रितिका अब और खुद को संभाल नहीं पाई। उसके सब्र का बांध टूट गया और वह फफक-फफक कर कल्याणी जी के सीने से लिपट गई। वह किसी छोटी बच्ची की तरह रोने लगी, “मां… मुझे माफ कर दीजिए… मुझे माफ कर दीजिए मां!”
कल्याणी जी ने उसे कसकर अपने आलिंगन में भर लिया। रितिका के सारे आंसू कल्याणी जी के आंचल में समाते चले गए। वे उसके आंसू नहीं थे, बल्कि वह सारा ज़हर और मैल था जो इंटरनेट की आभासी दुनिया ने उसके मन में भर दिया था।
कुछ देर बाद जब रितिका का रोना थोड़ा थमा, तो कल्याणी जी ने हल्के से मुस्कुराते हुए उसके गाल खींचे और छेड़ते हुए बोलीं, “रोकर सारा गम बहा दिया ना? अब सुन, अगर दोबारा ऐसी कोई गलती की तो मैं समझाने के साथ-साथ दो थप्पड़ लगाने का और डांटने का भी हक रखती हूँ, समझी? चल अब, उठ, मुंह धोकर आ और मेरे साथ बैठकर यह गर्म चाय पी।”
मोबाइल स्क्रीन की नीली रोशनी में रितिका की आंखें गड़ी हुई थीं। वह लगातार अपनी उंगलियों से स्क्रीन को स्क्रोल करती जा रही थी। कभी कोई सास अपनी बहू पर ताने कसते हुए वीडियो में दिखती, तो कभी कोई बहू अपने ससुराल की बंदिशों का रोना रोते हुए व्यूज और लाइक्स बटोर रही होती।
“अरे रितिका! तू अपना फोन रख भी दे अब। ये सोशल मीडिया की रीलें और फालतू के ब्लॉग्स देखकर तूने अपने दिमाग का दही बना रखा है। ये सब सिर्फ फॉलोअर्स बढ़ाने के लिए नौटंकी करते हैं। हकीकत की दुनिया इससे कोसों दूर होती है, पगली!” उसकी सहेली तान्या ने कॉलेज की कैंटीन में टेबल पर चाय का कप रखते हुए उसे टोकते हुए कहा था।
लेकिन रितिका पर तान्या की किसी भी बात का रत्ती भर असर नहीं होता था। उसने एक गहरी सांस ली और फोन की स्क्रीन को बंद करते हुए तान्या की तरफ घूरकर देखा। रितिका ने पढ़ाई में हमेशा टॉप किया था। उसने अभी-अभी भोपाल के एक बड़े कॉलेज से फाइनेंस में मास्टर्स की डिग्री पूरी की थी। दिखने में बेहद खूबसूरत, समझदार और तेज-तर्रार, मगर एक जगह आकर उसकी सारी सूझबूझ जवाब दे जाती थी—वह थी उसकी सोशल मीडिया की लत और वहां से गढ़ी गई नकारात्मक धारणाएं।
रितिका के मन में यह बात पत्थर की लकीर की तरह बैठ चुकी थी कि चाहे ससुराल कितना भी पढ़ा-लिखा और संपन्न क्यों न हो, वे कभी बहू को अपनी बेटी नहीं मान सकते। वहां हर कदम पर राजनीति होती है, साजिशें रची जाती हैं और बहू को सिर्फ काम करने की मशीन और ताने सहने का जरिया समझा जाता है। हर रोज इंटरनेट पर ‘टॉक्सिक इन-लॉज’ और ‘सास-बहू की जंग’ वाले कंटेंट देख-देखकर उसका कोमल मन जाने-अनजाने ज़हरीले विचारों से भर गया था।
मास्टर्स खत्म होते ही रितिका के लिए इंदौर के एक बेहद प्रतिष्ठित और संभ्रांत परिवार से रिश्ता आया। लड़का, ईशान, एक सॉफ्टवेयर कंपनी में सीनियर आर्किटेक्ट था। शांत स्वभाव, सुलझा हुआ नजरिया और चेहर पर हमेशा रहने वाली एक सौम्य मुस्कान। उसके पिता एक सम्मानित कॉलेज से प्रोफेसर के पद से रिटायर हुए थे और मां, कल्याणी जी, एक सरल, धार्मिक और बेहद ममतामयी गृहिणी थीं।
परिवार की रजामंदी से दोनों की शादी बड़े धूमधाम से हो गई। रितिका को लगा कि वह शायद किसी ऐसे चक्रव्यूह में जा रही है जहां से बिना लड़े बाहर निकलना नामुमकिन होगा। विदाई के वक्त जब सब रो रहे थे, तब रितिका के मन में अपनी मां से बिछड़ने का दुख तो था ही, साथ ही भीतर एक अनजाना रक्षात्मक रवैया भी तैयार हो रहा था। उसने शादी के पहले ही खुद को मानसिक रूप से यह समझा लिया था कि उसे किसी के आगे झुकना नहीं है, क्योंकि जो झुकता है, उसे ही दुनिया दबाती है।
शादी के बाद जब रितिका अपनी नई दुनिया यानी इंदौर के उस शांत और खूबसूरत बंगले में पहुंची, तो वहां उसका स्वागत बड़े ही स्नेह और उल्लास के साथ हुआ। ईशान की मां कल्याणी जी ने आरती की थाल सजाई, बड़े लाड़ से उसका गृह प्रवेश कराया। लेकिन रितिका की नजरें हर बात में कोई न कोई छिपा हुआ षड्यंत्र ढूंढने में लगी थीं।
कल्याणी जी ने जब मुस्कुराते हुए कहा, “रितिका बेटा, सफर की थकान होगी, तुम अपने कमरे में जाकर थोड़ा आराम कर लो, पूजा हम शाम को कर लेंगे।” तो रितिका के मन में तुरंत रील की एक लाइन गूंज गई—’शुरुआत में सब मीठा बोलते हैं, बाद में असली रंग दिखाते हैं।’ उसने मन ही मन सोचा कि शायद सासू मां उसे यह जताना चाहती हैं कि घर के काम और नियम उन्हीं के हिसाब से चलेंगे।
शादी के शुरुआती हफ्ते यूं ही बीते। कल्याणी जी सुबह जल्दी उठतीं, लेकिन वे कभी रितिका को नहीं जगाती थीं। वे सोचतीं कि नई-नई बच्ची आई है, थकी होगी, उसे सोने दिया जाए। मगर जब रितिका उठती और नाश्ता पहले से बना देखती, तो उसे लगता कि यह उस पर ताना मारा जा रहा है कि तुम देर से उठती हो इसलिए काम हमें करना पड़ता है। अगर कल्याणी जी प्यार से कहतीं, “बेटा, आज दाल में थोड़ा सा जीरा ज्यादा डल गया, अगली बार थोड़ा ध्यान रखना,” तो रितिका का मुंह बन जाता। उसे लगता कि उसकी रसोई की परीक्षा ली जा रही है और उसे नीचा दिखाने की कोशिश हो रही है।
उसका यह चिड़चिड़ापन और मन का तनाव धीरे-धीरे उसके व्यवहार में झलकने लगा। वह छोटी-छोटी बातों पर उदास हो जाती, कमरे का दरवाजा बंद कर घंटों फोन पर वही नकारात्मक वीडियो देखने लगती। जो बात बिल्कुल सामान्य होती, उस पर भी वह तल्ख तेवर दिखाने लगती। ईशान कई बार उसे समझाने की कोशिश करता, उसके करीब आता, उससे पूछता कि क्या कोई परेशानी है, तो वह झिड़क देती, “तुम लोग मुझे कभी समझ ही नहीं सकते! तुम्हारे घर में मुझे सांस लेने की भी आजादी नहीं है।” ईशान हैरान रह जाता कि आखिर ऐसा क्या हुआ है जो यह इतनी भड़क रही है।
एक दिन रविवार की दोपहर थी। घर में सब शांति से बैठे थे। ईशान ने कमरे में आकर बड़े प्यार से रितिका से कहा, “रितिका, मां कह रही थीं कि आज शाम को मौसी जी और उनके बच्चे मिलने आ रहे हैं। अगर तुम्हारी तबीयत ठीक हो तो तुम भी नीचे आ जाना, सबसे मुलाकात हो जाएगी। मां ने यह भी कहा कि अगर तुम थक गई हो तो कोई ज़बरदस्ती नहीं है।”
बस, इतनी सी बात पर रितिका का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उसके दिमाग में फिर वही इंटरनेट की बातें गूंजने लगीं कि ‘ससुराल वाले हमेशा रिश्तेदारों के सामने बहू की नुमाइश करते हैं।’
वह एकदम से बिफर पड़ी और चिल्लाकर बोली, “वाह ईशान! तुम और तुम्हारी मां मुझे क्या समझ कर रखे हो? क्या मैं कोई खिलौना हूँ जिसे जब चाहा रिश्तेदारों के आगे सजाकर खड़ा कर दिया? जब देखो तब किसी न किसी का आना-जाना लगा रहता है! क्या मेरी कोई पर्सनल लाइफ नहीं है? मुझे नहीं मिलना किसी से! तुम लोग सिर्फ अपनी मर्जी मुझ पर थोपना चाहते हो!”
ईशान ने उसे शांत करने की कोशिश की, “रितिका, आवाज़ नीची करो! मां ने बस प्यार से पूछा है, कोई दबाव नहीं डाला। तुम बात का बतंगड़ क्यों बना रही हो?”
“हां! अब मैं ही गलत हूँ! तुम तो हमेशा अपनी मां की ही तरफदारी करोगे! तुम सब एक जैसे हो, बस मुझे दबाना चाहते हो!” रितिका के चिल्लाने की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि उसकी गूंज पूरे घर में फैल गई।
बाहर ड्राइंग रूम में बैठी कल्याणी जी के कानों में जब बहू की ये तीखी और बेरुखी भरी बातें पड़ीं, तो उनका दिल दहल गया। वे जो हाथ में चाय की प्याली लिए बैठी थीं, उनके हाथ कांप गए। उन्होंने तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस बच्ची को वे अपनी बेटी मानकर इस घर में लाई हैं, उसके दिल में उनके लिए इतनी कड़वाहट और ज़हर भरा हुआ है। कल्याणी जी की आंखों में आंसू छलक आए। वे चुपचाप उठीं और भारी कदमों से चलकर घर के पीछे बने छोटे से आंगन में रखी तुलसी की क्यारी के पास जाकर बैठ गईं।
आंगन में लगे नीम के पेड़ से छनकर आती धूप उनके उदास चेहरे पर पड़ रही थी। उन्होंने अपने आंसुओं को पल्लू के कोने से पोंछा। उन्हें रितिका पर गुस्सा नहीं आ रहा था, बल्कि उसके उस आंतरिक दर्द और नफ़रत को देखकर तरस आ रहा था जो बिना किसी कारण के उसके दिल को जला रहा था। एक मां का दिल भला अपनी ही संतान से नफ़रत कैसे कर सकता था?
शाम ढल चुकी थी। रिश्तेदार आकर चले भी गए थे। कल्याणी जी ने खुद ही सबको संभाला और किसी को यह भनक तक नहीं लगने दी कि घर में कोई तनाव है। मेहमानों के जाने के बाद उन्होंने रसोई में जाकर अदरक वाली ताज़ा चाय बनाई और दो कप ट्रे में सजाए। वे धीरे-धीरे कदमों से रितिका के कमरे की ओर बढ़ीं।
कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था। रितिका बिस्तर पर बैठी थी, उसका चेहरा गुस्से और रोने की वजह से सूजा हुआ था। उसने कल्याणी जी को अंदर आते देखा तो तुरंत अपनी नज़रें फेर लीं और चेहरे पर एक सख्त भाव ले आई, मानो वह किसी नए युद्ध के लिए तैयार हो रही हो।
कल्याणी जी ने कोई नाराजगी नहीं दिखाई। वे मंद मुस्कान के साथ उसके पास आईं, चाय का कप साइड टेबल पर रखा और खुद रितिका के पास बिस्तर पर बैठ गईं।
“रितिका बेटा, चाय ठंडी हो जाएगी, ले लो,” कल्याणी जी ने बेहद शांत और सहज स्वर में कहा।
रितिका ने कोई जवाब नहीं दिया, बस अपनी उंगलियां मरोड़ती रही।
कल्याणी जी ने उसके ठंडे पड़ चुके हाथ को अपने दोनों हाथों में थाम लिया। उनके स्पर्श में इतनी कोमलता और गर्माहट थी कि रितिका चाहकर भी अपना हाथ झटक नहीं पाई।
“बेटा, क्या बात है? तुम इतनी परेशान क्यों रहती हो? मुझसे कोई गलती हो गई क्या? अगर तुम मुझे बताओगी नहीं, तो मैं तुम्हारी मदद कैसे कर पाऊंगी?” कल्याणी जी की आवाज़ में किसी शिकायत का नामोनिशान नहीं था, केवल एक चिंता और दुलार था।
रितिका फिर भी खामोश रही, लेकिन उसका सीना भारी हो रहा था।
कल्याणी जी ने उसके चेहरे की लटों को प्यार से पीछे करते हुए कहा, “बेटा, ज़िंदगी बहुत खूबसूरत होती है, लेकिन कभी-कभी हमारे सामने ऐसी परिस्थितियां आ जाती हैं जहां हमारा धीरज डोलने लगता है। जब मन में उलझनें हों और कुछ समझ न आ रहा हो, तो उस वक्त अधीर होकर अपने ही रिश्तों को चोट नहीं पहुंचाई जाती। ऐसे समय में मन को शांत रखना पड़ता है। दुखी होकर या दूसरों पर दोष मढ़ देने से किसी समस्या का हल नहीं निकलता, बच्ची।”
रितिका ने चौंककर सास की तरफ देखा। उसे लगा था कि आज उसे डांट पड़ेगी, उस पर चिल्लाया जाएगा, लेकिन यहां तो सब कुछ उल्टा हो रहा था।
कल्याणी जी ने आगे समझाया, “तू एक नए घर में आई है, नए माहौल में आई है। तूने अपनी पूरी ज़िंदगी अपने मायके में बिताई है, वहां की आदतें अलग थीं, यहां की अलग हैं। इस नए रिश्ते को, इस नए घर को थोड़ा समय दे बेटा। जब दो बर्तन साथ रहते हैं तो कभी-कभार खटकते ही हैं। कभी आपस में थोड़ी बहुत तकरार या नोंक-झोंक हो भी जाए, तो उसे इतना बड़ा रूप मत लेने दिया कर कि वह तुम्हारे रिश्ते की बुनियाद को ही हिला दे। प्यार में थोड़ी खट्टी-मीठी बातें तो होती ही हैं, लेकिन उन्हें पल दो पल में गले मिलकर सुलझा लेना चाहिए। यही तो सच्चे प्रेम और परिवार की ताकत होती है।”
कल्याणी जी की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने रितिका के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “तू इस घर की बहू बनकर आई है रितिका, लेकिन जिस दिन तूने पहली बार इस चौखट पर कदम रखा था, मेरे दिल ने तुझे अपनी बेटी मान लिया था। और जब अपनी बेटी ही उदास हो, घुट-घुट कर जी रही हो, तो एक मां को कैसे चैन मिल सकता है?”
उन्होंने अपने आंचल से रितिका के माथे का पसीना पोंछा और अपने दिल पर हाथ रखते हुए कहा, “बेटा, अपनी इस मां से तू कभी भी अपने दिल की हर बात कह सकती है। जो भी गुस्सा हो, जो भी शिकायत हो, सीधे आकर मुझसे कह दे। लेकिन एक बार… सिर्फ एक बार अपने इस परिवार पर विश्वास करके देख। तू मेरी अपनी है, और इस घर का हर कोना, हर इंसान सिर्फ तेरा है।”
कल्याणी जी के इन शब्दों ने रितिका के भीतर बरसों से जमी बर्फ को पिघलाकर रख दिया। वह जो अपने चारों तरफ एक सख्त दीवार बनाकर बैठी थी, वह दीवार एक ही पल में ढह गई। वह जिसे अपनी दुश्मन समझ रही थी, वह तो सामने साक्षात मां बनकर उसका दर्द बांटने बैठी थी।
रितिका अब और खुद को संभाल नहीं पाई। उसके सब्र का बांध टूट गया और वह फफक-फफक कर कल्याणी जी के सीने से लिपट गई। वह किसी छोटी बच्ची की तरह रोने लगी, “मां… मुझे माफ कर दीजिए… मुझे माफ कर दीजिए मां!”
कल्याणी जी ने उसे कसकर अपने आलिंगन में भर लिया। रितिका के सारे आंसू कल्याणी जी के आंचल में समाते चले गए। वे उसके आंसू नहीं थे, बल्कि वह सारा ज़हर और मैल था जो इंटरनेट की आभासी दुनिया ने उसके मन में भर दिया था।
कुछ देर बाद जब रितिका का रोना थोड़ा थमा, तो कल्याणी जी ने हल्के से मुस्कुराते हुए उसके गाल खींचे और छेड़ते हुए बोलीं, “रोकर सारा गम बहा दिया ना? अब सुन, अगर दोबारा ऐसी कोई गलती की तो मैं समझाने के साथ-साथ दो थप्पड़ लगाने का और डांटने का भी हक रखती हूँ, समझी? चल अब, उठ, मुंह धोकर आ और मेरे साथ बैठकर यह गर्म चाय पी।”
रितिका ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। उसने उठकर आईने में अपना चेहरा देखा। आज पहली बार उसे आईने में अपनी आंखों में कोई डर या नफ़रत नहीं दिखी, बल्कि एक सुकून और प्यार की चमक दिखाई दे रही थी।
वह बाथरूम में मुंह धोकर बाहर आई और कल्याणी जी के पास आकर बैठ गई। चाय की चुस्की लेते हुए रितिका सोचने लगी कि वह कितनी बड़ी नादान और मूर्ख थी। जो सोशल मीडिया पर चंद लाइक्स के लिए झूठी कहानियां गढ़ी जाती हैं, वह उन्हें ही सच मान बैठी थी। उसने हकीकत में मौजूद उन सच्चे और मासूम रिश्तों को देखा ही नहीं जो उस पर जान छिड़कते थे। उसने मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया और सोचा—’काश, ऐसी समझने वाली, मां जैसी ममतामयी सास हर लड़की को मिले, जो बहू के कड़वे बोलों का जवाब भी अमृत जैसे प्यार से दे।’
उस दिन के बाद से उस घर की आबोहवा पूरी तरह बदल गई। रितिका ने अपने फोन से उन सभी नेगेटिव पेजों और ग्रुप्स को अनफॉलो कर दिया। अब वह सुबह उठकर कल्याणी जी के साथ रसोई में हाथ बंटाती, उनसे नई-नई रेसिपी सीखती और कभी कोई मनमुटाव होता तो कमरे में बैठकर घुटने के बजाय सीधे जाकर सासू मां के गले लग जाती।
ईशान जब शाम को घर लौटता, तो आंगन में सास और बहू को एक साथ खिलखिलाते देखकर उसका दिल सुकून से भर जाता। घर अब सिर्फ चार दीवारों का मकान नहीं रह गया था, बल्कि वह सचमुच प्यार, विश्वास और समझदारी का एक खूबसूरत मंदिर बन चुका था। रितिका ने समझ लिया था कि रिश्तों को स्क्रीन पर देखकर नहीं, बल्कि दिल की नजरों से देखकर जिया जाता है।
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