रागिनी ने पल्लवी का हाथ अपने कांपते हाथों में थाम लिया। उनके आंसुओं की धार रुकने का नाम नहीं ले रही थी। वह रुंधे गले से बोलीं, “पल्लवी… मुझे माफ कर दे मेरी बहना। मैंने तेरे साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है। तूने बरसों तक मेरे बच्चों को अपने बच्चों की तरह पाला, बिना किसी स्वार्थ के मेरी हर बात मानी, मेरे हर नखरे को बर्दाश्त किया। लेकिन मैंने तेरे उस त्याग को तेरी मजबूरी समझ लिया। आज जब मेरी अपनी बहू मेरे साथ वैसा ही रूखा बर्ताव कर रही है, जब मुझे हर निवाले के लिए सोचना पड़ रहा है, तब मुझे समझ आया कि मैंने तेरे जैसे अनमोल हीरे को खो दिया। मैं अपने किए पर बहुत शर्मिंदा हूँ पल्लवी।”
विदाई का वह नाजुक पल आ चुका था, जब एक बेटी अपने बाबुल के आंगन को छोड़कर एक अनजान दुनिया में अपने नए सफर की शुरुआत करने जा रही थी। पल्लवी का रो-रोकर बुरा हाल था। माँ की ममतामयी छाती से लगकर वह हिचकियाँ ले रही थी और पिता के कांपते हाथों ने जब उसके सिर पर आशीर्वाद का हाथ रखा, तो जैसे उनका कलेजा ही छिटक कर बाहर आ गया। भाई ने नम आँखों से अपनी लाडली बहना के दोनों हाथ थामे और गाड़ी तक ले आया। रीति-रिवाजों की जंजीरें जितनी भारी थीं, अपनों का प्यार उससे कहीं ज्यादा गहरा था। भारी मन से, आंसुओं के समंदर को पीछे छोड़ते हुए, पल्लवी ने अपने नए जीवन की चौखट पर कदम रखा।
ससुराल की दहलीज पर कदम रखते ही पल्लवी का स्वागत किसी राजसी उत्सव की तरह हुआ। उसका पति मयंक बेहद संवेदनशील, समझदार और जमीन से जुड़ा हुआ इंसान था। परिवार भी बहुत बड़ा और खुशहाल था। ससुर विश्वनाथ जी और सास यशोदा जी के चेहरों पर एक अनूठा तेज था। मयंक के बड़े भाई शैलेंद्र जी गंभीर स्वभाव के थे और उनकी पत्नी, यानी पल्लवी की जेठानी, रागिनी एक बेहद चतुर और वाकपटु महिला थीं। उनके दो प्यारे-प्यारे बच्चे थे—बड़ा बेटा अर्णव और छोटी बेटी तान्या। इसके अलावा दो शादीशुदा ननदें, उनके पति और उनके छोटे-छोटे बच्चे भी विवाह के उत्सव में शामिल थे। घर में जैसे खुशियों का मेला लगा हुआ था।
शुरुआती कुछ दिन हंसी-खुशी और मेहमाननवाजी के बीच पलक झपकते बीत गए। ननदें अपने-अपने ससुराल लौट गईं और मयंक व पल्लवी भी कुछ दिनों के लिए पर्यटन यात्रा पर निकल पड़े। जब दोनों वापस लौटे, तो घर की नियमित गृहस्थी का पहिया फिर से घूमने लगा। रागिनी जेठानी के रूप में बहुत मीठी और अपनापन दिखाने वाली महिला प्रतीत होती थीं। पल्लवी ने बचपन से यही सीखा था कि परिवार को जोड़कर रखना ही एक बहू का सबसे बड़ा धर्म होता है। उसने बिना किसी शिकायत के धीरे-धीरे रसोई और पूरे घर की देखरेख की बागडोर अपने हाथों में ले ली।
सुबह का नाश्ता तैयार करना हो, दोपहर का भोजन बनाना हो या शाम की चाय के साथ गरमा-गरम नाश्ता परोसना—पल्लवी चौके में पसीना बहाती रहती। लेकिन एक अजीब सा सिलसिला शुरू हुआ जो धीरे-धीरे नियम बन गया। जब भी खाना पूरी तरह पक जाता और उसे डाइनिंग टेबल पर सजाने की बारी आती, रागिनी तुरंत रसोई के दरवाजे पर प्रकट हो जातीं। वह बड़े ही सलीके से कटोरियों और थालियों को उठाकर बाहर ले जातीं और सभी के सामने बड़े लाड़ से परोसतीं। ससुर जी कहते, “अरे वाह रागिनी बहू! तुम्हारे हाथ का खाना तो हमेशा की तरह लाजवाब है।” रागिनी मंद-मंद मुस्कुराकर प्रशंसा बटोर लेतीं और पल्लवी अंदर चूल्हे की तपन के सामने तवे पर रोटियां सेकती ही रह जाती। मयंक जब कभी रसोई में आकर देखता कि पल्लवी पसीने से तर-बतर है, तो वह उसके पास आता और पानी का गिलास पकड़ाता, लेकिन पल्लवी कभी कोई शिकायत नहीं करती। वह सोचती कि परिवार तो अपना ही है, श्रेय किसी को भी मिले क्या फर्क पड़ता है।
समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। साल दर साल बीतते गए। पल्लवी और मयंक के भी दो बच्चे हुए और वे बड़े होने लगे। उधर जेठानी के बच्चे अर्णव और तान्या तो पल्लवी के आंचल में ही पले-बढ़े थे। पल्लवी उन्हें अपने बच्चों से भी बढ़कर मानती थी। समय ने करवट ली और बूढ़े सास-ससुर एक-एक करके इस संसार से विदा हो गए। बुजुर्गों के जाने के बाद घर की धुरी रागिनी के हाथों में और मजबूत हो गई, जबकि सेवा और मेहनत का पूरा दायरा पल्लवी की झोली में सिमट कर रह गया।
जब तान्या शादी के योग्य हुई, तो घर में रिश्ते आने लगे। जब भी कोई प्रतिष्ठित परिवार लड़की देखने आता, रागिनी बहुत ही सधे हुए अंदाज में पल्लवी से कहतीं, “पल्लवी, तुम तो जानती ही हो कि बाहर बैठना और बातचीत संभालना कितना जिम्मेदारी का काम है। भाई साहब और मैं बाहर बैठते हैं, तुम जरा रसोई संभाल लो। मेहमानों के लिए खस्ता कचौरी और शाही पनीर तैयार कर देना, कोई कमी न रहे।”
पल्लवी हर बार मुस्कुराते हुए सिर हिला देती। वह पूरे मन से रसोई में जुट जाती। जब बाहर रिश्ते की बात पक्की हो रही होती, लोग एक-दूसरे को मेवे और मिठाइयां खिलाकर बधाइयां दे रहे होते, तब पल्लवी रसोई की तपन में कड़ाही के पास खड़ी पकौड़े तल रही होती थी। उस पूरे जश्न में सिर्फ मयंक ही ऐसा था जो चुपके से रसोई में आता, पल्लवी का हाथ पकड़कर बाहर ले जाने की कोशिश करता और कहता, “चलो पल्लवी, तुम भी बाहर बैठो।” लेकिन पल्लवी कह देती, “अरे सुनिए, मेहमानों को गरम नाश्ता नहीं मिलेगा तो बुरा लगेगा, आप जाइए, मैं बस आ रही हूँ।” तान्या की विदाई भी बड़ी धूमधाम से हुई। कुछ समय बाद अर्णव का भी विवाह तय हो गया और उसके लिए एक पढ़ी-लिखी, आधुनिक विचारों वाली कामकाजी लड़की सुकृति बहू बनकर आई।
सुकृति के घर में आने के बाद समीकरण बदलने लगे। सुकृति एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत थी। सुबह तैयार होकर दफ्तर चली जाती और शाम को थककर लौटती। पल्लवी ने देखा कि रागिनी अब भी सोफे पर बैठकर हुकुम चलाती थीं, सुकृति अपने कमरे में आराम करती थी और रसोई का पूरा बोझ अब भी उसी के कंधों पर लदा हुआ था। यहाँ तक कि सुकृति के टिफिन से लेकर उसके शाम के नाश्ते तक का जिम्मा पल्लवी के ही सिर था।
पल्लवी को अब धीरे-धीरे समझ आने लगा कि जिसे वह अपना ‘कर्तव्य’ और ‘त्याग’ समझ रही थी, उसे परिवार ने उसकी ‘मजबूरी’ और ‘आदत’ मान लिया था। जिस सम्मान की वह हकदार थी, वह उसे कभी मिला ही नहीं। उसे केवल रसोई संभालने वाली एक मूक सेविका समझ लिया गया था। अपने आत्मसम्मान को लगातार कुचले जाते देख पल्लवी के सब्र का बांध आखिरकार टूट गया। उसने चुपचाप एक निर्णय लिया। उसने रसोई के कामों से अपने हाथ खींचने शुरू कर दिए। अब वह केवल अपने हिस्से का काम करती या जब जरूरत होती तभी सहयोग देती।
एक शाम, जब घर में मेहमान आने वाले थे और रसोई में बर्तन वैसे ही पड़े थे, रागिनी तमतमाती हुई पल्लवी के कमरे में घुसीं। उनकी आवाज में साफ तीखापन था, “पल्लवी! यह मैं क्या देख रही हूँ? आजकल तुम्हारा रसोई में मन ही नहीं लगता। मेहमान आने वाले हैं और अभी तक नाश्ते की कोई तैयारी नहीं हुई। तुम इतनी लापरवाह कैसे हो सकती हो?”
पल्लवी ने हाथ में पकड़ी किताब बंद की और बहुत ही शांत, संतुलित स्वर में कहा, “भाभी, घर में अब केवल मैं ही बहू नहीं हूँ। सुकृति भी आ चुकी है। मुझे लगता है कि अब घर की जिम्मेदारियों का बँटवारा हो जाना चाहिए। हर कोई अपना-अपना हिस्सा संभाले, तो काम आसान हो जाएगा।”
रागिनी की भवें तन गईं। उन्होंने व्यंग्य से कहा, “अरे वाह! अब तुम काम सिखाओगी? तुम्हें अच्छी तरह मालूम है कि सुकृति पूरे दिन दफ्तर में नौकरी करती है, बेचारी कितनी थक जाती है। उसके पास इतना समय कहाँ कि वह चौका-चूल्हा संभाले? जैसा सालों से चलता आ रहा है, वैसा ही चलेगा। तुम अपना काम करो।”
पल्लवी ने सीधे रागिनी की आँखों में देखा और पूछा, “और अगर मैं यह सब न करना चाहूँ तो भाभी?”
“करना तो तुम्हें पड़ेगा ही पल्लवी! यह तुम्हारी जिम्मेदारी है!” रागिनी ने हक जताते हुए स्वर ऊंचा किया।
पल्लवी अपनी जगह से उठी। उसकी आँखों में विद्रोह नहीं, बल्कि वर्षों से दबे स्वाभिमान की चमक थी। उसने स्पष्ट लहजे में कहा, “भाभी, आप मुझ पर हुकुम चलाने का अधिकार नहीं रखतीं। मैं इस घर की बराबर की बहू हूँ, आपकी दासी नहीं। मैंने सालों तक आपकी हर बात को सिर-माथे इसलिए रखा क्योंकि मैं आपका सम्मान करती थी, आपका दर्जा बड़ी बहन जैसा मानती थी। पर आज मुझे समझ आ रहा है कि मेरी उसी चुप्पी और सम्मान को आपने अपना घमंड बना लिया। जब आदर को अधिकार और सेवा को गुलामी समझ लिया जाए, तो वहां रिश्तों की डोर कमजोर हो जाती है। बात और बिगड़े, कड़वाहट बढ़े, इससे बेहतर यही है कि अब हमारे रास्ते अलग हो जाएं। हम अपना चूल्हा अलग कर लेते हैं।”
रागिनी सन्न रह गईं। उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि हमेशा सिर झुकाकर ‘जी भाभी’ कहने वाली पल्लवी इतना बड़ा कदम उठा सकती है। अहंकार में आकर रागिनी ने कह दिया, “ठीक है, अगर तुम्हारी यही मर्जी है तो यही सही! देखते हैं तुम अकेले कैसे सब संभालती हो।”
मयंक और शैलेंद्र जी के बीच बात पहुँची। मयंक ने बिना किसी हिचक के अपनी पत्नी के स्वाभिमान का साथ दिया। दोनों भाइयों ने बिना किसी झगड़े या हंगामे के, शांतिपूर्वक घर के दो हिस्से कर लिए। चूल्हा अलग हो गया।
शुरुआत में रागिनी को लगा कि वह सुकृति के साथ मिलकर सब संभाल लेंगी। लेकिन हकीकत जल्द ही सामने आ गई। सुकृति आधुनिक सोच की थी; उसने साफ कह दिया कि वह काम और घर दोनों का बोझ अकेले नहीं उठा सकती। जब रागिनी ने उस पर दबाव बनाने की कोशिश की, तो सुकृति ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया, “मम्मी जी, मैं आपके बेटे की पत्नी हूँ, घर की नौकरानी नहीं। अगर खाना बनवाना है तो रसोइया रखिए, मुझसे यह सब नहीं होगा।”
घर में रोज-रोज के ताने, नोकझोंक और अशांति का माहौल बनने लगा। जिस रागिनी ने जीवन भर हुक्म चलाया था, अब उन्हें खुद बूढ़े शरीर से बर्तन मांजने और झाड़ू लगाने की नौबत आ गई। जब भी कोई रिश्तेदार आता, रागिनी अकेले रसोई में पसीना बहातीं और सुकृति अपने कमरे का दरवाजा बंद करके लैपटॉप पर काम करती रहती। तब रागिनी को याद आता था कि कैसे पल्लवी उनके एक इशारे पर सारा काम हंसते-हंसते संभाल लेती थी और उन्हें समाज में मान-सम्मान दिलाती थी।
लगभग आठ महीने बीत चुके थे। पल्लवी का घर शांत और व्यवस्थित था। जब भी जेठ जी या रागिनी के बच्चे उसके हिस्से में आते, वह बड़े आदर और प्रेम से उनका स्वागत करती, लेकिन वह खुद कभी उनके हिस्से में जाकर काम में दखल नहीं देती थी।
एक दोपहर, जब घर में कोई नहीं था, दरवाजे की घंटी बजी। पल्लवी ने दरवाजा खोला तो सामने रागिनी खड़ी थीं। उनके बाल बिखरे हुए थे, आँखों के नीचे काले घेरे थे और चेहरे पर एक गहरी उदासी और थकान छाई हुई थी।
“अरे भाभी! आप? सब कुशल-मंगल तो है ना? आइए, अंदर बैठिए,” पल्लवी ने सहजता से कहा।
रागिनी अंदर आईं और सोफे पर बैठते ही अपनी हथेलियों में मुंह छिपाकर फफक पड़ीं। पल्लवी घबरा गई। उसने जल्दी से पानी का गिलास लाकर दिया, “भाभी, क्या हुआ? तबीयत तो ठीक है आपकी?”
रागिनी ने पल्लवी का हाथ अपने कांपते हाथों में थाम लिया। उनके आंसुओं की धार रुकने का नाम नहीं ले रही थी। वह रुंधे गले से बोलीं, “पल्लवी… मुझे माफ कर दे मेरी बहना। मैंने तेरे साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है। तूने बरसों तक मेरे बच्चों को अपने बच्चों की तरह पाला, बिना किसी स्वार्थ के मेरी हर बात मानी, मेरे हर नखरे को बर्दाश्त किया। लेकिन मैंने तेरे उस त्याग को तेरी मजबूरी समझ लिया। आज जब मेरी अपनी बहू मेरे साथ वैसा ही रूखा बर्ताव कर रही है, जब मुझे हर निवाले के लिए सोचना पड़ रहा है, तब मुझे समझ आया कि मैंने तेरे जैसे अनमोल हीरे को खो दिया। मैं अपने किए पर बहुत शर्मिंदा हूँ पल्लवी।”
पल्लवी का दिल भी पसीज गया, पर उसने बहुत ही गरिमा के साथ कहा, “भाभी, जो बीत गया उसे जाने दीजिए। पर सच तो यह है कि आपने शुरू से ही सुकृति को जिम्मेदारी का अहसास नहीं कराया। जब तक मैं थी, तब तक आपको लगता था कि पल्लवी तो है ही सब करने के लिए। अब जब परिस्थितियां बदलीं, तो टकराव होना स्वाभाविक था। आज की पीढ़ी अपनी सीमाएं जानती है और हमें भी समय के साथ बदलना सीखना होगा।”
रागिनी ने सिसकते हुए कहा, “तू सच कह रही है पल्लवी। गलती मेरी ही थी। अहंकार ने मेरी आँखों पर पर्दा डाल दिया था। पर क्या तू सुकृति से थोड़ी बात नहीं कर सकती? वह तेरी बहुत इज्जत करती है। शायद तेरे समझाने से घर में शांति हो जाए।”
पल्लवी ने बहुत ही अपनत्व से रागिनी के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “भाभी, मैं सुकृति से एक बड़ी माँ के नाते जरूर बात करूंगी और उसे समझाऊंगी कि परिवार में तालमेल कैसे बिठाया जाता है। लेकिन मेरा एक सुझाव यह भी है कि आप घर के भारी कामों के लिए एक अच्छी सहायिका रख लीजिए। उम्र के इस पड़ाव पर अब आपको भी आराम की जरूरत है। रिश्तों को जबरदस्ती के बंधनों से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सम्मान से बांधा जाता है। आप चिंता मत कीजिए, हम अलग जरूर हुए हैं, पर पराए नहीं हुए।”
रागिनी की आँखों में अब पश्चाताप के साथ-साथ एक गहरा सुकून था। वह उठने लगीं तो पल्लवी ने मुस्कुराते हुए कहा, “अरे भाभी! ऐसे कैसे जा रही हैं? बैठिए, मैं आपके लिए आपके पसंदीदा अदरक वाली चाय और गरमा-गरम पकौड़े बनाकर लाती हूँ।”
रागिनी की आँखें फिर भर आईं, पर इस बार उन आँखों में कृतज्ञता थी। दोनों बहनों जैसे रिश्ते में जो बर्फ जम गई थी, वह अहसास और क्षमा की धूप से पिघल चुकी थी। घर की दीवारें वहीं थीं, लेकिन दिलों के बीच की दूरियां हमेशा के लिए मिट गई थीं।
आपके विचार हमारे लिए अनमोल हैं:
क्या आज भी संयुक्त परिवारों में सेवा और त्याग करने वाले सदस्य को हल्के में लिया जाता है? जब किसी के सम्मान को उसका अभिमान समझ लिया जाए, तो रिश्ते कैसे बचाए जाएं? अपनी बेबाक राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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मूल लेखिका : गुरविंदर टुटेजा