अनकहा दर्द

“सुमित, मैं थक चुकी हूँ। मैं अपने ही परिवार की नजरों में सिर्फ एक साधन बन कर रह गई हूँ। जब भी उनका फोन आता है, मेरी रूह कांप जाती है। मुझे नहीं चाहिए ऐसा मायका जहाँ मेरी कोई कद्र नहीं, जहाँ सिर्फ पैसों से मेरे अस्तित्व की कीमत तय होती है,” शालिनी की आवाज में बेबसी और गुस्सा दोनों थे।

सुमित ने उसे पानी का गिलास थमाया और बहुत धैर्य से समझाया, “शालिनी, मेरी बात ध्यान से सुनो। मायके से प्यार और जुड़ाव होना हर लड़की का अधिकार है, लेकिन शोषण को सहना किसी का कर्तव्य नहीं है। जब तक तुम खुद ‘ना’ कहना नहीं सीखोगी, तब तक वे तुम्हें ऐसे ही भावनात्मक रूप से प्रताड़ित करते रहेंगे। 

गुलाबी ठंड की सुहानी दोपहर थी। शहर की उस बड़ी और खूबसूरत आवासीय सोसायटी के मुख्य लॉन में हरी-भरी घास पर गुनगुनी धूप फैली हुई थी। रविवार का दिन होने के कारण पूरा परिसर चहल-पहल से गुलजार था। एक तरफ पुरुष अपनी चाय की चुस्कियों के साथ राजनीति और दफ्तर की बातें कर रहे थे, वहीं दूसरी तरफ महिलाओं का एक छोटा सा समूह कालीन बिछाकर बैठा हुआ था। हर तरफ से ठहाकों, खिलखिलाहटों और बातों की फुहारें फूट रही थीं।

उस समूह में शालिनी भी बैठी थी। उसके चेहरे पर एक शांत, सधी हुई मुस्कान चिपकी हुई थी, लेकिन उसकी आँखों में एक ऐसी उदासी तैर रही थी जिसे वह लंबे समय से छिपाने का हुनर सीख चुकी थी। उसकी सबसे करीबी पड़ोसन और सहेली रश्मि अभी दो दिन पहले ही जयपुर से अपने भाई की शादी में शामिल होकर लौटी थी। रश्मि के पास बताने के लिए किस्सों का अंबार था।

“अरे यार शालिनी, भाभी के घर वालों ने तो भाई को सोने की चेन दी ही, पर मेरी माँ ने भी मुझे विदाई में ऐसा सोने का सेट दिया कि मैं तो हैरान रह गई! और भैया ने जो बनारसी साड़ी दी, उसकी तो चमक ही अलग है,” रश्मि अपनी उंगलियों पर मायके से मिले उपहारों और लाड़-प्यार का हिसाब गिनाते हुए खुशी से फूली नहीं समा रही थी।

पास ही बैठी तन्वी ने मटर छीलते हुए अपनी बात जोड़ी, “सच में रश्मि, मायका तो मायका ही होता है। मैं तो जब भी इंदौर जाती हूँ, मेरी माँ मुझे रसोई में पाँव तक नहीं रखने देती। कहती है—’यहाँ सिर्फ आराम करने आई है, ससुराल में तो काम करना ही पड़ता है।’ सच कहूँ तो वहाँ पहुँचते ही बचपन फिर से लौट आता है।”

सब औरतें एक-दूसरे की बातों में अपनी-अपनी मायके की यादें पिरोने लगीं। कोई माँ के हाथ के पराठों की बात कर रही थी, तो कोई पिता द्वारा स्टेशन पर छोड़ने आते वक्त छलकने वाले आंसुओं की। सब अपनी-अपनी दुनिया में खुश थीं। लेकिन उस पूरे घेरे में केवल शालिनी अकेली थी, जिसके पास मायके के नाम पर सुनाने के लिए कोई सुखद याद नहीं थी। उसके हिस्से में शादी के बाद कभी ऐसा कोई पल आया ही नहीं था, जिसे वह गर्व से अपनी सहेलियों के सामने साझा कर सके।

दूर झूले और स्लाइडर के पास बच्चे खेल रहे थे। शालिनी का नौ साल का बेटा आरव और सात साल की बेटी मायरा अपनी जिद्द में मस्त थे। वे बाहर की खुली हवा और दौड़-भाग छोड़कर पार्क की एक बेंच पर बैठकर मोबाइल में गेम खेलने में लगे हुए थे। साथ में तन्वी का बेटा कबीर भी उसी स्क्रीन पर टकटकी लगाए खड़ा था।

शालिनी ने कई बार दूर से ही आवाज लगाई, “आरव, मायरा… फोन बंद करो बेटा, बाहर धूप में थोड़ा दौड़ लो!” लेकिन बच्चे कहाँ सुनने वाले थे। वे अपनी डिजिटल दुनिया में पूरी तरह गुम थे।

तभी अचानक आरव अपनी जगह से उठा और हाथ में बजता हुआ मोबाइल लेकर भागता हुआ अपनी माँ के पास आया। “मम्मी! नानी का फोन आ रहा है, कब से बज रहा है!” आरव ने तेज आवाज में कहा।

‘नानी’ शब्द सुनते ही शालिनी के चेहरे का रंग एकाएक उड़ गया। होंठों पर जो एक औपचारिक मुस्कान ठहरी हुई थी, वह पल भर में गायब हो गई। उसके सीने में एक अनजाना सा डर धड़कने लगा। उसका दिल जोरों से धड़कने लगा मानो किसी अनहोनी की आहट हो गई हो।

शालिनी ने घबराहट छुपाते हुए बेटे से फोन लेने के बजाय कहा, “आरव बेटा, तुम कबीर के साथ खेलो। मैं घर चलकर आराम से बात कर लूँगी। अभी फोन रख दो।”

लेकिन वहाँ बैठी सहेलियों की आँखें शालिनी के इस व्यवहार पर टिक गईं। एक अजीब सा मौन छा गया। रश्मि ने चौंकते हुए कहा, “अरे शालिनी! माँ का फोन है और तू कह रही है घर जाकर बात करेगी? देख तो सही, कितनी देर से बज रहा है। कहीं कोई जरूरी बात न हो!”

तन्वी ने भी हैरान होकर कहा, “हाँ यार, कितनी अजीब बात है! मेरे मायके से तो एक घंटी भी बज जाए तो मैं काम छोड़कर लपक पड़ती हूँ। माँ की आवाज सुने बिना तो दिन नहीं बीतता। उठा न, बात कर ले!”

शालिनी ने असहज होकर कांपते हाथों से मोबाइल थामा। स्क्रीन पर देखा तो होश उड़ गए। माँ के चार मिस्ड कॉल थे और भाभी के छह मिस्ड कॉल पड़े थे। साथ ही छोटे भाई रोहन के भी दो मैसेज आए हुए थे।

मायके से इतने सारे कॉल्स का मतलब शालिनी के लिए कभी कोई शुभ समाचार नहीं होता था। उसका बीता हुआ कल आँखों के आगे तैरने लगा। शादी के इन दस सालों में मायके से जब भी फोन आया था, किसी न किसी नई मांग, नई परेशानी या पैसों की जरूरत को लेकर ही आया था। कभी भाई के नए व्यापार में घाटे की भरपाई के लिए, कभी भाभी के मायके वालों को दिखाने के लिए महंगे उपहारों का बंदोबस्त करने के लिए, तो कभी पिता की पुरानी देनदारियों का रोना रोकर।

शालिनी के पति सुमित एक समझदार और सुलझे हुए इंसान थे। उन्होंने कई बार अपनी सामर्थ्य से बढ़कर शालिनी के मायके की मदद की थी। लेकिन मदद जब अधिकार और आदत बन जाए, तो रिश्तों की मिठास कड़वाहट में बदलने लगती है। शालिनी जब भी मायके जाती, तो माँ का पहला सवाल यह नहीं होता था कि ‘तू कैसी है बेटी?’, बल्कि यह होता था कि ‘दामाद जी ने इस बार क्या भेजा है?’ या ‘रोहन को कुछ रुपयों की सख्त जरूरत है, सुमित से बात की क्या?’

इन्हीं यादों के बोझ तले दबी शालिनी का गला सूखने लगा। वह समझ नहीं पा रही थी कि इस बार कौन सा नया बवंडर आने वाला है।

सहेलियों की उत्सुक नजरें उसी पर टिकी थीं। शालिनी ने एक गहरी सांस ली, खुद को संभाला और थोड़ी दूरी पर जाकर फोन का हरा बटन दबाया। उसने कांपती आवाज में कहा, “हाँ माँ… प्रणाम। मैं पार्क में थी बच्चों के साथ, फोन साइलेंट पर था।”

दूसरी तरफ से माँ की आवाज में कोई कुशलक्षेम नहीं थी, बल्कि एक तीखा उलाहना था, “कहाँ रहती हो तुम शालिनी? दस बार फोन किया है। इधर हम लोग कितनी बड़ी आफत में फंसे हैं और तुम्हें फोन उठाने की फुर्सत नहीं है!”

“क्या हुआ माँ? सब ठीक तो है न? बाबूजी की तबीयत ठीक है?” शालिनी ने घबराकर पूछा।

“तबीयत को क्या होना है, जीते जी मार दिया है तुम्हारे भाई के ससुराल वालों ने! बात यह है कि रोहन ने जो गाड़ी ली थी, उसकी तीन किस्तें बाकी हैं और आज शाम तक अगर सत्तर हजार रुपये जमा नहीं हुए तो बैंक वाले गाड़ी खींच कर ले जाएंगे। समाज में हमारी क्या इज्जत रह जाएगी? तेरी भाभी रो-रोकर मायके जाने की धमकी दे रही है। तू तुरंत सुमित से कहकर हमारे खाते में सत्तर हजार रुपये ट्रांसफर करवा दे,” माँ ने बिना रुके, हक जताते हुए पूरा फरमान सुना दिया।

शालिनी की आँखों से अपमान और दुख के गर्म आंसू बह निकले। उसने अपनी रुलाई को रोकते हुए धीमे स्वर में कहा, “माँ… पिछले महीने ही तो सुमित ने रोहन की दुकान के लिए पचास हजार रुपये दिए थे। अभी आरव और मायरा के स्कूल की छमाही फीस जमा करनी है। इस महीने हमारे पास भी हाथ बहुत तंग है। मैं सुमित से बार-बार पैसे कैसे मांग सकती हूँ? उनका भी तो अपना एक आत्मसम्मान है, हमारा भी परिवार है।”

माँ का स्वर तुरंत कठोर हो गया, “अच्छा! तो अब तू अपने सगे भाई के लिए इतनी पराई हो गई? थोड़ा सा रुपया क्या मांग लिया, तूने अपना और पराया गिनाना शुरू कर दिया। अरे, बड़ा अफसर है तेरा पति, क्या सत्तर हजार में उसका खजाना खाली हो जाएगा? अगर आज तूने मदद नहीं की, तो समझ लेना कि मायके के दरवाजे तेरे लिए हमेशा के लिए बंद हैं!”

उधर से फोन कट गया। फोन कटने की ‘बीप-बीप’ की आवाज शालिनी के कानों में हथौड़े की तरह बज रही थी। वह वहीं एक पेड़ के सहारे खड़ी होकर सिसक पड़ी। यह कैसा मायका था? जहाँ बेटी सिर्फ एक बैंक का खाता बनकर रह गई थी? जहाँ प्यार, ममता और अपनेपन का मोल केवल नोटों की गड्डियों से आंका जाता था? क्या एक बेटी का कर्तव्य सिर्फ मायके की हर जायज-नाजायज मांग को पूरा करते रहना है, भले ही उसका अपना वैवाहिक जीवन दांव पर लग जाए?

शालिनी ने अपने आंसू पोंछे और पार्क में लौट आई। उसने सहेलियों से सिरदर्द का बहाना बनाया और बच्चों को लेकर चुपचाप अपने फ्लैट में आ गई।

शाम को जब सुमित दफ्तर से लौटे, तो उन्होंने शालिनी के मुरझाए चेहरे और लाल आँखों को तुरंत पहचान लिया। सुमित ने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा और पूछा, “क्या बात है शालिनी? आज फिर मायके से कोई फोन आया था क्या? तुम्हारी यह खामोशी मुझे डराती है।”

शालिनी अपने आंसुओं का बांध और न रोक सकी। वह सुमित के सीने से लगकर फूट-फूट कर रो पड़ी। उसने बिना कुछ छिपाए सब कुछ सच-सच बता दिया—रोहन की गाड़ी की किस्त, माँ की धमकी, और अपने दिल में वर्षों से घुट रहे उस दर्द को, जो वह किसी से नहीं कह पाती थी।

“सुमित, मैं थक चुकी हूँ। मैं अपने ही परिवार की नजरों में सिर्फ एक साधन बन कर रह गई हूँ। जब भी उनका फोन आता है, मेरी रूह कांप जाती है। मुझे नहीं चाहिए ऐसा मायका जहाँ मेरी कोई कद्र नहीं, जहाँ सिर्फ पैसों से मेरे अस्तित्व की कीमत तय होती है,” शालिनी की आवाज में बेबसी और गुस्सा दोनों थे।

सुमित ने उसे पानी का गिलास थमाया और बहुत धैर्य से समझाया, “शालिनी, मेरी बात ध्यान से सुनो। मायके से प्यार और जुड़ाव होना हर लड़की का अधिकार है, लेकिन शोषण को सहना किसी का कर्तव्य नहीं है। जब तक तुम खुद ‘ना’ कहना नहीं सीखोगी, तब तक वे तुम्हें ऐसे ही भावनात्मक रूप से प्रताड़ित करते रहेंगे। रिश्ते पैसों की नींव पर नहीं, परस्पर सम्मान पर टिकते हैं। तुमने अपनी तरफ से हमेशा बेटी का फर्ज निभाया है, लेकिन अब वक्त आ गया है कि तुम अपने स्वाभिमान और अपने इस छोटे से परिवार के लिए सीमाएं तय करो। अगर तुम्हारे पैसे न देने से वे रिश्ते तोड़ते हैं, तो समझ लो कि वह रिश्ता कभी था ही नहीं।”

सुमित की बातों ने शालिनी के भीतर सोए हुए आत्मसम्मान को झकझोर कर जगा दिया। उसे समझ आ गया कि त्याग और कायरता में फर्क होता है। किसी की अनुचित मांगों के आगे घुटने टेकना प्यार नहीं, बल्कि अपनी बर्बादी को न्योता देना है।

अगली सुबह, शालिनी ने खुद अपनी माँ को फोन मिलाया। माँ ने फोन उठाते ही तंज भरे लहजे में कहा, “हाँ, क्या हुआ? दामाद जी ने पैसे भेज दिए क्या?”

शालिनी की आवाज में इस बार कोई कंपन नहीं था। उसकी आवाज में एक गजब का ठहराव और दृढ़ता थी। उसने कहा, “नहीं माँ, सुमित कोई पैसे नहीं भेजेंगे। और न ही मैं उनसे एक पैसा मांगने वाली हूँ।”

“क्या? तेरी यह मजाल! तू अपने भाई की बर्बादी का तमाशा देखेगी? तू भूल गई कि उस घर ने तुझे पाला-पोसा है?” माँ चीख पड़ीं।

शालिनी ने शांत भाव से जवाब दिया, “माँ, मुझे सब याद है। और शायद इसीलिए मैं और सुमित पिछले दस सालों से लगातार रोहन की हर गलती पर पर्दा डालते हुए आर्थिक मदद करते आए हैं। लेकिन अब और नहीं। रोहन पच्चीस साल का एक वयस्क पुरुष है। अगर उसने अपनी हैसियत से बाहर जाकर गाड़ी खरीदी है, तो उसकी किस्त भरने की जिम्मेदारी भी उसी की है। जब तक आप लोग उसे बैसाखियों पर चलाना बंद नहीं करेंगे, वह कभी अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाएगा।”

माँ ने गुस्से में कहा, “तो फिर भूल जाना कि तेरा कोई मायका भी है! इस चौखट पर कदम रखने की हिम्मत मत करना!”

शालिनी की आँखों से एक आखिरी आंसू टपका, जिसे उसने तुरंत पोंछ लिया। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “माँ, जिस घर में बेटी का मान केवल पैसों से तौला जाए, जिस घर का फोन आने पर बेटी की धड़कनें खुशी से नहीं बल्कि डर से बढ़ जाएं, वह मायका हो ही नहीं सकता। मायका तो सुकून का नाम होता है माँ, सौदेबाजी का नहीं। अगर आपकी नजर में मेरा मोल सिर्फ रुपयों तक सीमित है, तो मुझे भी ऐसा खोखला मायका नहीं चाहिए। आप सब अपना ख्याल रखिएगा। प्रणाम।”

शालिनी ने खुद ही फोन काट दिया। फोन काटते ही उसे महसूस हुआ जैसे उसके सीने से मनों भारी पत्थर उतर गया हो। वर्षों से जिस अपराधबोध और भय की बेड़ियों में वह जकड़ी हुई थी, आज वह उन सब से आजाद हो चुकी थी।

उसने बालकनी में आकर खुली हवा में एक लंबी और गहरी सांस ली। सूरज की सुनहरी किरणें उसके चेहरे को रोशन कर रही थीं। अंदर कमरे से बच्चों के हंसने की और सुमित के गुनगुनाने की आवाजें आ रही थीं। शालिनी मुड़ी और अपने उस खूबसूरत, सच्चे और प्यारे संसार की ओर पूरे आत्मविश्वास के साथ कदम बढ़ा दिए, जहाँ उसका सम्मान था, जहाँ उसका वास्तविक अस्तित्व था। उसने समझ लिया था कि सच्चा मायका किसी ईंट-पत्थर के मकान में नहीं, बल्कि उन अपनों के दिलों में होता है जो आपको बिना किसी स्वार्थ के स्वीकार करते हैं।

आपकी क्या राय है?

अक्सर हमारे समाज में बेटियों से यह उम्मीद की जाती है कि वे मायके के हर अभाव या गलती को चुपचाप सहकर आर्थिक और मानसिक रूप से पूरा करती रहें, भले ही इसके बदले उन्हें केवल उपेक्षा मिले। क्या शालिनी का अपने मायके की अनुचित मांगों के आगे ‘ना’ कहना सही फैसला था? या उसे रिश्तों को बचाने के लिए झुक जाना चाहिए था? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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मूल लेखिका : अर्चना सिंह

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