी घाटे में डाल दिया था। कामिनी जब अपनी बेटी और दामाद के पास मदद माँगने गईं, तो दामाद ने उन्हें घर से निकाल दिया। जब कामिनी को पता चला कि गाँव की वही अनन्य, जिसे उन्होंने अपने घर की देहरी पर रखने से मना कर दिया था, आज शहर की सबसे बड़ी प्रशासनिक अधिकारी बन चुकी है, तो वे एक दिन अपनी फरियाद लेकर अनन्य के दफ्तर पहुँचीं।
दफ्तर में अनन्य अपनी कुर्सी पर बैठी फाइलों पर हस्ताक्षर कर रही थी। सामने कामिनी को सिर झुकाए, फटेहाली में खड़े देखकर अनन्य अपनी कुर्सी से उठी। उसने अपनी ताई जी के चरण स्पर्श किए और उन्हें सम्मान से कुर्सी पर बिठाया। कामिनी की आँखें शर्म से झुक गईं, वे रोते हुए बोलीं, “अनन्य बेटी, मुझे माफ कर दे। मैंने तुम्हारे पिता के त्याग की कीमत नहीं समझी और तुम्हें अपने घर से दुत्कार दिया था।”
अनन्य ने शांत और गंभीर स्वर में कहा, “ताई जी, आपने उस दिन जो किया, उसने मुझे तोड़ा नहीं, बल्कि मुझे अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया। पिताजी ने जो फर्ज निभाया था, वह किसी बदले की उम्मीद में नहीं निभाया था। हम बदले की भावना से नहीं जीते। एक अधिकारी के रूप में नियम के तहत आपकी जो भी कानूनी सहायता होगी, मैं जरूर करूँगी, लेकिन रिश्तों का जो मान उस दिन टूटा था, वह अब केवल यादों में ही रह सकता है।”
कामिनी के पास पश्चाताप के आंसुओं के सिवा कुछ न बचा था। देवानंद के घर में आज खुशहाली की बयार बह रही थी, क्योंकि जहाँ त्याग, सत्य और स्वाभिमान होता है, वहाँ देर से ही सही, ईश्वर की कृपा अवश्य बरसती है।
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मूल लेखिका : मेघा मालवीय