अपना–पराया

इस खूबसूरत जिंदगी में हजारों मोड़ आते हैं, ना जाने किस मोड़ पर किस अजनबी से मुलाकात हो जाए। कभी-कभी इन अपने-पराया से इतना खुशी मिल जाती है कि संभाले नहीं संभलती और कभी कभी ऐसा गम जो सिर्फ दर्द का एक रिश्ता बन कर रह जाता है।

ठेकेदार ने जोर जोर से शारदा को डांटते कहा तुम आज के बाद काम पर मत आना। शारदा ने हाथ जोड़कर कहा, साहब मेरा बच्चा बहुत बीमार है उसे दवा और बार-बार दूध पिलाना पड़ता है, शारदा ठेकेदार के सामने गिड़गिड़ाती रही पर ठेकेदार ने उसे काम से निकाल कर ही दम लिया और उसका बकाया पैसे को हिसाब बाद में करने को कहा। शारदा अपने बीमार बच्चे को लेकर रोती हुई अपने घर चली गई। दूसरे दिन मालिक गोपाल ने ठेकेदार से शारदा के बारे में पूछा तो ठेकेदार ने कहा सर मैंने उसे काम से निकाल दिया। मालिक ने ठेकेदार से बस इतना ही पूछा कि क्या शारदा का बच्चा अभी बीमार था। ठेकेदार ने कहा हाँ।

सुबह-सुबह किसी ने शारदा का दरवाजा खटखटाया, अंदर से बच्चे की रोने की आवाज आ रही थी, शारदा ने बच्चे को चुप कराया और दरवाजा खोला, सामने मालिक गोपाल जी को देखकर शारदा चौंक गई, वह अंदर से पूरी तरह डर गई थी कि शायद मुझसे कोई गलती हो गई इसलिए मालिक को यहाँ आना पड़ा। वह अंदर से कांप रही थी। गोपाल जी ने कहा शारदा मुझे पानी पिलाओ और खाने को कुछ लेकर आओ। शारदा जल्दी से एक गिलास में पानी लेकर आई पर खाने का सामान घर में कुछ नहीं था, सारे बच्चे की दवा में खर्च हो चुके थे, अब तो उसके पास दवा के लिए भी पैसे नहीं थे। गोपाल जी ने बच्चे का इलाज कराया और वह धीरे-धीरे स्वस्थ हो गया।

शारदा गोपाल जी के पैरों पर गिर पड़ी। गोपाल जी ने कहा शारदा सुना ठीक हो जाए तो तुम काम पर आ जाना। चार दिन बाद जब शारदा काम पर लौटी तो उसके नजर मालिक गोपाल को ढूंढ रही थी। कई दिन बीतने के बाद शारदा को मालूम पड़ा कि मालिक की तबीयत ठीक नहीं है। डरते-डरते शारदा एक दिन मालिक के घर जा पहुँची। मालिक अकेले ही चारपाई पर पड़े थे। शारदा को देखकर गोपाल जी की आँखें नम हो गईं। शारदा ने हिम्मत करके पूछा मालिक घर में और कोई नहीं है क्या, नहीं शारदा एक नौकर है वह इन दिनों छुट्टी लेकर अपने गाँव गया है, मालिक कुछ खाने को लाई हूँ, ठीक है शारदा रख दो और तुम जाओ और अपने बच्चे की देखभाल करो।

शारदा चली गई पर शारदा के दिल में दर्द का एक तूफान उठ खड़ा हुआ। दूसरे दिन आने के बाद गोपाल जी ने शारदा से कहा देखो शारदा तुम्हारी दवा और दुआओं की वजह से मैं ठीक हो गया, धन्यवाद शारदा, शारदा ने मालिक के हाथ जोड़ लिए, मालिक गोपाल जी ने पूछा शारदा तुम्हारे सिवा तुम्हारा इस दुनिया में और कौन है, कोई नहीं मालिक शारदा ने रोते हुए कहा, मालिक मैंने घर वाले के खिलाफ प्रेम विवाह किया था अब तो घर वालों से भी सारे रिश्ते खत्म हो गए और जिससे प्रेम विवाह किया वह निकम्मा निकला, दिन भर शराब के नशे में रहता था और आखिरकार एक दिन दुनिया से चल बसा और सोमात में मेरी कोख में बच्चा छोड़ गया। शारदा मैंने भी किसी से प्रेम किया था पर शादी न हो सकी तब से अकेला ही जी रहा हूँ, अब तो उम्र भी बहुत हो गई।

शारदा जिंदगी बिना सहारे की नहीं गुजरती, शारदा इतना कहकर गोपाल जी रुक गए, शारदा ने कहा बोलो मालिक, गोपाल जी के होंठ कांप रहे थे, उन्होंने कहा शारदा तुम चाहो तो मैं तुम्हारा सहारा और तुम मेरा सहारा बन सकती हो। शारदा आवाक मालिक की तरफ देख कर चुप हो गई। शारदा ने कहा मालिक मैं इस लायक नहीं हूँ। नहीं शारदा तुम पढ़ी-लिखी और समझदार हो, हालात ने तुम्हें तोड़ कर रख दिया है। शारदा अपने बच्चे को आंचल छुपाए दूध पिलाती मालिक की तरफ देख-देखकर रोने लगी। शारदा को अपनी किस्मत पर विश्वास नहीं हो रहा था। शारदा ने कहा मालिक कभी-कभी पति पत्नी की नहीं एक अच्छे दोस्त की जरूरत होती है। शारदा ने मालिक के साथ रहने की सहमति जता दी।

गोपाल और शारदा अनजाने में ही एक बंधन में बंध गए। शारदा मालिक के एहसानों का बदला उनकी सेवा बदले बिना रही थी। गोपाल जी ने कहा शारदा हमें और बच्चे नहीं चाहिए हम इसी बच्चे का पालन-पोषण करेंगे और आगे चलकर यही हमारा सहारा बनेगा। दोनों ने मिलकर बच्चे को बड़े प्यार से पाला। गोपाल जी ने बच्चे को पिता का नाम दिया। बच्चा धीरे-धीरे बड़ा हो गया। गोपाल जी ने उसे विदेश में पढ़ाया और उसे काबिल बना दिया।

पर समय का चक्रव्यूह अभी बाकी था। आने वाला तूफान बरसों हुए चमन को उजाड़ ले जाने को बेताब था। धीरे-धीरे बच्चे का व्यवहार बदलने लगा और वह बात-बात में गोपाल जी का अपमान करने लगा। वह उन्हें पिता मानने से इनकार करने लगा और माँ के समझाने का उस पर कोई असर न पड़ता। आखिर एक दिन करण ने अपना फैसला सुना दिया कि अब इस घर में मैं किसी और के साथ नहीं रह सकता। मुझसे कोई भूल हो गई बेटा, करण ने कहा आप मुझे बेटा मत कहिए क्योंकि मैं आपको अपना पिता नहीं मानता। ठीक है बेटा बस एक आखिरी बार मुझे पापा कह दे। पर करण ने वह भी कहना गवारा न समझा और एक दिन ऐसा हुआ कि गोपाल जी के घर से निकलना पड़ा, माँ ने करण को बहुत समझाया पर करण अपनी जिद पर अड़ा रहा। शारदा ने गोपाल जी को बहुत समझाया विनती की पर गोपाल जी एक दिन घर छोड़ कर चले गए। शारदा ने उनको बहुत ढूंढा पर उनका कोई पता न चला।

गोपाल जी घर से बेघर हो गए इधर उधर भटकते जिंदगी के बाकी दिन गुजारने लगे। समय बीतता गया, गोपाल जी बहुत कमजोर हो गए। वे एक दिन बेहोश होकर सड़क के किनारे गिर पड़े, किसी ने उन्हें अस्पताल पहुँचाया। अस्पताल में जब उनकी आँख खुली तो पास के बिस्तर पर अपने बच्चे को पड़े देखकर वह चौंक गए। डॉक्टर ने बताया कि इस बच्चे की किडनी खराब हो गई है। अब शायद यह न बचे, गोपाल जी की आत्मा द्रवित हो गई। शारदा की हालत देखकर वह अंदर ही अंदर रो पड़े। डॉक्टर के बहुत मना करने के बाद भी गोपाल जी अपनी किडनी देने को तैयार हो गए। डॉक्टर ने गोपाल जी को समझाया कि इससे उनकी मौत भी हो सकती है। पर वो नहीं माने। उन्होंने अपनी किडनी करण को दे दी। ऑपरेशन सफल रहा और करण को नई जिंदगी मिल गई।

शारदा ने डॉक्टरों को धन्यवाद दिया। डॉक्टरों ने कहा धन्यवाद हमें नहीं उन सज्जन को दीजिए जिन्होंने अपना किडनी देकर आपके बच्चे की जान बचाई और अब वह जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे हैं।

शारदा और करण ने जब गोपाल जी को देखा तो वो दंग रह गए। शारदा और करण की अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। शारदा गोपाल जी के पैरों पर गिरकर फूट-फूट कर रोने लगी। करण गोपाल जी को लिपटकर दहाड़े मार कर रोने लगा। आपने यह क्या किया पापा मेरी जान बचाने के लिए आपने अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी, मुझे माफ कर दो पापा। कुछ नहीं बेटा शारदा जिंदगी इम्तिहान ले रही थी, तू ठीक हो गया न और मुझे कुछ नहीं चाहिए, पापा आप ठीक हो जाओ हम अपने घर चले चलेंगे पापा, अब बहुत देर हो चुकी है बेटा। तुम मुझे पापा कहो न, यह शब्द सुनने के लिए मैं तरस रहा था। मैंने अपना आखिरी फर्ज पूरा कर दिया, बेटे अब मैं खुशी से मर सकूँगा अब मुझे कोई गम नहीं रहेगा, माँ का ध्यान रखना बस मुझे एक बार और पापा कह दे, आपकी कुछ नहीं होगा पापा आपको कुछ नहीं होगा, करण जोर जोर से रो रहा था पर पापा की साँसें थम चुकी थीं पर उनकी आँखों से अब भी ममता के आँसू निकल रहे थे।

पूज्य बाबूजी को समर्पित। देहांत 30 सितंबर 2018।

लेखक : श्यामसुंदर मुख्य वाणिज्य लिपिक, तारकेशो

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