बगल के कमरे से पापा की भीगी किन्तु विचलित-सी आवाज सुनाई दी—”पारखी… पारखी! सुन रही है न तू?”
पारखी आँखें बन्द किए निर्लिप्त भाव से लेटी हुई थी। उसने अपना एक हाथ अपने माथे पर रखा हुआ था, जैसे खुद को भी इस धोखे में रख सके कि अभी वह सोयी हुई है। पापा की आवाज एकदम नजदीक आ गयी थी।
“पारखी…?”
पारखी उठ बैठी। पापा बोले—”बेटा, ये स्टेट बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा, इन्हीं दोनों बैंक में कैसरबाग की ब्रांच में अंकित ने तुम लोगों के खाते खुलवाये थे, तुम्हें पता है न? ये दोनों ब्रांच कहाँ पर हैं?”
पारखी पापा को एकटक देखने लगी, जैसे वही प्रश्न वह पापा से भी पूछ रही हो। उसके पापा ने कहा—”पारखी? क्या तुम कभी बैंक नहीं गयी हो अंकित के साथ?”
“गयी हूँ पापा! इतना ही पता है कि यहीं घर के आस-पास ही है। गयी हूँ कई बार अंकित के साथ, पर रास्ता याद नहीं!!!”
पापा हैरानी से देखते रहे पारखी को। कितनी अजीब बात है कि कई बार गयी है, पर रास्ता याद नहीं? चलो कोई बात नहीं। पता करते हैं। पापा मन ही मन कुछ सोचते हुए दूसरे कमरे में चले गए।
“पारखी???”
ये माँ की आवाज थी।
“पारखी, तू जल्दी से तैयार हो जा। पापा और भाई दोनों तुम्हें लेकर बैंक जाएंगे।”
पारखी घबरा कर माँ से बोली—”माँ, मुझे बैंक का पता नहीं मालूम है।”
पापा वहीं खड़े थे, बोले कि हमने पता लगा लिया है, यहीं बगल में ही तो है!
पारखी चुपचाप बेड के पास रखी चेयर पर बैठ गयी। उसे याद है, एक बार अंकित उससे बोले कि एक डी०डी०ओ० बनवाने के लिए बैंक ऑफ बड़ौदा में दिया है। मुझे कुछ जरूरी काम आ गया है। तुम जाकर उसे ले आना।
मैंने तुरन्त जवाब दे दिया था—”नहीं! अपना काम तुम खुद करो। बच्चे भी स्कूल से आते होंगे। उन्हें खाना भी देना है।”
अंकित इतना ही बोले—”अच्छा ठीक है! मैं कल लाऊँगा डी०डी०ओ०, तुम बच्चों को देखो।”
अब पारखी की जान में जान आई। यही होता आया है शुरू से। पारखी की शादी जब अंकित से हुई तब वो सिर्फ 18 वर्ष की ही थी। पढ़ाई भी अपनी पूरी नहीं की उसने। घर-परिवार बहुत लंबा-चौड़ा था। एक बार घर गृहस्थी में उलझी तो पीएचडी ही कर डाली।
पारखी कब 18 से 32 की हो गयी, उसे पता ही नहीं चला। इस बीच पारखी के 2 बहुत ही प्यारे-प्यारे बच्चे भी हुए। वह भी शायद अपने बच्चों के साथ बड़ी हो रही थी।
बाहर की दुनिया में पारखी अंकित के पीछे-पीछे चलने वाली एक खूबसूरत गुड़िया थी। पारखी को आज अंकित की बहुत याद आई! मन ही मन बोली—”अंकित, तुम कहाँ हो? आज मैं किसके पीछे चलूँ? मेरी तो आदत है न तुम्हारे पीछे-पीछे चलने की!!!”
तभी अंकित की आवाज आई—”पारखी!!! पारखी, एक एप्लिकेशन लिखना है बैंक मैनेजर को। तुम लिख दो न प्लीज, मैंने ऑफिस से छुट्टी ले रखी है। मैं कोई भी ऑफिशियल साइन नहीं कर सकता हूँ न।”
पारखी फिर से घबरा उठी—”अरे मैं कैसे?”
अंकित उसकी घबराहट तुरन्त भांप गए, बोले—”अरे एप्लिकेशन मैं लिख देता हूँ, तुम सिर्फ हस्ताक्षर कर देना, ठीक है?”
पारखी अब सुकून में थी और अंकित अपनी भोली पारखी को देखकर मुस्कुरा उठे।
पापा की आवाज बेहद करीब से आ रही थी—”पारखी, सो गयी हो क्या?”
पारखी ने तुरन्त अपनी आँखें खोल दीं।
“अंकित!!!”
पारखी की जुबान लड़खड़ा रही थी।
पापा बोले—”अब अंकित नहीं है, बेटा… अंकित तुम्हें बनना होगा।”
अब पापा की आवाज भीग चुकी थी यह बात कहते-कहते।
“चलो उठो! हमें बैंक चलना है।”
पारखी आँखें फाड़े पापा को देख रही थी। अभी जो अंकित उसे देख कर मुस्कुरा रहे थे, सब सपना भर था। भ्रम हुआ था उसे। पारखी की आँखें आँसुओं से भर उठीं। वो झट उठ खड़ी हुई।
पापा से बोली—”बस अभी तैयार हो जाती हूँ।”
पारखी अपने पापा व भाई के साथ कार में आ बैठी। आज उसे बड़ा आश्चर्य हो रहा था बाहर निकल कर। इन रास्तों पर न जाने कितनी बार आयी-गयी है, पर कभी ध्यान ही नहीं गया उसका! ये बड़े-बड़े होर्डिंग… दुकानें… और ये रहा बैंक!
मुश्किल से तीन मिनट का रास्ता था घर से यहाँ तक का। पर उसे इतना छोटा-सा रास्ता भी याद नहीं रहा? पारखी खुद ही सोचने लगी कि वह अंधी थी क्या पहले? या पागल? कोई पागल भी होता, तो वह भी ये रास्ते याद कर लेता। पता नहीं कितनी बार तो आयी-गयी है अंकित के साथ। शायद पूरे होश-ओ-हवास वाली अंधी गुड़िया थी वह। अंकित के पीछे चलने वाली अंधी गुड़िया!!!
बैंक मैनेजर ने पारखी से पूछा—”मैडम लॉकर नं०? लॉकर नं०?”
पारखी मैनेजर के ही शब्द बुदबुदा उठी। बड़ी बेबसी से मैनेजर को देखने लगी।
मैनेजर साहब बोले—”पारखी मैडम! अंकित सर के लिए बड़ा अफसोस हुआ।” और अपना सिर झुका लिया।
फिर बोला—”पारखी मैडम! लॉकर नं०?”
“मुझे याद नहीं है लॉकर नं०।” भरे गले से बोली वो।
कैसे याद रहता नं० पारखी को? आज से पहले जब भी पारखी लॉकर खोलने आयी है, अंकित के साथ ही आयी है। अंकित धीरे से नं० बड़े बाबू को बताते, बड़े बाबू रजिस्टर खोलते। अंकित जहाँ हस्ताक्षर करते, वहीं ठीक उसी हस्ताक्षर के नीचे पारखी भी हस्ताक्षर कर देती थी मुस्कुराते हुए, वह भी पूरे गौरव के साथ…।
तभी भाई मैनेजर से बोला कि—”सर, दीदी अभी ट्रामा में हैं। आप ही चेक करके बता दीजिये लॉकर नं०।”
मैनेजर पारखी और अंकित को वर्षों से जानता था, इसलिए 15 मिनट में अंकित और पारखी का लॉकर नं० खोज लिया।
मैनेजर पारखी की तरफ रजिस्टर करते हुए बोले—”पारखी मैडम साइन!”
आज पारखी ने फिर वही अपना हस्ताक्षर किया, पर आज पारखी का हस्ताक्षर बिल्कुल अकेला था। उसके हस्ताक्षर के ऊपर आज कोई हस्ताक्षर नहीं था। शायद पारखी के हस्ताक्षर को भी अंकित के हस्ताक्षर के साथ होने की आदत हो चुकी थी।
आज पारखी का हस्ताक्षर भी अंकित के हस्ताक्षर के लिए चित्कार कर उठा!!!
पारखी ने सभी से छिपाते हुए अपने गालों पर ढुलके आँसू पोंछे और लॉकर रूम की तरफ बढ़ चली।
आज बहुत देर हो गयी थी पारखी को बैंक से आते-आते। बच्चे स्कूल से आ चुके थे। माँ दोनों बच्चों को खाना परोस चुकी थी। दोनों मासूम चुपचाप खाना खा रहे थे।
पारखी को देखते ही बेटा बोला—”माँ, मेरी फीस लेट हो गयी है इस महीने। इसलिए, अब चेक से ही फीस जमा होगी।”
पारखी फिर जड़ हो गयी!
“चेक से?”
“हाँ माँ, चेक से। पिछले मंथ भी तो आपने चेक से फीस जमा की थी।”
“हाँ-हाँ।”
पारखी का गला रुँध गया। इसके आगे कुछ बोल नहीं पायी।
रात के 8 बज रहे थे। कौशिक, उसका बेटा पारखी के पास आ कर बैठ गया।
“माँ, चेक भर लिया?”
पारखी चेक बुक लेकर बैठी थी, वह बस चेक बुक देखे जा रही थी। कैसे बताए वह अपने बेटे को कि आज तक उसने सिर्फ हस्ताक्षर ही किए हैं। अंकित चेक भर देते थे, जहाँ उँगली रख कर बताते कि यहाँ हस्ताक्षर कर दो, वह वहीं मुस्कुराते हुए हस्ताक्षर कर देती थी। वह भी पूरे गौरव के साथ!!!
पारखी चेक बुक हाथ में लिए फूट-फूट कर रो पड़ी।
“अंकित! ये तुमने क्या कर डाला? मैं भी पढ़ी-लिखी थी, पर तुमने इतना ज्यादा स्नेह दिया कि मैं अपनी आँखों के होते हुए भी अंधी बन गयी और तुम्हारी सोच से चलते हुए अपनी समझ जाने कहाँ गंवा बैठी।”
तभी माँ की आवाज आई—”बेटा पारखी! गैस खत्म होने वाला है, तुम गैस बुक कर दो।”
पारखी उठ खड़ी हुई। पापा के पास आई और अपनी पूरी शक्ति से भीगे लहजे में ही बोल पड़ी—
“पापा, अंकित इसी मोबाइल से गैस बुक करते थे, पर मुझे नहीं पता है कि ये कैसे होता है?”
अंकित जब ये कहते कि पारखी तुम्हारा गैस बुक हो गया है, तो उसे लगता था कि उसके पति ने बहुत बड़ा काम किया है। वह अंकित को देख कर मुस्कुरा देती, वह भी पूरे गौरव के साथ!!!
“पापा, मुझे भी गैस बुक करना सिखा देंगे?”
पापा जो अभी तक उसी की तरफ ही बड़ी हैरत से देख रहे थे, बोले—”हाँ-हाँ बिटिया, बड़ा आसान है, अभी बताता हूँ तुझे! मोबाइल दे अंकित का।”
रात के दस बज रहे थे। सभी अपने-अपने कमरों में सोने चले गए थे। पारखी आज दिन भर की घटना याद कर रही थी।
अंकित के साथ अपना पिछला बिताया हुआ जीवन जैसे बेमानी सा लग रहा था। आज तक वह अंकित की कठपुतली ही तो थी। अंकित जहाँ डोर चलाते, वह वहीं चलती जाती। उसका अपना कोई वजूद था ही नहीं, वह तो अंकित में जीने की आदी हो चुकी थी।
पारखी को तो जाने ही दो, उसका अपना हस्ताक्षर तक अंकित के हस्ताक्षर के नीचे होने का आदी हो गया था।
पर, अब नहीं!
पारखी ने खुद से वादा किया कि अब वह अपनी आँखों से दुनिया देखेगी। पारखी की अपनी सोच-समझ होगी। अपना एक अलग वजूद होगा।
अंकित, तुम ये कैसे भूल गए कि एक छोटे बीज को भी पेड़ तभी बनाया जा सकता है जब वह मिट्टी का सीना चीर कर खुद से बाहर आए और जाड़ा, गर्मी, बरसात सब सहन कर अपना वजूद बनाए।
तब कहीं जाकर वह नन्हा बीज एक विशाल पेड़ बन पाता है।
पारखी की ही तरह अगर इस बीज को भी सहेजने के चक्कर में मिट्टी से बाहर निकाल दिया जाता, तो क्या वो कभी पनप पाता?
नहीं, कभी नहीं।
वह मिट्टी से बाहर आते ही कुछ दिनों में सड़ जाता, जैसे आज पारखी सड़ने के कगार पर आ चुकी है।
पारखी बिस्तर पर उठ बैठी। बगल की मेज पर रखी डायरी खोली और उस पर बड़ा सा अपना हस्ताक्षर किया।
पारखी…!
पारखी आँसुओं के साथ मुस्कुरा उठी।
अबकी बार सच में अपने पूरे गौरव के साथ।
लेखिका: अर्चना दूबे
प्रवर लिपिक, वर्माविंग (टीआरडी) कार्यालय, पूर्वोत्तर रेलवे, लखनऊ।