उम्र के चालीसवें पड़ाव को पार करते ही शरीर ने भी साथ छोड़ना शुरू कर दिया था। गठिया का दर्द और रीढ़ की हड्डी की तकलीफ रोज़ का साथी बन गई थी। एक दिन भारी बारिश के बीच घर की छत से पानी टपकने लगा। दर्द से कराहती अनन्या जब बाल्टी रखने उठी, तो उसका पैर फिसल गया और वह ज़मीन पर गिर पड़ी। कमर में असहनीय दर्द था, वह उठने की कोशिश करती पर बेबस होकर वहीं गिर जाती। नौकरानी भी छुट्टी पर थी।
खिड़की के बाहर हल्की बारिश की बूंदें कांच से टकराकर फिसल रही थीं। चाय का खाली कप हाथ में लिए अनन्या शून्य में ताक रही थी। आज उसका पैंतालीसवां जन्मदिन था, पर घर के सन्नाटे को तोड़ने वाला कोई नहीं था। न फोन की कोई घंटी बजी थी, न किसी ने दरवाज़ा खटखटाया था। कमरे के कोने में रखी पुरानी तस्वीर पर नज़र पड़ी, जिसमें उसके माता-पिता, छोटा भाई वरुण और छोटी बहन तान्या एक साथ मुस्कुरा रहे थे। उस तस्वीर को देखकर अनन्या की आंखों के कोरों से गर्म आंसू बह निकले। यह आंसू सिर्फ अकेलेपन के नहीं थे, बल्कि उन फैसलों के थे जो उसने कभी पूरे होशोहवास में अपने परिवार के लिए लिए थे।
भोपाल के एक साधारण से मोहल्ले में बीता उसका बचपन संघर्षों से भरा था। पिता एक सरकारी दफ्तर में क्लर्क थे, जिनकी आकस्मिक मृत्यु ने पूरे परिवार को सड़क पर ला खड़ा किया था। उस वक्त अनन्या केवल बाईस साल की थी, वरुण बारह का और तान्या नौ बरस की। मां गिरिजा देवी सदमे में बीमार रहने लगी थीं। उस नाज़ुक मोड़ पर अनन्या ने अपने सपनों की पोटली को एक संदूक में बंद कर दिया और पिता की जगह अनुकंपा पर मिलने वाली नौकरी और साथ में एक प्राइवेट फर्म में अकाउंटेंट का काम संभाल लिया।
उसी प्राइवेट फर्म में उसकी मुलाकात मयंक से हुई थी। मयंक स्वभाव से बेहद सुलझा हुआ, संवेदनशील और हंसमुख इंसान था। दफ्तर में जब भी अनन्या काम के बोझ से थक जाती, मयंक बिना कहे उसके लिए कॉफी ले आता या फाइलों को सुलझाने में उसकी मदद कर देता। मयंक की आंखों में अनन्या के लिए जो सम्मान और अपनापन था, वह किसी से छिपा नहीं था। अनन्या के मन के किसी वीरान कोने में भी मयंक के लिए एक मीठा सा अहसास जागने लगा था, मगर उसने कभी उस भावना को अपने चेहरे पर आने नहीं दिया। वह जानती थी कि उसके कंधों पर दो मासूम जिंदगियों और एक बीमार मां का भार है।
एक दिन, जब दफ्तर के बाकी लोग जा चुके थे, मयंक ने हिम्मत जुटाकर अपने दिल की बात कह दी। उसने एक छोटा सा गुलाब का फूल अनन्या के हाथ में थमाते हुए कहा था, “अनन्या, मैं जानता हूं तुम किस दौर से गुज़र रही हो। मैं तुम्हारे हर सुख-दुख में साया बनकर रहना चाहता हूं। मैं तुमसे विवाह करना चाहता हूं।”
अनन्या का दिल ज़ोर से धड़का था, पर यथार्थ की ज़मीन बेहद सख्त थी। उसने अपनी कांपती उंगलियों से वह फूल वापस लौटा दिया था। “मयंक, यह संभव नहीं है। मेरे घर में कोई कमाने वाला नहीं है। वरुण और तान्या की पढ़ाई, मां की दवाइयां… इन सब के बीच मैं अपनी गृहस्थी के बारे में सोच भी नहीं सकती।”
मयंक ने समझाने की बहुत कोशिश की थी, “अनन्या, तुम्हारी जिम्मेदारियां मेरी भी होंगी। हम मिलकर संभाल लेंगे सब कुछ।”
पर अनन्या ने एक गहरी सांस लेकर कहा था, “शादी दो लोगों का नहीं, दो परिवारों का मिलना होता है। मैं किसी पर अपने परिवार का बोझ नहीं लादना चाहती और न ही अपनी जिम्मेदारियों से भाग सकती हूं। तुम बहुत अच्छे हो मयंक, मेरी खातिर अपनी ज़िंदगी मत उलझाओ। किसी ऐसी लड़की से शादी करो जो तुम्हें पूरा वक्त और खुशहाल परिवार दे सके।”
मयंक की आंखों में आंसू थे, पर अनन्या के अडिग फैसले के आगे वह हार गया। कुछ महीनों बाद मयंक ने वह शहर छोड़ दिया और पुणे की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में चला गया। जाने से पहले उसने बस इतना कहा था, “अनन्या, तुमने जो त्याग चुना है, ईश्वर करे कभी तुम्हें उस पर पछताना न पड़े।”
समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। अनन्या ने अपनी जवानी, अपनी खुशियां, अपनी नींद सब कुछ भाई-बहन के भविष्य पर न्योछावर कर दिया। उसने कभी नई साड़ियां नहीं खरीदीं, कभी सहेलियों के साथ घूमने नहीं गई। पाई-पाई जोड़कर वरुण को इंजीनियरिंग कराई और तान्या को फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कराया। मां अक्सर कहती, “बेटी, तू भी अपना घर बसा ले, तेरी उम्र निकली जा रही है।” पर अनन्या हमेशा मुस्कुराकर टाल देती, “पहले इन दोनों को अपने पैरों पर खड़ा कर दूं मां, फिर सोचूंगी।”
धीरे-धीरे समय बीता। वरुण की नौकरी बेंगलुरु की एक बड़ी टेक कंपनी में लग गई और तान्या को दिल्ली में एक अच्छा प्लेसमेंट मिल गया। अनन्या को लगा कि उसकी तपस्या सफल हो गई। उसने अपनी जमा-पूंजी और कुछ कर्ज लेकर पहले तान्या की धूमधाम से शादी की और फिर वरुण का विवाह उसकी पसंद की लड़की से करा दिया।
लेकिन ज़िंदगी की असली परीक्षा तब शुरू हुई जब मां गिरिजा देवी शांत नींद में इस दुनिया से विदा हो गईं। मां के जाने के बाद वह बड़ा सा मकान मानों अनन्या को काटने लगा। अब घर में न कोई आवाज़ थी, न कोई इंतज़ार करने वाला।
शुरुआत में वरुण और तान्या रोज़ फोन करते थे। फिर यह सिलसिला हफ़्ते में एक बार हुआ और धीरे-धीरे महीनों में बदल गया। तान्या अपनी ससुराल और बच्चों में इतनी व्यस्त हो गई कि उसे दीदी के घुटनों के दर्द की खबर भी न रहती। वरुण जब भी फोन करता, अपनी व्यस्तताओं का रोना रोता। उसने कभी भूलकर भी यह नहीं कहा, “दीदी, आप अब अकेली क्यों रहती हैं, हमारे पास आ जाइए।” उल्टे जब एक बार अनन्या ने हिम्मत करके कहा कि उसकी तबीयत ठीक नहीं रहती और अकेले रहने में डर लगता है, तो वरुण की पत्नी ने फोन पर तल्खी से कह दिया था, “दीदी, महानगरों के फ्लैट बहुत छोटे होते हैं। यहां का लाइफस्टाइल आपके जैसे बुजुर्गों के अनुकूल नहीं है।”
उस दिन अनन्या के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई थी। जिस भाई की हर ख्वाहिश पूरी करने के लिए उसने अपनी खुशियों की बलि चढ़ा दी थी, आज उसी के पास अपनी दीदी के लिए एक कमरे की जगह नहीं थी।
उम्र के चालीसवें पड़ाव को पार करते ही शरीर ने भी साथ छोड़ना शुरू कर दिया था। गठिया का दर्द और रीढ़ की हड्डी की तकलीफ रोज़ का साथी बन गई थी। एक दिन भारी बारिश के बीच घर की छत से पानी टपकने लगा। दर्द से कराहती अनन्या जब बाल्टी रखने उठी, तो उसका पैर फिसल गया और वह ज़मीन पर गिर पड़ी। कमर में असहनीय दर्द था, वह उठने की कोशिश करती पर बेबस होकर वहीं गिर जाती। नौकरानी भी छुट्टी पर थी।
फर्श पर पड़े-पड़े जब उसने पानी की बूंदों को गिरते देखा, तो उसका संयम टूट गया। वह फफक-फफक कर रो पड़ी। आज पहली बार उसके भीतर गहरा पछतावा उमड़ रहा था। “काश! काश मैं भी उस दिन थोड़ी स्वार्थी हो गई होती। काश मैंने मयंक का हाथ थाम लिया होता! आज कम से कम कोई तो होता जो प्यार से माथे पर हाथ रखता, एक घूंट पानी पिला देता। मैंने जिनके लिए अपनी ज़िंदगी होम कर दी, उन्हें मेरी सांसों की भी फिक्र नहीं है।”
वह दर्द और निराशा के उस गर्त में डूबती जा रही थी जहां इंसान जीने की इच्छा खो देता है। कई घंटे वह उसी हाल में पड़ी रही, जब तक कि पड़ोस की एक बुजुर्ग महिला ने खिड़की से उसे देखकर दरवाज़ा नहीं खटखटाया और मोहल्ले वालों की मदद से उसे अस्पताल नहीं पहुंचाया।
अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए अनन्या ने खुद से एक कड़ा सवाल पूछा। “क्या मेरा जीवन यहीं खत्म हो गया? क्या किसी के अहसान फरामोश हो जाने से मेरी अपनी सत्ता मिट गई?” उसने महसूस किया कि पछतावे की आग में जलकर वह सिर्फ अपने बचे हुए जीवन को बर्बाद कर रही है। उसने त्याग किया था क्योंकि वह उस समय उसका कर्तव्य था, लेकिन दूसरों की बेरुखी की सज़ा वह खुद को क्यों दे?
अस्पताल से लौटकर अनन्या ने एक बड़ा फैसला लिया। उसने अपने आंसुओं को पोंछा और खुद को संभाला। उसने अपनी सरकारी नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। जो प्रोविडेंट फंड और बचत उसके पास थी, उससे उसने शहर के बाहरी इलाके में एक छोटा सा, खुला मकान किराए पर लिया। उसने देखा कि समाज में ऐसी कई बेटियां हैं जो पढ़ना चाहती हैं पर पैसे की कमी से रुक जाती हैं। अनन्या ने उन बच्चियों को मुफ्त गणित और अकाउंट्स पढ़ाना शुरू किया।
शुरुआत में सिर्फ चार लड़कियां आईं, लेकिन अनन्या के स्नेह और लगन से यह संख्या बढ़ने लगी। कुछ ही महीनों में उसके घर का आंगन बच्चों की खिलखिलाहट से गूंजने लगा। वह अब सिर्फ एक बेबस, अकेली औरत नहीं थी, बल्कि दर्जनों बच्चियों की “दीदी” बन चुकी थी। जो खालीपन उसे अंदर से खा रहा था, वह अब इन मासूम चेहरों की मुस्कान से भरने लगा था। उसने योग शुरू किया, अपने स्वास्थ्य पर ध्यान दिया और धीरे-धीरे उसका दर्द भी कम होने लगा।
एक शाम जब वह बच्चों को पढ़ाकर निवृत्त हुई थी, तभी दरवाज़े पर एक कार आकर रुकी। कार से एक अधेड़ उम्र का, सलीकेदार लिबास पहने व्यक्ति उतरा। उसके चेहरे पर वक्त की कुछ लकीरें थीं, लेकिन वही जानी-पहचानी सौम्यता थी।
वह मयंक था।
अनन्या की आंखें फटी की फटी रह गईं। मयंक ने आगे बढ़कर हाथ जोड़े, “पहचाना अनन्या?”
अनन्या के मुंह से शब्द नहीं निकले, बस उसकी आंखें भर आईं। मयंक ने बताया कि उसकी पत्नी का कुछ साल पहले एक गंभीर बीमारी के कारण देहांत हो गया था। उसकी एक बेटी थी जो अब विदेश में पढ़ रही थी। वह अपने काम के सिलसिले में इस शहर आया था और जब उसने पुराने मोहल्ले में अनन्या के बारे में पूछा, तो पड़ोसियों ने उसे यहां का पता दिया।
मयंक ने बच्चों से भरे उस घर को देखा, किताबों को देखा और फिर अनन्या के चेहरे को, जिस पर अब बुझे हुए मन की उदासी नहीं बल्कि एक शांत गरिमा थी।
मयंक ने धीरे से कहा, “अनन्या, मुझे तुम्हारे अकेलेपन और तकलीफों के बारे में सब पता चला। जब मुझे लगा कि तुम टूट चुकी होगी, तो मैं यहां खिंचा चला आया। लेकिन यहां आकर मैंने देखा कि तुमने अपने दर्द को अपनी ताकत बना लिया है। तुम आज भी दूसरों के जीवन में रोशनी भर रही हो।”
अनन्या ने मुस्कुराते हुए सिर झुका लिया, “मयंक, एक वक्त था जब मैं पछतावे के अंधेरे में डूब गई थी। मुझे लगता था कि अपनों ने मुझे ठुकरा दिया तो मेरी ज़िंदगी व्यर्थ हो गई। पर फिर मैंने समझा कि जो त्याग हमने अपने दिल से किया, उस पर पछताना कैसा? अगर उन्होंने कद्र नहीं की, तो यह उनकी कमी है, मेरी नीयत की नहीं। मैंने खुद को समेट लिया और अब मैं खुश हूं।”
मयंक ने एक गहरी सांस ली और अपनी जेब से वही पुराना सूखा हुआ गुलाब निकाला, जिसे उसने इतने बरसों से एक डायरी में सहेज कर रखा था।
उसने कहा, “अनन्या, उस दिन तुमने अपने परिवार के लिए मुझे मना किया था। आज तुम्हारे सिर पर वह जिम्मेदारियां नहीं हैं। आज हम दोनों ज़िंदगी के उस पड़ाव पर हैं जहां हमें किसी सहारे की नहीं, बल्कि एक सच्चे हमसफर की ज़रूरत है जो हमारे सुख-दुख को बांट सके। क्या तुम अपनी ज़िंदगी का बचा हुआ सफर मेरे साथ बिताना पसंद करोगी? इस बार कोई जल्दबाज़ी नहीं है, और न ही कोई मजबूरी।”
अनन्या ने उस सूखे गुलाब को देखा, फिर मयंक की उन आंखों को जिनमें आज भी वही सच्चा आदर और प्यार था जो पच्चीस साल पहले था। उसके मन का सारा भारीपन मानों एक पल में धुल गया। उसने महसूस किया कि ज़िंदगी कभी किसी एक मोड़ पर खत्म नहीं होती। जब हम खुद से प्यार करना सीखते हैं और दूसरों की बेरुखी से ऊपर उठ जाते हैं, तो कुदरत खुद हमारे लिए रास्ते बना देती है।
अनन्या की आंखों से एक आंसू टपका, पर इस बार वह दर्द का नहीं, कृतज्ञता का था। उसने धीरे से अपना हाथ मयंक के हाथ पर रख दिया और मंद स्वर में कहा, “हां मयंक, अब मैं अपने लिए जीना चाहती हूं… तुम्हारे साथ।”
शाम की ठंडी हवा में एक नई सुबह की खुशबू घुल चुकी थी। अनन्या ने साबित कर दिया था कि त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता, बस इंसान को अपनी पहचान और आत्मसम्मान कभी नहीं खोना चाहिए।
पाठकों से संवाद:
अक्सर हम अपने पूरे जीवन को दूसरों की खुशियों के लिए कुर्बान कर देते हैं, लेकिन जब वही लोग हमें अकेला छोड़ देते हैं, तो हम टूट जाते हैं। क्या अनन्या की तरह हमें भी अपने आत्मसम्मान को पहचानकर ज़िंदगी को एक नया मौका देना चाहिए? आपकी राय में क्या रिश्तों में हद से ज़्यादा त्याग करना सही है? अपने अनमोल विचार नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर बताएं।
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