छूटा हुआ साथ

 सत्यनारायण जी ने उनकी तरफ देखा और एक ठंडी आह भरी, “नहीं उर्मिला, अब कुछ कहने का कोई फायदा नहीं। अगर तुम बहू से कहोगी, तो उसे लगेगा कि सास-ससुर उनकी खुशियों के बीच में आ रहे हैं। घर में कलह होगी, खिंचाव बढ़ेगा। मैं नहीं चाहता कि मेरे एक छोटे से मंदिर जाने के चक्कर में बच्चों के चेहरे पर शिकन आए। शायद बुढ़ापे का यही दस्तूर है, अपनी इच्छाओं का गला घोंटकर अगली पीढ़ी के लिए रास्ता साफ करते रहो। तुम बच्चों को संभालना, मैं कल शाम भी अकेले ही पार्क चला जाऊंगा।”

  पैंसठ की उम्र पार कर चुके सत्यनारायण जी दो साल पहले ही बैंक के मुख्य प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए थे। पूरी जिंदगी फाइलों, हिसाब-किताब, बच्चों की पढ़ाई और शहर-दर-शहर तबादलों में बीत गई। अब जब वक्त का अथाह समंदर सामने था, तो उन्हें महसूस होता था कि किनारे पर खड़े होकर उन्होंने उस इंसान का हाथ कब का छोड़ दिया था, जो इस पूरी यात्रा में उनकी परछाईं बनकर साथ चली थी।

उर्मिला पूजा समाप्त करके जैसे ही कमरे से बाहर आने लगीं, सत्यनारायण जी ने हल्के से खांसकर उनका ध्यान आकर्षित किया।

“उर्मिला, ज़रा इधर बैठना, तुमसे कुछ जरूरी बात करनी थी।”

उर्मिला ने आंचल संभालते हुए चश्मा ठीक किया और पास पड़ी लकड़ी की तिपाई पर बैठ गईं। उनके चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट तैर गई, “कहिए, आज सुबह-सुबह कौन सा जरूरी फरमान जारी करना है? नाश्ते में कुछ खास खाने का मन है या फिर कोई किताब मंगवानी है?”

सत्यनारायण जी ने अखबार मोड़कर मेज पर रखा और एक संकोची बच्चे की तरह बोले, “नहीं, खाने की बात नहीं है। दरअसल, कल शाम हमारे पुराने दफ्तर के सहकर्मी माथुर साहब और उनकी पत्नी का फोन आया था। वे बता रहे थे कि शहर के पुराने हिस्से में जो प्राचीन राधा-कृष्ण मंदिर है, वहां इन दिनों शाम को बड़ा ही मनभावन भजन संध्या और दीपोत्सव चल रहा है। झील के किनारे ठंडी हवा, ढोलक की थाप और आरती की गूंज… माथुर साहब हर मंगलवार अपनी धर्मपत्नी के साथ वहां जाते हैं। मैं सोच रहा था, कितना वक्त गुजर गया हम दोनों कहीं बाहर साथ नहीं निकले। कल शाम हम दोनों भी वहां चलें तो कैसा रहेगा? अकेले जाने में मुझे अजीब सा खालीपन लगता है। तुम साथ चलोगी तो मेरा मन भी बहल जाएगा और सच कहूं तो तुम्हारे साथ कुछ सुकून भरे पल बिताने की बड़ी तमन्ना है।”

उर्मिला ने अपने पति की ओर देखा। उनकी आंखों में उम्मीद की एक ऐसी चमक थी, जो बरसों पहले तब दिखती थी जब वे किसी दूरदराज के हिल स्टेशन पर छुट्टियां बिताने की योजना बनाते थे। उर्मिला का दिल भर आया। उन्होंने अपनी हथेलियों से सत्यनारायण जी के झुर्रीदार हाथ को हल्के से थपथपाया और बोलीं, “आप भी कैसी बातें करते हैं सुनिए तो! मेरे जीवन की हर सांस, हर घड़ी आपकी ही तो है। वो तो पहले बच्चों की पढ़ाई, फिर उनकी शादियाँ और अब पोते-पोतियों की देखरेख में वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि पता ही नहीं चला कब दिन ढल गया। आप भी तो दफ्तर के तनाव में रहते थे। थोड़ा सा अंतराल हमारे बीच जिम्मेदारियों की वजह से आ गया था, मगर अब तो मैं पूरी तरह से आपके पास ही हूँ। कल शाम मैं बिल्कुल आपके साथ मंदिर चलूंगी। बहुत दिन हो गए, मैंने भी भगवान के दर्शन सुकून से नहीं किए।”

सत्यनारायण जी का चेहरा खिल उठा। किसी छोटे बालक को मनपसंद खिलौना मिल जाने पर जैसी खुशी होती है, वैसी ही आभा उनके चेहरे पर फैल गई। वे उत्साहित होकर बोले, “तो यह तय रहा! शाम ठीक पांच बजे हम निकलेंगे। आज जब मैं शाम को गुलमोहर पार्क में अपने पुराने मित्रों से मिलूंगा, तो माथुर साहब से सीना तानकर कहूंगा कि कल मैं अकेला नहीं आ रहा, अपनी अर्धांगिनी को साथ लेकर आऊंगा। हर बार वे अपनी पत्नी के साथ आते हैं और मैं एक किनारे चुपचाप बैठा रहता हूँ, मुझे बड़ा संकोच होता था।”

उर्मिला उन्हें देखकर मन ही मन मुस्कुराईं, पर भीतर एक हल्की टीस भी उठी। जीवन की इस ढलान पर इंसान कितना अकेला हो जाता है। परिवार बड़ा होता है, घर सुख-सुविधाओं से भरा होता है, मगर फिर भी बुजुर्ग माता-पिता अपनी ही बनाई दुनिया में पराए और तन्हा महसूस करने लगते हैं। बच्चों को एक सूत्र में बांधने, उनकी गृहस्थी संवारने के फेर में पति-पत्नी एक-दूसरे के लिए ही अजनबी हो जाते हैं।

शाम को सत्यनारायण जी पार्क गए। वहाँ बेंच पर बैठे अपने हमउम्र साथियों के बीच उन्होंने बड़े उत्साह से कल शाम का कार्यक्रम साझा किया। उनकी बातों में वही ताजगी थी जो किसी नए प्रेमी जोड़े के भीतर होती है। शाम करीब साढ़े सात बजे जब वे पार्क से लौटे, तो घर का मुख्य द्वार खुला था। बैठक में बारह वर्षीय पोता आरव और नौ वर्षीय पोती अनन्या टीवी पर कार्टून देखने में मशगूल थे और सोफे पर उनकी बड़ी बहू कृतिका कान में ईयरफोन लगाए मोबाइल स्क्रीन पर अंगुलियां फिरा रही थी।

सत्यनारायण जी ने जूते उतारे और रसोई की ओर देखा। उर्मिला वहां घर के पुराने नौकर और रसोइए मदन के साथ मिलकर रात के खाने की तैयारी में जुटी थीं। सत्यनारायण जी ने बैठक से ही धीमी आवाज में कहा, “उर्मिला, अगर तुम्हारी गृहस्थी से फुर्सत मिल गई हो, तो एक कप गर्म चाय मेरे कमरे में भिजवा देना।” यह कहकर वे अपने कमरे की ओर बढ़ गए। उनकी आवाज में सुबह वाला उत्साह गायब था, उसकी जगह एक खामोश शिकवा था।

रसोई में काम कर रहे मदन ने उर्मिला की तरफ देखा और दबी आवाज में कहा, “अम्मा जी, बड़े बाबूजी कुछ बुझे-बुझे लग रहे हैं। जब शाम को टहलने जा रहे थे तो बड़े खुश थे, पर लौटते ही उनकी आवाज में भारीपन आ गया।”

उर्मिला ने एक गहरी सांस छोड़ी और करछुल चलाते हुए बोलीं, “पता नहीं मदन, तुम्हारे बाबूजी को रिटायरमेंट के बाद क्या हो गया है। छोटी-छोटी बातों पर बच्चों की तरह रूठ जाते हैं। पहले काम में मशगूल रहते थे तो कभी किसी बात की शिकायत नहीं करते थे, अब हर घड़ी उनका चेहरा उतरा रहता है।”

मदन ने अदरक कूटते हुए बड़ी संजीदगी से कहा, “अम्मा जी, बुरा न मानिएगा, मगर जिंदगी भर बाबूजी ने परिवार के हर सदस्य की खुशियों के लिए दिन-रात एक कर दिया। अब जब उनके पास सिर्फ खाली वक्त है, तो उन्हें लगता है कि किसी के पास उनके लिए वक्त ही नहीं है। सबसे ज्यादा दर्द उन्हें इस बात से होता है कि इस बड़े से घर में, आपके रहते हुए भी वे अकेले पड़ जाते हैं। हमारे गांव में भी मेरे माता-पिता इसी बात पर उलझते हैं। बाबूजी को सिर्फ एक कप चाय नहीं, आपका थोड़ा सा सान्निध्य चाहिए। आप कमरे में जाइए और उनके पास बैठिए, दाल में तड़का मैं लगा दूंगा।”

मदन की बात उर्मिला के दिल पर सीधे जाकर लगी। उन्होंने ट्रे में चाय की प्याली रखी और सत्यनारायण जी के कमरे में पहुंचीं। कमरे में मंद रोशनी थी और वे खिड़की के बाहर अंधेरे को निहार रहे थे।

“यह लीजिए आपकी अदरक और इलायची वाली खास चाय,” उर्मिला ने मेज पर प्याली रखते हुए कहा, “जाते वक्त तो आपका चेहरा गुलाब की तरह खिला था, अब लौटते ही यह मायूसी क्यों ओढ़ ली आपने?”

सत्यनारायण जी ने मुड़कर देखा। उनकी आंखों में एक अजीब सा दर्द था। “उर्मिला, पहले जब मैं दफ्तर से थका-हारा लौटता था, तो तुम दरवाजे पर मुस्कुराते हुए मेरा स्वागत करती थीं। मेरी एक आह पर तुम सब काम छोड़कर आ जाती थीं। अब मैं कब आता हूँ, कब जाता हूँ, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। सब अपनी-अपनी स्क्रीनों में, अपनी-अपनी दुनिया में कैद हैं। तुम भी दिन भर चूल्हे-चौके और बच्चों की फरमाइशों में फंसी रहती हो। खैर, छोड़ो इन बातों को, बस इतना याद रखना कि कल शाम हमें मंदिर जाना है। मैंने माथुर साहब से कह दिया है।”

उर्मिला ने मुस्कुराकर उनके कंधे पर हाथ रखा, “आप भी न, बेकार में उदास होते हैं। मैंने वादा किया है न, कल शाम सिर्फ आपकी होगी।”

रात को साढ़े आठ बजे जब पूरा परिवार डाइनिंग टेबल पर एकत्र हुआ, तो माहौल में सामान्य चहल-पहल थी। बेटा अनुराग अपने लैपटॉप पर ऑफिस के ईमेल जांच रहा था और बहू कृतिका बच्चों को खाना परोस रही थी। सत्यनारायण जी का मन अब फिर से हल्का था, क्योंकि अगले दिन की शाम उनके लिए एक नई शुरुआत जैसी थी।

तभी खाना खाते-खाते कृतिका ने अचानक उर्मिला की तरफ देखकर कहा, “मम्मी जी, कल शाम को बच्चों की पूरी जिम्मेदारी आपकी रहेगी। अनुराग और मैंने कल शाम के लिए थियेटर के दो टिकट बुक किए हैं। एक नया नाटक आया है, जिसकी बहुत तारीफ हो रही है। ऑफिस के बाद हम दोनों सीधे वहीं चले जाएंगे। आते-आते हमें रात के दस बज जाएंगे। आप बस आरव और अनन्या को समय पर दूध और खाना खिला दीजिएगा, बाकी वे पढ़ाई करके सो जाएंगे, आपको बिल्कुल तंग नहीं करेंगे।”

कृतिका की यह बात सुनते ही मानो डाइनिंग टेबल पर सन्नाटा पसर गया।

उर्मिला का निवाला गले में ही अटक गया। उन्होंने घबराकर अपनी नजरें उठाईं और पहले कृतिका को देखा, फिर धीरे से सत्यनारायण जी की ओर देखा। कुछ ही क्षण पहले जिस चेहरे पर सुकून की लकीरें थीं, वे अचानक गहरी वेदना और निराशा में तब्दील हो चुकी थीं। सत्यनारायण जी ने अपनी थाली की ओर देखा, उनका हाथ वहीं का वहीं रुक गया। जिस शाम का वे एक बच्चे की तरह इंतजार कर रहे थे, उस पर एक झटके में बहू-बेटे के मनोरंजन का बोझ लद चुका था।

बेटा अनुराग अपने पिता के चेहरे के बदलते भावों को भांप गया। उसने लैपटॉप बंद किया और पूछा, “क्या हुआ पापा? आप अचानक इतने चुप क्यों हो गए? कुछ देर पहले तो आप ठीक थे, कहीं सीने में कोई तकलीफ या तबीयत खराब तो नहीं लग रही?”

सत्यनारायण जी ने फीकी सी हंसी हंसते हुए थाली एक तरफ सरका दी, “नहीं बेटा, तबीयत को क्या होना है। उम्र हो गई है तो भूख भी कम ही लगती है। तुम लोग नाटक देखने जरूर जाओ, बाहर घूमना-फिरना भी जरूरी है।” इतना कहकर वे बिना खाना पूरा किए कुर्सी से उठे और हाथ धोने चले गए।

उस रात घर की बत्तियां बुझ जाने के बाद भी सत्यनारायण जी की आंखों से नींद कोसों दूर थी। वे करवटें बदलते रहे। उर्मिला उनके सिरहाने बैठी रहीं।

“सुनिए,” उर्मिला ने दबे स्वर में कहा, “मैं कृतिका से कह देती हूँ कि वह किसी और दिन नाटक देखने चली जाए। हम कल मंदिर जरूर चलेंगे।”

सत्यनारायण जी ने उनकी तरफ देखा और एक ठंडी आह भरी, “नहीं उर्मिला, अब कुछ कहने का कोई फायदा नहीं। अगर तुम बहू से कहोगी, तो उसे लगेगा कि सास-ससुर उनकी खुशियों के बीच में आ रहे हैं। घर में कलह होगी, खिंचाव बढ़ेगा। मैं नहीं चाहता कि मेरे एक छोटे से मंदिर जाने के चक्कर में बच्चों के चेहरे पर शिकन आए। शायद बुढ़ापे का यही दस्तूर है, अपनी इच्छाओं का गला घोंटकर अगली पीढ़ी के लिए रास्ता साफ करते रहो। तुम बच्चों को संभालना, मैं कल शाम भी अकेले ही पार्क चला जाऊंगा।”

उनकी आवाज में जो टूटन थी, उसने उर्मिला की आत्मा को झकझोर कर रख दिया। वे पूरी रात सो नहीं सकीं। उन्हें समझ आ गया कि यह सिर्फ एक शाम या मंदिर जाने का मामला नहीं था; यह उस आत्मसम्मान, उस पहचान और उस रिश्ते की बात थी जिसे उन्होंने अपने पूरे जीवन की नींव बनाया था। अगर आज उन्होंने चुप्पी साध ली, तो आने वाले बरसों में उनका अस्तित्व सिर्फ एक ‘घरेलू केयरटेकर’ बनकर रह जाएगा।

अगली सुबह का सूरज निकला। घर में रोजमर्रा की तरह भागदौड़ शुरू हुई। अनुराग दफ्तर जाने के लिए तैयार हो रहा था और कृतिका बच्चों का टिफिन पैक कर रही थी। सत्यनारायण जी चुपचाप अपनी चाय पीकर कमरे में चले गए थे।

नाश्ते की मेज पर जब अनुराग और कृतिका बैठे, तो उर्मिला वहां आईं। उनके चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था, बल्कि एक गजब का ठहराव और गंभीरता थी। उन्होंने दोनों के सामने चाय के कप रखे और एक कुर्सी खींचकर बैठ गईं।

“अनुराग, कृतिका, मुझे तुम दोनों से कुछ बात करनी है,” उर्मिला ने शांत लेकिन स्पष्ट स्वर में कहा।

कृतिका ने चौंककर देखा, “हाँ मम्मी जी, बोलिए ना। बच्चों के खाने के बारे में कुछ बताना है क्या?”

“नहीं कृतिका, बच्चों के बारे में नहीं, तुम्हारे पापा और मेरे बारे में,” उर्मिला ने सीधे अनुराग की आंखों में देखते हुए कहा। “बेटा, कल शाम तुम्हारे पापा ने मुझसे बड़े मान और उम्मीद के साथ एक बात कही थी। उन्होंने मुझसे कहा था कि हम दोनों कल शाम राधा-कृष्ण मंदिर जाएंगे, वहां भजन सुनेंगे और थोड़ा वक्त एक-दूसरे के साथ बिताएंगे। रिटायरमेंट के बाद तुम्हारे पापा बहुत अकेला महसूस करते हैं। इस घर में, तुम सबके बीच रहकर भी वे तन्हा हैं। और सच कहूं तो मैं भी थक चुकी हूँ खुद को सिर्फ जिम्मेदारियों की चारदीवारी में बांधते-बांधते।”

अनुराग और कृतिका दोनों अवाक होकर उर्मिला का चेहरा देखने लगे।

उर्मिला आगे बोलीं, “कल जब कृतिका ने नाटक जाने की बात कही, तो तुम्हारे पापा ने एक शब्द नहीं कहा। उन्होंने अपनी खुशी को चुपचाप अपनी थाली में छोड़ दिया और उठ गए। क्यों? क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि उनके अरमानों से तुम दोनों का मन खराब हो। लेकिन आज मैं एक माँ होने के साथ-साथ एक पत्नी का फर्ज निभाने के लिए यह बात कह रही हूँ। बच्चों की परवरिश, उनकी देखरेख हमारा प्यार है, लेकिन यह हमारी रोज की ड्यूटी नहीं हो सकती जिसकी खातिर हम अपने बचे-खुचे जीवन के पलों को कुर्बान कर दें।”

कृतिका का चेहरा शर्म से लाल हो गया। उसने नजरें झुका लीं, “मम्मी जी, मुझे सच में नहीं पता था कि आप दोनों का बाहर जाने का कोई कार्यक्रम था। अगर पता होता तो मैं कभी टिकट बुक न करती।”

“जानती हूँ बहू,” उर्मिला ने नरमी से कृतिका का हाथ थामते हुए कहा, “गलती तुम्हारी नहीं है। गलती इस सोच की है जहां हम मान लेते हैं कि बूढ़े माता-पिता का अपना कोई निजी जीवन, अपनी कोई इच्छा या अपनी कोई शाम नहीं हो सकती। हम मान लेते हैं कि वे तो घर पर ही हैं, तो हमेशा उपलब्ध रहेंगे। अनुराग, जिस तरह तुम्हें और कृतिका को अपने रिश्ते को तरोताजा रखने के लिए एक शाम साथ चाहिए, ठीक उसी तरह इस उम्र में मुझे और तुम्हारे पापा को भी एक-दूसरे के हाथ की गर्माहट और वक्त की जरूरत है। इसलिए आज शाम मैं बच्चों को नहीं संभाल पाऊंगी। आज शाम मैं अपने पति के साथ मंदिर जाऊंगी।”

अनुराग की आंखें भर आईं। वह तुरंत अपनी कुर्सी से उठा और अपनी माँ के पास आकर घुटनों के बल बैठ गया। “मम्मी, मुझे माफ कर दीजिए। हम अपनी ही दुनिया, अपने करियर और अपनी जिंदगी में इतने अंधे हो गए थे कि हमें कभी दिखा ही नहीं कि पापा कितने खामोश होते जा रहे हैं। हमने कभी सोचा ही नहीं कि जिस छत को उन्होंने अपनी जवानी देकर बनाया, उसी छत के नीचे वे बेगाने हो रहे हैं। आप बिल्कुल मंदिर जाएंगी, और आज ही क्यों, जब आपका मन करे तब जाएंगी।”

कृतिका ने भी आगे बढ़कर उर्मिला के हाथ थाम लिए, “मम्मी जी, मुझे सचमुच बहुत पछतावा हो रहा है। हम नाटकों और फिल्मों में रिश्ते ढूंढते रहे, जबकि हमारे सामने दो जिंदगियां एक-दूसरे के साथ के लिए तरस रही थीं। आज का नाटक हम नहीं जाएंगे, हम टिकट कैंसिल कर देते हैं। हम बच्चों को संभालेंगे और आपके लिए गाड़ी की व्यवस्था भी अनुराग ही करेगा।”

उर्मिला ने मुस्कुराते हुए कृतिका के सिर पर हाथ फेरा, “नहीं बेटा, टिकट कैंसिल करने की कोई जरूरत नहीं है। नाटक का समय रात आठ बजे का है और हम शाम पांच से सात बजे तक मंदिर होकर लौट आएंगे। और अगर थोड़ा वक्त आगे-पीछे भी हुआ, तो आरव और अनन्या अब इतने समझदार हैं कि दो घंटे मदन काका के साथ बैठकर अपनी ड्राइंग और पढ़ाई कर सकते हैं। जिंदगी में संतुलन बनाना जरूरी है, किसी एक की खुशी की बलि देकर दूसरा कभी खुश नहीं रह सकता।”

दोपहर बाद जब सत्यनारायण जी अपने कमरे में उदास लेटे थे, तभी कमरे का दरवाजा खुला। सामने उर्मिला खड़ी थीं। उन्होंने हल्के नीले रंग की वह सूती साड़ी पहन रखी थी जो सत्यनारायण जी ने उन्हें उनकी पिछली सालगिरह पर लाकर दी थी। बालों में सलीके से कंघी की हुई थी और माथे पर लाल बिंदी चमक रही थी।

सत्यनारायण जी ने अचरज से उन्हें देखा, “अरे, यह क्या? तुम तैयार क्यों हो रही हो? बहू-बेटे को बाहर नहीं जाना क्या?”

उर्मिला ने अलमारी से सत्यनारायण जी का नया कुरता निकाला और उनके हाथों में थमाते हुए मुस्कुराकर कहा, “वे भी जाएंगे और हम भी जाएंगे। चलिए, जल्दी से यह कुरता पहन लीजिए, ठीक पांच बजने वाले हैं। माथुर साहब को मंदिर के प्रांगण में इंतजार मत करवाइएगा, वरना वे कहेंगे कि सत्यनारायण जी का अपनी अर्धांगिनी के साथ आने का दावा सिर्फ हवा-हवाई था।”

सत्यनारायण जी की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए। वे कुछ कह न सके, बस उर्मिला का हाथ अपने सीने से लगा लिया।

शाम को जब वे दोनों राधा-कृष्ण मंदिर की सीढ़ियां चढ़ रहे थे, तो दूर झील से आती ठंडी बयार उनके चेहरों को छू रही थी। मंदिर में शंख और घंटों की मधुर ध्वनि गूंज रही थी। माथुर साहब अपनी पत्नी के साथ खड़े आरती की प्रतीक्षा कर रहे थे। जब उन्होंने सत्यनारायण जी को उर्मिला का हाथ थामे आते देखा, तो उनके चेहरे पर एक आत्मीय मुस्कान तैर गई।

आरती के दौरान जब दीपकों की लौ झिलमिलाई, तो सत्यनारायण जी ने चुपके से उर्मिला की ओर देखा। उर्मिला ने आंखें मूंदकर हाथ जोड़े हुए थे। उस पल सत्यनारायण जी को लगा कि बरसों बाद उनकी जिंदगी की सबसे खूबसूरत शाम लौट आई थी—एक ऐसी शाम जहाँ कोई शिकायत नहीं थी, कोई अकेलापन नहीं था, बस दो पुराने हमसफर थे और उनके बीच का अटूट, मौन विश्वास।

जीवन के अंतिम पड़ाव पर बुजुर्गों को महलों जैसी सुख-सुविधाएं नहीं, बल्कि अपने जीवनसाथी का सान्निध्य और बच्चों का थोड़ा सा आदर व समझदारी चाहिए होती है। क्या आपके घर में भी कभी किसी बुजुर्ग की छोटी सी ख्वाहिश जिम्मेदारियों के नीचे दब गई है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट में जरूर साझा करें।

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