निया का परिवार कभी एक खूबसूरत संयुक्त परिवार था। एक ही आँगन में त्योहार मनते, बच्चों की हँसी गूँजती और किसी एक के घर की परेशानी पूरे परिवार की परेशानी बन जाती। मनमुटाव होते थे, लेकिन रिश्तों में दरार नहीं थी।
फिर एक दिन परिवार का बँटवारा हो गया।
कारोबार के हिस्से अलग हुए, पैसे का हिसाब हुआ और सब अपने-अपने घरों में चले गए। किसी के चेहरे पर संतोष था, किसी की आँखों में नमी। सबने यही सोचा था कि अलग रहने से रोज़ के छोटे-बड़े मतभेद खत्म होंगे और बच्चों को भी अनावश्यक तनाव से बचाया जा सकेगा।
लेकिन एक चीज अलग नहीं हुई थी—रिश्तों में छिपी हुई प्रतिस्पर्धा।
निया अपने पति के साथ अलग घर में रहने लगी। परिवार से दूरी आई, लेकिन अपनापन बना रहा। खासकर उसकी जेठानी सुनीता से उसका रिश्ता बहुत गहरा था।
सुनीता सामने से निया को अपनी छोटी बहन कहती।
“तुम मेरी देवरानी नहीं, मेरी बहन हो।”
निया उस पर पूरा विश्वास करती थी। घर की कोई बात हो, पति से कोई मनमुटाव हो या परिवार की कोई उलझन—निया सबसे पहले सुनीता से बात करती।
सुनीता उसकी बातें सुनती, उसे समझाती और हर बार यही कहती—
“तुम मुझ पर भरोसा कर सकती हो।”
निया को क्या पता था कि वही भरोसा धीरे-धीरे उसके खिलाफ इस्तेमाल होने वाला था।
बंटवारे के बाद निया के पति का काम तेजी से बढ़ने लगा। परिवार के लोग उसकी समझदारी की तारीफ करने लगे। निया भी हर रिश्ते को संभालने की कोशिश करती रही।
यही बात सुनीता को भीतर से परेशान करने लगी।
उसे लगने लगा कि निया का परिवार आगे निकल रहा है। उसे यह भी डर सताने लगा कि परिवार में निया का प्रभाव बढ़ता जा रहा है।
लेकिन सुनीता ने कभी निया से सीधे कुछ नहीं कहा।
उसने बस छोटे-छोटे बीज बोने शुरू किए।
“निया आजकल बहुत बदल गई है।”
“उसे अब शायद किसी की जरूरत नहीं रही।”
“वह हर बात में अपनी राय क्यों देती है?”
“मैं तो कुछ कहती नहीं… लेकिन कभी-कभी बहुत ज्यादा विश्वास भी ठीक नहीं होता।”
सुनीता की बातें हमेशा अधूरी होतीं।
वह आरोप नहीं लगाती थी।
सिर्फ संदेह पैदा करती थी।
और संदेह ऐसा बीज है जो एक बार मन में पड़ जाए तो सच से ज्यादा तेजी से बढ़ता है।
धीरे-धीरे परिवार की नजरें बदलने लगीं।
जो लोग निया की अनुपस्थिति में उसकी तारीफ करते थे, अब उसकी बातों में भी कमी खोजने लगे।
वह अपनी बात रखती तो कहा जाता—
“बहुत अधिकार जताने लगी है।”
वह चुप रहती तो—
“देखो, अब घमंड हो गया है।”
वह किसी काम में व्यस्त होती तो—
“अब परिवार की चिंता कहाँ है?”
निया हैरान थी।
उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर उसके साथ हो क्या रहा है।
सबसे ज्यादा चोट उसे तब लगी जब उसके अपने लोगों ने उसकी नीयत और ईमानदारी पर सवाल उठाना शुरू कर दिया।
जिस परिवार के लिए उसने वर्षों तक बिना किसी स्वार्थ के काम किया था, उसी परिवार के लोग अब उससे प्रमाण माँगने लगे थे।
एक दिन निया ने सुनीता से पूछा—
“जेठानी जी, क्या मुझसे कोई गलती हुई है?”
सुनीता ने उसे गले लगा लिया।
“पागल हो? तुम तो बिल्कुल ठीक हो। लोग तो बस बातें बनाते हैं।”
निया फिर उसकी बात पर विश्वास कर बैठी।
लेकिन कुछ ही दिनों बाद उसे पहली बार सच्चाई की झलक मिली।
वह अनजाने में सुनीता की बातचीत सुन बैठी।
“निया को अभी कुछ पता नहीं है,” सुनीता कह रही थी, “धीरे-धीरे सबको उसकी असलियत समझ आ जाएगी। बस हमें कुछ करना नहीं है… लोगों को खुद समझने देना है।”
निया वहीं जम गई।
असलियत? किसकी? उसकी?
जिस निया को वह खुद भी पहचानती थी, उसके बारे में किसी और ने कहानी लिख दी थी।
उस रात निया ने पिछले कई महीनों की सारी घटनाएँ याद कीं।
हर बदली हुई नजर।
हर अधूरी बात।
हर वह अवसर जब किसी ने अचानक उससे दूरी बना ली थी।
अब सब कुछ साफ दिखाई देने लगा।
सुनीता उसके खिलाफ अकेले नहीं लड़ रही थी।
वह धीरे-धीरे निया के अपने लोगों को ही उसके विरुद्ध खड़ा कर रही थी।
और सबसे बड़ा हथियार था—निया की चुप्पी।
निया ने सोचा था कि चुप रहने से परिवार में शांति बनी रहेगी।
लेकिन उसकी चुप्पी को उसकी कमजोरी समझ लिया गया।
अगले दिन निया ने पूरे परिवार को एक साथ बुलाया।
सुनीता भी वहाँ थी।
निया ने कोई चीख-पुकार नहीं की।
उसने बस एक-एक बात सामने रखी।
किस दिन क्या कहा गया।
किस बात को कैसे बदला गया।
किस बात का अर्थ किस तरह उलटकर परिवार तक पहुँचाया गया।
कमरे में धीरे-धीरे सन्नाटा छा गया।
निया ने सुनीता की ओर देखा।
“जेठानी जी, आपने मेरा पैसा नहीं छीना। आपने मेरा घर नहीं छीना। आपने मुझसे कोई अधिकार नहीं छीना।”
वह कुछ क्षण रुकी।
फिर उसकी आवाज काँप गई—
“आपने मुझसे मेरे अपनों का भरोसा छीना है।”
सुनीता की आँखों में आँसू आ गए।
निया ने आगे कहा—
“मैंने आपको अपनी बड़ी बहन माना था। इसलिए आपकी कही हर बात पर विश्वास किया। लेकिन आपने मेरे सामने मुझे गले लगाया और मेरी पीठ पीछे मेरे खिलाफ कहानी लिखती रहीं।”
कमरे में बैठे लोग सिर झुकाए थे।
निया की आँखों से आँसू बह रहे थे।
“और आप सब…” उसने परिवार की ओर देखते हुए कहा, “आपसे भी मुझे शिकायत है। आपने मुझसे एक बार पूछना भी जरूरी नहीं समझा। किसी की बात सुनकर आपने मेरी नीयत पर शक कर लिया। क्या इतने वर्षों का मेरा व्यवहार एक अफवाह से छोटा था?”
किसी के पास उत्तर नहीं था।
निया ने गहरी साँस ली।
“मैंने चुप्पी इसलिए रखी क्योंकि मुझे डर था कि सच बोलूँगी तो परिवार टूट जाएगा। लेकिन आज समझ आया है कि हर चुप्पी परिवार नहीं बचाती। कुछ चुप्पियाँ झूठ को ताकत देती हैं।”
सुनीता रोते हुए उसके पास आई।
“निया… मुझे माफ कर दो।”
निया ने उसे देखा।
“माफ करना आसान है, जेठानी जी। भरोसा वापस बनाना मुश्किल।”
वह कुछ पल चुप रही।
“मैं आपको माफ करती हूँ। लेकिन अब अपने बारे में बोले गए झूठ पर चुप नहीं रहूँगी।”
उस दिन निया ने किसी से बदला नहीं लिया।
उसने सिर्फ अपनी आवाज वापस पाई।
क्योंकि उसने समझ लिया था—
पीठ में घोंपा गया छुरा उतना दर्द नहीं देता, जितना यह देखना कि उसे घोंपने वाला अपना था और उसे पकड़ने वाले हाथ भी अपने ही थे।
और तब उसके मन में एक ही सवाल गूँजा—
कब तक चुप रहोगे?
जब झूठ तुम्हारे बारे में कहानी लिखता रहे?
जब तुम्हारे अपने तुम्हारी ईमानदारी पर शक करते रहें?
जब किसी और की आवाज तुम्हारे सच से ऊँची हो जाए?
तब चुप रहना शांति नहीं—अपने ही सच के साथ अन्याय है।
हिमानी बंसल