अनुपमा अस्पताल के उस ठंडे फर्श पर बैठकर अपनी किस्मत को कोसने लगी। उसके मन में आलोक पर भयानक गुस्सा और साथ ही बेइंतहा दर्द उमड़ रहा था। वह मन ही मन ईश्वर से लड़ने लगी, “हे भगवान! इसी दिन के लिए आलोक ने अपनी पूरी जिंदगी दूसरों पर लुटा दी थी? जब किसी को जरूरत थी तो आलोक अपनी जेब खाली करके खड़े हो जाते थे। आज जब उनकी अपनी सांसें उखड़ रही हैं, तो उनकी मदद करने वाला कोई नहीं है? क्या यही सिला मिलता है नेकी का? कहां हैं वे लोग जिनकी इन्होंने जिंदगी भर मदद की? कोई नहीं आया… सब मतलबी हैं!”
संसार का एक सीधा सा नियम है—जो बोओगे, वही काटोगे। मगर यह बात इंसान के समझ में तब आती है जब जिंदगी इम्तिहान के सबसे कठिन मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है। अनुपमा हमेशा अपने पति से एक बात सुनती थी, “इंसानियत वही है जो किसी गिरते हुए को सहारा दे दे, वरना अपने लिए तो हर कोई जी लेता है।” इस बात को लेकर दोनों के बीच न जाने कितनी बार बहस होती थी, कभी-कभी तो बात कई दिनों तक बोलचाल बंद होने तक पहुंच जाती थी। अनुपमा अपने पति आलोक और दो बच्चों—आरव और अनन्या के साथ कानपुर के एक मध्यमवर्गीय मुहल्ले में रहती थी। आलोक एक निजी टेक्सटाइल कंपनी में एकाउंटेंट के पद पर काम करते थे। सीमित वेतन था, पर खर्चे असीमित। गृहस्थी की गाड़ी ठीक-ठाक पटरी पर चलती रहे, इसके लिए अनुपमा घर पर ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने के साथ-साथ हाथ से बुनी ऊनी शॉल और स्वेटर बनाकर थोड़ी बहुत आमदनी जुटा लेती थी।
अनुपमा को आलोक से प्यार भी बहुत था और सम्मान भी, लेकिन आलोक की एक ऐसी आदत थी जिसने अनुपमा की रातों की नींद हराम कर रखी थी। आलोक का दिल इतना मोम का था कि वह किसी का भी दुख नहीं देख पाते थे। कोई भी उनके सामने रो दे, वह अपनी जेब टटोलकर जो कुछ भी होता, निकाल कर दे देते थे। वह यह भी नहीं सोचते थे कि महीने की कौन सी तारीख है, घर में राशन का डिब्बा खाली पड़ा है या बच्चों की स्कूल फीस जमा करनी बाकी है। जब भी अनुपमा इस बात पर टोकती, आलोक बड़े इत्मीनान से मुस्कुराते हुए कहते, “अनुपमा, जब भगवान ने हमें दो हाथ दिए हैं, तो किसी जरूरतमंद की तरफ एक हाथ बढ़ाने में कैसा संकोच? कोई हमारे पास तभी उम्मीद लेकर आता है जब दुनिया के बाकी सारे दरवाजे उसके लिए बंद हो जाते हैं। अगर हमने भी मुंह फेर लिया, तो इंसानियत से उसका भरोसा उठ जाएगा।”
एक बार की बात है, दीवाली का त्योहार सिर पर था। अनुपमा ने पाई-पाई जोड़कर और दिन-रात जागकर स्वेटर बुनकर कुछ पैसे इकट्ठे किए थे ताकि इस बार घर की पुताई हो सके और बच्चों के लिए नए कपड़े खरीदे जा सकें। आलोक को भी दफ्तर से छोटा सा बोनस मिला था। अनुपमा बेहद खुश थी कि इस बार का त्योहार बिना किसी तंगी के मनेगा। उसी दिन दफ्तर में काम करने वाला एक पुराना अर्दली, गिरधारी, सिर पकड़कर एक कोने में बैठा रो रहा था। आलोक से उसका रोना देखा नहीं गया। पास जाकर पूछा, “क्या बात है गिरधारी? त्योहार के दिन ऐसे आंसू क्यों बहा रहे हो?”
गिरधारी ने हाथ जोड़कर कांपती आवाज में कहा, “बाबूजी, मेरी बेटी की शादी तय हुई थी। लड़के वालों ने ऐन वक्त पर कुछ ऐसी मांग रख दी है जिसे पूरा करने में मेरी सारी जमा-पूंजी खत्म हो गई। अब बारात के स्वागत और विदाई के लिए मेरे पास दस हजार रुपये भी नहीं बचे हैं। अगर कल बारात दरवाजे से लौट गई, तो मेरी बेटी जीते जी मर जाएगी और समाज में मेरा मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगा।”
आलोक ने एक पल भी नहीं सोचा। उन्होंने अपनी जेब में रखा बोनस का लिफाफा और महीने के खर्च के लिए निकाले गए पैसे तुरंत गिरधारी के हाथ में रख दिए और बोले, “गिरधारी, परेशान मत हो। बेटी तुम्हारी ही नहीं, हमारी भी है। उसकी शादी की खुशियों में कोई कमी नहीं आएगी। तुम जाओ और धूमधाम से विदाई की तैयारी करो।” गिरधारी आलोक के पैर छूने लगा और उसकी आंखों से बहते आंसुओं में कृतज्ञता की असीम धारा थी।
शाम को जब आलोक खाली जेब घर पहुंचे, तो अनुपमा ने बाजार चलने के लिए थैला उठाया। आलोक ने नजरें झुकाकर जब पूरी बात बताई, तो अनुपमा के हाथ से थैला छूटकर नीचे गिर पड़ा। उसका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। वह चीख पड़ी, “क्या आप पूरी दुनिया का ठेका लेकर बैठे हैं? हमारे बच्चों के अरमानों का क्या? आरव कई महीनों से एक नई साइकिल मांग रहा है, अनन्या को सहेलियों के सामने पहनने के लिए एक अच्छी पोशाक चाहिए थी। आपने एक झटके में सब कुछ किसी और पर लुटा दिया! हमें तो कभी आपकी प्राथमिकता में जगह ही नहीं मिलती।”
आलोक ने शांत भाव से अनुपमा के कंधे पर हाथ रखा और बोले, “अनुपमा, साइकिल अगले महीने भी आ सकती है, बच्चे पुराने कपड़ों में भी सुंदर लगेंगे। लेकिन अगर किसी लाचार बाप की चौखट से बारात लौट जाती, तो क्या तुम दीवाली पर चैन से दीये जला पातीं? दुआओं की कीमत पैसों से कहीं ज्यादा होती है।” अनुपमा ने झटके से अपना हाथ छुड़ा लिया और कमरे में जाकर रोने लगी। वह मन ही मन यही सोचती रही कि ऐसे सीधे इंसान के साथ जिंदगी काटना कितना मुश्किल है जो खुद भूखा रहकर दूसरों को निवाला खिलाने की सनक पाले बैठा हो।
ऐसे किस्से आए दिन होते रहते थे। कभी किसी अनजान राहगीर का अस्पताल का बिल भर देना, कभी किसी मोहल्ले के गरीब बच्चे की किताबों का खर्च उठा लेना, तो कभी किसी बीमार रिश्तेदार की तीमारदारी में पूरी रात जागना। अनुपमा लड़ते-लड़ते थक चुकी थी और धीरे-धीरे उसने इसे आलोक का स्वभाव मानकर समझौता कर लिया था। समय बीतता गया। आरव ने अपनी पढ़ाई पूरी की और दूसरे शहर में एक अच्छी कंपनी में नौकरी करने लगा। अनन्या की शादी एक भले परिवार में हो गई और वह अपने ससुराल में सुखी थी। घर में अब सिर्फ आलोक और अनुपमा ही रह गए थे।
जिंदगी के उतार-चढ़ाव झेलते हुए उनकी शादी की तीसवीं वर्षगांठ का दिन आया। दोनों बच्चों ने फोन पर बधाई दी। आरव किसी जरूरी प्रोजेक्ट के सिलसिले में विदेश दौरे पर था और अनन्या की ससुराल में भी कोई पारिवारिक कार्यक्रम था, इसलिए दोनों आ नहीं सके। अनुपमा का मन थोड़ा उदास था, लेकिन आलोक ने सुबह उठते ही कहा, “चलो अनुपमा, आज का दिन हम दोनों के लिए बहुत खास है। आज हम शहर के सबसे पुराने शिव मंदिर चलेंगे, महादेव का आशीर्वाद लेंगे और वहीं से लौटते वक्त तुम्हारे लिए तुम्हारी पसंद की एक साड़ी खरीदेंगे।”
अनुपमा मुस्कुरा दी। दोनों तैयार होकर मंदिर पहुंचे। मंदिर में दर्शन करने के बाद जब वे बाहर निकली सीढ़ियों से उतर रहे थे, तभी सामने सड़क पर एक अजीब सी हलचल हुई। एक चार-पांच साल का छोटा सा बालक अपनी मां की उंगली छुड़ाकर सड़क के बीचों-बीच गिरी अपनी रंग-बिरंगी गेंद उठाने के लिए दौड़ पड़ा था। उसी समय मोड़ से एक अनियंत्रित गति से आती हुई भारी लोडिंग वैन तेजी से उस बच्चे की तरफ बढ़ रही थी। वैन का ड्राइवर शायद फोन पर बात कर रहा था या उसका संतुलन बिगड़ चुका था। बच्चे की मां सीढ़ियों से पागलों की तरह चीख रही थी, लेकिन कोई भी आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।
आलोक की नजर जैसे ही उस मासूम पर पड़ी, उनके पैर एक पल के लिए भी नहीं ठिठके। अनुपमा कुछ समझ पाती या उनका हाथ पकड़ पाती, इससे पहले ही आलोक बिजली की तेजी से सड़क की ओर लपके। उन्होंने पूरी ताकत से बच्चे को धक्का देकर सड़क के दूसरी तरफ सुरक्षित फुटपाथ पर गिरा दिया, लेकिन खुद को उस तेज रफ्तार वैन से बचा नहीं पाए। एक जोरदार धमाका हुआ और आलोक हवा में कई फीट उछलकर दूर सड़क के किनारे जा गिरे। उनका सिर डिवाइडर के नुकीले पत्थर से टकराया और चारों तरफ खून फैल गया।
अनुपमा की चीख से पूरा इलाका दहल उठा। वह बदहवास होकर भागी और सड़क पर पड़े आलोक के सिर को अपनी गोद में रख लिया। “आलोक! अपनी आंखें खोलो! देखो मैं क्या कह रही हूं… आलोक!” अनुपमा का पूरा शरीर कांप रहा था, उसके हाथ पति के खून से सन चुके थे। उस छोटे बच्चे की मां रोते हुए अपने बच्चे को सीने से लगाए आलोक के पास आई। आसपास के लोगों ने तत्परता दिखाई और एक ऑटो रिक्शा में डालकर आलोक को शहर के सबसे बड़े निजी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में पहुंचाया गया।
अस्पताल पहुंचते ही डॉक्टरों की टीम आलोक को आईसीयू में ले गई। अनुपमा फर्श पर बेसुध होकर बैठ गई। उसके आंसू सूख चुके थे और सांसें अटक रही थीं। कुछ ही देर में आईसीयू का दरवाजा खुला और ड्यूटी पर तैनात एक सीनियर डॉक्टर बाहर निकले। उनके चेहरे पर गहरी चिंता थी। डॉक्टर ने कहा, “मरीज की हालत बहुत ही नाजुक है। सिर में गंभीर चोट लगी है और अंदरूनी ब्लीडिंग हो रही है। तुरंत एक बड़ी सर्जरी करनी पड़ेगी। इसके अलावा इनके शरीर से बहुत खून बह चुका है, इनका ब्लड ग्रुप ‘ओ नेगेटिव’ है जो बहुत दुर्लभ है। हमें तुरंत तीन यूनिट खून की जरूरत है, और ऑपरेशन शुरू करने के लिए कम से कम तीन लाख रुपये की शुरुआती राशि तुरंत जमा करानी होगी, वरना हम सर्जरी शुरू नहीं कर पाएंगे।”
यह सुनते ही अनुपमा के पैरों तले से जमीन खिसक गई। तीन लाख रुपये! उसके बैंक खाते में तो मुश्किल से बीस-पच्चीस हजार रुपये पड़े थे। आरव को फोन लगाया, लेकिन उसका फोन फ्लाइट में होने की वजह से बंद आ रहा था। दामाद को फोन किया तो पता चला कि वे लोग शहर पहुंचने में कम से कम आठ घंटे लगाएंगे। अनुपमा बेबसी से हाथ जोड़कर डॉक्टर के सामने गिड़गिड़ाने लगी, “डॉक्टर साहब, मेरे पति को बचा लीजिए! वे बहुत भले इंसान हैं। उन्होंने आज भी एक मासूम की जान बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल दी। मैं अपने घर के सारे गहने बेच दूंगी, सब कुछ गिरवी रख दूंगी, बस आप ऑपरेशन शुरू कर दीजिए। मेरे पास इस वक्त इतने पैसे नहीं हैं।”
डॉक्टर ने बेबसी से सिर हिलाते हुए कहा, “माजी, हम नियमों से बंधे हैं। मैनेजमेंट की अनुमति के बिना इतनी बड़ी सर्जरी का सामान और दवाइयां इशू नहीं हो सकतीं।”
अनुपमा अस्पताल के उस ठंडे फर्श पर बैठकर अपनी किस्मत को कोसने लगी। उसके मन में आलोक पर भयानक गुस्सा और साथ ही बेइंतहा दर्द उमड़ रहा था। वह मन ही मन ईश्वर से लड़ने लगी, “हे भगवान! इसी दिन के लिए आलोक ने अपनी पूरी जिंदगी दूसरों पर लुटा दी थी? जब किसी को जरूरत थी तो आलोक अपनी जेब खाली करके खड़े हो जाते थे। आज जब उनकी अपनी सांसें उखड़ रही हैं, तो उनकी मदद करने वाला कोई नहीं है? क्या यही सिला मिलता है नेकी का? कहां हैं वे लोग जिनकी इन्होंने जिंदगी भर मदद की? कोई नहीं आया… सब मतलबी हैं!”
तभी अस्पताल के गलियारे में तेज कदमों की आहट सुनाई दी। अस्पताल के मुख्य सर्जन, जो उस शहर के सबसे माने हुए न्यूरोसर्जन थे, तेजी से आईसीयू की तरफ आ रहे थे। उनके साथ अस्पताल का प्रशासनिक स्टाफ भी था। जैसे ही वे आईसीयू के दरवाजे के पास पहुंचे, उनकी नजर खून से सनी अनुपमा और स्ट्रेचर के पास रखे आलोक के सामान पर पड़ी। डॉक्टर के कदम अचानक रुक गए। उन्होंने फाइल पर लिखा नाम पढ़ा—’आलोक शर्मा’।
डॉक्टर का चेहरा सफेद पड़ गया। उन्होंने तुरंत अनुपमा से पूछा, “माताजी, क्या ये वही आलोक शर्मा जी हैं जो न्यू टेक्सटाइल मिल में काम करते थे?”
अनुपमा ने रोते हुए सिर हिलाया। डॉक्टर ने एक पल भी नहीं गंवाया। उन्होंने पलटकर अपने पूरे स्टाफ को सख्त लहजे में आदेश दिया, “तुरंत ऑपरेशन थिएटर तैयार करो! सारी औपचारिकताएं, बिलिंग और पैसे बाद में देखे जाएंगे। इस मरीज की जान बचाना इस वक्त इस अस्पताल की सबसे पहली और सबसे बड़ी प्राथमिकता है।”
अस्पताल का रिसेप्शनिस्ट डरते हुए बोला, “लेकिन सर, मैनेजमेंट का नियम… डिपॉजिट मनी…”
डॉक्टर ने गुस्से में कहा, “नियमों को चूल्हे में डालो! इनके इलाज का एक-एक पैसा मैं अपनी जेब से भरूंगा। अगर किसी ने एक सेकंड की भी देरी की, तो मैं उसे सस्पेंड कर दूंगा।”
इसके बाद डॉक्टर ने तुरंत अपने फोन से ब्लड बैंक और अपने परिचित डॉक्टरों को फोन मिलाना शुरू किया। केवल पंद्रह मिनट के भीतर दुर्लभ ‘ओ नेगेटिव’ खून की तीन यूनिट की व्यवस्था हो गई। डॉक्टर खुद ओटी गाउन पहनकर ऑपरेशन थिएटर के अंदर चले गए। अनुपमा बाहर हाथ जोड़े स्तब्ध खड़ी थी। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि कुछ ही पलों में यह क्या चमत्कार हो गया।
लगभग साढ़े चार घंटे चला वह जटिल ऑपरेशन बेहद तनावपूर्ण था। अनुपमा का हर एक पल सदियों की तरह बीत रहा था। आखिरकार, ऑपरेशन थिएटर का लाल बल्ब बुझा और मुख्य सर्जन मुस्कुराते हुए बाहर निकले। उनके चेहरे पर संतोष की चमक थी। उन्होंने अपने ग्लव्स उतारे और सीधे आकर अनुपमा के सामने झुककर उनके दोनों हाथ पकड़ लिए।
“माताजी, भगवान का लाख-लाख शुक्र है। आलोक बाबू अब पूरी तरह खतरे से बाहर हैं। सर्जरी सफल रही है और ब्लीडिंग रोक दी गई है। कुछ ही घंटों में उन्हें होश आ जाएगा।”
अनुपमा की आंखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला। उसने हाथ जोड़कर कहा, “डॉक्टर साहब, आप हमारे लिए साक्षात ईश्वर बनकर आए हैं। आपने मेरे सुहाग को नई जिंदगी दी है। मैं आपका यह अहसान जिंदगी भर नहीं भूल पाऊंगी। पर मैं आपको जानती तक नहीं, फिर आपने हमारे लिए इतना सब कुछ क्यों किया?”
सर्जन की आंखें भी नम हो गईं। उन्होंने एक गहरी सांस ली और कहा, “माताजी, आपने मुझे नहीं पहचाना, लेकिन मैं आलोक बाबू को अपनी आखिरी सांस तक नहीं भूल सकता। मैं वही गिरधारी का बेटा हूं… विकास। जिसकी बहन की शादी टूटने की कगार पर थी और मेरे पिता दफ्तर के कोने में बैठकर अपनी बेबसी पर रो रहे थे। उस दिन अगर आलोक बाबू ने अपनी जेब से वो पैसे न दिए होते, तो न मेरी बहन की डोली उठ पाती और न ही उस सदमे से उबरकर मेरा परिवार मुझे आगे पढ़ा पाता। आलोक बाबू ने उस दिन मेरे पिता से कहा था कि गिरधारी, अपने बेटे को खूब पढ़ाना, इसे बड़ा आदमी बनाना।”
डॉक्टर विकास का गला रुंध गया, उन्होंने आगे कहा, “मेरे पिता अक्सर घर में आलोक बाबू की तस्वीर के सामने हाथ जोड़ते थे और कहते थे कि इस इंसान की वजह से आज हमारे घर की इज्जत बची है। मैंने दिन-रात एक करके मेडिकल की पढ़ाई की और आज जिस मुकाम पर हूं, वह आलोक बाबू की उसी नेकी की नींव पर खड़ा है। आज सुबह जब सड़क पर दुर्घटना हुई, तो जिस बच्चे को इन्होंने अपनी जान पर खेलकर बचाया, वह कोई और नहीं, मेरी इकलौती बहन का बेटा था! आलोक बाबू ने आज एक बार फिर मेरे पूरे परिवार को उजड़ने से बचा लिया। आज अगर मैं अपना पूरा जीवन भी इनकी सेवा में लगा दूं, तो भी इनका कर्ज नहीं चुका पाऊंगा।”
अनुपमा जड़वत खड़ी रह गई। उसके कानों में आलोक के वे पुराने शब्द गूंजने लगे—”दुआओं की कीमत पैसों से कहीं ज्यादा होती है… जो इंसानियत के लिए बोया जाता है, वह कभी व्यर्थ नहीं जाता।” अनुपमा को अपने उन तमाम तानों, झगड़ों और सोच पर इतनी ग्लानि हुई कि उसका सिर झुक गया। जिस नेकी को वह पति की फिजूलखर्ची और बेवकूफी समझती रही थी, उसी नेकी ने आज बैंक खाते के लाखों रुपयों से भी तेज काम किया था और मौत के मुंह से उसके पति को खींचकर वापस ले आई थी।
शाम ढलते-ढलते आलोक को होश आ गया। जब अनुपमा उनके पास पहुंची, तो आलोक ने बहुत धीमी आवाज में मुस्कुराते हुए कहा, “अनुपमा… बच्चा ठीक है न?”
अनुपमा की आंखों से आंसू टपक कर आलोक के हाथों पर गिरे। उसने उनका हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया और भरे गले से कहा, “हां, बच्चा भी बिल्कुल ठीक है और आपके इस नेक दिल की बदौलत आज मेरी पूरी दुनिया भी बच गई। आज मुझे समझ आ गया कि इंसान जो बैंक में जमा करता है, वह केवल तिजोरी में रहता है, लेकिन जो दूसरों की भलाई में लगाता है, वह ईश्वर के खाते में जमा होता है और मुसीबत में वही सबसे बड़ा सहारा बनकर लौटता है।”
आलोक की आंखों में संतोष था और अनुपमा के दिल में अपने पति के लिए अब किसी शिकायत की जगह अगाध श्रद्धा और सम्मान था।
दोस्तों, इस कहानी ने हमें यह सिखाया कि कभी-कभी हमें लगता है कि दूसरों की मदद करने से हमारा नुकसान हो रहा है, लेकिन वक्त आने पर नेकी का वह एक बीज वटवृक्ष बनकर हमें ही छाया देता है।
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