ओंकारनाथ जी ने अर्नव के साथ कभी एक कड़क अनुशासनप्रिय संरक्षक का व्यवहार नहीं किया था। जब अर्नव हाई स्कूल में था, तब भी दादाजी उसके साथ बैठकर उसकी पसंद की बातें सुनते थे। तकनीक, कंप्यूटर और दुनिया भर के बदलावों पर वे अर्नव से सवाल पूछते थे ताकि पोते को लगे कि उसके दादाजी उसकी दुनिया में दिलचस्पी रखते हैं। जब अर्नव गलतियां करता, तो वे उस पर चीखने-चिल्लाने के बजाय एकांत में बैठाकर तर्क के साथ समझाते थे। उन्होंने कभी अर्नव पर अपने विचार नहीं थोपे, बल्कि सही और गलत के बीच फर्क करने का विवेक दिया।
पंडित ओंकारनाथ जी अपने कमरे की आरामकुर्सी पर बैठकर चश्मा ठीक कर ही रहे थे कि बाहर मुख्य दरवाजे की सांकल जोर से खटखटाने की आवाज आई। कदमों की तेज और उतावली आहट बता रही थी कि कोई बहुत जल्दी में है। लकड़ी का पुराना दरवाजा जैसे ही खुला, उन्नीस वर्षीय अर्नव आंधी की तरह भीतर दाखिल हुआ। उसके चेहरे पर फैली चमक सुबह के सूरज से भी ज्यादा प्रखर थी। उसने चारों तरफ नजरें दौड़ाईं। बैठक खाली थी, रसोई से चाय की खुशबू आ रही थी, पर जिसके चेहरे को देखने के लिए उसकी आंखें सबसे ज्यादा बेचैन थीं, वे वहां नहीं दिखे। अर्नव बिना एक पल गंवाए सीधे दादाजी के अध्ययन कक्ष की ओर लपका। कमरे का परदा हटाते ही उसने देखा कि ओंकारनाथ जी हाथ में धार्मिक पत्रिका लिए बैठे थे और चेहरे पर वही चिरपरिचित शांत भाव था।
अर्नव ने एक पल भी नहीं गंवाया। हाथ में थामे सुनहरे डिब्बे को मेज पर रखते हुए वह पूरी शिद्दत से दादाजी के पैरों पर गिर पड़ा। उसके दोनों हाथ उनके चरणों को छू रहे थे और उसका सिर उनके घुटनों पर टिका हुआ था। कमरे में सिर्फ उसकी गहरी सांसों की आवाज थी, जो खुशी के मारे तेज चल रही थीं।
दादाजी, आपका पोता आज जीत गया। आपकी तपस्या, आपका हर एक सबक रंग ले आया। पिछले महीने जिस बहुराष्ट्रीय कंपनी के कड़े इम्तिहान और अंतिम साक्षात्कार के लिए मैं बेंगलुरु गया था, आज सुबह ही उनका औपचारिक नियुक्ति पत्र आ गया है। मुझे डेटा साइंटिस्ट के पद पर चुन लिया गया है। पैकेज भी इतना शानदार है कि मैंने कभी पहले साल में इसकी उम्मीद भी नहीं की थी।
ओंकारनाथ जी का हाथ खुद-ब-खुद अर्नव के सिर पर चला गया। उनकी उंगलियां अर्नव के घने बालों में प्यार से फिरने लगीं। अर्नव का गला रुंधा हुआ था, पर वह बोले जा रहा था।
दादाजी, जब मैं कोटा में प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा था और बाद में चार साल इंजीनियरिंग कॉलेज के हॉस्टल में अकेले एक छोटे से कमरे में बंद रहता था, तब कई बार लगता था कि सब छोड़कर घर लौट आऊं। अकेलेपन में जब भी हिम्मत टूटने लगती, मुझे आपकी वह भारी आवाज याद आती थी जो हर सुबह मुझे जगाते हुए कहती थी कि आत्मसंयम और नियमित दिनचर्या ही मनुष्य को महान बनाती है। पापा को मैंने जिंदगी भर अपनी साइकिल की दुकान पर पसीना बहाते देखा है। उन्होंने कभी अपने लिए नया कुर्ता नहीं खरीदा, पर मेरी हर किताब के लिए पैसे हमेशा समय पर भिजवाए। मां का वह शांत चेहरा, जिसने कभी किसी अभाव की शिकायत नहीं की, हमेशा मुझे धैर्य सिखाता रहा। आप सब की दी हुई सीख ही थी कि मैं परदेस में रहकर भी कभी भटका नहीं। आज जो कुछ भी हूं, आपकी ही परवरिश का फल हूं।
ओंकारनाथ जी की आंखों के कोरों से नमी की दो बूंदें ढुलक कर उनके सफेद कुर्ते पर गिर पड़ीं। उन्होंने अर्नव को दोनों बाजुओं से पकड़कर ऊपर उठाया और अपने सीने से भींच लिया। एक पल के लिए कमरे में शब्द गुम हो गए, केवल दो पीढ़ियों का आलिंगन और उनकी धड़कनें गूंज रही थीं।
शाबाश, मेरे बच्चे, शाबाश। भगवान तुम्हें दीर्घायु करे और तुम्हारी यह नम्रता हमेशा ऐसे ही बनी रहे। लेकिन सुनो, यह पहला डिब्बा तुम सीधे मेरे पास क्यों लाए? बाहर रसोई में तुम्हारी मां सुबह से काम में जुटी है, और तुम्हारे पिता दुकान खोलने की तैयारी कर रहे हैं। इस सफलता की पहली मिठाई उन दोनों के मुंह में जानी चाहिए। तुम्हारी मां ने तुम्हारे लिए अपने सारे सुख न्योछावर किए हैं और तुम्हारे पिता ने अपनी पीठ झुकाकर तुम्हारी रीढ़ को सीधा रखा है। जाओ, पहले उनके पांव छुओ।
अर्नव मुस्कुराया। उसकी आंखों में एक नटखटपन तैर गया, जैसा बचपन में हुआ करता था जब वह दादाजी के चश्मे का खोल छिपा दिया करता था। उसने झुककर ओंकारनाथ जी के कान के पास मुंह किया और धीमी आवाज में फुसफुसाया।
दद्दू, मां और पापा के लिए बाहर गाड़ी की डिक्की में काजू कतली के बड़े डिब्बे रखे हैं। पूरी कॉलोनी में बांटने के लिए अलग से व्यवस्था की है। पर इस डिब्बे को ध्यान से देखिए। इसमें पुरानी चौक की वही खास बालूशाही है, जिसकी कुरकुरी परत और अंदर का रस आपको सबसे ज्यादा भाता है। मुझे पता है कि घर में पापा और मां आपके बढ़ते शुगर की वजह से मीठे पर कड़ी पाबंदी लगाकर रखते हैं। आज कोई डांट नहीं पड़ेगी, पर वादा कीजिए कि आप इसे एक साथ नहीं खाएंगे। रोज छिपकर एक-एक खाइएगा, ताकि मां की नजर न पड़े।
यह सुनते ही ओंकारनाथ जी का गंभीर चेहरा खिल उठा और वे खिलखिलाकर हंस पड़े। उस पल में वह अस्सी साल के बुजुर्ग नहीं, बल्कि एक छोटे बालक जैसे मासूम लग रहे थे। अर्नव दौड़कर बाहर आंगन की तरफ निकल गया, जहां उसके माता-पिता खड़े थे। आंगन से मां के आंसुओं की सिसकारी और पिता की गर्व भरी आवाज गूंजने लगी।
कमरे में अकेले बैठे ओंकारनाथ जी ने मेज पर रखे बालूशाही के डिब्बे को छुआ। उनके मन में विचारों का एक ज्वार उमड़ पड़ा। समाज में अक्सर एक बात बहुत आसानी से कह दी जाती है कि बच्चों को जब छोटी उम्र में घर से बाहर भेज दिया जाता है, जब वे हॉस्टल के आजाद माहौल में जीने लगते हैं, तो उनका परिवार से मोहभंग हो जाता है। लोग कहते हैं कि अकेले रहने के आदी हो चुके युवाओं को अपने बुजुर्गों की मौजूदगी एक बोझ, एक बंधन और दखलअंदाजी लगने लगती है। वे त्योहारों पर घर आने से कतराने लगते हैं और फोन पर दो मिनट बात करना भी एहसान समझते हैं।
लेकिन ओंकारनाथ जी की सोच हमेशा से अलग थी। वे खिड़की के बाहर धूप में चहकती चिड़ियों को देखने लगे। उनका मानना था कि बंधन और संस्कार में जमीन-आसमान का अंतर होता है। बंधन जबरदस्ती थोपा जाता है, जिससे हर जीव मुक्त होना चाहता है। संस्कार आत्मा में रोपे जाते हैं, जो इंसान को चाहे दुनिया के किसी भी कोने में ले जाएं, उसकी जड़ों को सूखने नहीं देते। अगर परवरिश की नींव में केवल अधिकार जताना और आदेश देना शामिल होगा, तो बच्चा जैसे ही अपने पैरों पर खड़ा होगा, वह उस माहौल से भागने की कोशिश करेगा।
वे सोचने लगे कि गलती सिर्फ नई पीढ़ी की नहीं होती। अक्सर पुरानी पीढ़ी भी अपनी हठधर्मिता, अपने पुराने ढर्रे और अपने अहंकार को छोड़ने को तैयार नहीं होती। बड़े-बुजुर्ग यह भूल जाते हैं कि समय बदल चुका है। वे बच्चों की आधुनिक सोच, उनकी प्राथमिकताओं और उनकी चुनौतियों को समझने के बजाय उन पर अपने अधूरे सपनों और सख्त नियमों का पहरा बिठाना चाहते हैं। दो पीढ़ियों के बीच जो खाई बनती है, उसे पाटने की पहली पहल हमेशा बुजुर्गों को ही करनी चाहिए, क्योंकि उनके पास अनुभव का धन होता है।
ओंकारनाथ जी ने अर्नव के साथ कभी एक कड़क अनुशासनप्रिय संरक्षक का व्यवहार नहीं किया था। जब अर्नव हाई स्कूल में था, तब भी दादाजी उसके साथ बैठकर उसकी पसंद की बातें सुनते थे। तकनीक, कंप्यूटर और दुनिया भर के बदलावों पर वे अर्नव से सवाल पूछते थे ताकि पोते को लगे कि उसके दादाजी उसकी दुनिया में दिलचस्पी रखते हैं। जब अर्नव गलतियां करता, तो वे उस पर चीखने-चिल्लाने के बजाय एकांत में बैठाकर तर्क के साथ समझाते थे। उन्होंने कभी अर्नव पर अपने विचार नहीं थोपे, बल्कि सही और गलत के बीच फर्क करने का विवेक दिया।
यही कारण था कि अर्नव जब सात साल तक भोपाल से दूर रहकर अपनी पढ़ाई करता रहा, तब भी उसका मन हर शाम अपने घर के उस छोटे से कमरे में ही अटका रहता था। उसने हॉस्टल की आजादी को स्वच्छंदता नहीं बनने दिया। उसने अपनी स्वतंत्रता का उपयोग खुद को तराशने में किया, अपनी जड़ों को काटने में नहीं। आज जब उसे सफलता का सबसे बड़ा मुकाम मिला, तो उसके मन में सबसे पहले अपने दादाजी का आशीर्वाद लेने की तड़प जागी। वह भागा-भागा अपनी जड़ों के पास लौटा था।
बाहर आंगन में अब पूरे परिवार की हंसी गूंज रही थी। मां की ममता और पिता के गर्व से भरा माहौल पूरे घर को एक नए उत्सव में रंग रहा था। ओंकारनाथ जी ने डिब्बे से बालूशाही का एक छोटा सा टुकड़ा तोड़ा और मुंह में रख लिया। वह मिठास केवल खोए और चाशनी की नहीं थी, वह मिठास उस विश्वास की थी जो पीढ़ियों के बीच अटूट बना हुआ था। उनके चेहरे पर एक असीम संतोष की चमक थी, जो यह साबित कर रही थी कि सही संस्कार और आपसी समझ से पली-बढ़ी पीढ़ी कभी अपने बुजुर्गों को अकेला नहीं छोड़ती।
क्या आपको भी लगता है कि अगर बड़े-बुजुर्ग अपनी पुरानी हठ छोड़कर नई पीढ़ी की सोच और भावनाओं को समझें, तो पीढ़ियों के बीच की दूरी हमेशा के लिए मिट सकती है? अपनी राय हमें नीचे लिखकर जरूर बताएं।
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मूल लेखिका : उमा महाजन