ज़िंदगी की ढाल

अवनि ने आगे बढ़कर मां की कांपती, सूखी और ठंडी हथेली को अपने दोनों हाथों में थाम लिया। उस हथेली की त्वचा खुरदरी थी, जिस पर बरसों की मेहनत और अपनों की परवाह की लकीरें साफ देखी जा सकती थीं। अवनि का दिल जैसे किसी भारी पत्थर के नीचे दब गया। उसने महसूस किया कि यह वही हाथ था, जिसने बचपन में उसकी हर बीमारी में रात-रात भर उसके माथे पर गीली पट्टियां रखी थीं। यह वही हाथ था, जो जब वह पहली बार शहर जा रही थी, तो उसकी नजर उतारते हुए कांप रहा था।

कल्याणी नानी की आँखों में एक अजीब सा वात्सल्य और दृढ़ता थी। उन्होंने भर्राए गले से कहा, “बेटा, मेरी उम्र तो देख। अस्सी पार कर चुकी हूँ। अब जिंदगी से क्या मोह? अगर मेरी इस ढलती उम्र के दो दिन मेरी बच्ची के काम आ जाएं, तो इससे बड़ा पुण्य क्या होगा? वह बच्ची अंदर घुट-घुट कर मर रही है। दवाइयों से ज़्यादा उसे अपनेपन की जरूरत है। मैं उसके पास रहूंगी, उसके सिर पर हाथ फेरूंगी, उसे अपने हाथ से दलिया खिलाऊंगी। तू बस दरवाजा खोल।”

  खिड़कियों के भारी पर्दे गिरे हुए थे और धूप का एक कतरा भी अंदर आने से जैसे डर रहा था। पहली मंजिल के कोने वाले कमरे में पच्चीस साल की नव्या बेदम सी बिस्तर पर पड़ी थी। आँखों के नीचे गहरा कालापन उतर आया था, गाल अंदर धंस चुके थे और कभी गुलाब की पंखुड़ी से दिखने वाले होंठ सूखकर पपड़ी बन चुके थे। शरीर में उठने या करवट लेने तक की ताकत नहीं बची थी।

यह वही नव्या थी, जिसके कदमों की आहट से कभी पूरा मोहल्ला जाग उठता था। सुबह की ताजी हवा की तरह चहकने वाली, तितली की मानिंद पूरे घर में उड़ने वाली और पड़ोस के हर सुख-दुख में सबसे पहले पहुँचने वाली नव्या। चाहे किसी की शादी में मेहंदी लगाने का जिम्मा हो या किसी बुजुर्ग की दवाई लाने की बात, नव्या हमेशा मुस्कुराते हुए आगे रहती थी। उसके लिए खाली बैठना किसी यातना से कम नहीं था। लेकिन उस जानलेवा महामारी ने उसे एक बंद कमरे के चार कोनों में ला पटका था। रिपोर्ट पॉजिटिव आते ही दुनिया एकदम से बदल गई थी। खुद को अपनों से अलग कर लेना, एक बंद अंधेरे कमरे में कैद हो जाना, किसी कठोर कारावास से कम नहीं लग रहा था। बंद कमरे की दीवारों ने उसकी हँसी छीन ली थी और अकेलापन उसकी बची-खुची हिम्मत को अंदर से खोखला कर रहा था।

नीचे भूतल पर उसका पति, अनिरुद्ध, जिसे सभी प्यार से अनु कहते थे, बेहद बेबसी और तनाव में दिन काट रहा था। वह थर्मामीटर, गर्म पानी की केतली, दवाइयां और काढ़े की कटोरी लिए दिन-रात सीढ़ियों और रसोई के चक्कर काटता। चेहरे पर दो-दो मास्क लगाए जब वह दूर से ही कमरे के दरवाजे पर ट्रे रखता, तो नव्या की सूनी, थकी हुई आँखें देखकर उसका कलेजा फट पड़ता। पर डॉक्टर की सख्त हिदायत थी—दूरी ही बचाव है।

एक दोपहर, जब बाहर चिलचिलाती धूप थी और सन्नाटे को केवल कभी-कभार सायरन बजाती एंबुलेंस की आवाज़ चीरती थी, तभी मुख्य लोहे के गेट पर ज़ोर-ज़ोर से खटखटाहट हुई।

गेट के बाहर कोई अपनी लाठी और हाथ से दरवाजे को लगातार पीट रहा था। साथ ही एक कांपती मगर बुलंद आवाज़ गूंज रही थी, “अरे अनु बेटा! दरवाजा खोल रे… मैं हूँ, तेरी कल्याणी नानी! ज़रा किवाड़ तो खोल!”

अनिरुद्ध ने हड़बड़ाकर खिड़की से झांका। सामने पड़ोस की कल्याणी नानी खड़ी थीं। सफेद खादी की सूती साड़ी, पल्लू सिर पर बंधा हुआ, चेहरे पर उम्र के अस्सी सालों की अनगिनत झुर्रियां और हाथ में एक छोटी सी पोटली और कांसा की कटोरी।

अनिरुद्ध खिड़की से ही हाथ जोड़कर चिल्लाया, “नानी! आप यहाँ क्यों आई हैं? आप घर वापस जाइए! आपको पता नहीं है क्या कि नव्या को संक्रमण हो गया है? इस समय हमारे घर के पास आना भी खतरे से खाली नहीं है। आपकी उम्र बहुत नाजुक है, आप तुरंत लौट जाइए!”

आसपास के घरों की बालकनियों से भी कुछ लोग झांकने लगे। सामने वाले घर से त्रिवेदी जी ने आवाज़ लगाई, “कल्याणी अम्मा, पागल मत बनो! सरकार कह रही है कि बुजुर्गों को सबसे ज़्यादा खतरा है। घर जाओ, जान जोखिम में मत डालो!”

लेकिन कल्याणी नानी ने अपनी लाठी ज़मीन पर पटकी और आंखें तरेर कर बोलीं, “अरे हट जाओ सब के सब! तुम लोग क्या जानो बीमारी से लड़ना! बीमारी शरीर को बाद में मारती है, तुम्हारा यह अकेलापन और डर इंसान को पहले मार देता है। अनु, तू ज्यादा ज्ञान मत बघार और सीधा दरवाजा खोल, नहीं तो मैं यहीं चौखट पर बैठ जाऊंगी।”

अनिरुद्ध नीचे आया और जाली वाले दरवाजे के पीछे से मिन्नतें करने लगा, “नानी, समझिए! अगर आपको कुछ हो गया तो मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊंगा। नव्या ठीक हो जाएगी, फिर वह खुद आपके पैर छूने आएगी।”

कल्याणी नानी की आँखों में एक अजीब सा वात्सल्य और दृढ़ता थी। उन्होंने भर्राए गले से कहा, “बेटा, मेरी उम्र तो देख। अस्सी पार कर चुकी हूँ। अब जिंदगी से क्या मोह? अगर मेरी इस ढलती उम्र के दो दिन मेरी बच्ची के काम आ जाएं, तो इससे बड़ा पुण्य क्या होगा? वह बच्ची अंदर घुट-घुट कर मर रही है। दवाइयों से ज़्यादा उसे अपनेपन की जरूरत है। मैं उसके पास रहूंगी, उसके सिर पर हाथ फेरूंगी, उसे अपने हाथ से दलिया खिलाऊंगी। तू बस दरवाजा खोल।”

नानी के अटूट संकल्प और ममता के आगे अनु के सारे तर्क, विज्ञान और नियम धरे के धरे रह गए। अनिरुद्ध ने कांपते हाथों से कुंडी खोली। नानी सीधे अंदर आईं, अपने पैरों की चप्पल उतारी और बिना किसी झिझक के सीढ़ियां चढ़ने लगीं।

जब कमरे का दरवाज़ा खुला और कल्याणी नानी भीतर आईं, तो नव्या ने चौंककर अपनी आधी खुली आँखें पूरी खोल दीं। उसने अपने कमजोर हाथों से चादर चेहरे तक खींचने की कोशिश की और भर्राई आवाज़ में बोली, “नानी… नहीं… आप बाहर जाइए! मुझे छूना मत… मुझे वो बीमारी है। आप क्यों अपनी जान खतरे में डाल रही हैं?”

कल्याणी नानी ने एक पल भी नहीं गंवाया। वे सीधे जाकर नव्या के बिस्तर की पाटी पर बैठ गईं। अपना झुर्रियों भरा, ठंडा और ममतामयी हाथ नव्या के तपते हुए माथे पर रख दिया।

“चुप कर पगली! मेरा क्या बिगाड़ेगा यह रोग? मुझे तो खुद यमराज भी लेने आएँगे तो चार बातें सुनाकर भगा दूंगी। तू इतनी कमजोर कब से हो गई? जिस नव्या की हंसी से पूरा मोहल्ला गूंजता था, वह आज यूं हार मानकर लेट गई?” नानी ने अपने पल्लू के छोर से नव्या के चेहरे का पसीना और आंखों से बहते आंसू पोंछे।

नव्या को लगा जैसे साक्षात माँ या कोई देवी उसके सिरहाने आ बैठी हो। वह रो पड़ी। नानी ने उसे अपने सीने से लगा लिया। उस स्पर्श में कोई डर नहीं था, कोई दूरी नहीं थी; था तो बस बेपनाह अपनापन।

नानी ने अपनी पोटली खोली, जिसमें घर का बना भुना हुआ जीरा, अजवाइन, तुलसी और सोंठ का चूर्ण था। उन्होंने अनु को आवाज़ देकर गर्म पानी और सादा दलिया मंगवाया। फिर खुद अपने कांपते हाथों से चम्मच भरकर नव्या को खिलाने लगीं।

“नानी, आपको डर नहीं लगता?” नव्या ने धीरे से पूछा।

नानी अपनी बत्तीसी चमकाते हुए हंसीं। हंसते वक्त उनके चेहरे की झुर्रियां और गहरी हो जाती थीं। “डर किस बात का बिटिया? डर तो तब लगता है जब जीने का कोई मकसद न हो। मैंने जवानी में ही अपनी पूरी दुनिया उजड़ते देखी थी। जब मैं पैंतीस की थी, तभी एक सड़क हादसे में मेरे पति और मेरा इकलौता बारह साल का बेटा मुझे छोड़कर चले गए थे। उस दिन लगा था कि सब खत्म हो गया। चाहती तो रो-रोकर, लोगों की दया की मोहताज बनकर पूरी जिंदगी गुजार देती। पर मैंने ठाना कि दूसरों के आंसुओं को पोंछना ही अपनी जिंदगी का सहारा बनाऊंगी। तब से आज तक, जहाँ किसी को जरूरत होती है, मैं पहुँच जाती हूँ। जब तुम दूसरों को खुशी और हिम्मत देते हो न, तो ऊपर वाला तुम्हारी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद ले लेता है।”

अगले सात दिनों तक कल्याणी नानी उसी कमरे में एक मजबूत दीवार बनकर डटी रहीं। वे सुबह उठकर नव्या को काढ़ा पिलातीं, उसके सिर में तेल की मालिश करतीं, उसे अपने पुराने जमाने के किस्से सुनातीं और कभी-कभी बेसुरी आवाज़ में पुराने भजन गाकर हंसातीं। नानी की बातों में इतना रस और जीवन का ऐसा निचोड़ था कि कमरे का भारीपन धीरे-धीरे गायब होने लगा।

नव्या, जो निवाले निगलने में भी दर्द महसूस कर रही थी, अब नानी के हाथ से पूरा कटोरा सूप और खिचड़ी खाने लगी। सकारात्मकता की यह ऊर्जा दवाइयों से कहीं तेज़ असर कर रही थी। दसवें दिन जब डॉक्टर ने आकर नव्या का चेकअप किया और उसका ऑक्सीजन लेवल नापा, तो वह नब्बे से सीधे अट्ठानवे पर था। नव्या के चेहरे का पीलापन गायब हो चुका था और उसकी आँखों में फिर से वही पुरानी चमक लौट आई थी। उसकी रिपोर्ट नेगेटिव आ चुकी थी।

नव्या ने बिस्तर से उठकर नानी के चरण पकड़ लिए। उसकी आँखों से कृतज्ञता के आंसू बह रहे थे, “नानी, आपने मुझे नई जिंदगी दी है। अगर आप न आतीं, तो मैं उस अकेलेपन के डर से ही दम तोड़ देती। आपका यह अहसान मैं सात जन्मों में भी नहीं चुका सकती।”

कल्याणी नानी ने उसे उठाकर गले से लगाया और बोलीं, “पगली, अहसान कैसा? बस मेरी एक सीख हमेशा याद रखना। बुढ़ापा या बीमारी इंसान को तब तक नहीं तोड़ सकती जब तक उसका मन न टूटे। बुजुर्ग किसी के धन या संपत्ति के भूखे नहीं होते, उन्हें बस थोड़े से सम्मान, प्रेम और अपनेपन की दरकार होती है। आज की पीढ़ी समझती है कि मोबाइल और स्क्रीन पर वक्त बिताकर जिंदगी कट जाती है, पर सच तो यह है कि जब तक चार इंसानों से दिल न मिले, जिंदगी बेमानी है। तू ठीक हो गई, मेरी तपस्या पूरी हो गई।”

लेकिन नियति अभी एक और इम्तिहान लेने वाली थी।

उसी शाम, जब घर में नव्या के ठीक होने की खुशी में दीपक जलाए जा रहे थे, कल्याणी नानी को अचानक तेज कंपकंपी के साथ बुखार चढ़ आया। उनका शरीर तपने लगा और सांस लेने में हल्की तकलीफ होने लगी। उम्र का तकाजा और वायरस का असर अब उनके कमजोर जिस्म पर दिखने लगा था।

अनिरुद्ध और नव्या के हाथ-पांव फूल गए। नव्या रोने लगी, “नानी! मेरी वजह से आपको यह सब हुआ। मैं आपको कुछ नहीं होने दूंगी।”

अनिरुद्ध ने तुरंत शहर के सबसे अच्छे अस्पताल में संपर्क किया। नव्या खुद पीपीई किट पहनकर नानी के साथ एंबुलेंस में बैठी। जिस तरह नानी ने उसका हाथ पकड़ा था, उसी तरह नव्या ने नानी की झुर्रियों भरी हथेली को अपने दोनों हाथों में थामे रखा। वह पूरे रास्ते कहती रही, “नानी, आपने मुझे लड़ना सिखाया है, अब आप हार नहीं मान सकतीं।”

अस्पताल में डॉक्टरों की विशेष टीम ने तुरंत कल्याणी नानी का इलाज शुरू किया। आईसीयू के बाहर नव्या और अनिरुद्ध हाथ जोड़े खड़े थे। मोहल्ले के वे सभी लोग, जो पहले नानी को पागल कह रहे थे, अब अस्पताल के बाहर खड़े होकर उनके लिए दुआएं मांग रहे थे। नानी ने अपने जीवन में जो निस्वार्थ प्यार और दुआएं बांटी थीं, आज वे सारी दुआएं एक ढाल बनकर उनके इर्द-गिर्द खड़ी थीं।

नानी का शरीर भले ही अस्सी साल पुराना था, लेकिन उनका आत्मबल किसी फौलाद जैसा था। डॉक्टरों ने भी कहा कि इस उम्र में इस तरह के गंभीर संक्रमण से उबरना किसी चमत्कार से कम नहीं है, और यह चमत्कार उनकी जीने की अदम्य इच्छाशक्ति और सकारात्मक सोच की वजह से मुमकिन हो पाया।

चार दिन के सघन इलाज के बाद नानी का बुखार उतर गया। उनका ऑक्सीजन लेवल स्थिर हो गया और वे खतरे से पूरी तरह बाहर आ गईं।

जिस दिन कल्याणी नानी अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर लौटीं, उस दिन पूरा मोहल्ला उनके स्वागत में सड़क के दोनों किनारों पर खड़ा था। लोगों ने तालियां बजाकर और फूलों की पंखुड़ियां बरसाकर उस वीरांगना का स्वागत किया। नानी कार से उतरीं, चेहरे पर वही पुरानी, शरारती मुस्कान और सफेद बत्तीसी।

उन्होंने हाथ जोड़कर सबकी तरफ देखा और हंसी में बोलीं, “देखा! मैंने कहा था न कि यमराज भी मुझसे डरते हैं! जब तक तुम जैसे बच्चों के चेहरों पर मुस्कुराहटें बिखेरने का काम बाकी है, तब तक मुझे कुछ नहीं होने वाला!”

नव्या ने आगे बढ़कर नानी की लाठी थामी और उन्हें घर के भीतर ले आई। आज उस घर में सिर्फ एक बीमारी पर जीत का जश्न नहीं था, बल्कि इंसानियत, सेवा, प्रेम और उस निस्वार्थ रिश्ते की जीत हुई थी, जो खून के रिश्तों से कहीं ज्यादा बड़ा और अटूट होता है। कल्याणी नानी ने यह साबित कर दिया था कि जब दिल में दूसरों के लिए जीने का जज्बा हो, तो मौत भी अदब से रास्ता छोड़ देती है।

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