सुनैना ने मुस्कुराते हुए अपने आंसू पोंछे और कहा, “बाबूजी, आज से रोज सुबह की पहली चाय आपके कमरे में, आपके उठने से पहले पहुंचेगी। और जब तक आप चाय नहीं पी लेंगे, इस घर का कोई दूसरा चूल्हा नहीं जलेगा।”
पंकज ने आगे बढ़कर पिता और पत्नी दोनों को अपने आलिंगन में समेट लिया। सुबह का सूरज अब पूरी तरह निकल चुका था और उसकी सुनहरी धूप दालान में उस पुरानी चारपाई तक फैल गई थी, मानो ईश्वर स्वयं उस घर में लौटे प्रेम और सम्मान पर अपनी कृपा बरसा रहा हो।
सुबह की पहली किरण अभी आकाश के पूर्वी छोर पर लालिमा बिखेर ही रही थी कि पुराने लकड़ी के तख्त से करवट बदलते हुए जगन्नाथ जी की नींद टूट गई। कमर में उठती हल्की सी टीस ने उन्हें अहसास कराया कि उम्र के पचहत्तरवें पड़ाव पर शरीर अब पहले जैसा साथ नहीं देता। उन्होंने आहिस्ता से अपने दोनों पैर जमीन पर टिकाए, बगल में रखी पुरानी छड़ी को थामा और धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए दालान की ओर चल पड़े।
दालान के कोने में बिछी वही पुरानी सुतली की चारपाई मानो वर्षों से उनकी मूक संगी बन चुकी थी। कभी इस घर की हर ईंट उनकी मेहनत की गवाही देती थी, लेकिन आज उनका पूरा संसार इसी दालान और इस पुरानी चारपाई तक सिमट कर रह गया था। चारपाई पर बैठते ही उन्होंने अपनी छड़ी को दीवार के सहारे टिका दिया और दोनों हाथों से घुटनों को सहलाने लगे।
जगन्नाथ जी की पत्नी अन्नपूर्णा को गुजरे आज पूरे छह साल हो गए थे। जब तक अन्नपूर्णा थीं, सुबह की पहली चाय बिना मांगे उनके बिस्तर पर हाजिर होती थी। चाय की चुस्कियों के साथ दोनों पुरानी यादों और बच्चों के भविष्य की बातें किया करते थे। पर अन्नपूर्णा के जाने के बाद घर का भूगोल और रिश्तों का मौसम दोनों पूरी तरह बदल गए थे।
चारपाई की ढीली सुतलियों में छिपे खटमलों ने जैसे ही उनकी बांह पर डंक मारा, जगन्नाथ जी ने चौंककर हाथ से अपनी आस्तीन झाड़ी। उन्होंने मन को शांत करने के लिए दोनों आँखें मूंद लीं और ईश्वर के ध्यान में लीन होने की चेष्टा की। पर शरीर की लाचारी और मन की बेचैनी ने ज्यादा देर तक ध्यान टिकने नहीं दिया। एक हल्की सी आह उनके होंठों से निकली और उन्होंने अपनी धुंधली नजरें घर के भीतरी हिस्से की ओर घुमाईं।
भीतर कमरे में उनका इकलौता बेटा पंकज अभी गहरी नींद में था। पंकज शहर के एक बड़े दफ्तर में काम करता था, रात देर से लौटना और सुबह देर तक सोना उसकी दिनचर्या बन चुकी थी। पोता आरव और पोती रिया भी अपने-अपने बिस्तरों में सुकून की नींद ले रहे थे। तभी रसोईघर से बर्तनों के टकराने की खटपट सुनाई दी।
जगन्नाथ जी समझ गए कि बहू सुनैना जाग चुकी है। रात भर से उनके सूखे गले में एक कप गर्म चाय की तलब मच रही थी। जैसे ही उन्होंने आवाज लगाने के लिए मुंह खोला, पुरानी दमे की खांसी का दौरा सा उठ आया। उन्होंने अपनी हथेली मुंह पर रखकर खांसी को दबाने की कोशिश की और संकोच भरे लहजे में आवाज दी, “बहू… जरा एक कप चाय मिल जाती तो बड़ी कृपा होती।”
रसोई में सिंक के पास खड़ी सुनैना के कान में जैसे ही ससुर की आवाज पड़ी, उसके माथे पर गहरी त्योरियां चढ़ गईं। नल की धार तेज करते हुए वह बुदबुदाई, “लो, हो गई सुबह की शुरुआत। चिड़ियों के चहकने से पहले ही इनकी फरमाइशें शुरू हो जाती हैं। कभी चाय, कभी पानी, कभी दवा, कभी नाश्ता। दिन भर इसी दालान में खूंटे की तरह बंधे रहते हैं, फिर भी चैन नहीं। मोहल्ले के बाकी बुजुर्ग तो अपने हाल में मस्त रहते हैं, पर यहां तो सांस लेना भी दूभर है।”
कुछ पल सन्नाटा छाया रहा। जगन्नाथ जी को लगा शायद बर्तन के शोर में उनकी आवाज दब गई होगी। उन्होंने थोड़ा और जोर लगाकर कहा, “बहू! थोड़ी सी चाय… अदरक डालकर बना देती तो गले को राहत मिल जाती।”
सुनैना ने हाथ में पकड़ा चाय का पतीला जोर से गैस के चूल्हे पर पटका और बाहर की ओर मुंह करके तल्खी से बोली, “अभी सूरज ठीक से निकला भी नहीं है बाबूजी! पूरे घर का काम पड़ा है, झाड़ू-पोंछा बाकी है, बच्चों का टिफिन तैयार करना है। मैं अकेली जान किस-किस की सेवा में लगूं? जूठे बर्तनों का ढेर लगा है, पहले उन्हें धोऊं या आपके लिए स्पेशल चाय की केतली चढ़ाऊं? थोड़ा सब्र नाम की चीज भी होनी चाहिए इंसान में।”
बहू की तीखी बातें तीर की तरह जगन्नाथ जी के दिल में चुभ गईं। उन्होंने अपनी गर्दन नीचे झुका ली और चुप हो गए। रसोई से फिर वही बर्तनों की खनखनाहट और चम्मचों की आवाजें आने लगीं, जो हर बार उनके मन में यह उम्मीद जगा देती थीं कि शायद अब चाय छन रही होगी।
सुनैना अंदर ही अंदर बड़बड़ाती रही, “रात भर खांस-खांसकर पूरे घर की नींद हराम करते हैं और सुबह होते ही हुक्म चलाना शुरू। न खुद चैन से रहते हैं, न दूसरों को रहने देते हैं। इंसान बूढ़ा हो तो समझदार बने, यहां तो बच्चों जैसी जिद पकड़ लेते हैं।”
आधे घंटे तक जगन्नाथ जी उसी आस में खाली पेट बैठे रहे। उनके सूखे होंठ चाय की एक घूंट के लिए तरस रहे थे। जब रसोई से गैस बंद होने की आवाज आई और सुनैना कमरे में पोछा लगाने चली गई, तो जगन्नाथ जी को अहसास हो गया कि आज भी चाय के लिए घंटों इंतजार करना पड़ेगा। उनकी आँखों के कोरों से नमी की एक बूंद फिसलकर झुर्रियों में समा गई। भारी मन से उन्होंने जेब से मोटा चश्मा निकाला, आंखों पर चढ़ाया और लाठी टेकते हुए मन बहलाने के लिए घर की दहलीज लांघकर बाहर निकल पड़े।
सुबह की ठंडी हवा चल रही थी। जबलपुर की वह संकरी सड़क अभी पूरी तरह जागी नहीं थी। इक्का-दुक्का लोग ही सैर पर निकले थे। जगन्नाथ जी लाठी के सहारे धीरे-धीरे कदम बढ़ा रहे थे कि अचानक पीछे से किसी की पहचानी हुई, उत्साह भरी आवाज गूंजी,
“अरे जगन्नाथ चाचा!”
जगन्नाथ जी के लड़खड़ाते कदम रुक गए। उन्होंने मुड़कर चश्मे को नाक पर ठीक करते हुए देखा। सामने एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति मुस्कुराता हुआ खड़ा था।
“पहचाना नहीं चाचा? मैं महेंद्र… स्वर्गीय रामेश्वर जी का छोटा बेटा। पंद्रह साल पहले मुंबई चला गया था, वहीं अपना कारोबार जमा लिया है। कल ही अपने पैतृक घर कुछ दिनों के लिए आया हूं।”
महेंद्र ने झुककर जगन्नाथ जी के चरण स्पर्श किए और फिर उनके झुर्रीदार, कमजोर चेहरे को गौर से देखते हुए बोला, “अरे चाचा, आप तो बहुत कमजोर लग रहे हैं! सच कहूं तो इतने सालों बाद देखकर खुशी भी हुई और ताज्जुब भी… मुझे लगा था कि शायद आप… खैर, पुरानी बातें छोड़िए। इस उम्र में आपको सड़क पर अकेले देखकर मन भर आया। चलिए, नुक्कड़ वाले शर्मा जी के ढाबे पर चलते हैं, आज आपके साथ बैठकर गरमा-गरम चाय की चुस्की लेते हैं। फिर जिंदगी का क्या भरोसा, दोबारा मिलना हो न हो।”
‘चाय’ शब्द सुनते ही जगन्नाथ जी का दिल जैसे भीतर तक कांप गया। जिस चाय की एक बूंद के लिए वे अपने ही घर में बहू के तानों से छलनी होकर निकले थे, उसी चाय का न्योता बाहर सड़क पर एक पराया इंसान इतने अपनत्व और सम्मान से दे रहा था।
जगन्नाथ जी ने कुछ पलों तक महेंद्र के चेहरे को अपलक देखा। उनके पास शब्द नहीं थे, बस आँखों में एक गहरा दर्द और सन्नाटा तैर रहा था।
“क्या हुआ चाचा? चलिए ना, दो घूंट चाय ही तो पीनी है,” महेंद्र ने उनका हाथ पकड़ना चाहा।
पर जगन्नाथ जी ने धीरे से अपना हाथ पीछे खींच लिया। उनके आत्मसम्मान ने उन्हें झकझोर दिया था। जिस घर को उन्होंने अपने खून-पसीने से सींचा था, जिस बेटे को उंगली पकड़कर चलना सिखाया था, अगर उसी घर में उन्हें चाय नसीब नहीं थी, तो बाहर किसी की दया पर चाय पीना उन्हें गवारा न हुआ।
वे बिना कुछ बोले, एक झटके में मुड़े और वापस अपने घर की ओर कदम बढ़ा दिए।
पीछे से महेंद्र पुकारता रहा, “अरे चाचा! सुनिए तो… एक कप चाय तो पीते जाइए…”
पर जगन्नाथ जी नहीं रुके। उनके पीछे केवल उनकी लाठी की ‘खट-खट’ की सूखी आवाज गूंजती रही।
घर के मुख्य द्वार पर पहुंचते ही उन्होंने देखा कि उनका बेटा पंकज सैर से लौट चुका था और मुख्य दरवाजे पर ही खड़ा होकर जूते उतार रहा था। पंकज ने पिता को हांफते हुए लाठी टेककर अंदर आते देखा, तो उसने हैरानी से पूछा, “बाबूजी, आप इतनी सुबह-सुबह कहां चले गए थे? आपकी तबीयत ठीक नहीं रहती, और आप अकेले बाहर निकल गए?”
जगन्नाथ जी ने कोई उत्तर नहीं दिया। वे चुपचाप अपनी उसी पुरानी चारपाई पर जाकर बैठ गए और लाठी को दीवार से टिका दिया। उनकी सांसें तेज चल रही थीं और चेहरा उतरा हुआ था।
पंकज ने देखा कि पिता की आँखों में आंसू थे। वह तुरंत उनके पास आया और चारपाई पर उनके पास बैठ गया। “क्या हुआ बाबूजी? आपकी आँखों में आंसू क्यों हैं? किसी ने कुछ कहा क्या?”
तभी सुनैना एक बड़े से सुंदर सिरेमिक मग में भाप उड़ाती हुई चाय लेकर कमरे से बाहर आई और मुस्कुराते हुए बोली, “लीजिए सुनिए, आपकी स्पेशल इलायची वाली चाय। आप टहलकर आ गए, मैं तो आपका ही इंतजार कर रही थी।”
पंकज ने चाय का मग हाथ में लिया, लेकिन उसका ध्यान अभी भी पिता के उदास चेहरे पर था। उसने सुनैना से पूछा, “सुनैना, बाबूजी को चाय दे दी तुमने?”
सुनैना का चेहरा थोड़ा फक पड़ गया। उसने नजरें चुराते हुए कहा, “वो… मैं तो अभी-अभी चाय बनाकर लाई हूं। सुबह से बहुत काम था, झाड़ू-बर्तन कर रही थी। बाबूजी तो बिना बताए ही बाहर निकल गए।”
जगन्नाथ जी ने धीमे स्वर में, बिना किसी शिकायत के भाव से कहा, “बेटा, मुझे किसी चाय की जरूरत नहीं है। तू पी ले। मेरी उम्र हो गई है, अब तो बस उस दिन का इंतजार है जब भगवान अपने पास बुला ले।”
पंकज का माथा ठनका। उसने पिता के कांपते हाथों को अपने हाथों में ले लिया। “बाबूजी, सच बताइए, बात क्या है?”
जगन्नाथ जी का सब्र का बांध टूट गया। रुंधे हुए गले से उन्होंने कहा, “बेटा, आज जब मैं गली से गुजर रहा था, तो पुराने पड़ोसी रामेश्वर का बेटा महेंद्र मिला। उसने मुझे सड़क पर देखते ही कहा कि ‘चाचा, आप अभी तक जिंदा हैं? चलिए मेरे साथ एक कप चाय पी लीजिए, फिर कभी मुलाकात हो न हो।’ पंकज, एक बाहर वाला, जिसे मुझसे कोई सरोकार नहीं, वह सड़क पर रोककर मुझे चाय पिलाने का मान दे रहा था। और मैं… मैं अपने ही बनाए घर में सुबह से एक कप गर्म पानी और चाय की पत्ती के लिए तरस गया। अगर मेरी मौजूदगी तुम लोगों पर इतनी भारी पड़ रही है, तो मुझे किसी वृद्धाश्रम छोड़ आओ बेटा, कम से कम वहां वक्त पर दो घूंट चाय तो बिना ताने सुने मिल जाएगी।”
यह सुनते ही पंकज के पैरों तले से जमीन खिसक गई। हाथ में पकड़ा हुआ चाय का मग कांपने लगा। उसने पलटकर सुनैना की ओर देखा। सुनैना का सिर शर्म से झुक चुका था।
पंकज की आवाज में एक गहरा दर्द और रोष था। उसने सुनैना की आंखों में देखते हुए कहा, “सुनैना, यह चाय मैं नहीं पी सकता। इस चाय में मिठास नहीं, मेरे बाबूजी के आंसुओं का खारापन घुला है।”
पंकज ने चाय का मग वहीं मेज पर रख दिया और अपनी पत्नी से बोला, “सुनैना, आज हम जिस आलीशान मकान में छत के नीचे चैन से सो रहे हैं, तुम्हें पता है यह किसकी बदौलत है? जब मैं छोटा था, तो बाबूजी के पास इतने पैसे नहीं होते थे कि वे अपने लिए एक नया कुर्ता भी खरीद सकें। उन्होंने फटी बनियान पहनकर मुझे शहर के सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ाया। जब कभी मैं बीमार पड़ता था, तो बाबूजी रात भर अपनी गोद में सिर रखकर मुझे सहलाते थे ताकि मैं सो सकूं। आज जब वे बूढ़े और लाचार हो गए हैं, जब उन्हें केवल हमारे प्रेम और सम्मान की जरूरत है, तब हम उन्हें एक कप चाय के लिए भी तरसा रहे हैं?”
पंकज की आँखें भर आईं। उसने आगे कहा, “सुनैना, याद रखो, आज जो व्यवहार हम अपने माता-पिता के साथ कर रहे हैं, कल हमारे बच्चे आरव और रिया हमारे साथ वही दोहराएंगे। बच्चे वही सीखते हैं जो देखते हैं। अगर आज हमने अपने संस्कारों की बलि चढ़ा दी, तो कल बुढ़ापे में हमारे लिए भी कोई एक कप चाय बनाने वाला नहीं होगा।”
पंकज की हर एक बात सुनैना के अंतर्मन को झकझोर रही थी। उसने कभी इस दृष्टिकोण से सोचा ही नहीं था। वह तो केवल अपनी रोजमर्रा की व्यस्तता और झुंझलाहट को सही मान बैठी थी। उसे अपनी भूल, अपनी संवेदनहीनता और अपने कठोर शब्दों का गहरा अहसास हुआ। उसे याद आया कि कैसे बाबूजी ने उसकी पहली रसोई पर उसे सोने की अंगूठी उपहार में दी थी और हमेशा उसे बेटी का दर्जा दिया था।
सुनैना की आँखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले। वह बिना कुछ कहे तुरंत रसोई की ओर भागी।
उसने गैस जलाई, एक नए बर्तन में दूध, अदरक, इलायची और चाय पत्ती डाली। उसने बड़े ही जतन और श्रद्धा से चाय को पकाया। चाय को एक सुंदर कप में छाना और साथ में दो हल्के बिस्कुट एक प्लेट में सजाए।
कांपते हाथों और आंसुओं से भीगे चेहरे के साथ सुनैना दालान में आई। वह सीधे जगन्नाथ जी की चारपाई के पास जमीन पर घुटनों के बल बैठ गई। उसने चाय की प्लेट जगन्नाथ जी के सामने रखी और उनके दोनों कमजोर, झुर्रीदार पैरों को पकड़ लिया।
“बाबूजी… मुझे माफ कर दीजिए,” सुनैना फूट-फूट कर रो पड़ी। “मुझसे बहुत बड़ा पाप हो गया। काम के दबाव और नासमझी में मैं यह भूल गई थी कि आप इस घर के आधार हैं। एक बहू होने के नाते आपकी सेवा करना मेरा सबसे पहला कर्तव्य था, लेकिन मैंने अपने कड़वे बोल से आपके आत्मसम्मान को चोट पहुंचाई। बाबूजी, मुझे अपनी नादान बेटी समझकर माफ कर दीजिए। अगर आज आपने यह चाय नहीं पी, तो मैं जिंदगी भर अपने आप को माफ नहीं कर पाऊंगी।”
दालान में एक अजीब सा भावुक सन्नाटा छा गया। पंकज चुपचाप खड़ा अपनी पत्नी के इस हृदय परिवर्तन को देख रहा था।
जगन्नाथ जी ने अपनी भीगी आँखों से बहू की ओर देखा। उनके दिल में कोई मैल या बदले की भावना नहीं थी। माता-पिता का दिल तो क्षमा का सागर होता है। उन्होंने कांपते हाथों से सुनैना के सिर पर हाथ रख दिया।
“उठो बहू, रोते नहीं,” जगन्नाथ जी का स्वर बेहद कोमल और स्नेह से भरा था। “तू तो मेरी बेटी जैसी है। सुबह-सुबह घर-गृहस्थी के सौ काम होते हैं, मैं ही शायद ज्यादा अधीर हो गया था। तूने अपनी भूल मान ली, मेरे लिए यही बहुत है।”
जगन्नाथ जी ने अपने कांपते हाथों से चाय का प्याला उठाया और उसकी पहली चुस्की ली। वह केवल चाय की चुस्की नहीं थी, बल्कि वर्षों से उपेक्षित पड़े रिश्ते में घुली हुई अपनत्व की मिठास थी। उस गर्म चाय ने न केवल उनके सूखे गले को तर किया, बल्कि उनके बूढ़े, उदास दिल में जीवन का एक नया उजाला भर दिया।
सुनैना ने मुस्कुराते हुए अपने आंसू पोंछे और कहा, “बाबूजी, आज से रोज सुबह की पहली चाय आपके कमरे में, आपके उठने से पहले पहुंचेगी। और जब तक आप चाय नहीं पी लेंगे, इस घर का कोई दूसरा चूल्हा नहीं जलेगा।”
पंकज ने आगे बढ़कर पिता और पत्नी दोनों को अपने आलिंगन में समेट लिया। सुबह का सूरज अब पूरी तरह निकल चुका था और उसकी सुनहरी धूप दालान में उस पुरानी चारपाई तक फैल गई थी, मानो ईश्वर स्वयं उस घर में लौटे प्रेम और सम्मान पर अपनी कृपा बरसा रहा हो।
दोस्तों, यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि आज के समाज के उस कड़वे सच का आईना है जहाँ बुजुर्ग अपने ही घरों में छोटी-छोटी खुशियों और सम्मान के लिए मोहताज हो जाते हैं। क्या हमारे बुजुर्ग केवल जिम्मेदारियों का बोझ हैं, या वे हमारे जीवन की वह अमूल्य छांव हैं जिनके बिना हमारा अस्तित्व अधूरा है? आपके अनुसार एक परिवार में बुजुर्गों को उनका खोया हुआ सम्मान कैसे लौटाया जा सकता है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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