ममता की छांव

पापा! मम्मी! देखो हम सब आ गए! सबसे आगे पल्लवी, वैशाली, तन्वी, हिमानी और चारु जैसी वे बेटियां थीं, जिनका कन्यादान मनसुख भाई ने पहले किया था। उनके चेहरों पर मायके आने की वही रौनक और खिलखिलाहट थी, जो किसी भी लाडली बेटी के चेहरे पर होती है। उनके पीछे उनके पति यानी मनसुख भाई के दामाद भी हाथों में उपहार, मिठाइयों के डिब्बे और फल लिए चले आ रहे थे।

अरे तुम सब आ गईं! आओ मेरी बच्चियों, आओ! शारदा बेन ने अपनी बाहें फैला दीं। एक-एक करके सभी बेटियां उनसे और मनसुख भाई से लिपट गईं। कोई उनके पैर छू रही थी तो कोई गले मिलकर लाड़ जता रही थी।

 यह सुनते ही सावित्री जी का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। वे हाथ नचाते हुए बोलीं, “एक घंटा? तुझे जब देखो अपने बच्चे को दूसरों के सिर मढ़कर बाहर घूमने का शौक क्यों चढ़ा रहता है? क्या मेरे भरोसे इस बच्चे को जन्म दिया था? और आजकल कौन भरी दुपहरी में बाजार भटकने जाता है? जब देखो तब तुम्हारे नाम के पार्सल घर आते रहते हैं, ऑनलाइन शॉपिंग करती हो। आज अचानक बाजार जाने का भूत कैसे सवार हो गया? और देख नहीं रही हो, आज सुबह से मेरा सिर भारी है, तबीयत ठीक नहीं लग रही मेरी।

चंडीगढ़ के सेक्टर-14 की शांत सड़क पर स्थित ‘सद्भावना निवास’ में सुबह की धूप खिड़कियों से छनकर आ रही थी। रसोई में कुकर की सीटी बजी और चाय की सौंधी खुशबू पूरे आंगन में फैलने लगी। अंजलि ने अदरक वाली चाय के दो कप ट्रे में सजाए और बालकनी में बैठी अपनी सास सावित्री जी के पास ले आई। पास ही झूले में आठ महीने का नन्हा विवान खेल रहा था। ससुर जी हरिहर बाबू कुर्सी पर बैठे अखबार पलट रहे थे और पति निशांत तैयार होकर दफ्तर निकलने की जल्दी में था।

अंजलि ने चाय का कप मेज पर रखते हुए धीरे से कहा, “मम्मी जी, कल सुबह ससुर जी की आंखों की जांच की रिपोर्ट लेने शहर के बड़े आई-सेंटर जाना है। निशांत को तो ऑडिट की वजह से दफ्तर से छुट्टी मिल नहीं पाएगी, तो मैं ही जाकर ले आऊंगी।”

सावित्री जी ने चाय की चुस्की लेते हुए मुस्कुराकर कहा, “हां बहू, यह तो तूने बहुत अच्छा सोचा। हरिहर जी की रिपोर्ट समय पर आ जाए तो डॉक्टर से आगे की दवाई भी शुरू हो जाएगी। तू चली जाना।”

अंजलि ने थोड़ा झिझकते हुए आगे जोड़ा, “पर मम्मी जी… वह अस्पताल यहां से काफी दूर है। बस-ऑटो बदलते हुए थोड़ा समय लग जाएगा। सोच रही थी कि वापसी में घर का राशन और रसोई के कुछ जरूरी मसाले भी ले आऊं, ताकि बार-बार धूप में न निकलना पड़े। ऐसे में अगर मैं विवान को साथ ले गई तो वह धूप और धूल में परेशान हो जाएगा। क्या आप थोड़ी देर के लिए उसे संभाल लेंगी?”

सावित्री जी ने तुरंत लाड़ जताते हुए कहा, “अरे बहू! तू भी कैसी बात करती है? विवान मेरा पोता है। तू उसकी बिल्कुल चिंता मत कर। मैं उसे बड़े प्यार से खिला लूंगी, मालिश कर दूंगी और सुला भी दूंगी। तू बिना किसी फिक्र के जा और इत्मीनान से सारा काम निपटाकर आना।”

अंजलि के मन को बड़ा संबल मिला। उसने अगले दिन सुबह उठकर घर का सारा काम निपटाया, ससुर जी की रिपोर्ट लाई, बाजार से राशन खरीदा और दोपहर तक घर लौट आई। विवान अपनी दादी की गोद में खेल रहा था। अंजलि को लगा कि उसका ससुराल सचमुच कितना समझदार और सहयोगी है।

लगभग दस दिन बाद, अंजलि की कॉलेज की सबसे पक्की सहेली कृतिका के विवाह का बुलावा आया। कई सालों बाद कॉलेज के पुराने साथियों से मिलने का यह इकलौता मौका था। शाम को जब चाय का समय हुआ, तो अंजलि ने हिम्मत जुटाकर सावित्री जी से कहा, “मम्मी जी, आज शाम को कृतिका की शादी का रिसेप्शन है। बहुत दिनों बाद सब दोस्त इकट्ठा हो रहे हैं। हॉल काफी बड़ा है, पर शादी में तेज डीजे, आतिशबाजी और भारी भीड़ होगी। विवान अभी बहुत छोटा है, इतने शोरगुल में घबरा जाएगा और उसकी नींद भी खराब होगी। क्या आज शाम के लिए आप उसे दो घंटे संभाल लेंगी? निशांत भी दफ्तर से सीधे वहीं पहुंचेंगे।”

सावित्री जी के माथे पर तुरंत बल पड़ गए। उनके चेहरे की मिठास अचानक गायब हो गई और आवाज में तीखापन आ गया, “क्या कहा? विवान को मेरे पास छोड़कर शादी में जाएगी? बहू, तूने मुझे क्या समझ रखा है? मेरी उम्र देखी है? घुटनों का दर्द और ब्लड प्रेशर से मेरा बुरा हाल रहता है। मुझसे इतनी भागदौड़ और बच्चों की संभाल नहीं होती। मेरा नियम है कि रात आठ बजे खाना खाकर नौ बजे तक बिस्तर पर चली जाती हूँ। अब मैं इस उम्र में तेरे बच्चे को लेकर रातभर जागती रहूँ? शादी-ब्याह का मामला है, कब विदाई होगी, कब तू लौटेगी, इसका कोई ठिकाना है क्या? ना बाबा ना, मुझसे यह सब नहीं होगा। बच्चे को साथ लेकर जा। हम औरतों को तो बच्चों को आंचल से बांधकर ही हर जगह जाना पड़ता है। मां बनने का यही फर्ज होता है।”

सास की इन कड़वी बातों ने अंजलि के दिल को छलनी कर दिया। वह चुपचाप अपने कमरे में चली आई। उसने विवान को तैयार किया और भारी मन से शादी समारोह में पहुंची। जैसा कि अंजलि को डर था, वही हुआ। शादी के हॉल में बज रहे कानफाड़ू संगीत, चकाचौंध रोशनी और भीड़भाड़ से विवान सहम गया और जोर-जोर से चीखकर रोने लगा। निशांत ने उसे गोद में लेकर बहलाने की कोशिश की, पर बच्चा किसी के हाथ में चुप नहीं हो रहा था। भूख और नींद से बेहाल बच्चा लगातार रोए जा रहा था। अंजलि न तो अपनी सहेली से ठीक से मिल पाई, न खाना खा सकी और न किसी से बात कर पाई। वह नम आँखों से आधे घंटे के भीतर ही बच्चे को सीने से चिपकाकर घर लौट आई। पूरे रास्ते वह सोचती रही कि जब ससुराल के काम की बात थी तो दादी की उम्र और बीमारी आड़े नहीं आई, पर जब उसकी अपनी थोड़ी सी खुशी की बात आई, तो उम्र का पहाड़ खड़ा कर दिया गया।

दो दिन शांति से गुजरे। तीसरे दिन सुबह सावित्री जी नाश्ते की मेज पर आईं और बड़े अपनत्व भरे स्वर में बोलीं, “बहू, कल हरिहर जी का रूटीन चेकअप है। डॉक्टर का समय ले लेना और अगर हो सके तो तुम ही उनके साथ अस्पताल चली जाना। तुम तो जानती ही हो, मुझसे अस्पताल की कुर्सियों पर इतनी देर बैठा नहीं जाता। मुझे वहां घुटन होने लगती है।”

अंजलि ने मासूमियत से पूछा, “पर मम्मी जी, विवान? अस्पताल में तो संक्रमण का डर रहता है, उसे साथ ले जाना ठीक नहीं होगा।”

सावित्री जी ने तुरंत हंसते हुए विवान को गोद में उठाया, उसके गाल चूमे और बोलीं, “अरे पगली! उसकी दादी बैठी है ना उसके लिए! दादी-पोते का प्यार तो सबसे निराला होता है। तू बेफिक्र होकर बाबूजी को डॉक्टर को दिखा ला।”

अंजलि एकटक अपनी सास को देखती रह गई। उसके मन में कई सवाल उठे, पर वह चुप रही और ससुर जी को अस्पताल ले जाकर चेकअप करवा लाई।

अगले दिन दोपहर में अंजलि ने फोन पर बात करने के बाद सावित्री जी से झिझकते हुए कहा, “मम्मी जी, मुझे बाजार से कुछ पारंपरिक शॉल और कश्मीरी कढ़ाई के कुर्ते खरीदने हैं। क्या आप सिर्फ एक घंटे के लिए विवान को देख लेंगी? मैं जल्दी से जाकर ले आऊंगी।”

यह सुनते ही सावित्री जी का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। वे हाथ नचाते हुए बोलीं, “एक घंटा? तुझे जब देखो अपने बच्चे को दूसरों के सिर मढ़कर बाहर घूमने का शौक क्यों चढ़ा रहता है? क्या मेरे भरोसे इस बच्चे को जन्म दिया था? और आजकल कौन भरी दुपहरी में बाजार भटकने जाता है? जब देखो तब तुम्हारे नाम के पार्सल घर आते रहते हैं, ऑनलाइन शॉपिंग करती हो। आज अचानक बाजार जाने का भूत कैसे सवार हो गया? और देख नहीं रही हो, आज सुबह से मेरा सिर भारी है, तबीयत ठीक नहीं लग रही मेरी।”

अंजलि ने धीमी आवाज में सफाई दी, “मम्मी जी, दीदी कह रही थीं कि जो खास कढ़ाई का कपड़ा उन्हें चाहिए, वह हमारे शहर के मेन मार्केट में ही अच्छा मिलता है। इसलिए उन्होंने मुझसे मंगवाने को कहा था।”

सावित्री जी ने तिनककर कहा, “अच्छा! तो अब अपनी दीदी के शौक पूरे करने के लिए तुम दूधमुंहे बच्चे को घर छोड़कर निकलोगी? अपनी दीदी से साफ कह दो कि या तो ऑनलाइन मंगा लें या जब कभी खुद यहां आएं तो अपने पैरों से जाकर खरीद लें। मेरे घर में यह सब तमाशा नहीं चलेगा।”

अंजलि ने गहरी सांस ली, अपनी आँखों में उमड़ते आंसुओं को रोका और फोन निकालते हुए कहा, “ठीक है मम्मी जी, मैं अभी फोन करके दीदी से मना कर देती हूँ।”

अंजलि ने नंबर मिलाया और फोन कान पर लगाकर बोली, “हेलो रश्मि दीदी… नमस्ते। वो दीदी, मैं आज मेन मार्केट नहीं जा पाऊंगी। दरअसल मम्मी जी कह रही हैं कि…”

सावित्री जी के कान खड़े हो गए। उन्होंने तुरंत अंजलि की बात बीच में काटी और चौंककर पूछा, “क्या? रश्मि? मेरी बेटी रश्मि का फोन है?”

अंजलि ने फोन कान से हटाकर धीरे से कहा, “जी मम्मी जी, रश्मि दीदी का ही फोन है।”

सावित्री जी का चेहरा एक पल में बदल गया। उनके चेहरे पर पहले का गुस्सा काफूर हो चुका था और उनकी आवाज में अजीब सी हड़बड़ाहट और मिठास घुल गई। वे तुरंत बोलीं, “अरे! रश्मि है तो पहले बताना था ना! मुझे लगा तेरी ममेरी बहन मोहिनी का फोन है। कह उससे कि तू अभी बाजार जा रही है और उसके लिए सबसे सुंदर कढ़ाई वाला सूट लेकर आएगी।”

अंजलि ने फोन काट दिया और वहीं मेज पर रख दिया। उसकी सहनशीलता अब जवाब दे चुकी थी। उसने नजरें उठाकर सीधे सावित्री जी की आँखों में देखा। उसकी आवाज में न तो गुस्सा था और न ही कोई बदतमीजी, बल्कि एक गहरा, चुभता हुआ दर्द था।

अंजलि ने कहा, “मम्मी जी, आज मुझे आपके व्यवहार का मतलब समझाइए। जब ससुर जी की रिपोर्ट लानी होती है, तब आप विवान को घंटों खिलाने को तैयार रहती हैं। जब ससुर जी को अस्पताल ले जाना होता है, तब आपकी कमर का दर्द गायब हो जाता है और आप खुशी-खुशी दादी का फर्ज निभाने लगती हैं। पर जब मुझे अपनी सहेली की शादी में दो घंटे के लिए जाना था, तो आपकी उम्र आड़े आ गई। और अभी जब आपको लगा कि सामान मेरी बहन के लिए है, तो आपकी तबीयत खराब हो गई, पर जैसे ही पता चला कि सामान आपकी अपनी बेटी रश्मि दीदी का है, तो एक ही पल में आपकी बीमारी ठीक हो गई और आप विवान को रखने के लिए राजी हो गईं!”

सावित्री जी हक्की-बक्की होकर अंजलि का मुंह ताकने लगीं। उनके पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं बचा था।

अंजलि की आँखों से आंसू बह निकले, पर उसकी आवाज बिल्कुल स्थिर थी, “मम्मी जी, यह कैसा सुविधा का तराजू है? कैसा मतलबी रिश्ता निभा रही हैं आप मेरे साथ? जब से इस घर में आई हूँ, मैंने आपको अपनी मां और ससुर जी को अपने पिता से कम नहीं समझा। मैंने कभी अपने मायके और ससुराल के फर्ज में फर्क नहीं किया। पर आज मुझे अहसास हो रहा है कि आपने मुझे कभी इस परिवार का हिस्सा माना ही नहीं। समाज में सब कहते हैं कि शादी के बाद बेटा बदल जाता है, बहू परिवार तोड़ देती है। पर कोई यह क्यों नहीं देखता कि अगर बहू के साथ सिर्फ अपनी सहूलियत और मतलब के रिश्ते निभाए जाएंगे, तो वह कब तक दिल से रिश्ते निभा पाएगी? कोई भी लड़की ससुराल में अपनी गृहस्थी बसाने आती है, नौकरानी बनकर इस्तेमाल होने नहीं। जब अपने ही घर में अपनेपन का नाटक और मतलब का खेल दिखे, तो इंसान अंदर से टूट जाता है। आखिर ऐसे मतलबी रिश्तों की उम्र कितनी होती है मम्मी जी?”

कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया। अंजलि का एक-एक शब्द सावित्री जी के अंतर्मन को झकझोर रहा था। उनके सामने उनके खुद के दोहरे मापदंड शीशे की तरह साफ हो चुके थे। उन्हें याद आया कि कैसे अंजलि ने कभी किसी काम के लिए ना नहीं कहा था, कभी किसी बीमारी में मुंह नहीं बनाया था, फिर भी उन्होंने उसके आत्मसम्मान और उसकी छोटी-छोटी खुशियों को अपने स्वार्थ की बलि चढ़ा दिया था। शर्मिंदगी के मारे सावित्री जी की नजरें झुक गईं।

अंजलि ने अपने आंसुओं को पोंछा और शांत स्वर में कहा, “ठीक है मम्मी जी, मैं अभी बाजार जा रही हूँ। रश्मि दीदी ने बड़े चाव से कहा है, तो उनका सामान ले आऊंगी।”

जैसे ही अंजलि मुड़ने लगी, सावित्री जी आगे बढ़ीं और उन्होंने अंजलि का हाथ पकड़ लिया। सावित्री जी की आँखें भी भीगी हुई थीं।

सावित्री जी ने कांपती आवाज में कहा, “रुक बहू… आज तूने मेरी आँखें खोल दी हैं। सच कह रही है तू, मैं अपनी बेटी के लिए मां बनी रही, पर तेरे लिए कभी सच्ची मां नहीं बन पाई। हमेशा अपनी सहूलियत देखी और तेरे त्याग को तेरी मजबूरी समझ लिया। मुझे माफ कर दे बेटा।”

अंजलि ने अचरज से अपनी सास को देखा। सावित्री जी ने विवान को अपने सीने से लगाया और प्यार से अंजलि के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “सुन बहू, बाजार से दीदी का सामान तो ले ही आना, पर उसके बाद पास वाले ब्यूटी पार्लर भी चली जाना। तू कितने दिनों से कह रही थी ना कि तुझे अपने बाल सेट करवाने हैं और थोड़ा आराम करना है? आज तू अपने लिए जी। विवान की रत्ती भर भी चिंता मत कर। जब तक तू पूरी तरह तरोताजा होकर नहीं लौटेगी, मैं अपने पोते को अपनी पलकों पर बिठाकर रखूंगी। और हां… कभी-कभार यह बुढ़िया सास किच-किच कर दे, तो उसे दिल पर मत लगाना, एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देना।”

सास की इस आत्मीय और सच्ची बात को सुनकर अंजलि के चेहरे पर बरसों की थकान मिट गई। उसके होंठों पर एक खिली हुई मुस्कान तैर गई। उसने आगे बढ़कर सावित्री जी को गले से लगा लिया। घर के आंगन में खिली धूप अब सचमुच रिश्तों की गर्माहट और मिठास से भर चुकी थी।

आपके विचार हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं:

क्या आज भी हमारे समाज में बहुओं के साथ ‘सुविधा के अनुसार’ रिश्ते निभाए जाते हैं? जब जरूरत हो तो बहू ‘बेटी’ और जब उसकी अपनी इच्छा हो तो वह ‘परायी’ क्यों हो जाती है? इस विषय पर अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद।

मूल लेखिका : रोनिता कुंडू

error: Content is protected !!