साढ़े तीन साल का नन्हा कबीर अपने छोटे-छोटे हाथों में लकड़ी की टूटी हुई रेलगाड़ी लिए बैठक के कोने में चुपचाप बैठा था। उसके मासूम चेहरे पर गहरी असमंजस की लकीरें खिंची हुई थीं। दरवाजे की चौखट पर उसके पिता आलोक खड़े थे और उनके साथ एक शांत, सौम्य चेहरे वाली स्त्री खड़ी थी, जिसकी आँखों में एक अजीब सा ठहराव और हल्का संकोच था। आलोक ने आगे बढ़कर कबीर को अपनी गोद में उठाया, उसके गालों को चूमा और बेहद भीगे हुए गले से बोले, “चीकू बेटा, देख कौन आया है… तेरी नई मां।”
‘मां’ शब्द सुनते ही कबीर की बड़ी-बड़ी आँखें चमक उठीं। उसने अपनी नजरें उस स्त्री के चेहरे पर टिका दीं। उसके नन्हे मन में एक हलचल सी मच गई। उसे लगा शायद उसकी वही पुरानी मां लौट आई है जो रात को उसे लोरी गाकर सुलाती थी और माथे पर हाथ फेरती थी। लेकिन जैसे ही उसने उस नई औरत का चेहरा गौर से देखा, उसका उत्साह पलक झपकते ही बुझ गया। यह चेहरा तो बिल्कुल अलग था। न वह जानी-पहचानी खुशबू थी, न वह पुरानी ममतामयी मुस्कान। कबीर सहमकर आलोक के सीने से चिपट गया और उसकी आँखें डबडबा गईं।
आलोक ने कबीर के नन्हे सिर पर हाथ फेरते हुए बड़े प्यार से समझाया, “बेटा, तेरी पहले वाली मां को तो भगवान जी ने अपने पास एक बहुत जरूरी काम से बुला लिया था। वो अब तारों के देश में रहती है। उसने वहां से देखा कि मेरा चीकू अकेला पड़ गया है, इसलिए भगवान जी के हाथ उसने इस नई मां को तेरे लिए भेजा है। जब तक तू बड़ा नहीं हो जाता, यह मां तेरा पूरा ख्याल रखेगी।”
कबीर ने अपने पिता की आँखों में देखा। उसे लगा कि जब पापा कह रहे हैं, तो बात बिल्कुल सच ही होगी। उसके बालमन ने मान लिया कि शायद भगवान जी ने उसकी मां का रूप बदलकर उसे वापस धरती पर भेज दिया है। कबीर धीरे से आलोक की गोद से उतरा, अपने डगमगाते कदमों से आगे बढ़ा और उस स्त्री के पल्लू को अपनी नन्हीं मुट्ठी में पकड़कर बोला, “मां… तुम आ गईं?”
उस स्त्री की आँखों से बरबस दो बूंद आंसू छलक पड़े। उसने झुककर उस मासूम को अपनी छाती से भींच लिया। उस आलिंगन में एक खालीपन को भरने की तड़प थी।
यह कहानी शुरू हुई थी लगभग छह साल पहले, जब भोपाल के एक शांत मोहल्ले में आलोक और गरिमा का विवाह हुआ था। दोनों का दांपत्य जीवन किसी शांत नदी की तरह बह रहा था। गरिमा केवल एक कुशल गृहिणी ही नहीं, बल्कि घर की आत्मा थी। विवाह के दो साल बाद जब कबीर का जन्म हुआ, तो मानो घर में खुशियों का कोई उत्सव शुरू हो गया। कबीर की खिलखिलाहट, उसके नन्हें कदमों की चाप और उसकी तोतली आवाज ने पूरे परिवार को एक नई ऊर्जा से भर दिया था। आलोक जब दिनभर की भागदौड़ के बाद ऑफिस से लौटते, तो गरिमा की मुस्कान और कबीर की उछलकूद उनकी सारी थकान हर लेती थी। गरिमा कबीर के पालन-पोषण में इस कदर रम गई थी कि उसे अपनी सुध-बुध ही नहीं रहती थी।
लेकिन किस्मत के क्रूर खेल को कौन टाल सकता है। उस दिन मौसम बड़ा सुहावना था। शाम के वक्त तेज हवाएं चलने लगी थीं। गरिमा छत पर फैले कपड़े समेटने के लिए ऊपर गई। अचानक तेज आंधी के साथ हल्की बूंदाबांदी शुरू हो गई। गरिमा कपड़े लेकर सीढ़ियों की तरफ तेजी से भागी। बारिश के कारण सीढ़ियों की चिकनी सतह पर उसका पैर फिसल गया। संभलने का एक क्षण भी नहीं मिला और वह सिर के बल नीचे आ गिरी। तेज आवाज सुनकर जब तक आलोक दौड़कर पहुंचे, गरिमा के सिर से खून की धार बह निकली थी। अस्पताल पहुंचते-पहुंचते डॉक्टरों ने गरिमा को मृत घोषित कर दिया।
हंसता-खेलता परिवार एक ही झटके में वीरान हो गया। आलोक की दुनिया जैसे पत्थर बन गई थी। जिस घर में कल तक गरिमा की चूड़ियों की खनक गूंजती थी, वहां अब केवल एक सन्नाटा और मातम पसरा था। सबसे हृदयविदारक स्थिति कबीर की थी। वह अबोध बच्चा यह समझ ही नहीं पा रहा था कि उसकी मां अचानक कहां गायब हो गई। जब लोग सफेद कफन में लिपटी गरिमा को ले जा रहे थे, कबीर रोते हुए अपनी मां की उंगली पकड़ने की कोशिश कर रहा था।
शुरुआती कुछ महीने आलोक के लिए किसी नरक से कम नहीं थे। दिन तो जैसे-तैसे ऑफिस के काम में बीत जाता, पर रात होते ही कबीर का रोना शुरू हो जाता। वह दरवाजे की तरफ उंगली दिखाकर कहता, “पापा, मां कब आएगी? मां को बुलाओ ना।” आलोक अपने आंसुओं को पीकर कबीर को सीने से लगाते और आसमान में सबसे चमकीले तारे को दिखाकर कहते, “बेटा, मां वहां चली गई है, बहुत दूर… वो तुझे रोज देखती है।” बच्चा मासूमियत से कहता, “पापा, गाड़ी से जाकर मां को ले आओ ना, मुझे भूख लगी है।” आलोक का कलेजा छलनी हो जाता।
कभी आलोक की बहन आकर कुछ दिन रह जाती, तो कभी कोई रिश्तेदार। लेकिन कोई भी अपनी गृहस्थी छोड़कर हमेशा के लिए वहां नहीं रह सकता था। कबीर उपेक्षित होने लगा था। समय पर खाना न मिलना, बीमार पड़ने पर रात-रात भर जागकर सेवा करने वाला कोई न होना—इन सबने कबीर को चिड़चिड़ा और कमजोर बना दिया था। रिश्तेदारों और दोस्तों ने आलोक को समझाना शुरू किया कि जिंदगी इतनी लंबी है और कबीर अभी बहुत छोटा है, बिना मां के इस बच्चे का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। आलोक को भी समझ आने लगा था कि कबीर को बचाने के लिए उन्हें अपने जीवन में एक नया कदम उठाना ही होगा।
तभी एक पारिवारिक परिचित के जरिए वंदना का प्रस्ताव आया। वंदना इंदौर की रहने वाली थी और उसकी अपनी एक दर्दनाक दास्तान थी। तीन साल पहले उसका विवाह हुआ था, लेकिन ससुराल पहुंचते ही उसे पता चला कि उसका पति शराब का आदी और भयंकर हिंसक प्रवृत्ति का व्यक्ति था। वह वंदना पर हाथ उठाता, गालियां देता और आए दिन दहेज के ताने मारता। वंदना ने रिश्ते को बचाने की हर मुमकिन कोशिश की, लेकिन जब पानी सिर से ऊपर गुजर गया, तो उसने आत्मसम्मान की खातिर तलाक की अर्जी दे दी। कानूनी लड़ाई जीतकर वह अपने मायके लौट आई थी, जहां समाज के तानों और तिरस्कार भरी नजरों ने उसका जीना दूभर कर दिया था। वक्त की मार ने उसके मन को झकझोर कर रख दिया था, लेकिन उसके भीतर की ममता और करुणा अभी मरी नहीं थी।
आलोक और वंदना की पहली मुलाकात एक साधारण मंदिर के प्रांगण में हुई। आलोक ने बिना कोई लाग-लपेट के सीधे शब्दों में कहा, “वंदना जी, मैं आपसे झूठ नहीं बोलूंगा। मेरे दिल में किसी नए रिश्ते के लिए शायद वह जगह नहीं है जो एक सामान्य पति-पत्नी के बीच होती है। मेरे जीवन का केवल एक ही मकसद है—मेरा बेटा कबीर। वह मेरी सांसों में बसता है। मुझे अपने लिए पत्नी से ज्यादा कबीर के लिए एक ममतामयी मां चाहिए। अगर आप मेरे बच्चे को अपना समझकर पाल सकें, तो यह घर और मेरा हर सम्मान आपका होगा।”
वंदना ने आलोक की आँखों में एक लाचार पिता का दर्द देखा। उसने उस सच्चाई को महसूस किया जिसमें कोई छल नहीं था। वंदना ने शांत भाव से कहा, “आलोक जी, मैंने रिश्तों में केवल धोखे और दर्द देखे हैं। मुझे भी एक ऐसे आशियाने की तलाश है जहां सम्मान हो और किसी को मेरी जरूरत हो। अगर मैं उस बेसहारा बच्चे की सूनी दुनिया को संवार सकी, तो मुझे लगेगा कि मेरे जीवन का कोई अर्थ है।”
दोनों परिवारों की सहमति से एक बेहद सादे समारोह में आलोक और वंदना का विवाह संपन्न हो गया। कोई धूमधाम नहीं, कोई दिखावा नहीं—बस दो टूटी हुई जिंदगियों ने एक-दूसरे का हाथ थाम लिया।
विवाह के बाद जब वंदना आलोक के घर आई, तो कबीर के साथ उसका रिश्ता वहीं से शुरू हुआ जहां उसने उसे ‘नई मां’ के रूप में स्वीकार किया था। लेकिन कहानी जितनी सरल दिखती थी, धरातल पर उतनी थी नहीं। एक बच्चे के मन में अपनी सगी मां की छवि को मिटाए बिना नई जगह बनाना कांटों भरे रास्ते पर चलने जैसा था।
शुरुआती दिनों में कबीर जब भी गुस्सा होता या किसी बात पर मचल जाता, तो वह चिल्ला पड़ता, “तुम मेरी असली मां नहीं हो! तुम गंदी हो, मेरी पुरानी मां अच्छी थी!” ऐसे शब्द किसी भी स्त्री के कलेजे को चीर देने के लिए काफी थे। आलोक घबरा जाते और कबीर पर डांटने लगते, लेकिन वंदना आलोक का हाथ पकड़कर रोक देती। वह मुस्कुराकर कहती, “आलोक जी, धीरज रखिए। उसने बहुत कम उम्र में अपना सबसे बड़ा सहारा खोया है। उसका गुस्सा स्वाभाविक है। अगर मैं इसके गुस्से को नहीं समझूंगी, तो मां कैसे कहलाऊंगी?”
वंदना ने कबीर को जीतने के लिए शब्दों का नहीं, बल्कि अपने असीम प्रेम और सेवा का सहारा लिया। वह सुबह सबसे पहले उठकर कबीर की पसंद का नाश्ता बनाती। जब कबीर स्कूल जाता, तो वह खुद उसका बस्ता तैयार करती, उसके जूतों के फीते बांधती। दोपहर में जब कबीर स्कूल से लौटता, तो वंदना दरवाजे पर बाहें फैलाए उसका इंतजार करती मिलती। कबीर अक्सर खाना खाने में नखरे करता, थाली फेंक देता, लेकिन वंदना कभी नाराज नहीं होती। वह तरह-तरह की कहानियां सुनाकर, खिलौनों से बहलाकर उसे एक-एक निवाला अपने हाथों से खिलाती।
एक बार की बात है, सर्दियों का मौसम था। कबीर को अचानक रात में तेज बुखार आ गया। उसका बदन तवे की तरह तप रहा था। आलोक शहर से बाहर एक आवश्यक दफ्तर के काम से गए हुए थे और फोन पर नेटवर्क की समस्या थी। रात के दो बजे कबीर उल्टियां करने लगा और बेहोशी की हालत में ‘मां-मां’ पुकारने लगा। वंदना के हाथ-पैर फूल गए, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। कड़ाके की ठंड में उसने अकेले कबीर को अपनी गोद में उठाया, चादर में लपेटा और पड़ोस के एक सज्जन की मदद से उसे तुरंत नजदीकी अस्पताल ले गई।
अस्पताल में डॉक्टरों ने बताया कि बच्चे को गंभीर निमोनिया हो गया है और उसे तुरंत ड्रिप चढ़ानी होगी। जब नर्स कबीर के नन्हे हाथ में सुई लगाने लगी, तो कबीर दर्द से चीख पड़ा और उसने वंदना की गर्दन को दोनों हाथों से जकड़ लिया। वह रोते हुए कह रहा था, “मां, मुझे बचा लो… बहुत दर्द हो रहा है मां!”
उस रात वंदना एक पल के लिए भी नहीं सोई। वह अस्पताल की संकरी बेंच पर बैठकर कबीर के सिर पर ठंडे पानी की पट्टियां रखती रही। उसकी आँखों से लगातार आंसू बह रहे थे और उसके होंठ ईश्वर से कबीर की सलामती की प्रार्थना कर रहे थे। उसने कबीर के माथे को चूमते हुए कहा, “कुछ नहीं होगा मेरे बच्चे को, तेरी मां तेरे पास है।”
अगली सुबह जब आलोक बदहवास हालत में अस्पताल पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि कबीर वंदना की गोद में सिर रखकर शांति से सो रहा था और वंदना की आँखें रतजगे के कारण लाल थीं, लेकिन उसके चेहरे पर एक गहरी राहत की चमक थी। डॉक्टर ने आलोक से कहा, “अगर रात को यह बच्चा अस्पताल लाने में थोड़ी भी देर हो जाती, तो स्थिति बेहद गंभीर हो सकती थी। आपकी पत्नी ने पूरी रात जिस तरह इस बच्चे की देखभाल की है, कोई सगी मां भी इससे ज्यादा क्या करती।”
आलोक की आँखें भर आईं। उन्हें महसूस हुआ कि ईश्वर ने गरिमा को छीनकर जो घाव दिया था, वंदना के रूप में उस पर मरहम लगा दिया था।
अस्पताल से घर लौटने के बाद कबीर के भीतर एक बड़ा परिवर्तन आ चुका था। अब वह वंदना को एक पल के लिए भी अपनी नजरों से दूर नहीं होने देता था। जब वंदना रसोई में खाना बनाती, तो कबीर वहीं जमीन पर बैठकर अपनी कॉपियों पर लकीरें खींचता रहता। अब वह उसे ‘नई मां’ नहीं, बल्कि सिर्फ ‘मां’ कहकर पुकारता था।
समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। धीरे-धीरे दो वर्ष बीत गए। कबीर अब छह वर्ष का हो चुका था और पहली कक्षा में पढ़ता था। वंदना ने कबीर को केवल लाड़-प्यार ही नहीं दिया, बल्कि उसे अच्छे संस्कार भी सिखाए। उसने कबीर के भीतर किताबों के प्रति रुचि जगाई, बड़ों का आदर करना सिखाया और हर परिस्थिति में सच बोलने की आदत डाली। मोहल्ले के लोग जो शुरुआत में कानाफूसी करते थे कि ‘सौतेली मां कभी अपनी नहीं हो सकती’, अब वंदना के समर्पण की मिसालें दिया करते थे।
एक दिन कबीर के स्कूल में ‘मातृ दिवस’ का विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। सभी बच्चों को अपनी माताओं के साथ स्कूल आना था। वहां एक चित्रकला और भाषण प्रतियोगिता रखी गई थी, जिसका विषय था—”मेरी मां, मेरी दुनिया।”
वंदना और आलोक दोनों कबीर के साथ स्कूल पहुंचे। कबीर ने मंच पर जाकर अपनी बनाई हुई एक सुंदर पेंटिंग दिखाई। उस पेंटिंग में एक पेड़ की घनी छाया के नीचे एक नन्हा परिंदा बैठा हुआ था और उस परिंदे के सिर पर एक बड़ा सा सुरक्षात्मक पंख फैला हुआ था।
जब कबीर को माइक पर बोलने के लिए बुलाया गया, तो उसने अपने नन्हे हाथों से माइक थामा और बोलना शुरू किया:
“मेरे पापा कहते हैं कि हर बच्चे के पास एक मां होती है, लेकिन मैं इस दुनिया का सबसे किस्मत वाला बच्चा हूं क्योंकि मेरे पास दो माताएं हैं। एक मां वो है जो मुझे जन्म देकर भगवान के पास चली गई और तारों में बैठकर मुझे देखती है। लेकिन मेरी दूसरी मां वो है जिसे भगवान ने खास तौर पर सिर्फ मेरे लिए जमीन पर भेजा है। जब मुझे बुखार आता है, तो यह रात भर नहीं सोती। जब मुझे भूख लगती है, तो पहले मुझे खिलाती है, फिर खुद खाती है। मेरे चोट लगने पर रोने वाली मेरी यह मां है। लोग कहते हैं कि मां पेट से जन्म देती है, लेकिन मेरी मां ने मुझे अपने दिल से जन्म दिया है। मैं अपनी मां से बहुत प्यार करता हूं।”
इतना कहकर कबीर मंच से नीचे उतरा और उसने दौड़कर वंदना के दोनों पैरों को छू लिया और फिर उसके गले से लिपट गया।
पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। स्कूल के शिक्षकों, प्राचार्या और वहां उपस्थित सैकड़ों अभिभावकों की आँखें नम हो गई थीं। वंदना फूट-फूट कर रो पड़ी। उसने कबीर को अपनी गोद में उठा लिया। आज समाज के वे सारे ताने, अतीत के सारे जख्म और मन की सारी कड़वाहट उस नन्हे बच्चे के आंसुओं और आलिंगन में धुल चुकी थी।
आलोक एक तरफ खड़े होकर इस दृश्य को देख रहे थे। उनका सीना गर्व और कृतज्ञता से भर गया था। उन्होंने मन ही मन ऊपर आसमान की ओर देखा, मानो गरिमा से कह रहे हों—”देखो गरिमा, हमारा बच्चा अब अकेला नहीं है। उसे एक ऐसी मां मिल गई है जिसने अपने आंचल की छांव से उसकी पूरी दुनिया को महका दिया है।”
उस दिन यह साबित हो गया कि मातृत्व केवल खून के रिश्तों का मोहताज नहीं होता। ममता की असली पहचान उस निस्वार्थ भाव, त्याग और समर्पण में है जो किसी दूसरे के अस्तित्व को अपना बनाकर उसे पूर्णता प्रदान कर दे। वंदना ने यह साबित कर दिया था कि कोख से बड़ा दिल होता है, और जब एक औरत किसी अनाथ बच्चे को अपने दिल में पनाह देती है, तो वहां साक्षात ईश्वर का वास होता है।
घर लौटते समय कबीर ने वंदना का हाथ कसकर पकड़ रखा था। शाम की हल्की सुनहरी धूप उनके चेहरे पर पड़ रही थी। जिंदगी ने एक नया, सुखद और प्रेरणादायक मोड़ ले लिया था, जहां अब किसी पुराने दर्द की परछाई नहीं थी, बल्कि आने वाले उज्ज्वल कल की एक अटूट मुस्कान थी।
दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि मातृत्व का संबंध केवल जन्म देने से नहीं, बल्कि निस्वार्थ प्रेम और पालन-पोषण से होता है? क्या वंदना जैसी महिलाएं हमारे समाज के लिए एक सच्ची प्रेरणा नहीं हैं? अपनी राय हमें नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।
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मूल लेखक : बालेश्वर गुप्ता